अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
युद्धकाण्ड - सर्ग ३: विभीषणकी शरणागति, समुद्रका त्रास तथा सेतु-बन्धनका आरम्भ
सर्ग ३ ] युद्धकाण्ड २४१
प्रधानपुरुषाभ्यां स जगत्कृत्स्नं सृजत्यजः ।
कालरूपेण कलनां जगतः कुरुतेऽव्ययः ॥४१॥
कालरूपी स भगवान् रामरूपेण मायया ॥४२॥
ब्रह्मणा प्रार्थितो देवस्त्वद्वधार्थमिहागतः ।
दन्यथा कथं कुर्यात्सत्यसङ्कल्प ईश्वरः ॥४३॥
हनिष्यति त्वां रामस्तु सपुत्रबलवाहनम् ।
हन्यमानं न शक्नोमि द्रष्टुं रामेण रावण ॥४४॥
त्वां राक्षसकुलं कृत्स्नं ततो गच्छामि राघवम् ।
मयि याते सुखीभूत्वा रमस्व भवने चिरम् ॥४५॥
विभीषणो रावणवाक्यतः क्षणा-
द्विसृज्य सर्वं सपरिच्छदं गृहम् ।
जगाम रामस्य पदारविन्दयोः
सेवाभिकाङ्क्षी परिपूर्णमानसः ॥४६॥
अजन्मा होकर भी प्रधान और पुरुषरूपसे सम्पूर्ण जगत्की रचना करते हैं और अविनाशी होकर भी कालरूपसे जगत्का संहार करते हैं ॥ ४१ ॥ वे ही कालरूपी भगवान् ब्रह्माकी प्रार्थनासे आपका वध करनेके लिये मायासे रामरूप होकर यहाँ आये हैं। ईश्वर सत्यसंकल्प हैं, इसलिये वे अपनी प्रतिज्ञाको अन्यथा कैसे कर सकते हैं ॥ ४२-४३ ॥ अतः राम अवश्य ही आपको पुत्र, सेना और वाहनादिके सहित मारेंगे। हे रावण ! मैं रामद्वारा सम्पूर्ण राक्षसंवश और आपका संहार होता नहीं देख सकता। अतः मैं रघुनाथजीके पास जाता हूँ। मेरे चले जानेपर आप आनन्दपूर्वक अपने महलमें बहुत समयतक भोग भोगना”॥४४-४५॥
इस प्रकार, सन्तुष्टचित्त विभीषण रावणके कठोर भाषणसे एक क्षणमें ही समस्त सामग्रीके सहित अपने घरको छोड़कर भगवान् रामके चरणकमलोंकी सेवाकी कामनासे उनके पास चले गये ॥ ४६ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
तृतीय सर्ग
विभीषणकी शरणागति, समुद्रका त्रास तथा सेतु-बन्धका आरम्भ।
श्रीमहादेव उवाच
विभीषणो महाभागश्चतुर्भिर्मन्त्रिभिः सह ।
आगत्य गगने रामसम्मुखे समवस्थितः ॥ १ ॥
उच्चैरुवाच भोः स्वामिन् राम राजीवलोचन ।
रावणस्यानुजोऽहं ते दारहर्तुर्विभीषणः ॥ २ ॥
नाम्ना भ्रात्रा निरस्तोऽहं त्वामेव शरणं गतः।
हितमुक्तं मया देव तस्य चाविदितात्मनः ॥ ३ ॥
सीतां रामाय वैदेहीं प्रेषयेति पुनः पुनः ।
उक्तोऽपि न शृणोत्येव कालपाशवशं गतः ॥ ४ ॥
हन्तुं मां खड्गमादाय प्राद्रवद्राक्षसाधमः ।
श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! तदनन्तर महाभाग विभीषण अपने चार मन्त्रियोंके साथ आकर आकाशमें श्रीरघुनाथजीके सामने उपस्थित हुए ॥ १ ॥ और ऊँचे स्वरसे कहने लगे—"हे कमलनयन प्रभो राम ! मैं आपकी भार्याका हरण करनेवाले रावणका छोटा भाई हूँ । मेरा नाम विभीषण है । मुझे भाईने निकाल दिया है, इसलिये मैं आपकी शरणमें आया हूँ । हे देव ! मैंने उस अज्ञानीके हितकी बात कही थी ॥ २-३ ॥ उससे वार-वार कहा है कि ‘तुम विदेहनन्दिनी सीताको रामके पास भेज दो,’ तथापि कालके वशीभूत होनेके कारण वह कुछ सुनता ही नहीं है ॥४॥ इस समय वह राक्षसाधम मुझे तलवारसे मारनेके लिये दौड़ा; तब मैं भयसे तुरन्त ही
