अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
बालकाण्ड - सर्ग ४: विश्वामित्रजीका आगमन; राम और लक्ष्मणका उनके साथ जाना...
| १८ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ४ |
|---|
प्रातरुत्थाय सुस्नातः पितरावभिवाद्य च ।
पौरकार्याणि सर्वाणि करोति विनयान्वितः ॥ ६४ ॥
बन्धुभिः सहितो नित्यं भुक्त्वा मुनिभिरन्वहम् ।
धर्मशास्त्ररहस्यानि शृणोति व्याकरोति च ॥ ६५ ॥
एवं परात्मा मनुजावतारो
मनुष्यलोकाननुसृत्य सर्वम् ।
चक्रेऽविकारी परिणामहीनो
विचार्यमाणे न करोति किञ्चित् ॥ ६६ ॥
करनेके अनन्तर वे माता-पिताको प्रणाम करते और फिर नम्रतापूर्वक नगर-निवासियोंके समस्त कार्य करते ॥ ६४ ॥ फिर भाइयोंसहित भोजन करके नित्यप्रति मुनिजनोंसे धर्मशास्त्रोंका मर्म सुनते और स्वयं भी उनकी व्याख्या करते ॥ ६५ ॥
इस प्रकार अविकारी और परिणामहीन परमात्मा मनुष्यावतार लेकर मनुष्योंके आचरणका अनुगमन करते हुए समस्त कार्य किये; पर विचार करके देखा जाय तो वे कुछ भी नहीं करते ॥ ६६ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे बालकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥
चतुर्थ सर्ग
विश्वामित्रजीका आगमन; राम और लक्ष्मणका उनके साथ जाना और ताटकाका वध करना ।
श्रीमहादेव उवाच
कदाचित्कौशिकोऽभ्यागादयोध्यां ज्वलनप्रभः ।
द्रष्टुं रामं परात्मानं जातं ज्ञात्वा स्वमायया ॥ १ ॥
दृष्ट्वा दशरथो राजा प्रत्युत्थायाचिरेण तु ।
वसिष्ठेन समागम्य पूजयित्वा यथाविधि ॥ २ ॥
अभिवाद्य मुनिं राजा प्राञ्जलिर्भक्तिनम्रधीः ।
कृतार्थोऽस्मि मुनीन्द्राद्यं त्वदागमनकारणात् ॥ ३ ॥
त्वद्विधा यद्गृहं यान्ति तत्रैवायान्ति संपदः ।
यदर्थमागतोऽसि त्वं ब्रूहि सत्यं करोमि तत् ॥ ४ ॥
विश्वामित्रोऽपि तं प्रीतः प्रत्युवाच महामतिः ।
अहं पर्वणि संप्राप्ते दृष्ट्वा यष्टुं सुरान्पितॄन् ॥ ५ ॥
यदारभे तदा दैत्या विघ्नं कुर्वन्ति नित्यशः ।
मारीचश्च सुबाहुश्चापरे चानुचरास्तयोः ॥ ६ ॥
श्रीमहादेवजी बोले— एक बार अग्निके समान तेजस्वी महर्षि विश्वामित्र परमात्माको अपनी ही मायासे रामरूपमें प्रकट हुए जान उनके दर्शन करनेके लिये अयोध्या-पुरीमें आये ॥ १ ॥ उन्हें देखते ही महाराज दशरथ तुरन्त उठ खड़े हुए और वसिष्ठजीके सहित आगे आकर उनका स्वागत किया और यथाविधि पूजन तथा अभिवादन कर राजाने भक्ति-विनम्र-चित्तसे हाथ जोड़कर मुनिसे कहा—"हे मुनीन्द्र ! आपके शुभागमनसे आज मैं कृतकृत्य हो गया ॥ २-३ ॥ जिस घरमें आप-जैसे महानुभाव पधारते हैं उसमें सभी सम्पत्तियाँ आ जाती हैं । अब आप यह बताइये कि आपका शुभागमन किसलिये हुआ है ? मैं आपसे सत्य कहता हूँ, मैं आपकी आज्ञाका पालन अवश्य करूँगा" ॥ ४ ॥
तत्र महामति विश्वामित्रजीने उनसे कहा—"जब कभी पर्वकाल उपस्थित हुआ देखकर मैं देव और पितृगणों-के लिये यजन करना आरम्भ करता हूँ तो सदा ही मारीच, सुबाहु और उनके अन्यान्य अनुयायी दैत्यगण उसमें विघ्न डाल देते हैं ॥ ५-६ ॥ अतएव उनका
सर्ग ४ ] बालकाण्ड [ १९
अतस्तयोर्वधार्थाय ज्येष्ठं रामं प्रयच्छ मे ।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा तव श्रेयो भविष्यति ॥७॥
वसिष्ठेन सहामन्त्र्य दीयतां यदि रोचते ।
पप्रच्छ गुरुमेकान्ते राजा चिन्तापरायणः ॥८॥
