अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग ४: भगवान् रामका लक्ष्मणजीसे क्रिया-योगका वर्णन
| १७० | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ४ |
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सुग्रीवेण यथान्यायं पूजितो लक्ष्मणस्तदा ।
आगत्य राघवं शीघ्रं प्रणिपत्योपतस्थिवान् ॥५२॥
ततो रामो जगामाशु लक्ष्मणेन समन्वितः ।
प्रवर्षणगिरेरूर्ध्वं शिखरं भूरिविस्तरम् ॥५३॥
तत्रैकं गह्वरं दृष्ट्वा स्फाटिकं दीप्तिमच्छुभम् ।
वर्षवातातपसहं फलमूलसमीपगम् ।
वासाय रोचयामास तत्र रामः सलक्ष्मणः ॥५४॥
दिव्यमूलफलपुष्पसंयुते
मौक्तिकोपमजलौघपल्वले ।
चित्रवर्णमृगपक्षिशोभिते
पर्वते रघुकुलोत्तमोऽवसत् ॥५५॥
यथोचित आदर पा लक्ष्मणजी श्रीरघुनाथजीके पास चले आये और उनके चरणोंमें प्रणाम कर उनकी सेवामें उपस्थित हो गये ॥ ५२ ॥
तब श्रीरामचन्द्रजी तत्काल ही लक्ष्मणके साथ प्रवर्षण पर्वतके ऊपर अति विस्तीर्ण शिखरपर गये ॥ ५३ ॥ वहाँ उन्होंने स्फटिकमणिकी एक स्वच्छ और प्रकाशमान गुफा देखी। उसमें वर्षा, वायु और धूपसे बचनेका सुभीता था तथा पास ही कन्द, मूल और फल भी लगे हुए थे। उसे देखकर श्रीराम और लक्ष्मणने वहीं रहना पसन्द किया ॥ ५४ ॥ तब रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजी दिव्य मूल फल और फूलोंसे सम्पन्न, मोतीके समान स्वच्छ जलवाले सरोवरोंसे युक्त और चित्र-विचित्र मृग तथा पक्षियोंसे सुशोभित उस प्रवर्षण पर्वतपर रहने लगे ॥ ५५ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
किष्किन्धाकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥३॥
चतुर्थ सर्ग
भगवान् रामका लक्ष्मणजीसे क्रियायोगका वर्णन करना।
श्रीमहादेव उवाच
तत्र वार्षिकादिनानि राघवो
लीलया मणिगुहासु सञ्चरन् ।
पक्कमूलफलभोगतोषितो
लक्ष्मणेन सहितोऽवसत्सुखम् ॥ १ ॥
वातनुन्नजलपूरितमेघा-
नन्तरस्तनितविद्युतगर्भान् ।
वीक्ष्य विस्मयमगाद्गजयूथा-
न्यङ्गदाहितसुकाञ्चनकक्षान् ॥ २ ॥
नवघासं समास्वाद्य हृष्टपुष्टमृगद्विजाः ।
धावन्तः परितो रामं वीक्ष्य विस्फारितेक्षणाः ॥३॥
न चलन्ति सदाध्याननिष्ठा इव मुनीश्वराः ।
रामं मानुषरूपेण गिरिकाननभूमिषु ॥ ४ ॥
**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति! वहाँ श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणजीके साथ लीलासे ही मणिमय गुफाओंमें विचरते और पके हुए फल-फूल खाकर निर्वाह करते हुए वर्षाके दिनोंमें आनन्दपूर्वक रहे ॥ १ ॥ वायुसे प्रेरित सजल मेघोंको देखकर, जो अपने भीतर कौंधती हुई बिजलीके कारण सुनहरी झूलोंसे युक्त हाथियोंके झुण्डके समान प्रतीत होते थे, उन्हें बड़ा ही विस्मय हुआ करता था ॥ २ ॥ नवीन घासके खानेसे हृष्ट-पुष्ट हुए मृग और पक्षिगण जब कभी इधर-उधर दौड़ते हुए श्रीरामचन्द्रजीको देख लेते तो उनकी ओर टकटकी लगाये रह जाते ॥ ३ ॥ और ध्याननिष्ठ मुनीश्वरोंके समान इधर-उधर जाना भूलकर जहाँ-के-तहाँ खड़े रह जाते। इस समय परमात्मा रामको मनुष्यरूपसे पर्वत और वनोंमें विचरते जानकर
सर्ग ४ ] किष्किन्धाकाण्ड १७१