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ततोऽचिरेण सचिवैश्चतुर्भिः सहितो भयात् ॥ ५ ॥<br>त्वामेव भवमोक्षाय मुमुक्षुः शरणं गतः।<br>विभीषणवचः श्रुत्वा सुग्रीवो वाक्यमब्रवीत् ॥ ६ ॥ | अपने चार मन्त्रियोंके सहित संसार-पाशसे मुक्त होनेके लिये मुमुक्षु होकर आपकी ही शरणमें चला आया हूँ।”<br>विभीषणके ये वचन सुनकर सुग्रीवने कहा—॥ ५-६ ॥ “हे राम ! इस मायावी राक्षसाधमका कुछ
विश्वासाहर्हो न ते राम मायावी राक्षसाधमः ।<br>सीताहर्तुर्विशेषेण रावणस्यानुजो बली ॥ ७ ॥ | विश्वास न करना चाहिये । ( यदि कोई और होता तब कोई विशेष चिन्ताकी बात भी नहीं थी किन्तु ) यह तो सीताका हरण करनेवाले रावणका ही छोटा भाई है और वैसे भी बहुत बलवान् दिखायी देता है ॥ ७॥
मन्त्रिभिः सायुधैरस्मान् विवरे निहनिष्यति ।<br>तदाज्ञापय मे देव वानरैर्हन्यतामयम् ॥ ८ ॥ | यह अपने सशस्त्र मन्त्रियोंके साथ किसी समय एकान्तमें हमें मार डालेगा । अतः हे प्रभो ! मुझे आज्ञा दीजिये मैं इसे वानरोंसे मरवा डालूँ ॥ ८ ॥
ममैवं भाति ते राम बुद्ध्या किं निश्चितं वद ।<br>श्रुत्वा सुग्रीववचनं रामः सस्मितमब्रवीत् ॥ ९ ॥ | हे राम ! मुझे तो ऐसा ही जँचता है, आपका इस विषयमें क्या निश्चय है, सो कहिये।” सुग्रीवके वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने मुसकाकर कहा—॥९॥ “हे कपिश्रेष्ठ !
यदीच्छामि कपिश्रेष्ठ लोकान्सर्वान्सहेश्वरान्।<br>निमिषार्धेन संहन्यां सृजामि निमिषार्धतः ॥१०॥ | यदि मेरी इच्छा हो तो मैं आधे निमेषमें ही लोकपालोंके सहित सम्पूर्ण लोकोंको नष्ट कर सकता हूँ और आधे निमेषमें ही सबको रच सकता हूँ, अतः ( तुम किसी
अतो मयाऽभयं दत्तं शीघ्रमानय राक्षसम् ॥११॥ | प्रकारकी चिन्ता न करो ) मैं इस राक्षसको अभयदान देता हूँ, तुम इसे शीघ्र ही ले आओ ॥ १०-११ ॥
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।<br>अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम ॥१२॥ | मेरा यह नियम है कि जो एक बार भी मेरी शरण आकर ‘मैं तुम्हारा हूँ’ ऐसा कहकर मुझसे अभय माँगता है उसे मैं समस्त प्राणियोंसे निर्भय कर देता हूँ” ॥१२॥
रामस्य वचनं श्रुत्वा सुग्रीवो हृष्टमानसः ।<br>विभीषणमथानाय्य दर्शयामास राघवम् ॥१३॥ | रामके ये वचन सुनकर सुग्रीवने अति प्रसन्नचित्तसे विभीषणको लाकर रघुनाथजीसे मिलाया ॥ १३ ॥
विभीषणस्तु साष्टाङ्गं प्रणिपत्य रघूत्तमम् ।<br>हर्षगद्गदया वाचा भक्त्या च परयान्वितः ॥१४॥ | विभीषणने रघुनाथजीको साष्टांग प्रणाम किया और हर्षसे गद्गदकण्ठ हो परम भक्तिपूर्वक हाथ जोड़-
रामं श्यामं विशालाक्षं प्रसन्नमुखपङ्कजम् ।<br>धनुर्बाणधरं शान्तं लक्ष्मणेन समन्वितम् ॥१५॥<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा स्तोतुं समुपचक्रमे ॥१६॥ | कर शान्तमूर्ति प्रसन्नवदनारविन्द विशालनयन श्यामसुन्दर धनुर्बाणधारी भगवान् रामकी, लक्ष्मणजीके सहित, स्तुति करनी आरम्भ की ॥ १४-१६ ॥
विभीषण उवाच | विभीषण बोले—
नमस्ते राम राजेन्द्र नमः सीतामनोरम ।<br>नमस्ते चण्डकोदण्ड नमस्ते भक्तवत्सल ॥१७॥ | “हे राजराजेश्वर राम ! आपको नमस्कार है। हे सीताके मनमें रमण करनेवाले ! आपको नमस्कार है । हे प्रचण्डधनुर्धर ! आपको नमस्कार है । हे भक्तवत्सल ! आपको बारम्बार नमस्कार है ॥ १७ ॥
