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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

युद्धकाण्ड - सर्ग १: वानर-सेनाका प्रस्थान

ॐ

अध्यात्मरामायण

युद्धकाण्ड


प्रथम सर्ग

वानर-सेनाका प्रस्थान।

श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले—
यथावद्भाषितं वाक्यं श्रुत्वा रामो हनूमतः ।<br>उवाचानन्तरं वाक्यं हर्षेण महताऽऽवृतः ॥ १ ॥हे पार्वति ! हनुमान्जीके ज्यों-के-त्यों कहे हुए वाक्योंको सुननेके अनन्तर श्री-रामचन्द्रजीने अति हर्षसे भरकर ये वचन कहे—॥ १ ॥
कार्यं कृतं हनुमता देवैरपि सुदुष्करम् ।<br>मनसाऽपि यदन्येन स्मर्तुं शक्यं न भूतले ॥ २ ॥“हनुमान्जीने जो कार्य किया है उसका करना देवताओंको भी अति कठिन है, पृथ्वीतलपर और कोई तो उसका मनसे भी स्मरण नहीं कर सकता ॥ २ ॥
शतयोजनविस्तीर्णं लङ्घयेत्कः पयोनिधिम् ।<br>लङ्कां च राक्षसैर्गुप्तां को वा धर्षयितुं क्षमः ॥ ३ ॥भला ऐसा कौन है जो सौ योजन विस्तारवाले समुद्रको लाँघने और राक्षसोंसे सुरक्षिता लङ्कापुरीका ध्वंस करनेमें समर्थ हो ? ॥ ३ ॥
भृत्यकार्यं हनुमता कृतं सर्वमशेषतः ।<br>सुग्रीवस्येदृशो लोके न भूतो न भविष्यति ॥ ४ ॥हनुमान्ने सुग्रीवके समग्र सेवक-धर्मको खूब निभाया । संसारमें ऐसा न कोई हुआ और न आगे होगा ही ॥ ४ ॥
अहं च रघुवंशश्च लक्ष्मणश्च कपीश्वरः ।<br>जानक्या दर्शनेनाद्य रक्षिताःस्मो हनूमता ॥ ५ ॥हनुमान्ने जानकीजीको देखकर आज मुझको तथा रघुवंश, लक्ष्मण और सुग्रीव आदि सभीको बचा लिया है ॥५॥
सर्वथा सुकृतं कार्यं जानक्याः परिमार्गणम् ।<br>समुद्रं मनसा स्मृत्वा सीदतीव मनो मम ॥ ६ ॥जानकीजीकी खोजका कार्य तो बिलकुल ठीक हो गया, किन्तु समुद्रकी याद आनेसे मेरा मन व्यथित-सा होने लगता है ॥ ६ ॥
कथं नक्रझषाकीर्णं समुद्रं शतयोजनम् ।<br>लङ्घयित्वा रिपुं हन्यां कथं द्रक्ष्यामि जानकीम् ॥७॥नाके और मकरोंसे भरे हुए सौ योजन विस्तारवाले समुद्रको लाँघकर मैं शत्रुको कैसे मारूँगा ? और जानकीजीको कैसे देख सकूँगा ? ॥७॥
श्रुत्वा तु रामवचनं सुग्रीवः प्राह राघवम् ।<br>समुद्रं लङ्घयिष्यामो महानक्रझषाकुलम् ॥८॥श्रीरघुनाथजीके ये वचन सुनकर सुग्रीव उनसे बोला—
लङ्कां च विधमिष्यामो हनिष्यामोऽद्य रावणम् ।<br>चिन्तां त्यज रघुश्रेष्ठ चिन्ता कार्यविनाशिनी ॥९॥“हम बड़े-बड़े नाके और मछलियोंसे पूर्ण समुद्रको लाँघ जायँगे और शीघ्र ही लङ्काको विध्वंस कर रावणका भी नाश करेंगे । रघुनाथजी ! आप चिन्ता छोड़िये, चिन्ता तो कार्य बिगाड़नेवाली होती है