किं करोमि गुरो रामं त्यक्तुं नोत्सहते मनः ।
बहुवर्षसहस्रान्ते कष्टेनोत्पादिताः सुताः ॥९॥
चत्वारोऽमरतुल्यास्ते तेषां रामोऽतिवल्लभः ।
रामस्त्वितो गच्छति चेन्न जीवामि कथञ्चन ॥१०॥
प्रत्याख्यातो यदि मुनिः शापं दास्यत्यसंशयः ।
कथं श्रेयो भवेन्मह्यमसत्यं चापि न स्पृशेत् ॥११॥
वसिष्ठ उवाच
शृणु राजन्देवगुह्यं गोपनीयं प्रयत्नतः ।
रामो न मानुषो जातः परमात्मा सनातनः ॥१२॥
भूमेर्भारावताराय ब्रह्मणा प्रार्थितः पुरा ।
स एव जातो भवने कौसल्यायां तवानघ ॥१३॥
त्वं तु प्रजापतिः पूर्वं कश्यपो ब्रह्मणः सुतः ।
कौसल्या चादितिर्देवमाता पूर्वं यशस्विनी ।
भवन्तौ तप उग्रं वै तेपाथे बहुवत्सरम् ॥१४॥
अग्राम्यविषयौ विष्णुपूजाध्यानैकतत्परौ ।
तदा प्रसन्नो भगवान्वरदो भक्तवत्सलः ॥१५॥
वृणीष्व वरमित्युक्ते त्वं मे पुत्रो भवामल ।
इति त्वया याचितोऽसौ भगवान्भूतभावनः ॥१६॥
तथेत्युक्त्वाऽद्य पुत्रस्ते जातो रामः स एव हि ।
शेषस्तु लक्ष्मणो राजन् राममेवान्वपद्यत ॥१७॥
जातौ भरतशत्रुघ्नौ शङ्खचक्रे गदाभृतः ।
योगमायापि सीतेति जाता जनकनन्दिनी ॥१८॥
वध करनेके लिये तुम अपने बड़े पुत्र रामको भाई लक्ष्मणके सहित मुझे दो, इससे तुम्हारा भी परम कल्याण होगा ॥७॥ इस विषयमें वसिष्ठजीसे सम्मति करके यदि तुम्हारी इच्छा हो तो तुम मुझे दोनों कुमारोंको दे दो।" तब राजाने चिन्ताकुल होकर एकान्तमें गुरुजीसे पूछा ॥८॥ "हे गुरो ! सहस्रों वर्ष बीतनेपर बड़े कष्टसे मुझे ये देवताओंके सदृश चार पुत्र मिले हैं। इनमें राम मुझे बहुत ही प्रिय है, सो अब मैं क्या करूँ ? मेरा चित्त तो रामको छोड़नेके लिये तैयार नहीं है। यदि राम यहाँसे चला जायगा तो मैं किसी प्रकार भी जी नहीं सकूँगा ॥९-१०॥ परन्तु यदि मैं सूखा जवाब दूँ तो यह निश्चय है कि मुनि मुझे शाप दे देंगे। अतः अब यह बताइये कि मेरा हित किस प्रकार हो और मैं असत्य-भाषणसे भी कैसे बचूँ ?" ॥११॥
**वसिष्ठजी बोले—**राजन् ! यह देवताओंकी गुह्य लीला सुनो, इसे किसी प्रकार प्रकट न होने देना चाहिये। ये राम मनुष्य नहीं हैं साक्षात् पुराण-पुरुष परमात्मा ही (अपनी मायासे) इस रूपमें प्रकट हुए हैं ॥१२॥ हे अनघ ! पूर्वकालमें पृथिवीका भार उतारनेके लिये ब्रह्माजीने भगवान्से प्रार्थना की थी, उसे पूर्ण करनेके लिये उन परमेश्वरने तुम्हारे यहाँ कौसल्याके गर्भसे जन्म लिया है ॥१३॥ पूर्व जन्ममें तुम ब्रह्माजीके पुत्र प्रजापति कश्यप थे और यशस्विनी कौसल्या देवमाता अदिति थीं। उस समय तुम दोनोंने बहुत वर्षोंतक ग्राम्य-विषयोंसे रहित और एकमात्र भगवान् विष्णुकी पूजामें तत्पर रहकर बड़ा उग्र तप किया। तब कालान्तरमें भक्तवत्सल वरदायक भगवान्ने तुम दोनोंपर प्रसन्न होकर कहा कि 'वर माँगो' तो तुमने (भगवान्से) यही माँगा कि 'हे निरञ्जन ! आप हमारे पुत्र हों' तब भूतभावन भगवान्ने कहा कि 'ऐसा ही हो।' इसलिये वे ही विष्णु भगवान् इस समय रामरूपसे तुम्हारे पुत्र हुए हैं और (उनकी सेवा करनेके लिये) शेषजी लक्ष्मणके रूपमें प्रकट होकर उनके अनुयायी हुए हैं ॥१४—१७॥ भगवान् गदाधरके शङ्ख और चक्रने भरत और शत्रुघ्नके रूपसे अवतार लिया है तथा योगमाया जनक-दुलारी सीताजी होकर प्रकट हुई हैं ॥१८॥ इस
२० अध्यात्मरामायण [ सर्ग ४
विश्वामित्रोऽपि रामाय तां योजयितुमागतः।