नमोऽनन्ताय शान्ताय रामायामिततेजसे ।<br>सुग्रीवमित्राय च ते रघूणां पतये नमः ॥१८॥ | हे अनन्त, शान्त, अतुलतेजोमय, सुग्रीवसखा रघुकुलनायक भगवान् राम ! आपको नमस्कार है ॥१८॥
जगदुत्पत्तिनाशानां कारणाय महात्मने । | जो संसारकी उत्पत्ति और नाशके कारण हैं त्रिलोकी-
सर्ग ३ ]
युद्धकाण्डम्
२४३
| त्रैलोक्यगुरवेऽनादिगृहस्थाय नमोनमः ॥१९॥ | के गुरु और अनादिकालीन गृहस्थ* हैं उन महात्मा रामको बारम्बार नमस्कार है ॥ १९ ॥ हे राम ! आप |
| त्वमादिर्जगतां राम त्वमेव स्थितिकारणम् । | संसारकी उत्पत्ति और स्थितिके कारण हैं तथा अन्तमें- |
| त्वमन्ते निधनस्थानं स्वेच्छाचारस्त्वमेव हि ॥२०॥ | आप ही उसके लयस्थान हैं; आप अपनी इच्छानुसार विहार करनेवाले हैं ॥ २० ॥ हे राघव ! चराचर भूतों- |
| चराचराणां भूतानां बहिरन्तश्च राघव । | के भीतर और बाहर व्याप्य-व्यापक-रूपसे आप विश्वरूप |
| व्याप्यव्यापकरूपेण भवान् भाति जगन्मयः ॥२१॥ | ही भास रहे हैं ॥ २१ ॥ आपकी मायाने जिनका |
| त्वन्मायया हृतज्ञाना नष्टात्मानो विचेतसः। | सदसद्विवेक हर लिया है वे नष्ट-बुद्धि मूढ़ पुरुष अपने पाप-पुण्यके वशीभूत होकर संसारमें बारम्बार आते- |
| गतागतं प्रपद्यन्ते पापपुण्यवशात्सदा ॥२२॥ | जाते रहते हैं ॥ २२ ॥ जबतक मनुष्य एकाग्र |
| तावत्सत्यं जगद्भाति शुक्तिकारजतं यथा । | चित्तसे आपके ज्ञानस्वरूपको नहीं जानता तभीतक |
| यावन्न ज्ञायते ज्ञानं चेतसाऽनन्यगामिना ॥२३॥ | सीपीमें चाँदीके समान यह संसार सत्य प्रतीत होता है ॥ २३ ॥ हे विभो ! आपको न जाननेसे ही लोग पुत्र, स्त्री |
| त्वदज्ञानात्सदा युक्ताः पुत्रदारगृहादिषु । | और गृह आदिमें आसक्त होकर अन्तमें दुःख देनेवाले |
| रमन्ते विषयान्सर्वानन्ते दुःखप्रदान्विभो ॥२४॥ | विषयोंमें सुख मानते हैं ॥ २४ ॥ हे पुरुषोत्तम ! आप ही इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण और वायु हैं तथा आप |
| त्वमिन्द्रोऽग्निर्यमो रक्षो वरुणश्च तथानिलः । | ही कुबेर और रुद्र हैं ॥ २५ ॥ हे प्रभो ! आप अणु-से- |
| कुबेरश्च तथा रुद्रस्त्वमेव पुरुषोत्तम ॥२५॥ | अणु और महान्-से-महान् हैं तथा आप ही समस्त लोकोंके पिता, माता और धाता (धारण-पोषण करनेवाले) हैं |
| त्वमणोरप्यणीयांश्च स्थूलात् स्थूलतरः प्रभो । | ॥ २६ ॥ आप आदि, मध्य और अन्तसे रहित सर्वत्र परिपूर्ण |
| त्वं पिता सर्वलोकानां माता धाता त्वमेव हि ॥२६॥ | अच्युत और अविनाशी हैं । आप हाथ-पाँवसे रहित तथा नेत्र और कर्णहीन हैं ॥ २७ ॥ तथापि हे |
| आदिमध्यान्तरहितः परिपूर्णोऽच्युतोऽव्ययः । | खरान्तक ! आप सब कुछ देखनेवाले, सब कुछ सुनने- |
| त्वं पाणिपादरहितश्चक्षुःश्रोत्रविवर्जितः ॥२७॥ | वाले, सब कुछ ग्रहण करनेवाले और बड़े वेगवान् हैं । हे प्रभो ! आप अन्नमय आदि पाँचों कोशोंसे रहित तथा |
| श्रोता द्रष्टा ग्रहीता च जवनस्त्वं खरान्तक । | निर्गुण और निराश्रय हैं ॥ २८ ॥ आप निर्विकल्प, |
| कोशेभ्यो व्यतिरिक्तस्त्वं निर्गुणो निरूपाश्रयः ॥२८॥ | निर्विकार और निराकार हैं, आपका कोई प्रेरक नहीं |