३०

२३४अध्यात्मरामायण[ सर्ग १
एतान्यश्य महासत्त्वान् शूरान्वानरपुङ्गवान् ।<br>त्वत्प्रियार्थं समुद्युक्तान्प्रवेष्टुमपि पावकम् ॥१०॥<br><br>समुद्रतरणे बुद्धिं कुरुष्व प्रथमं ततः ।<br>दृष्ट्वा लङ्कां दशग्रीवो हत इत्येव मन्महे ॥ ११॥<br><br>नहि पश्याम्यहं कश्चित्त्रिषु लोकेषु राघव ।<br>गृहीतधनुषो यस्ते तिष्ठेदभिमुखो रणे ॥१२॥<br><br>सर्वथा नो जयो राम भविष्यति न संशयः ।<br>निमित्तानि च पश्यामि तथाभूतानि सर्वशः॥१३॥<br><br>सुग्रीववचनं श्रुत्वा भक्तिवीर्यसमन्वितम् ।<br>अङ्गीकृत्याब्रवीद्रामो हनूमन्तं पुरःस्थितम् ॥१४॥<br><br>येन केन प्रकारेण लङ्घयामो महार्णवम् ।<br>लङ्कास्वरूपं मे ब्रूहि दुःसाध्यं देवदानवैः ॥१५॥<br><br>ज्ञात्वा तस्य प्रतीकारं करिष्यामि कपीश्वर ।<br>श्रुत्वा रामस्य वचनं हनूमान्विनयान्वितः ॥१६॥<br><br>उवाच प्राञ्जलिर्देव यथा दृष्टं ब्रवीमि ते ।<br>लङ्का दिव्या पुरी देव त्रिकूटशिखरे स्थिता ॥१७॥<br><br>स्वर्णप्राकारसहिता स्वर्णाट्टालकसंयुता ।<br>परिखाभिः परिवृता पूर्णाभिर्निर्मलोदकैः ॥१८॥<br><br>नानोपवनशोभाढ्या दिव्यवापीभिरावृता ।<br>गृहैर्विचित्रशोभाढ्यैर्मणिस्तम्भमयैः शुभैः ॥१९॥<br><br>पश्चिमद्वारमासाद्य गजवाहाः सहस्रशः ।<br>उत्तरे द्वारि तिष्ठन्ति साश्ववाहाः सपत्तयः ॥२०॥<br><br>तिष्ठन्त्यर्बुदसङ्ख्याकाः प्राच्यामपि तथैव च ।<br>दक्षिणे राक्षसा वीर द्वारं दक्षिणमाश्रिताः ॥२१॥<br><br>मध्यकक्षेऽप्यसङ्ख्याता गजाश्वरथपत्तयः ।<br>रक्षयन्ति सदा लङ्कां नानास्त्रकुशलाः प्रभो ॥२२॥॥ ८-९ ॥ आप इन महापराक्रमी और शूरवीर वानर-वीरोंको देखिये। ये आपका प्रिय करनेके लिये अग्निमें प्रवेश करनेको भी तैयार हैं ॥ १० ॥ पहले समुद्र पार करनेका विचार कीजिये, फिर लङ्काके तो दर्शन होते ही हम रावणको मरा हुआ ही समझते हैं ॥ ११ ॥ हे राघव ! त्रिलोकीमें मुझे ऐसा कोई वीर दिखायी नहीं देता जो आपके धनुष ग्रहण करनेपर युद्धमें सामने डटा रहे ॥ १२ ॥ हे राम ! इसमें तनिक भी सन्देह नहीं सब प्रकारसे जीत हमारी ही होगी, क्योंकि मुझे सब ओर ऐसे ही कारण (शकुन) दिखायी दे रहे हैं" ॥ १३ ॥<br><br>सुग्रीवके ये भक्ति और पुरुषार्थसे भरे वचन सुनकर भगवान् रामने उन्हें सादर स्वीकार किया और फिर सामने खड़े हुए हनुमान्‌जीसे कहा—॥१४॥ "हम जैसे-तैसे समुद्र तो पार करेंगे ही, किन्तु तुम लङ्काका रूप तो बताओ। सुना है, उसे जीतना तो देवता और दानवोंको भी अत्यन्त कठिन है ॥ १५॥ हे कपीश्वर ! उसका स्वरूप विदित होनेपर मैं उसका कोई प्रतिकार सोचूँगा।"<br><br>रामचन्द्रजीके ये वचन सुनकर हनुमान्जीने विनयपूर्वक हाथ जोड़कर कहा—"देव ! मैंने जैसा कुछ देखा है वह आपसे निवेदन करता हूँ। दिव्यपुरी लङ्का त्रिकूटपर्वतके शिखरपर बसी हुई है ॥१६-१७॥ उसका सोनेका परकोटा है और उसमें सोनेकी ही अट्टालिकाएँ हैं तथा वह निर्मल जलसे भरी खाइयोंसे घिरी हुई है ॥ १८ ॥ अनेकों उपवनोंके कारण उसकी अत्यन्त शोभा हो रही है और उसमें जहाँ-तहाँ बहुत-सी वावड़ियाँ तथा विचित्रशोभासम्पन्न मणिस्तम्भयुक्त भवन शोभायमान हैं ॥१९॥ उसके पश्चिमद्वारपर हजारों गजारोही, उत्तरद्वारपर पैदल सेनाके सहित बहुत-से घुड़सवार, पूर्वद्वारपर एक अरब राक्षस वीर और दक्षिणद्वारपर भी इतने ही रक्षक रहते हैं ॥ २०-२१ ॥ हे प्रभो ! उसके मध्यभागमें भी हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंकी असंख्य सेना रहकर नगरकी रक्षा करती है। वे सब नाना प्रकारके शस्त्र चलानेमें अत्यन्त कुशल हैं ॥ २२ ॥ इस प्रकार लङ्कामें
सर्ग १ ]युद्धकाण्डे२३५