| चरन्तं परमात्मानं ज्ञात्वा सिद्धगणा भुवि ।<br>मृगपक्षिगणा भूत्वा राममेवानुसेविरे ॥ ५॥ | बहुत-से सिद्धगण पृथिवीपर मृग और पक्षियोंके रूपसे सदा उन्हींकी सेवामें रहने लगे ॥ ४-५ ॥ |
| सौमित्रिरेकदा राममेकान्ते ध्यानतत्परम् ।<br>समाधिविरमे भक्त्या प्रणयाद्विनयान्वितः ॥ ६ ॥ | एक दिन एकान्तमें ध्यान करते हुए भगवान् रामसे उनकी समाधि खुलनेपर सुमित्रानन्दन श्रीलक्ष्मणजीने अति प्रेम और भक्तिसे नम्रतापूर्वक कहा— |
| अब्रवीद्देव ते वाक्यात्पूर्वोक्ताद्विगतो मम ।<br>अनाद्यविद्यासम्भूतः संशयो हृदि संस्थितः ॥ ७॥ | "भगवन् ! आपने मुझे जो उपदेश पहले दिया था उससे मेरे हृदयका अनादि अविद्या-जन्य सन्देह तो दूर हो गया है ॥ ६-७ ॥ |
| इदानीं श्रोतुमिच्छामि क्रियामार्गेण राघव ।<br>भवदाराधनं लोके यथा कुर्वन्ति योगिनः ॥ ८ ॥ | किन्तु हे राघव ! योगिजन क्रियामार्ग (पूजा-पद्धति) से जिस प्रकार संसारमें आपकी आराधना किया करते हैं, इस समय मैं उसे सुनना चाहता हूँ ॥ ८ ॥ |
| इदमेव सदा प्राहुर्योगिनो मुक्तिसाधनम् ।<br>नारदोऽपि तथा व्यासो ब्रह्मा कमलसम्भवः ॥ ९ ॥ | समस्त योगिजन एवं देवर्षि नारद, महर्षि व्यास और कमलयोनि श्रीब्रह्माजी भी इसीको मुक्तिका साधन बतलाते हैं ॥ ९ ॥ |
| ब्रह्मक्षत्रादिवर्णानामाश्रमाणां च मोक्षदम् ।<br>स्त्रीशूद्राणां च राजेन्द्र सुलभं मुक्तिसाधनम् ।<br>तव भक्ताय मे भ्रात्रे ब्रूहि लोकोपकारकम् ॥ १०॥ | हे राजराजेश्वर ! ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णों तथा ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य आदि आश्रमोंको मोक्ष देनेवाला यही साधन है और स्त्री तथा शूद्रोंकी भी इसी साधनसे सुगमतासे मुक्ति हो सकती है। हे प्रभो ! मैं आपका भक्त और भाई हूँ; अतः आप मुझसे इस लोकोपकारी साधनका वर्णन कीजिये" ॥ १० ॥ |
| श्रीराम उवाच | श्रीरामचन्द्रजी बोले- हे रघुकुलनन्दन लक्ष्मण ! |
| मम पूजा विधानस्य नान्तोऽस्ति रघुनन्दन ।<br>तथापि वक्ष्ये सङ्क्षेपाद्यथावदनुपूर्वशः ॥ ११॥ | मेरी पूजा-विधिका कोई अन्त नहीं है तथापि मैं क्रमशः उसका संक्षेपमें यथावत् वर्णन करता हूँ ॥ ११ ॥ |
| स्वगृह्योक्तप्रकारेण द्विजत्वं प्राप्य मानवः ।<br>सकाशात्सद्गुरोर्मन्त्रं लब्ध्वा मद्भक्तिसंयुक्तः ॥ १२॥ | मेरी भक्तिसे सम्पन्न मनुष्य अपनी शाखाके गृह्यसूत्रद्वारा बतलाये गये प्रकारसे (उपनयन-संस्कारके अनन्तर) द्विजत्व प्राप्त कर भक्तिपूर्वक सद्गुरुके पास जाय और उनसे मन्त्र ग्रहण करे ॥ १२ ॥ |
