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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

अरण्यकाण्ड - सर्ग ६: रावणका मारीचके पास जाना

१२६अध्यात्मरामायणं[ सर्ग ६

षष्ठ सर्ग

रावणका मारीचके पास जाना ।


श्रीमहादेव उवाच**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! रात्रिके समय इस प्रकार विचारकर प्रातःकाल होनेपर रावण रथमें सवार हुआ और अपने मन-ही-मन एक कार्य निश्चय कर वह समुद्रके दूसरे तटपर मारीचके घर गया । वहाँ मारीच मुनियोंके समान जटा-वल्कलादि धारण-कर प्राकृत गुणोंके प्रकाशक निर्गुण भगवान्‌का ध्यान कर रहा था । समाधि भंग होनेपर उसने रावणको अपने घर आया देखा ॥ १–३ ॥
विचिन्त्यैवं निशायां स प्रभाते रथमास्थितः ।<br>रावणो मनसा कार्यमेकं निश्चित्य बुद्धिमान् ॥१॥<br>ययौ मारीचसदनं परं पारमुदन्वतः ।<br>मारीचस्तत्र मुनिवज्जटावल्कलधारकः ॥२॥<br>ध्यायन् हृदि परात्मानं निर्गुणं गुणभासकम् ।<br>समाधिविरमेऽपश्यद्रावणं गृहमागतम् ॥३॥
द्रुतमुत्थाय चालिङ्ग्य पूजयित्वा यथाविधि ।<br>कृतातिथ्यं सुखासीनं मारीचो वाक्यमब्रवीत् ॥४॥रावणको देखते ही वह शीघ्रतासे उठ खड़ा हुआ और उससे गले मिलकर उसकी विधिपूर्वक पूजा की । तथा आतिथ्य-सत्कारके अनन्तर जब रावण स्वस्थ होकर बैठा तो मारीच उससे बोला—॥ ४ ॥
समागमनमेतत्ते रथेनैकेन रावण ।<br>चिन्तापर इवाभासि हृदि कार्यं विचिन्तयन् ॥५॥“हे रावण ! इस समय तुम अकेले ही रथमें बैठकर आये हो और तुम्हारा चित्त किसी कार्यके विचारमें चिन्ताग्रस्त-सा प्रतीत होता है ॥ ५ ॥
ब्रूहि मे नहि गोप्यं चेत्करवाणि तव प्रियम् ।<br>न्याय्यं चेद् ब्रूहि राजेन्द्र वृजिनं मां स्पृशेन्न हि ॥६॥यदि गोपनीय न हो तो मुझे वह कार्य बताइये । हे राजेन्द्र ! यदि उसके करनेमें मुझे पाप न लगे और वह न्यायानुतूल हो तो कहो, मैं तुम्हारा वह प्रिय कार्य अवश्य करूँगा” ॥ ६ ॥
रावण उवाच**रावण बोला—**कहते हैं राजा दशरथ अयोध्यापुरी-का अधिपति है, उसका ज्येष्ठ पुत्र सत्यपराक्रमी राम है ॥ ७ ॥
अस्ति राजा दशरथः साकेताधिपतिः किल ।<br>रामनामा सुतस्तस्य ज्येष्ठः सत्यपराक्रमः ॥७॥
विवासयामास सुतं वनं वनजनप्रियम् ।<br>भार्यया सहितं भ्रात्रा लक्ष्मणेन समन्वितम् ॥८॥उस अपने मुनिजनप्रिय पुत्रको दशरथने स्त्री और छोटे भाई लक्ष्मणके सहित वनमें भेज दिया है ॥ ८ ॥
स आस्ते विपिने घोरे पञ्चवट्याश्रमे शुभे ।<br>तस्य भार्या विशालाक्षी सीता लोकविमोहिनी ॥९॥इस समय वह घोर दण्डकारण्यके पञ्चवटी नामक शुभ आश्रममें रहता है । सुना है, उसकी भार्या विशाल-नयना सीता त्रिलोकीको मोहित करनेवाली है ॥ ९ ॥
रामो निरपराधान्मे राक्षसान् भीमविक्रमान् ।<br>खरं च हत्वा विपिने सुखमास्तेऽतिनिर्भयः ॥१०॥वह राम, मेरे बड़े पराक्रमी निरपराध राक्षसोंको भाई खरके सहित मारकर उस तपोवनमें निर्भयता-पूर्वक बड़े आनन्दसे रहता है ॥ १० ॥
भगिन्याः शूर्पणखाया निर्दोषायाश्च नासिकाम् ।<br>कर्णौ चिच्छेद दुष्टात्मा वने तिष्ठति निर्भयः ॥११॥मेरी बहिन शूर्पणखाने उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ा था किन्तु उस दुष्टने उसके नाक-कान काट डाले और अब निर्भयतापूर्वक उस वनमें रहता है ॥ ११ ॥
अतस्त्वया सहायेन गत्वा तत्राणवल्लभाम् ।<br>आनयिष्यामि विपिने रहिते राघवेण ताम् ॥१२॥इसलिये अब तुम्हारी सहायतासे मैं रामके तपोवनमें न रहनेपर उसकी प्राणप्रिया सीताको ले आना चाहता हूँ ॥ १२ ॥

