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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

अध्यात्मरामायण-माहात्म्य

ॐ

अध्यात्मरामायण

माहात्म्य

रामं विश्वमयं वन्दे रामं वन्दे रघूद्वहम् । रामं विप्रवरं वन्दे रामं श्यामाग्रजं भजे ॥
यस्य वागांशुतश्च्यूतं रम्यं रामायणामृतम् । शैलजासेवितं वन्दे तं शिवं सोमरूपिणम् ॥
सच्चिदानन्दसन्दोहं भक्तिभूतिविभूषणम् । पूर्णानन्दमहं वन्दे सद्गुरुं शङ्करं स्वयं ॥
अज्ञानध्वान्तसंहर्त्री ज्ञानालोकविलासिनी । चन्द्रचूडवचश्चन्द्रचन्द्रिकेयं विराजते ॥


अप्रमेयत्रयातीतनिर्मलज्ञानमूर्तये ।
मनोगिरां विदूराय दक्षिणामूर्तये नमः ॥ १ ॥

जो प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे परे, त्रिगुणातीत, मलहीन, ज्ञानस्वरूप और मन, वाणी आदिके अविषय हैं उन दक्षिणामूर्ति भगवान् (सदाशिव) को नमस्कार है ॥ १ ॥

सूत उवाच
कदाचिन्नारदो योगी परानुग्रहवाञ्छया ।
पर्यटन्सकलाँल्लोकान्सत्यलोकमुपागमत् ॥ २ ॥
तत्र दृष्ट्वा मूर्तिमद्भिश्छन्दोभिः परिवेष्टितम् ।
बालार्कप्रभया सम्यग्भासयन्तं सभागृहम् ॥ ३ ॥
मार्कण्डेयादिमुनिभिः स्तूयमानं मुहुर्मुहुः ।
सर्वार्थगोचरज्ञानं सरस्वत्या समन्वितम् ॥ ४ ॥
चतुर्मुखं जगन्नाथं भक्ताभीष्टफलप्रदम् ।
प्रणम्य दण्डवद्भक्त्या तुष्टाव मुनिपुङ्गवः ॥ ५ ॥

**श्रीसूतजी बोले—**एक समय योगिराज नारदजी दूसरोंपर कृपा करनेके लिये समस्त लोकोंमें विचरते हुए सत्यलोकमें पहुँचे ॥ २ ॥ वहाँ मूर्तिमान् वेदोंसे घिरे हुए, अपनी बालसूर्यके समान प्रभासे सभाभवनको पूर्णतया देदीप्यमान करते हुए, मार्कण्डेय आदि मुनिजनोंसे बारम्बार स्तुति किये जाते हुए, सम्पूर्ण पदार्थोंका ज्ञान रखनेवाले और भक्तोंको इच्छित फल देनेवाले सरस्वतीयुक्त जगत्पति ब्रह्माजीको देखकर मुनिश्रेष्ठ नारदजीने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और भक्तिभावसे स्तुति की ॥ ३–५ ॥

सन्तुष्टस्तं मुनिं प्राह स्वयम्भूर्वैष्णवोत्तम् ।
किं प्रष्टुकामस्त्वमसि तद्गदिष्यामि ते मुने ॥ ६ ॥

तब स्वयम्भू ब्रह्माजीने प्रसन्न होकर वैष्णवाग्रणी श्रीनारदजीसे कहा—"मुने ! तुम क्या पूछना चाहते हो ? मैं तुमसे वह सब कहूँगा" ॥ ६ ॥

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य मुनिर्ब्रह्माणमब्रवीत् ।
त्वत्तः श्रुतं मया सर्वं पूर्वमेव शुभाशुभम् ॥ ७ ॥
इदानीमेकमेवास्ति श्रोतव्यं सुरसत्तम ।
तद्रहस्यमपि ब्रूहि यदि तेऽनुग्रहो मयि ॥ ८ ॥