| निर्विकल्पो निर्विकारो निराकारो निरीश्वरः । | है, आप (उत्पत्ति, वृद्धि, परिणाम, क्षय, जीर्णता और नाश—इन) छः भाव-विकारोंसे रहित हैं तथा |
| षड्भावरहितोऽनादिः पुरुषः प्रकृतेः परः ॥२९॥ | प्रकृतिसे अतीत अनादि पुरुष हैं ॥ २९ ॥ मायाके |
| मायया गृह्यमाणस्त्वं मनुष्य इव भाव्यसे । | कारण ही आप साधारण मनुष्यके समान प्रतीत होते हैं; वैष्णवजन आपको निर्गुण और अजन्मा जानकर मोक्ष |
| ज्ञात्वा त्वां निर्गुणमजं वैष्णवा मोक्षगामिनः ॥३०॥ | प्राप्त करते हैं ॥ ३० ॥ हे राघव ! हे प्रभो ! मैं आप- |
| अहं त्वत्पादसद्भक्तिनिःश्रेणीं प्राप्य राघव । | के चरण-कमलकी विशुद्ध भक्तिरूप सीढ़ी पाकर ज्ञान- |
| इच्छामि ज्ञानयोगारूढं सौधमारोढुमीश्वर ॥३१॥ | योग नामक राजभवनके शिखरपर चढ़ना चाहता हूँ ॥ ३१ ॥ हे कारुणिकश्रेष्ठ सीताफ्ते राम ! आपको |
| नमः सीतापते राम नमः कारुणिकोत्तम । | नमस्कार है; हे रावणारे ! आपको बारम्बार नमस्कार |
| रावणारे नमस्तुभ्यं त्राहि मां भवसागरात् ॥३२॥ | है; आप इस संसार-सागरसे मेरी रक्षा कीजिये” ॥ ३२ ॥ |
* प्रकृतिरूपा पत्नीके साथ भगवान्का अनादि सम्बन्ध है, इसलिये वे अनादि गृहस्थ हैं ।
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| ततः प्रसन्नः प्रोवाच श्रीरामो भक्तवत्सलः।<br>वरं वृणीष्व भद्रं ते वाञ्छितं वरदोऽस्म्यहम् ॥३३॥ | तब भक्तवत्सल भगवान् रामने प्रसन्न होकर कहा—<br>"विभीषण ! तेरा कल्याण हो, मैं तुझे वर देना चाहता<br>हूँ; अतः तेरी जो इच्छा हो वही वर माँग ले" ॥३३॥ |
| विभीषण उवाच | विभीषण बोले—"हे रघुनन्दन ! मैं तो आपके<br>चरणोंका दर्शन पाकर ही धन्य और कृतकृत्य हो<br>गया; मुझे जो कुछ पाना था वह मिल गया। अब तो<br>मैं निःसन्देह मुक्त हो गया ॥ ३४ ॥ हे राम ! आपकी<br>मनोहर मूर्तिकी दर्शन करनेसे आज मेरे समान कोई<br>धन्य और पवित्र नहीं है; अब इस संसारमें (किसी भी<br>प्रकार) मेरी समता करनेवाला कोई नहीं है ॥ ३५ ॥<br>हे रघुनन्दन ! कर्म-बन्धनको नष्ट करनेके लिये आप<br>मुझे अपनी भक्तिसे प्राप्त होनेवाला ज्ञान और अपने<br>परमार्थ-स्वरूपका साक्षात् करानेवाला ध्यान दीजिये<br>॥ ३६ ॥ हे राजराजेश्वर राम ! मुझे विषयजन्य सुखकी<br>इच्छा नहीं है; मैं तो यही चाहता हूँ कि आपके चरण-<br>कमलोंमें सर्वदा मेरी आसक्तिरूपा भक्ति बनी रहे"॥३७॥ |
| धन्योऽस्मि कृतकृत्योऽस्मि कृतकार्योऽस्मि राघव।<br>त्वत्पाददर्शनादेव विमुक्तोऽस्मि न संशयः ॥३४॥ | |
| नास्ति मत्सदृशो धन्यो नास्ति मत्सदृशः शुचिः।<br>नास्ति मत्सदृशो लोके राम त्वन्मूर्तिदर्शनात् ॥३५॥ | |
| कर्मबन्धविनाशाय त्वज्ज्ञानं भक्तिलक्षणम्।<br>त्वद्ध्यानं परमार्थं च देहि मे रघुनन्दन ॥३६॥ | |
| न याचे राम राजेन्द्र सुखं विषयसम्भवम्।<br>त्वत्पादकमले सक्ता भक्तिरेव सदास्तु मे ॥३७॥ | |