सर्ग ६ ] अरण्यकाण्ड १२७


त्वं तु मायामृगो भूत्वा ह्याश्रमादपनेष्यसि ।<br>रामं च लक्ष्मणं चैव तदा सीतां हराम्यहम् ॥ १३॥<br>त्वं तु तावत्सहायं मे कृत्वा स्थास्यसि पूर्ववत् ।<br>इत्येवं भाषमाणं तं रावणं वीक्ष्य विस्मितः ॥ १४॥<br>केनेदमुपदिष्टं ते मूलघातकरं वचः ।<br>स एव शत्रुर्बध्यश्च यस्तवन्नाशं प्रतीक्षते ॥ १५॥<br>रामस्य पौरुषं स्मृत्वा चित्तमद्यापि रावण ।<br>बालोऽपि मां कौशिकस्य यज्ञसंरक्षणाय सः ॥ १६॥<br>आगतस्तिग्मपुङ्खेन पातयामास सागरे ।<br>योजनानां शतं रामस्तदादि भयविह्वलः ॥ १७॥<br>स्मृत्वा स्मृत्वा तदेवाहं रामं पश्यामि सर्वतः ॥ १८॥<br>दण्डकेऽपि पुनरप्यहं वने<br>$\hspace{1em}$पूर्ववैरमनुचिन्तयन् हृदि ।<br>तीक्ष्णशृङ्गमृगरूपमेकदा<br>$\hspace{1em}$मादृशैर्बहुभिरानृतोऽभ्ययाम् ॥ १९॥<br>राघवं जनकजासमन्वितं<br>$\hspace{1em}$लक्ष्मणेन सहितं त्वरान्वितः ।<br>आगतोऽहमथ हन्तुमुद्यतो<br>$\hspace{1em}$मां विलोक्य शरमेकमाक्षिपत् ॥ २०॥<br>तेन विद्धहृदयोऽहमुद्भ्रमन्<br>$\hspace{1em}$राक्षसेन्द्र पतितोऽस्मि सागरे ।<br>तत्प्रभृत्यहमिदं समाश्रितः<br>$\hspace{1em}$स्थानमूर्जितमिदं भयार्दितः ॥ २१॥<br>राममेव सततं विभावये<br>$\hspace{1em}$भीत भीत इव भोगराशितः ।<br>राजरत्नरमणीरथादिकं<br>$\hspace{1em}$श्रोत्रयोर्यदि गतं भयं भवेत् ॥ २२॥<br>राम आगत इहेति शङ्कया<br>$\hspace{1em}$बाह्यकार्यमपि सर्वमत्यजम् ।<br>निद्रया परिगतो यदा स्वपे<br>$\hspace{1em}$राममेव मनसाऽनुचिन्तयन् ॥ २३॥<br>स्वप्नदृष्टगतराघवं तदा<br>$\hspace{1em}$बोधितो विगतनिद्र आस्थितः ।तुम मायासे मृगरूप होकर राम और लक्ष्मणको आश्रमसे दूर ले जाना। उसी समय मैं सीताको हर लाऊँगा ॥ १३ ॥ इस प्रकार मेरी सहायता करके तुम फिर पूर्ववत् अपने आश्रममें आ रहना ।<br>$\hspace{1em}$रावणको इस प्रकार कहते देख मारीचने विस्मित होकर कहा—॥ १४ ॥ "रावण ! ये सर्वनाश करने-वाली बातें तुम्हें किसने बतायी हैं ? इस प्रकार जो कोई तुम्हारा नाश करना चाहता है, निश्चय ही वह तुम्हारा शत्रु है और वध करने योग्य है ॥ १५ ॥ हे रावण ! उनके बाल्यकालके पौरुषको याद करके, जब वे विश्वामित्रजीकी यज्ञ-रक्षाके लिये आये थे और उन्होंने एक बाणसे ही मुझे सौ योजन दूर समुद्रके तटपर फेंक दिया था, आजतक मेरा हृदय भयसे व्याकुल हो जाता है। बारम्बार उसी बातका स्मरण हो आनेसे मुझे सब ओर राम-ही-राम दिखलायी देने लगते हैं ॥ १६–१८ ॥ एक दिन अपने पूर्व-वैरका स्मरण कर मैं दण्डकारण्यमें भी अपने-जैसे बहुत-से मृगोंके साथ मिलकर एक तीखे सींगोंवाले मृगका रूप बनाकर गया था ॥ १९ ॥ जब मैं बड़ी फुर्तीसे सीता और लक्ष्मणके सहित श्रीरघुनाथजीको मारनेकी इच्छासे आगे बढ़ा तो मुझे देखकर उन्होंने केवल एक बाण छोड़ दिया ॥ २० ॥ हे राक्षसेन्द्र ! उसीसे हृदय विंध जानेके कारण मैं आकाशमें चक्कर काटता हुआ समुद्रमें आकर गिरा। तबसे मैं भयभीत होकर इस पवित्र स्थानमें आश्रम बनाकर बड़ी सावधानीसे रहता हूँ ॥ २१ ॥ राज, रत्न, रमणी और रथ आदि (भोग-सामग्रियोंके प्रथम अक्षर 'र') के कानोंमें पड़ते ही मुझे (रामकी याद आ जानेसे) भय उत्पन्न हो जाता है, इसलिये मैं भोग-समुदायसे भयभीत होकर निरन्तर 'राम' का ही ध्यान करता रहता हूँ ॥ २२ ॥ 'यहाँ राम न आ गये हों' इस आशंकासे मैंने समस्त बाह्य कार्य छोड़ दिये हैं। जिस समय मैं निद्राके वशीभूत होकर सोता हूँ उस समय मन-ही-मन रामका ही स्मरण करता रहता हूँ ॥ २३ ॥ इस प्रकार स्वप्नमें देखे हुए श्रीरघुनाथजीको जब निद्रा टूटनेपर जागता हूँ तब भी नहीं भूलता। अतः हे रावण ! तुम भी