| सङ्क्रमैर्विविधैर्लङ्का शतघ्नीभिश्च संयुता ।<br>एवं स्थितेऽपि देवेश शृणु मे तत्र चेष्टितम् ॥२३॥<br>दशाननबलौघस्य चतुर्थांशो मया हतः ।<br>दग्ध्वा लङ्कां पुरीं स्वर्णप्रासादो धर्षितो मया ॥२४॥<br>शतघ्न्यः सङ्क्रमाश्चैव नाशिता मे रघूत्तम ।<br>देव त्वद्दर्शनादेव लङ्का भस्मीकृता भवेत् ॥२५॥<br>प्रस्थानं कुरु देवेश गच्छामो लवणाम्बुधेः ।<br>तीरं सह महावीरैर्वानरौघैः समन्ततः ॥२६॥<br>श्रुत्वा हनूमतो वाक्यमुवाच रघुनन्दनः ।<br>सुग्रीव सैनिकान्सर्वान्प्रस्थानायाभिनोदय ॥२७॥<br>इदानीमेव विजयो मुहूर्तः परिवर्तते ।<br>अस्मिन्मुहूर्ते गत्वाऽहं लङ्कां राक्षससङ्कुलाम् ॥२८॥<br>सप्राकारां सुदुर्धर्षां नाशय्यामि सरावाणाम् ।<br>आनेष्यामि च सीतां मे दक्षिणाक्षि स्फुरत्यधः ॥२९॥<br>प्रयातु वाहिनी सर्वा वानराणां तरस्विनाम् ।<br>रक्षन्तु यूथपाः सेनामग्रे पृष्ठे च पार्श्वयोः ॥३०॥<br>हनूमन्तमथारुह्य गच्छाम्यग्रेऽङ्गदं ततः ।<br>आरुह्य लक्ष्मणो यातु सुग्रीव त्वं मया सह ॥३१॥<br>गजो गवाक्षो गवयो मैन्दो द्विविद एव च ।<br>नलो नीलः सुषेणश्च जाम्बवांश्च तथाऽपरे ॥३२॥<br>सर्वे गच्छन्तु सर्वत्र सेनायाः शत्रुघातिनः ।<br>इत्याज्ञाप्य हरीन् रामः प्रतस्थे सहलक्ष्मणः ॥३३॥<br>सुग्रीवसहितो हर्षात्सेनामध्यगतो विभुः ।<br>वारणेन्द्रनिभाः सर्वे वानराः कामरूपिणः ॥३४॥<br>क्ष्वेलन्तः परिगर्जन्तो जग्मुस्ते दक्षिणां दिशम् ।<br>भक्षयन्तो ययुः सर्वे फलानि च मधूनि च ॥३५॥<br>ब्रुवन्तो राघवस्याग्रे हनिष्यामोऽद्य रावणम् । | जानेके मार्ग नाना प्रकारके संक्रम (सुरंग) और शतघ्नियों<br>(तोपों) से सुरक्षित हैं; किन्तु हे देवेश्वर ! यह सब<br>कुछ होते हुए भी मैंने जो कुछ किया है वह सुनिये<br>॥ २३ ॥ मैंने रावणकी चौथाई सेना मार डाली और<br>लङ्कापुरीको जलाकर उसका सोनेका महल नष्ट कर दिया<br>॥ २४॥ हे रघुश्रेष्ठ ! संक्रमों और तोपोंको मैंने तोड़ डाला ।<br>हे देव ! (मुझे तो विश्वास है) आपकी दृष्टि पड़ते<br>ही लङ्का भस्मीभूत हो जायगी ॥ २५ ॥ हे देवेश्वर !<br>अब चलनेकी तैयारी कीजिये । हम सब ओरसे<br>महाबलवान् वानर-वीरोंकी सेना लेकर क्षार (खारे<br>पानीके) समुद्रके तटपर चलें” ॥ २६ ॥<br>हनुमान्‌जीका कथन सुनकर श्रीरघुनाथजीने कहा—<br>“सुग्रीव ! सब सैनिकोंको इसी समय कूच करनेकी<br>आज्ञा दो, क्योंकि इस समय विजयनामक मुहूर्त्त बीत<br>रहा है । इस मुहूर्त्तमें जाकर मैं राक्षससंकुलित लङ्काको,<br>जो परकोटे आदिके कारण अति दुर्जय है, रावणके<br>सहित नष्ट कर दूँगा और सीताजीको ले आऊँगा ।<br>इस समय मेरी दायीं आँखका नीचेका भाग फड़क<br>रहा है ॥ २७-२९ ॥ इसी समय बलवान् वानरोंकी<br>सम्पूर्ण सेना चले; जो यूथपति हों वे अपने-अपने<br>यूथकी आगे-पीछे और इधर-उधरसे रक्षा करें ॥३०॥<br>मैं हनुमान्‌के कन्धेपर चढ़कर सबसे आगे चलता हूँ,<br>उसके पीछे लक्ष्मण अंगदके ऊपर चढ़कर चलें और<br>हे सुग्रीव ! तुम मेरे साथ चलो ॥ ३१ ॥ गज, गवाक्ष,<br>गवय, मैन्द, द्विविद, नल, नील, सुषेण और जाम्बवान्<br>तथा शत्रुओंका नाश करनेवाले और भी समस्त<br>सेनापतिगण सेनाके चारों ओर चलें ।” वानरोंको<br>इस प्रकार आज्ञा दे श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीके सहित<br>कूच किया ॥ ३२-३३ ॥<br>भगवान् राम अति हर्षसे सुग्रीवके साथ सेनाके<br>बीचमें जा रहे थे । समस्त वानरगण गजराजके समान<br>बड़े डीलवाले और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले<br>थे ॥३४॥ वे सब बड़े वेगसे उछलते-कूदते, गरजते और<br>फल तथा मधु खाते दक्षिण दिशाको चले ॥ ३५ ॥<br>इस प्रकार वे अतुल पराक्रमी वानरश्रेष्ठ श्रीरघुनाथजीके |