| तेन सन्दर्शितविधिर्मामेवाराधयेत्सुधीः ।<br>हृदये वाऽनले वाऽर्चेत्प्रतिमाऽऽदौ विभावसौ ॥ १३॥ | फिर बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि उन गुरुदेवकी बतायी हुई विधिसे अपने हृदयमें, अग्निमें, प्रतिमा आदिमें अथवा सूर्यमें केवल मेरी ही सेवा-पूजा करे ॥ १३ ॥ |
| शालग्रामशिलायां वा पूजयेन्मामतन्द्रितः ।<br>प्रातःस्नानं प्रकुर्वीत प्रथमं देहशुद्धये ॥ १४॥ | अथवा सावधान होकर शालग्राम-शिलामें ही मेरी उपासना करे । बुद्धिमान् उपासकको चाहिये कि सबसे पहले देहशुद्धिके लिये, प्रातःकाल ही |
| वेदतन्त्रोदितैर्मन्त्रैर्मृल्लेपनविधानतः ।<br>सन्ध्यादि कर्म यन्नित्यं तत्कुर्याद्विधिना बुधः ॥ १५॥ | वैदिक तथा तान्त्रिक मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए शरीरमें विधिवत् मृत्तिका आदि लगाकर स्नान करे और फिर नियमानुसार सन्ध्या आदि नित्यकर्म करे ॥ १४-१५ ॥ |
| सङ्कल्पमादौ कुर्वीत सिद्धयर्थं कर्मणां सुधीः । | मेरी पूजा करनेवाला मतिमान् पुरुष कर्मोंकी सिद्धिके लिये |
| १७२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ४ |
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स्वगुरुं पूजयेद्भक्त्या मद्बुद्ध्या पूजको मम ॥१६॥
शिलायां स्नपनं कुर्यात्प्रतिमासु प्रमार्जनम् ।
प्रसिद्धैर्गन्धपुष्पाद्यैर्मत्पूजा सिद्धिदायिका ॥१७॥
अमायिकोऽनुवृत्त्या मां पूजयेन्नियतव्रतः ।
प्रतिमादिष्वलङ्कारः प्रियो मे कुलन्दन ॥१८॥
अग्नौ यजेत हविषा भास्करे स्थण्डिले यजेत् ।
भक्तेनोपहृतं प्रीत्यै श्रद्धया मम वार्यपि ॥१९॥
किं पुनर्लक्ष्यभोज्यादि गन्धपुष्पाक्षतादिकम् ।
पूजाद्रव्याणि सर्वाणि सम्पाद्यैवं समारभेत् ॥२०॥
चैलाजिनकुशैः सम्यगासनं परिकल्पयेत् ।
तत्रोपविश्य देवस्य सम्मुखे शुद्धमानसः ॥२१॥
ततो न्यासं प्रकुर्वीत मातृकाबहिरान्तरम् ।
केशवादि ततः कुर्यात्तत्त्वन्यासं ततः परम् ॥२२॥
मन्मूर्तिपञ्जरन्यासं मन्त्रन्यासं ततो न्यसेत् ।
प्रतिमादावपि तथा कुर्यान्नित्यमतन्द्रितः ॥२३॥
कलशं स्वपुरो वामे क्षिपेत्पुष्पादि दक्षिणे ।
अर्घ्यपाद्यप्रदानार्थं मधुपर्कार्थमेव च ॥२४॥
तथैवाचमनार्थं तु न्यसेत्पात्रचतुष्टयम् ।
हृत्पद्मे भानुविमले मत्कलां जीवसंज्ञिताम् ॥२५॥
ध्यायेत्स्वदेहमखिलं तया व्याप्तमरिन्दम ।
तामेवावाहयेन्नित्यं प्रतिमादिषु मत्कलाम् ॥२६॥
पाद्यार्घ्याचमनीयाद्यैः स्नानवस्त्रविभूषणैः ।
यावच्छक्योपचारैर्वा त्वर्चयेन्माममायया ॥२७॥
पहले संकल्प करे और फिर अपने गुरुदेवमें मेरी ही भावना रखकर उनकी पूजा करे ॥ १६ ॥ मेरी मूर्ति यदि शिलारूप हो तो स्नान करावे और यदि प्रतिमाकार हो तो केवल मार्जन ही करे । फिर प्रसिद्ध-प्रसिद्ध गन्ध और पुष्प आदिसे पूजा करे । इस प्रकार की हुई मेरी पूजा शीघ्र ही फल देनेवाली होती है ॥ १७ ॥ मनुष्यको सब प्रकारके छल-छिद्र छोड़कर गुरुकी बतायी विधिसे नियमबद्ध होकर मेरी पूजा करनी चाहिये । हे कुलन्दन ! प्रतिमा आदिका श्रृंगार करना मुझे अत्यन्त प्रिय है ॥ १८ ॥ यदि अग्निमें पूजा करनी हो तो आहुतिद्वारा करे और यदि सूर्यमें करनी हो तो वेदीमें सूर्यका आकार बनाकर करे । भक्तके द्वारा श्रद्धापूर्वक निवेदन किया हुआ जल भी मेरी प्रसन्नताका कारण होता है ॥ १९ ॥ फिर भक्ष्य, भोज्य आदि पदार्थ और गन्ध पुष्प अक्षत आदि पूजा-सामग्रीकी तो बात ही क्या है ? अतः पहले पूजाकी सब सामग्री इकट्ठी कर फिर मेरी पूजा आरम्भ करे ॥२०॥