ब्रह्माजीके ये वचन सुनकर नारदजीने उनसे कहा, "हे देवश्रेष्ठ ! शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन तो मैं आपसे पहले ही सुन चुका हूँ। अब मुझे एक ही बात और सुननी है; यदि मुझपर आपकी कृपा है तो गोपनीय होनेपर भी वह सुनाइये ॥ ७-८ ॥ अब घोर कलियुगके आनेपर

मा
अध्यात्मरामायण


प्राप्ते कलियुगे घोरे नराः पुण्यविवर्जिताः ।
दुराचाररताः सर्वे सत्यवार्तापराङ्मुखाः ॥ ९ ॥

मनुष्य पुण्यकर्म छोड़ देंगे और सत्यभाषणसे विमुख होकर दुराचारमें प्रवृत्त हो जायँगे ॥ ९ ॥


परापवादनिरताः परद्रव्याभिलाषिणः ।
परस्त्रीसक्तमनसः परहिंसापरायणाः ॥ १० ॥

वे दूसरोंकी निन्दामें तत्पर रहेंगे, दूसरोंके धनकी इच्छा करेंगे, परस्त्रीमें चित्त लगावेंगे और परायी हिंसा करेंगे ॥ १० ॥


देहात्मदृष्टयो मूढा नास्तिकाः पशुबुद्धयः ।
मातापितृकृतद्वेषाः स्त्रीदेवाः कामकिङ्कराः ॥ ११ ॥

ये मूढ़ देहमें ही आत्मबुद्धि करेंगे, शास्त्र और ईश्वरसे विमुख होंगे, उनकी बुद्धि पशुओंके समान होगी और वे कामके गुलाम होकर स्त्रीके भक्त और माता-पिताके द्रोही बनेंगे ॥ ११ ॥


विप्रा लोभग्रहग्रस्ता वेदविक्रयजीविनः ।
धनार्जनार्थमभ्यस्तविद्या मदविमोहिताः ॥ १२ ॥

ब्राह्मणगण लोभरूपी ग्रहसे ग्रस्त और वेद बेचकर अपनी आजीविका चलानेवाले होंगे, वे धनोपार्जनके लिये ही विद्याभ्यास करेंगे और (विद्या तथा ब्राह्मणत्वके) मदमे उन्मत्त हो जायँगे ॥ १२ ॥


त्यक्तस्वजातिकर्माणः प्रायशः परवञ्चकाः ।
क्षत्रियाश्च तथा वैश्याः स्वधर्मत्यागशीलिनः ॥ १३ ॥

क्षत्रिय और वैश्यगण भी स्वधर्मको त्यागनेवाले तथा अपने जाति-कर्मोंको छोड़कर प्रायः दूसरोंको ठगनेवाले ही होंगे ॥ १३ ॥


तद्वच्छूद्राश्च ये केचिद्ब्राह्मणाचारतत्पराः ।
स्त्रियश्च प्रायशो भ्रष्टा भर्तृवज्ञाननिर्भयाः ॥ १४ ॥

इसी प्रकार जो शूद्र होंगे वे भी ब्राह्मणोंके आचारमें तत्पर हो जायँगे तथा स्त्रियाँ प्रायः भ्रष्टाचारिणी और अपने पतिके अपमान करनेमें निडर होंगी ॥ १४ ॥


श्वशुरद्रोहकारिण्यो भविष्यन्ति न संशयः ।
एतेषां नष्टबुद्धीनां परलोकः कथं भवेत् ॥ १५ ॥

निस्सन्देह वे अपने सास-ससुरोंसे द्रोह करेंगी। इन नष्ट-बुद्धियोंका परलोक किस प्रकार सुधरेगा ? ॥ १५ ॥


इति चिन्ताकुलं चित्तं जायते मम सन्ततम् ।
लघूपायेन येनैषां परलोकगतिर्भवेत् ।
तमुपायमुपारूढि सर्वं वेत्ति यतो भवान् ॥ १६ ॥

