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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

अयोध्याकाण्ड - सर्ग ५: भगवान्‌का वनगमन

[ सर्ग ५ ] | अयोध्याकाण्ड | ६५

पञ्चम सर्ग

भगवान्‌का वनगमन

श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले—जानकी और लक्ष्मणके सहित
आयान्तं नागरा दृष्ट्वा मार्गे रामं सजानकिम् ।<br>लक्ष्मणेन समं वीक्ष्य ऊचुः सर्वे परस्परम् ॥ १ ॥<br>कैकेय्या वरदानादि श्रुत्वा दुःखसमावृताः ।<br>बत राजा दशरथः सत्यसन्धं प्रियं सुतम् ॥ २ ॥<br>स्त्रीहेतोरत्यजत्कामी तस्य सत्यवता कुतः ।<br>कैकेयी वा कथं दुष्टा रामं सत्यं प्रियङ्करम् ॥ ३ ॥<br>विवासयामास कथं क्रूरकर्माऽतिमूढधीः ।<br>हे जना नात्र वस्तव्यं गच्छामोऽद्यैव काननम् ॥ ४॥<br>यत्र रामः सभार्यश्च सानुजो गन्तुमिच्छति ।<br>पश्यन्तु जानकीं सर्वे पादचारेण गच्छतीम् ॥ ५ ॥<br>पुंभिः कदाचिद्दृष्टा वा जानकी लोकसुन्दरी ।<br>साऽपि पादेन गच्छन्ती जनसङ्घेष्वनावृता ॥ ६ ॥<br>रामोऽपि पादचारेण गजाश्वादि विवर्जितः ।<br>गच्छति द्रक्ष्यथ विभुं सर्वलोकैकसुन्दरम् ॥ ७॥<br>राक्षसी कैकेयीनाम्नी जाता सर्वविनाशिनी ।<br>रामस्यापि भवेद्दुःखं सीतायाः पादयानतः ॥ ८ ॥<br>बलवान्विधिरेवात्र पुंप्रयत्नो हि दुर्बलः ।श्रीरामचन्द्रजीको मार्गमें आते देख और कैकेयीके वरदानादिका समाचार सुन समस्त नगरवासी दुःखार्तुर होकर आपसमें कहने लगे—“हाय ! कामवश राजा दशरथने अपने सत्यपरायण प्रिय पुत्रको स्त्रीके कहनेसे क्यों छोड़ दिया ? उसकी सत्यता कहाँ चली गयी ? और दुष्टा कैकेयीने भी सत्यवादी और प्रियकारी रामको क्यों वनवास दिया ? वह ऐसी क्रूरकर्मा और हतबुद्धि क्यों हो गयी ? भाइयो ! अब हमें यहाँ न रहना चाहिये; हम भी आज ही वनको चलेंगे, जहाँ स्त्री और छोटे भाईके सहित श्रीराम जाना चाहते हैं। देखो तो, आज जानकीजी पैदल चल रही हैं ॥ १-५ ॥ हाय ! जिस त्रिलोकसुन्दरी जानकीको पहले कभी किसी पुरुषने शायद ही देखा हो, वही आज बिना किसी परदेके जनसमूहमें पैदल चल रही हैं ॥ ६ ॥ भाइयो ! इन सर्वलोकैकसुन्दर भगवान् रामकी ओर भी देखो; ये भी आज बिना हाथी-घोड़ेके पैदल ही जा रहे हैं ॥ ७ ॥ यह कैकेयी-नामकी राक्षसी सबका नाश करनेके लिये उत्पन्न हुई है। भाई ! इन सीताजीके पैदल चलनेसे रामजीको भी तो बड़ा दुःख होता होगा ॥ ८ ॥ किन्तु किया क्या जाय ? इसमें दैव ही प्रबल है, पुरुषका प्रयत्न सर्वथा असमर्थ है ।”
इति दुःखाकुले वृन्दे साधूनां मुनिपुङ्गवः ॥ ९ ॥<br>अब्रवीद्वामदेवोऽथ साधूनां सङ्घमध्यगः ।<br>मानुशोचथ रामं वा सीतां वा वच्मि तत्त्वतः ॥ १० ॥<br>एष रामः परो विष्णुरादिनारायणः स्मृतः ।<br>एषा सा जानकी लक्ष्मीर्योगमायेति विश्रुता ॥ ११ ॥<br>असौ शेषस्तमन्वेति लक्ष्मणाख्यश्च साम्प्रतम् ।<br>एष मायागुणैर्युक्तस्तत्तदाकारवानिव ॥ १२ ॥<br>एष एव रजोयुक्तो ब्रह्माऽभूद्विश्वभावनः ।<br>सत्त्वाविष्टस्तथा विष्णुस्त्रिजगत्प्रतिपालकः ॥ १३॥इस प्रकार साधु-समाजको दुःखार्तुर देख मुनिवर वामदेव उनके बीचमें आकर कहने लगे—“मैं आप-लोगोंको वास्तविक बात बताता हूँ, आप इन राम और सीताके लिये किसी प्रकारकी चिन्ता न करें ॥ ९-१० ॥ ये राम आदिनारायण भगवान् विष्णु हैं और ये जानकीजी योगमाया नामसे विख्यात श्रीलक्ष्मीजी हैं ॥ ११ ॥ इस समय जो लक्ष्मण नाम धारणकर इनका अनुगमन कर रहे हैं ये शेषजी हैं। ये पुरुषोत्तम भगवान् ही मायाके गुणोंसे युक्त होकर विभिन्न आकारवाले-से प्रतीत हुआ करते हैं ॥ १२ ॥ रजोगुणसे युक्त होकर ये ही विश्वरचयिता ब्रह्माजी हुए हैं और सत्त्वगुणविशिष्ट होनेपर ये ही त्रिलोक-

