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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

युद्धकाण्ड - सर्ग २: रावणद्वारा विभीषणका तिरस्कार

सर्ग २] युद्धकाण्ड २३७


अद्वितीयश्चिदात्मैकः परमात्मा सनातनः ।
यस्तु जानाति रामस्य स्वरूपं तत्त्वतो जनः ॥ ५० ॥
तं न स्पृशति दुःखादि किमुतानन्दमव्ययम् ।
दुःखहर्षभयक्रोधलोभमोहमदादयः ॥ ५१ ॥
अज्ञानलिङ्गान्येतानि कुतः सन्ति चिदात्मनि ।
देहाभिमानिनो दुःखं न देहस्य चिदात्मनः ॥ ५२ ॥
सम्प्रसादे द्वयाभावात्सुखमात्रं हि दृश्यते ।
बुद्ध्याद्यभावात्संशुद्धे दुःखं तत्र न दृश्यते ।
अतो दुःखादिकं सर्वं बुद्धेरेव न संशयः ॥ ५३ ॥
रामः परात्मा पुरुषः पुराणो
नित्योदितो नित्यसुखो निरीहः ।
तथापि मायागुणसङ्गतोऽसौ
सुखीव दुःखीव विभाव्यतेऽबुधैः ॥ ५४ ॥

भावार्थ: परमात्मा सनातन पुरुष थे, तथापि कार्यवश मनुष्यरूप होनेके कारण जानकीजीके लिये नाना प्रकारसे विलाप करने लगे। जो पुरुष परमात्मा रामका वास्तविक स्वरूप जानता है उसे भी दुःखादि स्पर्श नहीं कर सकते, फिर आनन्दस्वरूप अविनाशी भगवान् रामकी तो बात ही क्या है? दुःख, हर्ष, भय, क्रोध, लोभ, मोह और मद आदि सब अज्ञानके ही चिह्न हैं; चिदात्मा राममें ये कैसे हो सकते हैं ? देहका दुःख देहाभिमानीको ही होता है, चेतन आत्माको नहीं ॥४९-५२॥ समाधि-अवस्थामें द्वैत-प्रपञ्चका अभाव हो जानेके कारण वहाँ केवल सुखका ही साक्षात्कार होता है। उस अवस्थामें बुद्धि आदिका अभाव हो जानेसे शुद्ध आत्मामें दुःखका लेश भी दिखायी नहीं देता। अतः इसमें सन्देह नहीं ये दुःखादि सब बुद्धिके ही धर्म हैं॥५३॥
भगवान् राम परमात्मा, पुराणपुरुष, नित्य-प्रकाश-स्वरूप, नित्यसुख-स्वरूप और निरीह हैं; किन्तु अज्ञानी पुरुषोंको वे मायिक गुणोंके सम्बन्धसे सुखी या दुःखी-से प्रतीत होते हैं ॥ ५४ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥


द्वितीय सर्ग

रावणद्वारा विभीषणका तिरस्कार।

श्रीमहादेव उवाच
लङ्कायां रावणो दृष्ट्वा कृतं कर्म हनूमता ।
दुष्करं दैवतैर्वाऽपि ह्रिया किञ्चिदवाङ्मुखः ॥ १ ॥
आहूय मन्त्रिणः सर्वानिदं वचनमब्रवीत् ।
हनूमता कृतं कर्म भवद्भिर्दृष्टमेव तत् ॥ २ ॥
प्रविश्य लङ्कां दुर्धर्षां दृष्ट्वा सीतां दुरासदाम्।
हत्वा च राक्षसान्वीरानेकं मन्दोदरीसुतम् ॥ ३ ॥
दग्ध्वा लङ्कामशेषेण लङ्घयित्वा च सागरम् ।
युष्मान्सर्वानतिक्रम्य स्वस्थोऽगात्पुनरेव सः ॥ ४ ॥
किं कर्तव्यमितोऽस्माभिर्यूयं मन्त्रविशारदाः।
मन्त्रयध्वं प्रयत्नेन यत्कृतं मे हितं भवेत् ॥ ५ ॥

भावार्थ: श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! इधर लङ्कामें श्रीहनुमान्‌जीका देवताओंके लिये भी दुष्कर कृत्य देख रावणने अपने समस्त मन्त्रियोंको बुलाकर लज्जासे शिर नीचा करके कहा—"हनुमान्‌ने जो-जो कर्म किया वह सब आप लोगोंने देखा ही है ॥१-२॥ वह दुष्प्रवेश्य लङ्कामें घुसकर सर्वथा दुष्प्राप्य सीतासे मिला तथा उसने अन्य राक्षस वीरोंके साथ मन्दोदरीके पुत्र अक्षको मारकर सम्पूर्ण लङ्काको जला दिया और फिर आप सब लोगोंका तिरस्कार कर कुशलतापूर्वक समुद्र लाँघकर लौट गया ॥ ३-४ ॥ आप सब लोग नीति-निपुण हैं, अतः अब हमें क्या करना चाहिये, और क्या करनेसे हमारा हित हो सकता है—इसका प्रयत्नपूर्वक विचार कीजिये" ॥ ५ ॥