इस चिन्तासे मेरा चित्त निरन्तर व्याकुल रहता है। जिस सुगम उपायसे इनका परलोक सुधर सकता हो वह आप मुझे बतलाइये, क्योंकि आप सभी कुछ जानते हैं" ॥ १६ ॥


इत्युपर्षेर्वाक्यमाकर्ण्य प्रत्युवाचाम्बुजासनः ।
साधु पृष्टं त्वया साधो वक्ष्ये तच्छृणु सादरम् ॥ १७ ॥

देवर्षि नारदजीके ये वचन सुनकर कमलासन ब्रह्माजी बोले—"हे साधो ! तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है। मैं उसे बतलाता हूँ, तुम श्रद्धापूर्वक सुनो ॥ १७ ॥


पुरा त्रिपुरहन्तारं पार्वती भक्तवत्सला ।
श्रीरामतत्त्वं जिज्ञासुः पप्रच्छ विनयान्विता ॥ १८ ॥

"पूर्वकालमें भक्तवत्सला पार्वतीजीने श्रीराम-तत्त्वकी जिज्ञासासे त्रिपुर-विनाशक भगवान् शंकरसे विनयपूर्वक प्रश्न किया था ॥ १८ ॥


प्रियायै गिरिशस्तस्यै गूढं व्याख्यातवान्स्वयम् ।
पुराणोत्तममध्यात्मरामायणमिति स्मृतम् ॥ १९ ॥

तब अपनी प्रियासे श्रीमहादेवजीने जिस गूढ़ रहस्यका वर्णन किया था वह उत्तम पुराण अध्यात्मरामायणके नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ १९ ॥


तत्पार्वती जगद्धात्री पूजयित्वा दिवानिशम् ।
आलोचयन्ती स्वानन्दमग्ना तिष्ठति साम्प्रतम् ॥ २० ॥

अब जगज्जननी पार्वतीजी उसका पूजन कर रात-दिन उसीका मनन करती आत्मानन्दमें मग्न रहती हैं ॥ २० ॥


प्रचरिष्यति तल्लोके प्राण्यदृष्टवशाद्यदा ।
तस्याध्ययनमात्रेण जना यास्यन्ति सद्गतिम् ॥ २१ ॥

जिस समय प्राणियोंके सौभाग्यसे उसका लोकमें प्रचार होगा उस समय उसके अध्ययनमात्रसे लोग शुभगति प्राप्त करेंगे