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६६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ५


एष रुद्रस्तामसोऽन्ते जगत्प्रलयकारणम् ।
एष मत्स्यः पुरा भूत्वा भक्तं वैवस्वतं मनुम् ॥१४॥
नाव्यारोप्य लयस्यान्ते पालयामास राघवः ।
समुद्रमथने पूर्वं मन्दरे सुतलं गते ॥१५॥
अधारयत्स्वपृष्ठेऽद्रिं कूर्मरूपी रघूत्तमः ।
महीं रसातलं याता प्रलये सूकरोऽभवत् ॥१६॥
तोलयामास दंष्ट्राग्रे तां क्षोणीं रघुनन्दनः ।
नारसिंहं वपुः कृत्वा प्रह्लादवरदः पुरा ॥१७॥
त्रैलोक्यकण्टकं रक्षः पाटयामास तन्नखैः ।
पुत्रराज्यं हृतं दृष्ट्वा ह्यदित्या याचितः पुरा ॥१८॥
वामनत्वमुपागम्य याच्ञया चाहरतपुनः ।
दुष्टक्षत्रियभूभारनिवृत्त्यै भार्गवोऽभवत् ॥१९॥
स एव जगतां नाथ इदानीं रामतां गतः ।
रावणादीनि रक्षांसि कोटिशो निहनिष्यति ॥२०॥
मानुषेणैव मरणं तस्य दृष्टं दुरात्मनः ।
राज्ञा दशरथेनापि तपसाऽऽराधितो हरिः ॥२१॥
पुत्रत्वाकाङ्क्षया विष्णोस्तदा पुत्रोऽभवद्धरिः ।
स एव विष्णुः श्रीरामो रावणादिवधाय हि ॥२२॥
गन्ताऽद्यैव वनं रामो लक्ष्मणेन सहायवान् ।
एषा सीता हरेर्माया सृष्टिस्थित्यन्तकारिणी ॥२३॥
राजा वा कैकेयी वापि नात्र कारणमण्वपि ।
पूर्वेद्युर्नारदः प्राह भूभारहरणाय च ॥२४॥
रामोऽप्याह स्वयं साक्षाच्छ्वो गमिष्याम्यहं वनम् ।
अतो रामं समुद्दिश्य चिन्तां त्यजत बालिशाः ॥२५॥
रामरामेति ये नित्यं जपन्ति मनुजा भुवि ।
तेषां मृत्युभयादीनि न भवन्ति कदाचन ॥२६॥