२३८अध्यात्मरामायण[सर्ग २

[संस्कृत श्लोक]

रावणस्य वचः श्रुत्वा राक्षसास्तमथाब्रुवन् ।
देव शङ्का कुतो रामात्तव लोकजितो रणे ॥ ६ ॥

इन्द्रस्तु बद्ध्वा निक्षिप्तः पुत्रेण तव पत्तने ।
जित्वा कुबेरमानीय पुष्पकं भुज्यते त्वया ॥ ७ ॥

यमो जितः कालदण्डाद्भयं नाभूत्तव प्रभो ।
वरुणो हुङ्कृतेनैव जितः सर्वेऽपि राक्षसाः ॥ ८ ॥

मयो महासुरो भीत्या कन्यां दत्त्वा स्वयं तव ।
त्वद्वशे वर्ततेऽद्यापि किमुतान्ये महासुराः ॥ ९ ॥

हनूमद्धर्षणं यत्तु तदवज्ञाकृतं च नः ।
वानरोऽयं किमस्माकमस्मिन्पौरुषदर्शने ॥१०॥

इत्युपेक्षितमस्माभिर्धर्षणं तेन किं भवेत् ।
वयं प्रमत्ताः किं तेन वञ्चिताः सो हनूमता ॥११॥

जानीमो यदि तं सर्वे कथं जीवन् गमिष्यति ।
आज्ञापय जगत्कृत्स्नमवानरमानुषम् ॥१२॥

कृत्वाऽऽगस्यामहे सर्वे प्रत्येकं वा नियोजय ।
कुम्भकर्णस्तदा प्राह रावणं राक्षसेश्वरम् ॥१३॥

आरब्धं यत्त्वया कर्म स्वात्मनाशाय केवलम् ।
न दृष्टोऽसि तदा भाग्यात्त्वं रामेण महात्मना ॥१४॥

यदि पश्यति रामस्त्वां जीवन्नायासि रावण ।
रामो न मानुषो देवः साक्षान्नारायणोऽव्ययः॥१५॥

सीता भगवती लक्ष्मी रामपत्नी यशस्विनी ।
राक्षसानां विनाशाय त्वयाऽऽनीता सुमध्यमा ॥१६॥

विषपिण्डमिवागीर्य महामीनो यथा तथा ।
आनीता जानकी पश्चात्त्वया किं वा भविष्यति॥१७॥

यद्यप्यत्युचितं कर्म त्वया कृतमजानता ।
सर्वं समं करिष्यामि स्वस्थचित्तो भव प्रभो ॥१८॥


[हिन्दी अनुवाद]

रावणके वचन सुनकर राक्षसोंने उससे कहा— "देव ! आपको रामसे क्या शंका है ? आपने तो युद्धमें समस्त लोकोंको जीत लिया है ॥ ६ ॥ आपके पुत्रने इन्द्रको बाँधकर अपनी राजधानीमें डाल दिया था और आप स्वयं भी कुबेरको जीतकर उसका पुष्पक विमान लाकर भोगते हैं ॥ ७ ॥ हे प्रभो ! आपने यमराजको भी जीत लिया, उसके कालदण्डसे भी आपको कोई भय नहीं हुआ तथा वरुण और समस्त राक्षसोंको आपने हुंकारसे ही जीत लिया था ॥ ८ ॥ और महासुरोंकी तो बात ही क्या है, स्वयं मयासुर भी आपके भयसे आपको अपनी कन्या देकर आजतक आपके अधीन बना हुआ है ॥ ९ ॥ हनुमान्‌ने जो हमारा तिरस्कार किया है वह तो हमारी ही उपेक्षासे हुआ है। हमने यह सोचकर कि यह वानर है इसे पुरुषार्थ दिखानेमें क्या रक्खा है उसकी उपेक्षा कर दी थी, नहीं तो वह हमारी अवज्ञा क्या कर सकता था ? ॥ १० ॥ अतः असावधान रहनेके कारण यदि हमें हनुमान्‌ने ठग लिया तो इससे क्या हुआ ? यदि हम सब उसे जानते तो वह जीता हुआ कैसे जा सकता था ? आप हमें आज्ञा दीजिये, हम सब अभी जाकर पृथिवीको वानर और मनुष्योंसे शून्य कर आते हैं। अथवा हममेंसे एक-एकको ही इस कार्यके लिये नियुक्त कीजिये।"