माहात्म्य५
तावद्विजृम्भते पापं ब्रह्महत्यापुरःसरम् ।<br>यावज्जगति नाध्यात्मरामायणमुदेष्यति ॥२२॥॥२१॥ संसारमें ब्रह्म-हत्यादि पाप तभीतक रहेंगे जबतक अध्यात्मरामायणका प्रादुर्भाव नहीं होगा ॥ २२ ॥
तावत्कलिमहोत्साहो निःशङ्कं सम्प्रवर्तते ।<br>यावज्जगति नाध्यात्मरामायणमुदेष्यति ॥२३॥कलियुगका महान् उत्साह तभीतक निःशंक रहेगा जबतक संसारमें अध्यात्मरामायणका उदय न होगा ॥ २३ ॥
तावद्यमभटाः शूराः सञ्चरिष्यन्ति निर्भयाः ।<br>यावज्जगति नाध्यात्मरामायणमुदेष्यति ॥२४॥यमराजके शूरवीर दूत तभीतक निर्भय विचरते रहेंगे जबतक जगत्में अध्यात्मरामायण प्रकट नहीं होगी ॥ २४ ॥
तावत्सर्वाणि शास्त्राणि विवदन्ते परस्परम् ॥२५॥<br>तावत्स्वरूपं रामस्य दुर्बोधं महतामपि ।<br>यावज्जगति नाध्यात्मरामायणमुदेष्यति ॥२६॥और सम्पूर्ण शास्त्रोंमें परस्पर विवाद तभीतक रहेगा तथा महापुरुषोंको भी भगवान् रामका स्वरूप तभीतक दुर्बोध रहेगा जबतक संसारमें अध्यात्मरामायणका प्रकाश नहीं होगा ॥ २५-२६ ॥
अध्यात्मरामायणसङ्कीर्तनश्रवणादिजम् ।<br>फलं वक्तुं न शक्नोमि कार्त्स्न्येन मुनिसत्तम ॥२७॥<br>तथाऽपि तस्य माहात्म्यं वक्ष्ये किञ्चित्तवानघ।<br>शृणु चित्तं समाधाय शिवेनोक्तं पुरा मम ॥२८॥"हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं अध्यात्मरामायणके कीर्तन और श्रवणसे होनेवाले फलका पूर्णतया वर्णन नहीं कर सकता, तथापि हे अनघ ! मैं तुम्हें उसका थोड़ा-सा माहात्म्य सुनाता हूँ। इसे पूर्वकालमें मुझसे शिवजीने कहा था; तुम सावधान होकर सुनो—॥२७-२८॥
अध्यात्मरामायणतः श्लोकं श्लोकार्धमेव वा ।<br>यः पठेद्भक्तिसंयुक्तः स पापान्मुच्यते क्षणात्॥२९॥जो पुरुष अध्यात्मरामायणका एक अथवा आधा श्लोक भी भक्तिपूर्वक पढ़ता है वह तत्क्षण पापमुक्त हो जाता है ॥२९॥
यस्तु प्रत्यहमध्यात्मरामायणमनन्यधीः ।<br>यथाशक्ति वदेद्भक्त्या स जीवन्मुक्त उच्यते ॥३०॥जो इस अध्यात्मरामायणको नित्यप्रति अनन्य बुद्धिसे भक्तिपूर्वक यथाशक्ति सुनाता है वह जीवन्मुक्त कहलाता है ॥३०॥
यो भक्त्यार्चयतेऽध्यात्मरामायणमतन्द्रितः।<br>दिनेदिनेऽश्वमेधस्य फलं तस्य भवेन्मुने ॥३१॥हे मुने ! जो पुरुष आलस्य छोड़कर भक्तिभावसे प्रतिदिन अध्यात्मरामायणका पूजन करता है उसे अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है ॥ ३१ ॥
यदृच्छयापि योऽध्यात्मरामायणमनादरात्।<br>अन्यतः शृणुयान्मर्त्यः सोऽपि मुच्येत पातकात् ३२जो मनुष्य दूसरोंसे अनियमपूर्वक अनादरसे भी अध्यात्मरामायण श्रवण करता है वह भी पातकसे छूट जाता है ॥ ३२ ॥
नमस्करोति योऽध्यात्मरामायणमदूरतः ।<br>सर्वदेवार्चनफलं स प्राप्नोति न संशयः ॥३३॥जो कोई अध्यात्मरामायणके निकट जाकर उसे नमस्कार करता है वह समस्त देवताओंकी पूजाका फल पाता है—इसमें सन्देह नहीं ॥ ३३ ॥
लिखित्वा पुस्तकेऽध्यात्मरामायणमशेषतः ।<br>यो दद्याद्रामभक्तेभ्यस्तस्य पुण्यफलं शृणु ॥३४॥"जो पुरुष अध्यात्मरामायणकी सम्पूर्ण पुस्तक लिखकर राम-भक्तोंको देता है उसे जो पुण्य होता है उसका फल सुनो ॥३४॥
अधीतेषु च वेदेषु शास्त्रेषु व्याकृतेषु च ।<br>यत्फलं दुर्लभं लोके तत्फलं तस्य सम्भवेत् ॥३५॥उसे वह फल मिलता है जो वेदोंके पढ़नेसे और शास्त्रोंकी व्याख्या करनेसे भी संसारमें दुर्लभ है ॥ ३५ ॥
एकादशीदिनेऽध्यात्मरामायणमुपोषितः ।<br>यो रामभक्तः सदसि व्याकरोति नरोत्तमः ॥३६॥जो नरश्रेष्ठ रामभक्त एकादशीको उपवास करके सभामें अध्यात्मरामायणकी व्याख्या करता है, हे वैष्णवश्रेष्ठ ! उसके