| ओमित्युक्त्वा पुनः प्रीतो रामः प्रोवाच राक्षसम्।<br>शृणु वक्ष्यामि ते भद्र रहस्यं मम निश्चितम् ॥३८॥ | तब रघुनाथजीने 'तथास्तु' कहकर विभीषणसे प्रसन्न<br>होकर कहा—"भद्र ! सुनो, मैं तुम्हें अपना निश्चित<br>रहस्य सुनाता हूँ ॥ ३८ ॥ जो मेरे शान्तस्वभाव, विरक्त<br>और योगनिष्ठ भक्त हैं, उनके हृदयमें मैं सीताजीके सहित<br>सदा रहता हूँ—इसमें सन्देह नहीं ॥ ३९ ॥ अतः तुम<br>सर्वदा शान्त और पापरहित रहकर मेरा ध्यान करनेसे<br>घोर संसार-सागरसे पार हो जाओगे ॥ ४० ॥ जो<br>पुरुष मुझे प्रसन्न करनेके लिये इस स्तोत्रको पढ़ता,<br>लिखता अथवा सुनता है वह मेरा प्रिय सारूप्यपद<br>प्राप्त करता है" ॥ ४१ ॥ |
| मद्भक्तानां प्रशान्तानां योगिनां वीतरागिणाम्।<br>हृदये सीतया नित्यं वसाम्यत्र न संशयः ॥३९॥ | |
| तस्मात्त्वं सर्वदा शान्तः सर्वकल्मषवर्जितः।<br>मां ध्यात्वा मोक्ष्यसे नित्यं घोरसंसारसागरात् ॥४०॥ | |
| स्तोत्रमेतत्पठेद्यस्तु लिखेद्वाः शृणुयादपि।<br>मत्प्रीतये समाभीष्टं सारूप्यं समवाप्नुयात् ॥४१॥ | |
| इत्युक्त्वा लक्ष्मणं प्राह श्रीरामो भक्तभक्तिमान्।<br>पश्यत्विदानीमेवैष मम सन्दर्शने फलम् ॥४२॥ | विभीषणसे ऐसा कह भक्तवत्सल श्रीरामने<br>लक्ष्मणजीसे कहा—"लक्ष्मण ! यह अभी मेरे दर्शनका<br>फल देखे ॥ ४२ ॥ तुम समुद्रसे जल ले आओ; मैं<br>इसे लंकाके राज्यपर अभिषिक्त किये देता हूँ। जबतक<br>चन्द्र-सूर्य और पृथिवीकी स्थिति है तथा जबतक लोकमें<br>मेरी कथा रहेगी तबतक यह लंकाका राज्य करेगा।" |
| लङ्काराज्येऽभिषेक्ष्यामि जलमानय सागरात्।<br>यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च यावत्तिष्ठति मेदिनी ॥४३॥ | |
| यावन्मम कथा लोके तावद्राज्यं करोत्वसौ।<br>इत्युक्त्वा लक्ष्मणेनाम्बु ह्यानाय्य कलशेन तम्॥४४॥ | ऐसा कह श्रीरमापतिने लक्ष्मणजीसे कलशमें जल<br>मँगवाया और मन्त्रियों तथा विशेषतः लक्ष्मणजीसे उसे<br>लंकाके राज्यपदपर अभिषिक्त कराया ॥ ४३-४५ ॥<br>उस समय समस्त वानर प्रसन्न होकर 'धन्य है, धन्य |
| लङ्काराज्याधिपत्यार्थमभिषेकं रमापतिः।<br>कारयामास सचिवैर्लक्ष्मणेन विशेषतः ॥४५॥ |
| सर्ग ३ ] | युद्धकाण्ड | २४५ |
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| साधुसाध्विति ते सर्वे वानरास्तुष्टुवुर्भृशम् ।<br>सुग्रीवोऽपि परिष्वज्य विभीषणमथाब्रवीत् ॥४६॥<br>विभीषण वयं सर्वे रामस्य परमात्मनः ।<br>किङ्करास्तत्र मुख्यस्त्वं भक्त्या रामपरिग्रहात् ।<br>श्रावणस्य विनाशे त्वं साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥४७॥ | है' ऐसा कहने लगे; और सुग्रीवने विभीषणको गले लगाकर कहा—॥ ४६ ॥ “विभीषण ! हम सब परमात्मा रामके दास हैं, तथापि तुम हम सबमें प्रधान हो क्योंकि तुमने केवल भक्तिसे ही उनकी शरण ली है। अब तुम्हें रावणका नाश करानेमें हमारी सहायता करनी चाहिये” ॥ ४७ ॥ |
| विभीषण उवाच<br>अहं कियान्सहायत्वे रामस्य परमात्मनः ।<br>किं तु दास्यं करिष्येऽहं भक्त्या शक्त्या ह्यमायया॥४८॥ | विभीषण बोले—“मैं परमात्मा रामकी क्या सहायता कर सकता हूँ, तथापि मुझसे जैसी कुछ बनेगी निष्कपट होकर भक्तिभावसे उनकी सेवा करता रहूँगा” ॥ ४८ ॥ |