( अब जिस प्रकार पूजा करनी चाहिये वह बतलाता हूँ— ) पहले क्रमशः कुशा, मृगचर्म और वस्त्र बिछा-कर आसन बनावे तथा उसपर शुद्धचित्तसे इष्टदेवके सम्मुख बैठे ॥ २१ ॥ तदनन्तर बहिर्मातृका और अन्तर्मातृका न्यास करे तथा केशव, नारायण आदि चौबीस नामोंका न्यास करके तत्त्वन्यास करे । उसके पश्चात् ( विष्णु पञ्जरोक्त विधिसे ) मेरी मूर्तिमें पञ्जर-न्यास तथा मन्त्रन्यास करे । मेरी प्रतिमा आदिमें भी निरालस्य-भावसे उसी प्रकार न्यास करना चाहिये ॥ २२-२३ ॥ तथा अपने सामने बायीं ओर कलश और दायीं ओर पुष्प आदि सामग्री रखे, उसी तरह अर्घ्य, पाद्य, मधुपर्क और आचमनके लिये चार पात्र रखे । तत्पश्चात् अपने सूर्यके समान तेजस्वी हृदय-कमलमें जीवनाम्नी मेरी कलाका ध्यान करे और हे शत्रुदमन ! अपने सम्पूर्ण शरीरको उससे व्याप्त देखे तथा प्रतिमा आदिका पूजन करते समय भी उन ( प्रतिमा आदि ) में उस जीवकलाका ही आवाहन करे ॥ २४-२६ ॥ पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, आभूषण आदिसे अथवा जो कुछ सामग्री मिल सके उसीसे, निष्कपट होकर मेरी पूजा करे ॥ २७ ॥
सर्ग ४ ] | किष्किन्धाकाण्ड | १७३
विभवे सति कर्पूरकुङ्कुमागुरुचन्दनैः ।
अर्चयेन्मन्त्रवन्नित्यं सुगन्धकुसुमैः शुभैः ॥२८॥
दशावरणपूजां वै ह्यागमोक्तां प्रकारयेत् ।
नीराजनैर्धूपदीपैर्नैवेद्यैर्बहुविस्तरैः ॥२९॥
श्रद्धयोपहरेन्नित्यं श्रद्धाभुगहमेश्वरः ।
होमं कुर्यात्प्रयत्नेन विधिना मन्त्रकोविदः ॥३०॥
अगस्त्येनोक्तमार्गेण कुण्डेनागमवित्तमः ।
जुहुयान्मूलमन्त्रेण पुंसूक्तेनाथवा बुधः ॥३१॥
अथचौपासनाग्नौ वा चरुणा हविषा तथा ।
तप्तजाम्बूनदप्रख्यं दिव्याभरणभूषितम् ॥३२॥
ध्यायेदनलमध्यस्थं होमकाले सदा बुधः ।
पार्षदेभ्यो बलिं दत्त्वा होमशेषं समापयेत् ॥३३॥
ततो जपं प्रकुर्वीत ध्यायेन्मां यतवाक् स्मरन् ।
मुखवासं च ताम्बूलं दत्त्वा प्रीतिसमन्वितः ॥३४॥
मदर्थे नृत्यगीतादि स्तुतिपाठादि कारयेत् ।
प्रणमेद्दण्डवद्भूमौ हृदये मां निधाय च ॥३५॥
शिरस्याधाय मदत्तं प्रसादं भावनामयम् ।
पाणिभ्यां मत्पदे मूर्ध्नि गृहीत्वा भक्तिसंयुतः ॥३६॥
रक्ष मां घोरसंसारादित्युक्त्वा प्रणमेत्सुधीः ।
उद्वासयेद्यथापूर्वं प्रत्यग्ज्योतिषि संस्मरन् ॥३७॥
एवमुक्तप्रकारेण पूजयेद्विधिवद्यदि ।
इहामुत्र च संसिद्धिं प्राप्नोति मदनुग्रहात् ॥३८॥
मद्भक्तो यदि मामेवं पूजां चैव दिने दिने ।
करोति मम सारूप्यं प्राप्नोत्येव न संशयः ॥३९॥