न अध्यात्मरामायण


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्य पुण्यफलं वक्ष्ये शृणु वैष्णवसत्तम ।<br>प्रत्यक्षरं तु गायत्रीपुरश्चर्याफलं भवेत् ॥३७॥पुण्यका फल बतलाता हूँ, सुनो। उसे एक-एक अक्षर के पढ़नेमें गायत्रीके पुरश्चरणका फल मिलता है ॥३६-३७॥
उपवासव्रतं कृत्वा श्रीरामनवमीदिने ।<br>रात्रौ जागरितोऽध्यात्मरामायणमनन्यधीः।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि तस्य पुण्यं वदाम्यहम् ॥३८॥जो पुरुष रामनवमीके दिन निराहार रहकर और फिर रात्रिको जागरण कर अनन्य बुद्धि-से अध्यात्मरामायणको पढ़ता या सुनता है, अब मैं उसका पुण्य बतलाता हूँ ॥३८॥
कुरुक्षेत्रादिनिखिलपुण्यतीर्थेष्वनेकंशः ।<br>आत्मतुल्यं धनं सूर्यग्रहणे सर्वतोमुखे ॥३९॥<br>विप्रेभ्यो व्यासुल्येभ्यो दत्त्वा यत्फलमश्नुते ।<br>तत्फलं सम्भवेत्तस्य सत्यं सत्यं न संशयः ॥४०॥कुरुक्षेत्रादि सम्पूर्ण पवित्र तीर्थोंमें सर्वग्रस्त सूर्यग्रहणके समय अनेकों बार व्यासजीके समान ब्राह्मणोंको अपने बराबर धन देनेसे जो फल होता है उसे वही फल मिलता है; इसमें कोई सन्देह नहीं, यह सर्वथा सत्य है, सर्वथा सत्य है ॥३९-४०॥
यो गायते मुदाऽध्यात्मरामायणमहर्निशम् ।<br>आज्ञां तस्य प्रतीक्षन्ते देवा इन्द्रपुरोगमाः ॥४१॥जो मनुष्य अहर्निश प्रसन्नचित्तसे अध्यात्मरामायणका गान करता है उसकी आज्ञाकी इन्द्रादि देवगण प्रतीक्षा किया करते हैं ॥४१॥
पठन्प्रत्यहमध्यात्मरामायणमनुव्रतः ।<br>यद्यत्करोति तत्कर्म ततः कोटिगुणं भवेत् ॥४२॥अध्यात्मरामायणका नित्यप्रति नियमपूर्वक पाठ करने-से मनुष्य जो कुछ पुण्य-कर्म करता है वह करोड़-गुना हो जाता है ॥४२॥
तत्र श्रीरामहृदयं यः पठेत्सुसमाहितः ।<br>स ब्रह्मघ्नोऽपि पूतात्मा त्रिभिरेव दिनैर्भवेत् ॥४३॥“इस (अध्यात्मरामायण) मेंसे जो पुरुष खूब समाहित होकर श्रीरामहृदयका पाठ करता है वह ब्रह्महत्यारा भी हो तो भी तीन दिनमें ही पवित्र हो जाता है ॥४३॥
श्रीरामहृदयं यस्तु हनूमत्प्रतिमान्तिके ।<br>त्रिः पठेत्प्रत्यहं मौनी स सर्वेप्सितभाग्भवेत् ॥४४॥जो पुरुष हनुमान्‌जीकी प्रतिमाके समीप प्रतिदिन तीन बार मौन होकर श्रीरामहृदयका पाठ करता है वह समस्त इच्छित फल प्राप्त करता है ॥४४॥
पठन् श्रीरामहृदयं तुलस्यश्वत्थयोर्यदि ।<br>प्रत्यक्षरं प्रकुर्वीत ब्रह्महत्यानिवर्तनम् ॥४५॥और यदि कोई पुरुष तुलसी या पीपलके निकट श्रीराम-हृदयका पाठ करे तो वह एक-एक अक्षरपर (अपनी) ब्रह्महत्या (जैसे पापों) को दूर कर देता है ॥४५॥
श्रीरामगीतामाहात्म्यं कृत्स्नं जानाति शङ्करः ।<br>तदर्धं गिरिजा वेत्ति तदर्धं वेद्म्यहं मुने ॥४६॥“हे मुने ! श्रीरामगीताका माहात्म्य पूरा-पूरा तो श्रीमहादेवजी ही जानते हैं; उनसे आधा पार्वतीजी जानती हैं और उनसे भी आधा मैं जानता हूँ ॥४६॥
तत्ते किञ्चित्प्रवक्ष्यामि कृत्स्नं वक्तुं न शक्यते ।<br>यज्ज्ञात्वा तत्क्षणालोकश्चित्तशुद्धिमवाप्नुयात्।४७।सो उसे पूरा कह भी नहीं सकता, उसमेंसे थोड़ा-सा तुम्हें सुनाता हूँ जिसके जाननेमात्रसे चित्त तत्काल शुद्ध हो जाता है ॥४७॥
श्रीरामगीता यत्पापं न नाशयति नारद ।<br>तन्न नश्यति तीर्थादौ लोके क्वापि कदाचन ।<br>तन्न पश्याम्यहं लोके मार्गमाणोऽपि सर्वदा ॥४८॥हे नारद ! जिस पापको श्रीरामगीताने नष्ट नहीं किया वह संसारमें कभी किसी तीर्थादिसे भी नष्ट नहीं हो सकता, मैं सदा ढूँढ़नेपर भी उस पापको नहीं देख पाता ॥४८॥
रामेणोपनिषत्सिन्धुमुन्मथ्योत्पादितां मुदा ।जिस गीतामृतको भगवान् रामने उपनिषत्सागरका