रक्षक भगवान् विष्णु होते हैं ॥१३॥ तथा कल्पान्त-में तमोगुणका आश्रय कर ये ही जगत्का प्रलय करनेवाले रुद्र होते हैं । पूर्वकालमें इन्हीं रघुनाथजीने मत्स्यरूप होकर अपने भक्त वैवस्वत मनुको नावमें बैठाकर प्रलयकालके समय उनकी रक्षा की थी । समुद्र-मन्थनके समय, जब मन्दराचल पाताल-लोकको जाने लगा ॥१४-१५॥ तब इन्हीं रघुनाथजीने कूर्मरूप होकर उसे अपनी पीठपर धारण किया था । प्रलयकालमें जब पृथिवी रसातलको चली गयी तो ये शूकररूप हुए ॥१६॥ और उस पृथिवीको अपनी दाढ़ोंपर उठा लिया । इसी प्रकार एक बार प्रह्लादको वर देनेके लिये इन्होंने नृसिंहरूप धारण किया ॥१७॥ और तीनों लोकोंके कण्टकरूप दैत्यराज हिरण्यकशिपुको अपने नखोंसे फाड़ डाला । एक बार, अपने पुत्र इन्द्रका राज्य गया हुआ देख जब अदितिने इनसे प्रार्थना की ॥१८॥ तब इन्होंने वामनरूप धारणकर याचना करके उसे फिर लौटा लिया । इन्होंने पृथिवीके भाररूप दुष्ट क्षत्रिय-गणोंको नष्ट करनेके लिये भृगुपुत्र परशुरामका रूप धारण किया था ॥१९॥ वे ही जगत्प्रभु इस समय रामरूपसे प्रकट हुए हैं; अब ये रावण आदि करोड़ों राक्षसोंका वध करेंगे ॥२०॥ उस दुरात्माकी मृत्यु मनुष्यके हाथ ही बदी है । महाराज दशरथने (अपने पूर्वजन्ममें) तपस्याद्वारा भगवान् विष्णुकी इसलिये आराधना की थी कि वे उनके यहाँ पुत्ररूपसे अवतार लें; इसलिये भगवान् इनके पुत्र हुए हैं । वे विष्णु भगवान् ही श्रीरामचन्द्रजी हैं । अब ये रावणके वधके लिये आज ही लक्ष्मणसहित वनको जायेंगे । ये सीताजी जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करनेवाली साक्षात् भगवान्की माया हैं ॥२१-२३॥ इनके वन-गमनमें राजा या कैकेयी अणुमात्र भी कारण नहीं हैं । कल ही इनसे नारदजीने पृथिवी-का भार उतारनेके लिये प्रार्थना की थी ॥२४॥ उस समय स्वयं रामने भी उनसे यही कहा था कि कल मैं वनको जाऊँगा । अतः भोले भाइयो ! आप-लोग रामके लिये कोई चिन्ता न करें ॥२५॥ संसारमें जो लोग नित्य प्रति 'राम-राम' जपा करते हैं उनको भी किसी समय मृत्युके भय आदि नहीं