एतद्गुह्यतमं राजन्न वक्तव्यं कदाचन ॥१९॥
अतः प्रीतेन मनसा पूजयित्वाऽथ कौशिकम्।
प्रेषयस्व रमानाथं राघवं सहलक्ष्मणम् ॥२०॥
वसिष्ठेनैवमुक्तस्तु राजा दशरथस्तदा।
कृतकृत्यमिवात्मानं मेने प्रमुदितान्तरः ॥२१॥
आहूय रामरामेति लक्ष्मणेति च सादरम्।
आलिङ्ग्य मूर्धन्यवघ्राय कौशिकाय समर्पयत्॥२२॥
ततोऽतिहृष्टो भगवान्विश्वामित्रः प्रतापवान्।
आशीर्भिरभिनन्द्याथ आगतौ रामलक्ष्मणौ ॥२३॥
गृहीत्वा चापतूणीरवाणखड्गधरौ ययौ।
किञ्चिद्देशमतिक्रम्य राममाहूय भक्तितः ॥२४॥
ददौ वलां चातिबलां विद्ये द्वे देवनिर्मिते।
ययोर्ग्रहणमात्रेण क्षुत्क्षामादि न जायते ॥२५॥
तत उत्तीर्य गङ्गां ते ताटकावनमागमन्।
विश्वामित्रस्तदा प्राह रामं सत्यपराक्रमम् ॥२६॥
अत्रास्ति ताटका नाम राक्षसी कामरूपिणी।
बाधते लोकमखिलं जहि तामविचारयन् ॥२७॥
तथेति धनुरादाय सगुणं रघुनन्दनः।
टङ्कारमकरोत्तेन शब्देनापूरयद्वनम् ॥२८॥
तच्छ्रुत्वासहमाना सा ताटका घोररूपिणी।
क्रोधसंमूर्च्छिता राममभिदुद्राव मेघवत् ॥२९॥
तामेकेन शरेणाशु ताडयामास वक्षसि।
पपात विपिने घोरा वमन्ती रुधिरं बहु ॥३०॥
समय विश्वामित्रजी रामसे सीताका संयोग करानेके लिये ही आये हैं। हे राजन् ! यह रहस्य अत्यन्त गुह्य है, इसे कभी प्रकाशित मत करना ॥ १९ ॥ (अब सम्पूर्ण रहस्य तुमको मालूम हो गया है) इसलिये अब तुम प्रसन्न-चित्तसे श्रीविश्वामित्रजीका सत्कार करके लक्ष्मीपति श्रीरघुनाथजीको लक्ष्मणसहित इनके साथ भेज दो॥२०॥
वसिष्ठजीके इस प्रकार कहनेपर राजा दशरथने उस समय अपनेको कृतकृत्य माना और प्रसन्न-चित्तसे आदरपूर्वक 'हे राम ! हे राम ! हे लक्ष्मण !' ऐसा कहकर पुकारा तथा उन दोनों भाइयोंके आनेपर उन्हें हृदयसे लगाकर और शिर सूंघकर श्रीविश्वामित्रजीको सौंप दिया ॥ २१-२२ ॥ तब अति प्रतापी भगवान् विश्वामित्रजीने उन्हें अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक आशीर्वाद देकर सम्मानित किया और फिर धनुष, तरकश, बाण एवं खड्ग आदिसे सुसज्जित होकर अपने पास आये हुए राम और लक्ष्मणको साथ लेकर वहाँसे चल पड़े। थोड़ी दूर जानेपर विश्वामित्रजीने भक्तिपूर्वक रामको बुलाया और उन्हें देव-निर्मित बला और अतिबला नामकी ऐसी दो विद्याएँ दीं, जिनके ग्रहण करने-से ही क्षुधा और दुर्बलता आदिकी बाधा नहीं होती ॥ २३-२५ ॥
तदनन्तर गङ्गाजीको पार कर वे ताटकावनमें आये; तब विश्वामित्रजीने सत्यपराक्रमी रामसे कहा ॥ २६ ॥ "यहाँ एक ताटका नामकी इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली राक्षसी रहती है जो इस प्रदेशके समस्त निवासियोंको अत्यन्त कष्ट पहुँचाती है, तुम बिना कुछ सोच-विचार किये उसे मार डालो ॥ २७॥ तब रघुनाथजीने 'बहुत अच्छा' कह धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर टंकार किया, जिसके शब्दसे वह सम्पूर्ण वन गुञ्जायमान हो गया ॥ २८ ॥ उस शब्दको सुनकर घोररूपिणी ताटका उसे सहन न कर सकने-के कारण क्रोधसे पागल होकर मेघके समान रामकी ओर दौड़ी ॥ २९ ॥ भगवान् रामने तुरन्त ही उसके वक्षःस्थलमें एक बाण मारा, जिससे वह घोर राक्षसी बहुत-सा रुधिर उगलती हुई उस वनमें गिर पड़ी ॥३०॥ फिर शापवश पिशाचताको प्राप्त हुई वह ताटका श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे शापमुक्त होकर एक सर्वाङ्कार-