यदि धनवान् हो तो नित्यप्रति कर्पूर, कुंकुम, अगुरु, चन्दन और अत्युत्तम सुगन्धित पुष्पोंसे मन्त्रोच्चारण करता हुआ मेरी पूजा करे ॥ २८ ॥ तथा नीरांजन (पाँच बत्तियोंकी आरती), धूप, दीप और नाना प्रकारके नैवेद्योंद्वारा वेदोक्त दशावरण-पूजा-विधिसे मेरा अर्चन करे ॥ २९ ॥
नित्यप्रति अति श्रद्धाके साथ सब पदार्थ निवेदन करे क्योंकि मैं परमात्मा श्रद्धाका ही भूखा हूँ। मन्त्र-विधिको जाननेवाला उपासक पूजाके अनन्तर विधिपूर्वक हवन करे ॥ ३० ॥ शास्त्रविधिके जाननेवाले बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि अगस्त्य मुनिकी बतायी हुई विधिसे कुण्ड बनाकर उसमें गुरुके दिये हुए मूलमन्त्रसे अथवा पुरुषसूक्तके मन्त्रोंसे आहुति छोड़े ॥ ३१ ॥ अथवा अग्निहोत्रकी अग्निमें ही चरु तथा हविसे हवन करे। हवन करते समय बुद्धिमान् याजक होमाग्निमें 'तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाले सर्वालंकारविभूषित भगवान् यज्ञ-पुरुषके रूपमें' परमात्माका सदा ध्यान करे। और फिर मेरे पार्षदोंके लिये बलि देकर होम समाप्त कर दे ॥ ३२–३३ ॥
तदनन्तर मौन होकर मेरा ध्यान और स्मरण करता हुआ जप करे। फिर प्रीतिपूर्वक ताम्बूल और मुखवास देकर मेरे लिये नृत्य, गान और स्तुति-पाठ आदि करावे और हृदयमें मेरी मनोहर मूर्तिको धारण कर पृथिवी पर लोटकर साष्टांग दण्डवत् करे ॥ ३४–३५ ॥ मेरे दिये हुए भावनामय प्रसादको 'यह भगवत्प्रसाद है' ऐसी भावनासे शिरपर रखे और भक्तिभावसे विभोर हो मेरे चरणोंको अपने मस्तकपर रखकर और 'हे प्रभो! इस भयंकर संसारसे मुझे बचाओ' ऐसा कहकर मुझे प्रणाम करे, उसके बाद बुद्धिमान् उपासकको चाहिये कि प्रतिमामें आवाहन की हुई जीवकलाको 'वह मुझहीमें प्रवेश कर गयी है' ऐसी भावना करते हुए विसर्जन करे ॥ ३६–३७ ॥
जो पुरुष उपरोक्त प्रकारसे मेरी विधिपूर्वक पूजा करता है वह मेरी कृपासे इहलोक और परलोक दोनों जगह सिद्धि प्राप्त करता है ॥ ३८ ॥ यदि मेरा भक्त इस प्रकार नित्यप्रति पूजा करे तो वह मेरा सारूप्य प्राप्त कर लेता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ३९ ॥ यह अति
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| १७४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ४ |
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| इदं रहस्यं परमं च पावनं<br>मयैव साक्षात्कथितं सनातनम् ।<br>पठत्यजस्रं यदि वा शृणोति यः<br>स सर्वपूजाफलभाङ् न संशयः ॥४०॥ | गोपनीय पूजाविधि परम पवित्र और सनातन है । इसे साक्षात् मैंने ही अपने मुखसे कहा है । जो पुरुष इसे निरन्तर पढ़ता या सुनता है उसे निस्सन्देह सम्पूर्ण पूजाका फल मिलता है ॥ ४० ॥ |