२३६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग १


एवं ते वानरश्रेष्ठा गच्छन्त्यतुलविक्रमाः ॥३६॥
हरिभ्यामुह्यमानौ तौ शुशुभाते रघूत्तमौ ।
नक्षत्रैः सेवितौ यद्वच्चन्द्रसूर्याविवाम्बरे ॥३७॥
आवृत्य पृथिवीं कृत्स्नां जगाम महती चमूः ।
प्रस्फोटयन्तः पुच्छाग्राल्लुङ्हन्तश्च पादपान् ॥३८॥
शैला नारोहयन्तश्च जग्मुर्मारुतवेगतः ।
असङ्ख्याताश्च सर्वत्र वानराः परिपूरिताः ॥३९॥
हृष्टास्ते जग्मुरत्यर्थं रामेण परिपालिताः ।
गता चमूर्दिंवारान्नं कचिन्नासज्जत क्षणम् ॥४०॥
काननानि विचित्राणि पश्यन्मलयसह्ययोः ।
ते सह्यं समतिक्रम्य मलयं च तथा गिरीन् ॥४१॥
आययुश्चानुपूर्व्येण समुद्रं भीमनिःस्वनम् ।
अवतीय हनूमन्तं रामः सुग्रीवसंयुतः ॥४२॥
सलिलाभ्याशमासाद्य रामो वचनमब्रवीत् ।
आगताः स्म वयं सर्वे समुद्रं मकरालयम् ॥४३॥
इतो गन्तुमशक्यं नो निरुपायेन वानराः ।
अत्र सेनानिवेशोऽस्तु मन्त्रयामोऽस्य तारणे ॥४४॥