माहात्म्य \qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad मः


लक्ष्मणायार्पितां गीतासुधां पीत्वाऽमरो भवेत् ४९
जमदग्निसुतः पूर्वं कार्तवीर्यवधेच्छया ।
धनुर्विद्यामभ्यसितुं महेशस्यान्तिके वसन् ॥५०॥
अधीयमानां पार्वत्या रामगीतां प्रयत्नतः ।
श्रुत्वा गृहीत्वाऽऽशु पठन्नारायणकलामागात्॥५१॥
ब्रह्महत्यादिपापानां निष्कृतिं यदि वाञ्छति।
रामगीतां मासमात्रं पठित्वा मुच्यते नरः ॥५२॥
दुष्प्रतिग्रहदुर्भोज्यदुरालापादिसम्भवम् ।
पापं यत्तत्कीर्तनेन रामगीता विनाशयेत् ॥५३॥
शालग्रामशिलाग्रे च तुलस्यश्वत्थसन्निधौ ।
यतीनां पुरतस्तद्वद्रामगीतां पठेत्तु यः ॥५४॥
स तत्फलमवाप्नोति यद्वाचोऽपि न गोचरम्॥५५॥
रामगीतां पठन्भक्त्या यः श्राद्धे भोजयेद्द्विजान् ।
तस्य ते पितरः सर्वे यान्ति विष्णोः परं पदम् ॥५६॥
एकादश्यां निराहारो नियतो द्वादशीदिने ।
स्थित्वाऽगस्त्यतरोर्मूले रामगीतां पठेत्तु यः ।
स एव राघवः साक्षात्सर्वदेवैश्च पूज्यते ॥५७॥
विना दानं विना ध्यानं विना तीर्थावगाहनम् ।
रामगीतां नरोऽधीत्य तदनन्तफलं लभेत् ॥५८॥
बहुना किमिहोक्तेन शृणु नारद तत्त्वतः ।
श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासागमशतानि च ।
अर्हन्ति नाल्पमध्यात्मरामायणकलामपि ॥५९॥
अध्यात्मरामचरितस्य मुनीश्वराय
माहात्म्यमेतदुदितं कमलासनेन ।
यः श्रद्धया पठति वा शृणुयात्स मर्त्यः
प्राप्नोति विष्णुपदवीं सुरपूज्यमानः॥६०॥