सर्ग ५] अयोध्याकाण्ड ६७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
का पुनस्तस्य रामस्य दुःखशङ्का महात्मनः।<br>रामनाम्नैव मुक्तिः स्यात्कलौ नान्येन केनचित् ॥२७॥होते ॥२६॥ फिर उन महात्मा रामके लिये तो दुःखकी शंका ही कैसे हो सकती है ? कलियुगमें तो एकमात्र राम-नामसे ही मुक्ति हो सकती है और किसी उपायसे नहीं ॥२७॥
मायामानुषरूपेण विडम्बयति लोककृत् ।<br>भक्तानां भजनार्थाय रावणस्य वधाय च ॥२८॥ये जगत्कर्त्ता प्रभु भक्तोंको गुण-कीर्तनका सुयोग देनेके लिये और रावणको मारनेके लिये ही मायामानुषरूपसे संसारमें लीला कर रहे हैं ॥२८॥
राजाभीष्टसिद्धयर्थं मानुषं वपुराश्रितः ।<br>इत्युक्त्वा विररामाथ वामदेवो महामुनिः ॥२९॥इसके सिवा राजा दशरथकी मनोरथ-सिद्धिके लिये भी इन्होंने यह मनुष्य-शरीर धारण किया है।" ऐसा कह महामुनि वामदेवजी मौन हो गये ॥२९॥
श्रुत्वा तेऽपि द्विजाः सर्वे रामं ज्ञात्वा हरिं विभुम् ।<br>जहुर्हृत्संशयग्रन्थि राममेवान्वचिन्तयन् ॥३०॥यह सुन वहाँ एकत्रित हुए सब द्विजगणोंने भी भगवान् रामको सर्वव्यापक श्रीविष्णु भगवान् जाना और वे अपने हृदयका संशय छोड़कर श्री-रामचन्द्रजीका ही स्मरण करने लगे ॥३०॥
य इदं चिन्तयेन्नित्यं रहस्यं रामसीतयोः।<br>तस्य रामे दृढा भक्तिर्भवेद्विज्ञानपूर्विका ॥३१॥'जो पुरुष नित्यप्रति राम और सीताके इस रहस्यका मनन करेगा, उसकी भगवान् राममें विज्ञानके सहित दृढ-भक्ति हो जायगी ॥३१॥
रहस्यं गोपनीयं वो यूयं वै राघवप्रियाः ।<br>इत्युक्त्वा प्रययौ विप्रस्तेऽपि रामं परं विदुः ॥३२॥आप सब लोग रामके परम प्रिय हैं अतः इस रहस्यको सदा गुप्त रक्खें।' ऐसा कह विप्रवर वामदेवजी वहाँसे चले गये और पुरजनोंने भी जाना कि राम परमात्मा हैं ॥३२॥
ततो रामः समाविश्य पितुर्गेहमवारितः ।<br>सानुजः सीतया गत्वा कैकेयीमिदमब्रवीत् ॥३३॥तदनन्तर रामजीने बिना किसी रोक-टोकके पिताके महलमें प्रवेश किया और लक्ष्मण तथा सीताके सहित वहाँ पहुँचकर कैकेयीसे कहा—॥३३॥
आगताः स्मो वयं मातस्त्वयस्ते सम्मतं वनम् ।<br>गन्तुं कृतधियः शीघ्रमाज्ञापयतु नः पिता ॥३४॥"माताजी ! आपके कथनानुसार हम तीनों बनको जानेके लिये तैयार होकर आ गये हैं; अब शीघ्र ही पिताजी हमें आज्ञा दें" ॥३४॥
इत्युक्ता सहसोत्थाय चीराणि प्रददौ स्वयम् ।<br>रामाय लक्ष्मणायाथ सीतायै च पृथक् पृथक् ॥३५॥रामके ऐसा कहनेपर कैकेयीने सहसा उठकर स्वयं ही राम, लक्ष्मण और सीताको अलग-अलग वल्कल-वस्त्र दिये ॥३५॥
रामस्तु वस्त्राण्युत्सृज्य वन्यचीराणि पर्यधात् ।<br>लक्ष्मणोऽपि तथा चक्रे सीता तन्न विजानती ॥३६॥तब रामचन्द्रजीने अपने राजोचित वस्त्रोंको उतारकर बनवासियोंके-से वस्त्र धारण किये; लक्ष्मणजीने भी ऐसा ही किया किन्तु सीताजी उन्हें पहनना नहीं जानती थीं ॥३६॥
हस्ते गृहीत्वा रामस्य लज्जया मुखमैक्षत ।<br>रामो गृहीत्वा तच्चीरमंशुके पर्यवेष्टयत् ॥३७॥अतः उन वस्त्रोंको हाथमें लेकर वे लज्जापूर्वक रामजीकी ओर देखने लगीं । तब रामचन्द्रजीने उस चीरको लेकर सीताजीके वस्त्रोंपर ही लपेट दिया ॥३७॥
तद्दृष्ट्वा रुरुदुः सर्वे राजदाराः समन्ततः ।<br>वसिष्ठस्तु तदाकर्ण्य रुदितं भर्त्सयन् रुषा ॥३८॥यह देखकर रनिवासकी सभी स्त्रियाँ रोने लगीं । तब वसिष्ठजीने उनके रोनेका शब्द सुनकर क्रोधित हो कैकेयीको डाँटते हुए कहा—"अयि दुःशीले !
६६अध्यात्मरामायण[ सर्ग ५