| एवं परात्मा श्रीरामः क्रियायोगमनुत्तमम् ।<br>पृष्टः प्राह स्वभक्ताय शेषांशाय महात्मने ॥४१॥ | इस प्रकार अपने अनन्य भक्त शेषावतार महात्मा लक्ष्मणजीके पूछनेपर परमात्मा श्रीरामचन्द्रजीने इस अत्युत्तम क्रियायोगका उन्हें उपदेश किया ॥ ४१ ॥ फिर श्रीरामचन्द्रजी अपनी मायाका अवलम्बन कर साधारण पुरुषोंके समान दुःखित-से दिखायी देने लगे । वे 'हा सीते ! हा सीते !' कहते हुए सारी रात यों ही बिता देते, उन्हें किसी प्रकार नींद न आती ॥ ४२ ॥ |
| पुनः प्राकृतवद्रामो मायामालम्ब्य दुःखितः ।<br>हा सीतेति वदन्नैव निद्रां लेभे कथञ्चन ॥४२॥ | |
| एतस्मिन्नन्तरे तत्र किष्किन्धायां सुबुद्धिमान् ।<br>हनूमान्प्राह सुग्रीवमेकान्ते कपिनायकम् ॥४३॥ | इसी समय किष्किन्धापुरीमें परम बुद्धिमान् हनुमान्जीने वानरराज सुग्रीवसे एकान्तमें कहा—॥ ४३ ॥ "हे राजन् ! सुनिये, मैं आपके बड़े हितकी बात कहता हूँ । देखिये, श्रीरामचन्द्रजीने पहले आपका कितना बड़ा उपकार किया है ॥ ४४ ॥ किन्तु मुझे मालूम होता है आप कृतघ्नके समान उसे भूल गये हैं । अहो ! आपहीके लिये जिन्होंने त्रिलोकमान्य वीरवर वालीको मारा और आपको राजपद्पर बैठाया तथा ( जिनकी कृपासे ) आपको परम दुर्लभ तारा मिली वे ही बुद्धिमान् भगवान् राम अपने भाईके साथ पर्वत-शिखरपर रहते हुए अपने भारी कार्यके लिये एकाग्रचित्तसे आपके आनेकी बाट देख रहे हैं । किन्तु आप वानर-स्वभावके अनुसार स्त्री-लम्पट होकर सब कुछ भूल गये ॥ ४५–४७ ॥ आपने सीताजीकी खोजके विषयमें 'मैं अवश्य करूँगा' ऐसी प्रतिज्ञा करके भी अभीतक कुछ नहीं किया । आप बड़े ही कृतघ्न हैं । मालूम होता है वालीके समान आप भी शीघ्र ही कालके गालमें जायँगे" ॥ ४८ ॥ |
| शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि तवैव हितमुत्तमम् ।<br>रामेण ते कृतः पूर्वमुपकारो ह्यनुत्तमः ॥४४॥ | |
| कृतघ्नवच्चया नूनं विस्मृतः प्रतिभाति मे ।<br>त्वत्कृते निहतो वाली वीरस्त्रैलोक्यसम्मतः ॥४५॥ | |
| राज्ये प्रतिष्ठितोऽसि त्वं तारां प्राप्तोऽसि दुर्लभाम् ।<br>स रामः पर्वतस्याग्रे भ्रात्रा सह वसन्सुधीः ॥४६॥ | |
| त्वदागमनमेकाग्रभीक्षते कार्यगौरवात् ।<br>त्वं तु वानरभावेन स्त्रीसक्तो नावबुद्ध्यसे ॥४७॥ | |
| करोमीति प्रतिज्ञाय सीतायाः परिमार्गणम् ।<br>न करोषि कृतघ्नस्त्वं हन्यसे वालिवद्द्रुतम् ॥४८॥ | |
| हनूमद्वचनं श्रुत्वा सुग्रीवो भयविह्वलः ।<br>प्रत्युवाच हनूमन्तं सत्यमेव त्वयोदितम् ॥४९॥ | हनूमान्जीके वचन सुनकर सुग्रीव भयसे विह्वल हो गये और बोले—"हनूमन् ! तुम ठीक ही कहते हो ॥ ४९ ॥ अब तुम मेरी आज्ञासे शीघ्र ही दशों दिशाओंमें बड़े शीघ्रगामी दश सहस्र वानर भेजो ॥ ५०॥ वे सातों द्वीपोंमें रहनेवाले सम्पूर्ण वानरोंको यहाँ ले आवें और जितने मुख्य-मुख्य वानर हैं वे सब यहाँ एक पक्षके भीतर आ जायँ ॥ ५१ ॥ जो कोई एक |
| शीघ्रं कुरु ममाज्ञां त्वं वानराणां तरस्विनाम् ।<br>सहस्राणि दशेदानीं प्रेषयाशु दिशो दश ॥५०॥ | |
| सप्तद्वीपगतान्सर्वान्वानरानानानयन्तु ते ।<br>पक्षमध्ये समायान्तु सर्वे वानरपुङ्गवाः ॥५१॥ |