मन्थन कर निकाला और फिर बड़ी प्रसन्नतासे लक्ष्मण-जीको दिया (मनुष्यको चाहिये कि) उसका पान करके अमर हो जाय ॥ ४९ ॥ पूर्वकालमें सहस्रार्जुनके वधकी इच्छासे जमदग्निनन्दन परशुरामजी धनुर्विद्याका अभ्यास करनेके लिये श्रीमहादेवजीके पास रहते थे ॥५०॥ उस समय रामगीताका अध्ययन करती हुई पार्वतीजीसे इसे यत्नपूर्वक सुनकर और तुरन्त ही हृदयंगम कर इसका पाठ करते-करते वे श्रीनारायणकी कलारूप हो गये ॥ ५१ ॥ यदि कोई पुरुष ब्रह्महत्या आदि घोर पापोंसे मुक्त होना चाहे तो केवल एकमास रामगीताका पाठ करनेसे छूट सकता है ॥५२॥ बुरे दान, निषिद्ध भोजन और खोटी बोलचाल आदिसे जो पाप होता है उसे रामगीता पाठमात्रसे नष्ट कर देती है ॥५३॥ जो पुरुष शालग्राम शिलाके आगे, तुलसी या पीपलके पास अथवा यतिजनोंके सामने रामगीताका पाठ करता है उसे वह फल मिलता है जो वाणीका भी विषय नहीं है ॥५४-५५॥ जो मनुष्य श्राद्धमें रामगीताका भक्तिपूर्वक पाठ करके ब्राह्मणोंको भोजन कराता है उसके वे समस्त पितृगण भगवान् विष्णुके परम धामको जाते हैं ॥५६॥ जो पुरुष एकादशीके दिन निराहार और जितेन्द्रिय रहकर द्वादशीको अगस्त्य वृक्षके नीचे बैठकर रामगीताका पाठ करता है वह साक्षात् रामरूप ही है, उसकी समस्त देवगण पूजा करते हैं ॥५७॥ रामगीताका पाठ करनेसे मनुष्य बिना किसी दान, ध्यान अथवा तीर्थस्नानके ही अक्षय फल पाता है ॥५८॥ हे नारद ! और अधिक क्या कहा जाय जो वास्तविक बात है वह सुन—श्रुति, स्मृति, पुराण और इतिहास आदि सैकड़ों शास्त्र श्रीअध्यात्मरामायणकी एक तुच्छ कलाके समान भी नहीं हैं” ॥५९॥

यह अध्यात्मरामायणका माहात्म्य श्रीब्रह्माजीने मुनिराज नारदसे कहा है । इसे जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक पढ़ता या सुनता है वह देवताओंसे पूजित होकर श्रीविष्णुभगवान्का पद प्राप्त करता है ॥६०॥


इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे उत्तरखण्डेऽध्यात्मरामायण-
माहात्म्यं सम्पूर्णम्

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बालकाण्ड

श्रीसीतारामाभ्यां नमः

अध्यात्मरामायण


बालकाण्ड

आलोक्य यस्यातिललामलीलां सद्भाग्यभाजौ पितरौ कृतार्थौ ।
तमर्भकं दर्पकदर्पचौरं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥

[चित्र: ध्यानस्थ भगवान् शिव]

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सदाप्रसन्न राम

सोऽयं परात्मा पुरुषः पुराणः एकः स्वयंज्योतिरनन्त आद्यः।
मायातनुं लोकविमोहनीयां धत्ते परानुग्रह एष रामः॥
(अ० रा० बाल० ५ । ४६)