[मूल संस्कृत श्लोक]

कैकेयीं प्राह दुर्बुत्ते राम एव त्वया वृतः ।
वनवासाय दुष्टे त्वं सीतायै किं प्रयच्छसि ॥ ३९ ॥
यदि रामं समन्वेति सीता भक्त्या पतिव्रता ।
दिव्याम्बरधरा नित्यं सर्वाभरणभूषिता ॥ ४० ॥
रमयन्यनिशं रामं वनदुःखन्निवारिणी ।
राजा दशरथोऽप्याह सुमन्त्रं रथमानय ॥ ४१ ॥
रथमारुह्य गच्छन्तु वनं वनचरप्रियाः ।
इत्युक्त्वा राममालोक्य सीतां चैव सलक्ष्मणम् ॥ ४२ ॥
दुःखान्निपतितो भूमौ रुरोदाश्रुपरिप्लुतः ।
आरुरोह रथं सीता शीघ्रं रामस्य पश्यतः ॥ ४३ ॥
रामः प्रदक्षिणं कृत्वा पितरं रथमारुहत् ।
लक्ष्मणः खड्गयुगलं धनुस्तूणीयुगं तथा ॥ ४४ ॥
गृहीत्वा रथमारुह्य नोदयामास सारथिम् ।
तिष्ठ तिष्ठ सुमन्त्रेति राजा दशरथोऽब्रवीत् ॥ ४५ ॥
गच्छ गच्छेति रामेण नोदितोऽचोदयद्रथम् ।
रामे दूरं गते राजा मूर्च्छितः प्रापतद्भुवि ॥ ४६ ॥
पौरास्तु बालवृद्धाश्च वृद्धा ब्राह्मणसत्तमाः ।
तिष्ठ तिष्ठेति रामेति क्रोशन्तो रथमन्वयुः ॥ ४७ ॥
राजा रुदित्वा सुचिरं मां नयन्तु गृहं प्रति ।
कौसल्याया राममातुरित्याह परिचारकान् ॥ ४८ ॥
किञ्चित्कालं भवेत्तत्र जीवनं दुःखितस्य मे ।
अत ऊर्ध्वं न जीवामि चिरं रामं विना कृतः ॥ ४९ ॥
ततो गृहं प्रविश्यैव कौसल्यायाः पपात ह ।
मूर्च्छितश्च चिराल्लब्ध्वा तूष्णीमेवावतस्थिवान् ॥ ५० ॥
रामस्तु तमसातीरं गत्वा तत्रावसत्सुखी ।
जलं प्राश्य निराहारो वृक्षमूलेऽस्वपद्विभुः ॥ ५१ ॥
सीतया सह धर्मात्मा धनुष्पाणिस्तु लक्ष्मणः ।
पालयामास धर्मज्ञः सुमन्त्रेण समन्वितः ॥ ५२ ॥


[हिन्दी अनुवाद]

तूने तो केवल रामके वन जानेका ही वर माँगा है न ? फिर तू सीताको भी वनके वस्त्र कैसे देती है ? ॥ ३८-३९ ॥ यदि पतिव्रता सीता भक्तिवश रामके साथ जाना चाहती है तो वह समस्त आभूषणोंसे विभूषित और दिव्य वस्त्र धारण किये हुए ही जाय ॥ ४० ॥ तथा नित्यप्रति रामके वनवास-दुःखको दूर करती हुई उनको आनन्दित करे।”