श्रुत्वा रामस्य वचनं सुग्रीवः सागरान्तिके ।
सेनां निवेशयत्क्षिप्रं रक्षितां कपिकुञ्जरैः ॥४५॥
ते पश्यन्तो विषेदुस्तं सागरं भीमदर्शनम् ।
महोन्नततरङ्गाढ्यं भीमनक्रमयङ्करम् ॥४६॥
अगाधं गगनाकारं सागरं वीक्ष्य दुःखिताः ।
तरिष्यामः कथं घोरं सागरं वरुणालयम् ॥४७॥
हन्तव्योऽस्माभिरद्यैव रावणो राक्षसाधमः ।
इति चिन्ताकुलाः सर्वे रामपार्श्वे व्यवस्थिताः ॥४८॥
रामः सीतामनुस्मृत्य दुःखेन महताऽऽवृतः ।
विलप्य जानकीं सीतां बहुधा कार्यमानुषः ॥४९॥


सामने 'हम आज ही रावणको मार डालेंगे' ऐसा कहते हुए जा रहे थे ॥ ३६ ॥ हनुमान् और अंगदके कन्धोंपर जाते हुए वे दोनों रघुश्रेष्ठ ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो आकाश-मण्डलमें नक्षत्रोंसे सुसेवित सूर्य और चन्द्रमा हों ॥ ३७ ॥ वह महान् सेना सम्पूर्ण पृथिवी-को घेरकर चल रही थी। वानरगण अपनी पूँछ फटकारते और पेड़ोंको उखाड़ते हुए पर्वतोंपर उछलते-कूदते वायुवेगसे जा रहे थे। उस समय सब ओर असंख्य वानर भरे हुए दीख पड़ते थे ॥ ३८-३९ ॥ भगवान् रामसे सुरक्षित होकर वे प्रसन्नतापूर्वक बड़ी तेजीसे जा रहे थे। वह वानर-सेना रात-दिन चलनी थी, कहीं एक क्षणको भी न रुकती थी ॥ ४० ॥ अन्तमें वे सबलोग मलयाचल और सह्याद्रिके विचित्र वनोंको देखते हुए उन दोनों पर्वतोंको पार कर क्रमशः भयङ्कर गर्जना करनेवाले समुद्रके तटपर पहुँच गये । तब श्रीरामचन्द्रजी हनुमान्‌जीके कन्धेसे उतरकर सुग्रीवके साथ जलके निकट आये और बोले—"हे वानरगण ! हमलोग मकरादिसे पूर्ण समुद्रके तटपर तो आ गये, किन्तु अब आगे बिना कोई विशेष उपाय किये हम नहीं जा सकते । अतः अब यहीं सेनाकी छावनी डाली जाय । हमलोग समुद्र पार करनेके विषयमें परस्पर परामर्श करेंगे" ॥ ४१–४४ ॥

रामके वचन सुनकर सुग्रीवने तुरन्त ही समुद्रके निकट सेनाका पड़ाव डाला । और बहुत-से प्रधान-प्रधान वानर-वीर उसकी रक्षा करने लगे ॥ ४५ ॥ वे लोग उत्ताल तरङ्गोंसे पूर्ण तथा दारुण नाके आदिके कारण भयङ्कर समुद्रको देखकर मन-ही-मन विषाद करने लगे ॥ ४६ ॥ उस आकाशके समान अगाध समुद्रको देखकर उन्हें बड़ा दुःख हुआ और वे सोचने लगे कि 'हम इस घोर वरुणालयको कैसे पार करेंगे ॥४७॥ राक्षसाधम रावणको तो हमें आज ही मारना है (पर मारें कैसे ?)' इस प्रकार सब लोग अति चिन्ताग्रस्त हो श्रीरघुनाथजीके पास बैठ गये ॥ ४८ ॥

इधर श्रीरामचन्द्रजी भी सीताकी यादकर महान् दुःखमें डूब गये । वे यद्यपि एक अद्वितीय चिन्मात्र