| दशग्रीवेण सन्दिष्टः शुको नाम महासुरः ।<br>संस्थितो ह्यम्बरे वाक्यं सुग्रीवमिदमब्रवीत् ॥४९॥<br>त्वामाह रावणो राजा भ्रातरं राक्षसाधिपः ।<br>महाकुलप्रसूतस्त्वं राजाऽसि वनचारिणाम् ॥५०॥<br>मम भ्रातृसमानस्त्वं तव नास्त्यर्थविप्लवः ।<br>अहं यदहरं भार्यां राजपुत्रस्य किं तव ॥५१॥<br>किष्किन्धां याहि हरिभिर्लङ्का शक्या न दैवतैः।<br>प्राप्तुं किं मानुषैरल्पसत्त्वैर्वानरयूथपैः ॥५२॥<br>तं ज्ञापयन्तं वचनं तूर्णमुत्प्लुत्य वानराः ।<br>आपद्यन्त तदा क्षिप्रं निहन्तुं दृढमुष्टिभिः ॥५३॥<br>वानरैर्हन्यमानस्तु शुको राममथाब्रवीत् ।<br>न दूतान् घ्नन्ति राजेन्द्र वानरान्वारय प्रभो ॥५४॥<br>रामः श्रुत्वा तदा वाक्यं शुकस्य परिदेवितम् ।<br>मा वधिष्टेति रामस्तान्वारयामास वानरान् ॥५५॥<br>पुनरम्बरमासाद्य शुकः सुग्रीवमब्रवीत् ।<br>ब्रूहि राजेन्द्रदशग्रीवं किं वक्ष्यामि व्रजाम्यहम् ॥५६॥ | इसी समय रावणका भेजा हुआ शुक नामक महादैत्य आकाशमें स्थित होकर सुग्रीवसे इस प्रकार बोला—॥ ४९ ॥ “राक्षसराज रावण तुम्हें अपने भाईके समान मानते हैं, उन्होंने तुम्हारे लिये कहा है कि तुम बड़े कुलमें उत्पन्न हुए हो और वानरोंके राजा हो ॥ ५० ॥ तुम मेरे भाईके समान हो और तुम्हारा कोई कार्यघात भी नहीं हुआ है। यदि मैंने किसी राजकुमारकी स्त्रीको हर ही लिया तो उससे तुम्हें क्या ? ॥५१॥ अतः तुम अपने वानरोंके सहित किष्किन्धाको लौट जाओ। लंकाको पाना तो देवताओंके लिये भी कठिन है, फिर अल्पशक्ति मनुष्य और वानरयूथपोंकी तो बात ही क्या है ?” ॥५२॥ जिस समय शुक इस प्रकार सन्देश सुना रहा था, वानरोंने अपने सुदृढ घूँसोंसे मारनेके लिये उसे तुरन्त ही उछलकर पकड़ लिया ॥ ५३ ॥ वानरोंके मारनेपर शुकने श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—"हे राजेन्द्र ! (विज्ञजन) दूतको मारा नहीं करते, अतः हे प्रभो ! इन वानरोंको रोकिये” ॥ ५४ ॥ शुकका यह करुणा-युक्त वचन सुनकर रामने 'इसे मत मारो' ऐसा कहकर वानरोंको रोक दिया ॥ ५५ ॥ तब शुकने फिर आकाशमें चढ़कर सुग्रीवसे कहा—"हे राजन् ! मैं जाता हूँ; कहिये, रावणको आपकी ओरसे क्या उत्तर दूँ ?” ॥ ५६ ॥ |
| सुग्रीव उवाच<br>यथा वाली मम भ्राता तथा त्वं राक्षसाधम ।<br>हन्तव्यस्त्वं मया यालात्सपुत्रबलवाहनः ॥५७॥ | **सुग्रीवने कहा—**उससे कहना, जिस प्रकार मैंने अपने भाई वालीको मारा था, हे राक्षसाधम ! उसी प्रकार तू भी अपने पुत्र, सेना और वाहनादिके सहित |
| २४६ | अध्यात्मरामायणे | [ सर्ग ३ |
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| ब्रूहि मे रामचन्द्रस्य भार्या हृत्वा क्व यास्यसि ।<br>ततो राजाज्ञया धृत्वा शुकं बध्वान्वरक्षयत् ॥५८॥ | मेरे हाथसे मारा जायगा। तू हमारे रामचन्द्रजीकी भार्याका हरण करके अब कहाँ जा सकता है ? तदनन्तर भगवान् रामकी आज्ञासे शुकको पकड़ उन्होंने बन्धनमें डालकर वानरोंकी रक्षामें छोड़ दिया॥५७-५८॥ |
| शार्दूलोऽपि ततः पूर्वं दृष्ट्वा कपिवलं महत् ।<br>यथावत्कथयामास रावणाय स राक्षसः ॥५९॥ | शुकसे पहले ही शार्दूल नामक राक्षसने वानरोंकी महान् सेना देखकर रावणसे उसका यथावत् वर्णन कर दिया था ॥ ५९ ॥ यह सब सुनकर रावणको बड़ी चिन्ता हुई और वह दीर्घ निःश्वास छोड़ता अपने महलमें बैठा रहा। इसी समय भगवान् रामने समुद्रकी ओर देखकर क्रोधसे नेत्र लाल कर कहा— |