तब महाराज दशरथने सुमन्त्रसे कहा—“सुमन्त्र ! तुम रथ ले आओ ॥ ४१ ॥ वनवासियोंके प्रिय ये राम आदि रथपर चढ़कर ही वनको जायँगे।” ऐसा कह वे सीता और लक्ष्मणके सहित रामको देख-कर दुःखसे पृथिवीपर गिर पड़े और आँखोंमें आँसू भरकर रोने लगे। तब रामजीके देखते-देखते शीघ्र ही सीताजी रथपर चढ़ीं ॥ ४२-४३ ॥ फिर रामचन्द्रजी पिताकी परिक्रमा कर रथारूढ हुए और उनके पीछे दो खड्ग तथा दो धनुष और तरकश लेकर लक्ष्मणजी सवार हुए और सारथीसे रथ हाँकनेको कहा। तब राजा दशरथ कहने लगे—'सुमन्त्र ! ठहरो, ठहरो' ॥ ४४-४५ ॥ किन्तु रामचन्द्रजीने 'चलो, चलो' कहकर शीघ्रता करनेको कहा। इसलिये सुमन्त्रने रथ हाँक दिया। रामके दूर निकल जानेपर महाराज मूच्छित होकर पृथिवीपर गिर पड़े ॥ ४६ ॥ तदनन्तर समस्त पुरवासी, बालक-वृद्ध और वयोवृद्ध मुनिगण 'हे राम ! ठहरो, मत जाओ' इस प्रकार चिल्लाते हुए रथके पीछे-पीछे चले ॥ ४७ ॥

राजा दशरथ बहुत देरतक रोते रहे, फिर उन्होंने अपने सेवकोंसे कहा—“मुझे रामकी माता कौसल्याके घर ले चलो ॥ ४८ ॥ मुझ दुखियाका वहाँ रहकर कुछ काल जीना हो सकता है; किन्तु रामसे रहित होकर अब मैं अधिक काल जीवित नहीं रह सकूँगा” ॥ ४९ ॥ तब कौसल्याके घर पहुँचते ही राजा अचेत होकर पृथिवीपर गिर पड़े; फिर बहुत देर पीछे चेत होनेपर वे चुपचाप बैठे रहे ॥ ५० ॥

इधर श्रीरामचन्द्रजी तमसा-नदीके तटपर पहुँचकर वहाँ सुखपूर्वक रहे और रात्रिके समय बिना कुछ आहार किये केवल जल पीकर सीताजीके सहित वृक्षके नीचे सो गये। तथा सुमन्त्रके सहित धर्मात्मा

सर्ग ५ ] | अयोध्याकाण्ड | ६९

मूल संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी अनुवाद

पौराः सर्वे समागत्य स्थितास्तस्याविदूरतः ।
शक्ता रामं पुरं नेतुं नोचेद्गच्छामहे वनम् ॥ ५३ ॥
इति निश्चयमाज्ञाय तेषां रामोऽतिविस्मितः ।
नाहं गच्छामि नगरमेते वै क्लेशभागिनः ॥ ५४ ॥
भविष्यन्तीति निश्चित्य सुमन्त्रमिदमब्रवीत् ।
इदानीमेव गच्छामः सुमन्त्र रथमानय ॥ ५५ ॥

लक्ष्मणजी धनुष लेकर उनकी रक्षा करते रहे ॥ ५१-५२ ॥ उनके पास ही समस्त पुरवासी आकर ठहर गये। उन्होंने निश्चय किया कि हम या तो रामको अयोध्या लौटा ले चलेंगे, नहीं तो हम भी इनके साथ वनको ही चले जायँगे ॥ ५३ ॥ रामचन्द्रजीको उनके इस निश्चयका पता चलनेपर अति विस्मय हुआ और उन्होंने यह सोचकर कि मैं तो अयोध्याको लौटूँगा नहीं, ये व्यर्थ वनमें क्लेश भोगेंगे, सुमन्त्रको बुलाकर कहा—"सुमन्त्र, तुम रथ ले आओ, हम अभी चलेंगे" ॥ ५४-५५ ॥