| दीर्घचिन्तापरो भूत्वा निःश्वसन्नास मन्दिरे ।<br>ततः समुद्रमावेक्ष्य रामो रक्तान्तलोचनः ॥६०॥ | ॥ ६० ॥ “लक्ष्मण ! देखो, यह समुद्र कैसा दुष्ट है ? मैं इसके तीरपर आया हूँ किन्तु हे अनघ ! इस दुरात्माने दर्शन करके भी मेरा अभिनन्दन नहीं किया ॥ ६१ ॥ यह समझता है, ‘यह एक मनुष्य ही तो है, वानरोंके साथ मिलकर भी यह मेरा क्या कर सकता है ?’ सो हे महाबाहो ! देखो, आज मैं इसे सुखाये डालता हूँ ॥ ६२ ॥ फिर वानरगण निश्चिन्त होकर पैदल ही इसके पार चले जायेंगे।” ऐसा कह भगवान् रामने क्रोधसे नेत्र लाल कर अपना धनुष चढ़ाया और तूणीरसे एक कालाग्निके समान तेजोमय वाण निकालकर उसे धनुषपर रखकर खींचते हुए कहा—॥६३-६४॥ “समस्त प्राणी रामके वाणका पराक्रम देखें; मैं इसी समय नदीपति समुद्रको भस्म किये डालता हूँ” ॥६५॥ |
| पश्य लक्ष्मण दुष्टोऽसौ वारिधिर्मामुपागतम् ।<br>नाभिनन्दति दुष्टात्मा दर्शनार्थं समानघ ॥६१॥ | |
| जानाति मानुषोऽयं मे किं करिष्यति वानरैः ।<br>अद्य पश्य महाबाहो शोषयिष्यामि वारिधिम् ॥६२॥ | |
| पादेनैव गमिष्यन्ति वानरा विगतज्वराः ।<br>इत्युक्त्वा क्रोधताम्राक्ष आरोपितधनुर्धरः ॥६३॥ | |
| तूणीराद्वाणमादाय कालाग्निसदृशप्रभम् ।<br>सन्धाय चापमाकृष्य रामो वाक्यमथाब्रवीत् ॥६४॥ | |
| पश्यन्तु सर्वभूतानि रामस्य शरविक्रमम् ।<br>इदानीं भस्मसात्कुर्यां समुद्रं सरितां पतिम् ॥६५॥ | |
| एवं ब्रुवति रामे तु सशैलवनकानना ।<br>चचाल वसुधा द्यौश्च दिशश्च तमसाऽऽवृताः ॥६६॥ | भगवान् रामके ऐसा कहते ही वन और पर्वतादिके सहित सम्पूर्ण पृथिवी हिलने लगी तथा आकाश और दिशाओंमें अन्धकार छा गया ॥६६॥ समुद्र क्षुभित हो गया और भयके कारण अपने तटसे एक योजन आगे बढ़ आया; तथा बड़े-बड़े मत्स्य, नाके, मकर और मछलियाँ सन्तप्त होकर भयभीत हो गये ॥ ६७ ॥ |
| चुक्षुभे सागरो वेलां भयाद्योजनमत्यगात् ।<br>तिमीनक्रझषा मीनाः प्रतप्ताः परित्रत्रसुः ॥६७॥ | |
| एतस्मिन्नन्तरे साक्षात्सागरो दिव्यरूपधृक् ।<br>दिव्याभरणसम्पन्नः स्वभासा भासयन् दिशः ॥६८॥ | इसी समय नाना प्रकारके दिव्य आभूषण धारण किये दिव्यरूपधारी समुद्र, हाथोंमें अपने ही भीतर स्थित दिव्य रत्न लिये, अपने प्रकाशसे दशों दिशाओंको प्रकाशित करता, स्वयं उपस्थित हुआ और भगवान् रामचन्द्रजीके चरणोंके आगे नाना प्रकारके उपहार रख, जिनके नेत्रोंके मध्यभाग क्रोधसे लाल |
| स्वान्तःस्थदिव्यरत्नानि कराभ्यां परिगृह्य सः ।<br>पादयोः पुरतः क्षिप्त्वा रामस्योपायनं बहु ॥६९॥ | |
| दण्डवत्प्रणिपत्याह रामं रक्तान्तलोचनम् । |
सर्ग ३ ] युद्धकाण्ड २४७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| त्राहि त्राहि जगन्नाथ राम त्रैलोक्यरक्षक ॥७०॥<br><br>जडोऽहं राम ते सृष्टः सृजता निखिलं जगत् ।<br>स्वभावमन्यथा कर्तुं कः शक्तो देवनिर्मितम् ॥७१॥<br><br>स्थूलानि पञ्चभूतानि जडान्येव स्वभावतः ।<br>कृतानि भवतैतानि त्वदाज्ञां लङ्घयन्ति न ॥७२॥<br><br>तामसादहमो राम भूतानि प्रभवन्ति हि ।<br>कारणानुगमात्तेषां जडत्वं तामसं स्वतः ॥७३॥<br><br>निर्गुणस्त्वं निराकारो यदा मायागुणान्प्रभो ।