इत्याज्ञप्तः सुमन्त्रोऽपि रथं वाहैरयोजयत् ।
आरुह्य रामः सीता च लक्ष्मणोऽपि ययुर्द्रुतम् ॥ ५६ ॥
अयोध्याभिमुखं गत्वा किञ्चिद्दूरं ततो ययुः।
तेऽपि राममदृष्ट्वैव प्रातरुत्थाय दुःखिताः ॥ ५७ ॥
रथनेमिगतं मार्गं पश्यन्तस्ते पुरं ययुः ।
हृदि रामं ससीतं ते ध्यायन्तस्तस्थुरन्वहम् ॥ ५८ ॥

रामकी ऐसी आज्ञा होनेपर सुमन्त्रने रथमें घोड़े जोत दिये तब राम, लक्ष्मण और सीता उसपर चढ़कर शीघ्रतासे चले ॥ ५६ ॥ उन्होंने अपना रथ कुछ दूर अयोध्याकी ओर ले जाकर फिर वनकी ओर बढ़ाया। प्रातःकाल होनेपर पुरवासियोंने उठकर जब रामको न देखा तो वे अत्यन्त दुःखी हुए ॥ ५७ ॥ और रथके पहियोंकी लीकके मार्गको देखते हुए वे अयोध्यापुरी लौट आये तथा प्रतिदिन हृदयमें राम और सीताका ध्यान करते हुए वहाँ रहने लगे ॥ ५८ ॥


सुमन्त्रोऽपि रथं शीघ्रं नोदयामास सादरम् ।
स्फीतान् जनपदान्पश्यन् रामः सीतासमन्वितः ॥
गङ्गातीरं समागच्छच्छृङ्गवेराविदूरतः ।
गङ्गां दृष्ट्वा नमस्कृत्य स्नात्वा सानन्दमानसः ॥ ६० ॥

इधर सुमन्त्रने भी शीघ्र ही आदरपूर्वक अपना रथ बढ़ाया। तब सीताके सहित श्रीरामचन्द्रजी विस्तृत देशोंको देखते हुए शृंगवेरपुरके पास गंगाजीके तटपर पहुँचे। गंगाजीको देखकर उन्होंने प्रसन्न-चित्तसे नमस्कार करके स्नान किया ॥ ५९-६० ॥ और फिर


शिंशपावृक्षमूले स निपसाद रघूत्तमः ।
ततो गुहो जनैः श्रुत्वा रामागमनमहोत्सवम् ॥ ६१ ॥
सखायं स्वामिनं द्रष्टुं हर्षात्तूर्णं समापतत् ।
फलानि मधुपुष्पादि गृहीत्वा भक्तिसंयुतः ॥ ६२ ॥
रामस्याग्रे विनिक्षिप्य दण्डवत्प्रापतद्भुवि ।
गुहमुत्थाप्य तं तूर्णं राघवः परिषस्वजे ॥ ६३ ॥

रघुश्रेष्ठ रामजी शिंशपा (सीसमके) वृक्षकी छायामें बैठे। इसी समय निषादराज गुहने लोगोंके मुखसे रामजीके आनेका मंगलसमाचार सुना ॥ ६१ ॥ यह सुनते ही वह तुरन्त अपने एकमात्र सखा और स्वामी श्रीरघुनाथजीको देखनेके लिये प्रसन्न-चित्तसे भक्तिपूर्वक फल, शहद और पुष्पादि लेकर वहाँ आया ॥ ६२ ॥ और वह भेंटकी सामग्री रामके आगे डालकर दण्डके समान पृथिवीपर गिर पड़ा। तब श्रीरघुनाथजीने उसे तुरन्त ही उठाकर गले लगा लिया ॥ ६३ ॥


संपृष्टकुशलो रामं गुहः प्राञ्जलिरब्रवीत् ।
धन्योऽहमद्य मे जन्म नैषादं लोकपावन ॥ ६४ ॥
बभूव परमानन्दः स्पृष्ट्वा तेऽङ्गं रघूत्तम । ...

तदुपरान्त रामजीके कुशल पूछनेपर गुहने हाथ जोड़कर कहा—"हे लोकपावन ! मैं धन्य हूँ, आज मेरा निषाद-जातिमें जन्म लेना सफल हो गया ॥ ६४ ॥ हे रघुश्रेष्ठ ! आपके अंगसंगसे मुझे परम आनन्द प्राप्त