<br>लीलयाङ्गीकरोषि त्वं तदा वैराजनामवान् ॥७४॥<br><br>गुणात्मनो विराजश्च सत्त्वाद्देवा बभूविरे ।<br>रजोगुणात्प्रजेशाद्या मन्योर्भूतपतिस्तव ॥७५॥<br><br>त्वामहं मायया छन्नं लीलया मानुषाकृतिम् ॥७६॥<br><br>जडबुद्धिर्जडो मूर्खः कथं जानामि निर्गुणम् ।<br>दण्ड एव हि मूर्खाणां सन्मार्गप्रापकः प्रभो ॥७७॥<br><br>भूतानाममरश्रेष्ठ पशूनां लगुडो यथा ।<br>शरणं ते व्रजामीश शरण्यं भक्तवत्सल ।<br>अभयं देहि मे राम लङ्कामार्गं ददामि ते ॥७८॥ | हो रहे हैं उन रघुनाथजीको साष्टाङ्ग दण्डवत् कर बोला—"हे त्रैलोक्यरक्षक जगत्पति राम ! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो ॥ ६८-७० ॥ हे राम ! सम्पूर्ण संसारकी रचना करते समय आपने मुझे जड ही बनाया था; फिर आपके बनाये स्वभावको कोई कैसे बदल सकता है ? ॥ ७१ ॥ पाँचों स्थूल भूतोंको आपने स्वभावसे जड ही बनाया है, वे आपकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं कर सकते ॥ ७२ ॥ हे राम ! भूत तामस अहंकारसे उत्पन्न होते हैं, अतः अपने कारणका अनुगमन करनेसे उनमें तमोरूप जडत्व तो स्वतःसिद्ध है ॥ ७३ ॥ हे प्रभो ! आप निर्गुण और निराकार हैं। जिस समय आप लीलासे ही मायिक गुणोंको अङ्गीकार करते हैं उस समय आपका नाम 'वैराज' पड़ जाता है ॥ ७४ ॥ उस गुणमय विराट्के सात्त्विकांशसे देवगण, राजसांशसे प्रजापतिगण और तामसांशसे रुद्रगण उत्पन्न होते हैं। ॥ ७५ ॥ हे नाथ ! लीलावश मायासे आच्छन्न होकर मनुष्यरूप हुए आप निर्गुण परमात्माको मैं जडबुद्धि मूर्ख कैसे जान सकता हूँ ? हे अमरश्रेष्ठ प्रभो ! पशुओंको जैसे लाठी ठीक-ठीक मार्गमें ले जाती है उसी प्रकार (मुझ-जैसे) मूर्ख जीवोंके लिये तो दण्ड ही सन्मार्गपर लानेवाला होता है। हे भक्तवत्सल भगवान् राम ! आप शरणागतरक्षककी मैं शरण हूँ। आप मुझे अभयदान दीजिये। मैं आपको लंकामें जानेका मार्ग दूँगा" ॥ ७६-७८ ॥ |
| श्रीराम उवाच<br>अमोघोऽयं महाबाणः कस्मिन्देशे निपात्यताम्।<br>लक्ष्यं दर्शय मे शीघ्रं बाणस्यामोघपातिनः ॥७९॥ | **श्रीरामचन्द्रजी बोले—**मेरा यह महाबाण व्यर्थ जानेवाला नहीं है; अतः शीघ्र ही मुझे इस अमोघ बाणका लक्ष्य बताओ । ॥ ७९ ॥ |
| रामस्य वचनं श्रुत्वा करे दृष्ट्वा महाशरम् ।<br>महोदधिर्महातेजा राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥८०॥<br><br>रामोत्तरप्रदेशे तु द्रुमकुल्य इति श्रुतः ।<br>प्रदेशस्तत्र बहवः पापात्मानो दिवानिशम् ॥८१॥<br><br>बाधन्ते मां रघुश्रेष्ठ तत्र ते पात्यतां शरः ।<br>रामेण सृष्टो बाणस्तु क्षणादाभीरमण्डलम् ॥८२॥<br><br>हत्वा पुनः समागत्य तूणीरे पूर्ववत्स्थितः । | रामका यह वचन सुनकर और उनके हाथमें वह महाबाण देखकर महातेजस्वी समुद्रने रघुनाथजीसे कहा—॥ ८० ॥ "हे राम ! उत्तरकी ओर एक 'द्रुमकुल्य' नामक देश है। वहाँ बहुत-से पापी रहते हैं। वे मुझे रात-दिन पीड़ा पहुँचाते हैं। हे रघुश्रेष्ठ ! आप अपना यह बाण वहीं गिराइये।" तदनन्तर रामका छोड़ा हुआ वह बाण एक क्षणमें ही समस्त आभीरमण्डलको मारकर फिर पूर्ववत् तरकशमें लौट आया। तब समुद्रने रघुनाथजीसे अति विनीत भावसे कहा— |