तदनन्तर राक्षसराज रावणसे कुम्भकर्ण बोला— ॥ ११-१३ ॥ "आपने जो कार्य आरम्भ किया है वह केवल आपका नाश करनेके लिये ही है। सौभाग्यवश इतना ही अच्छा हुआ कि सीताजीको चुरानेके समय महात्मा रामने आपको नहीं देखा ॥ १४ ॥ हे रावण ! यदि उस समय राम आपको देख लेते तो आप जीते-जागते नहीं लौट सकते थे। राम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं, वे साक्षात् अव्यय नारायणदेव हैं ॥१५॥ भगवान् रामकी पत्नी यशस्विनी सीताजी साक्षात् भगवती लक्ष्मी हैं, उस सुन्दरीको आप राक्षसोंके नाशके लिये ही लाये हैं ॥ १६ ॥ जिस प्रकार कोई महामत्स्य विषका पिण्ड निगल जाय उसी प्रकार आप (अपने नाशके लिये) जानकीको ले आये हैं, न जाने आगे क्या होना है ? ॥ १७ ॥ यद्यपि आपने अनजानमें यह बड़ा ही अनुचित कार्य किया है, तथापि आप शान्त होइये, मैं सब काम ठीक किये देता हूँ"

सर्ग २ ]युद्धकाण्ड२३९

| कुम्भकर्णवचः श्रुत्वा वाक्यमिन्द्रजिदब्रवीत् ।<br>देहि देव ममानुज्ञां हत्वा रामं सलक्ष्मणम् ।<br>सुग्रीवं वानरांश्चैव पुनर्यास्यामि तेऽन्तिकम् ॥१९॥<br><br>तत्रागतो भागवतप्रधानो<br>विभीषणो बुद्धिमतां वरिष्ठः ।<br>श्रीरामपादद्वय एकतानः<br>प्रणम्य देवारिमुपोपविष्टः ॥२०॥<br><br>विलोक्य कुम्भश्रवणादिदैत्या-<br>न्मत्तप्रमत्तानतिविस्मयेन ।<br>विलोक्य कामातुरमप्रमत्तो<br>दशाननं प्राह विशुद्धबुद्धिः ॥२१॥<br><br>न कुम्भकर्णेन्द्रजितौ च राजं-<br>स्तथा महापाश्र्वमहोदरौ तौ ।<br>निकुम्भकुम्भौ च तथातिकायः<br>स्थातुं न शक्ता युधि राघवस्य ॥२२॥<br><br>सीताऽभिधानेन महाग्रहेण<br>ग्रस्तोऽसि राजन् न च ते विमोक्षः ।<br>तामेव सत्कृत्य महाधनेन<br>दत्त्वाभिरामाय सुखी भव त्वम् ॥२३॥<br><br>यावन्न रामस्य शिताः शिलीमुखा<br>लङ्कामभिव्याप्य शिरांसि रक्षसाम् ।<br>छिन्दन्ति तावद्रघुनायकस्य भो<br>तां जानकीं त्वं प्रतिदातुमर्हसि ॥२४॥<br><br>यावन्नगाभाः कपयो महाबला<br>हरीन्द्रतुल्या नखदंष्ट्रयोधिनः ।<br>लङ्कां समाक्रम्य विनाशयन्ति ते<br>तावद्द्रुतं देहि रघूत्तमाय ताम् ॥२५॥<br><br>जीवन्न रामेण विमोक्ष्यसे त्वं<br>गुप्तः सुरेन्द्रेरपि शङ्करेण ।<br>न देवराजाङ्कगतो न मृत्योः<br>पाताललोकानपि सम्प्रविष्टः ॥२६॥<br><br>शुभं हितं पवित्रं च विभीषणवचः खलः ।<br>प्रतिजग्राह नैवासौ म्रियमाण इवौषधम् ॥२७॥ | ॥ १८ ॥ कुम्भकर्णके ये वचन सुनकर इन्द्रजित् बोला—"प्रभो ! आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं अभी लक्ष्मणके सहित राम, सुग्रीव और समस्त वानरोंको मारकर आपके पास लौट आता हूँ" ॥ १९ ॥<br><br>इसी समय वहाँ भागवत-प्रधान बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ विभीषणजी आये। उनके अन्तःकरणकी वृत्ति एकाग्रता-पूर्वक भगवान् रामके चरणयुगलमें लगी हुई थी। वहाँ आकर वे देवशत्रु रावणको प्रणाम कर उसके पास बैठ गये ॥ २० ॥ वहाँ बैठकर उन्होंने एक बार कुम्भकर्ण आदि समस्त मदोन्मत्त राक्षसोंको अति विस्मयके साथ देखा । फिर यह भी देखा कि रावण कामातुर है, (वह किसीकी माननेवाला नहीं है) । तथापि अति निर्मल-बुद्धि होनेसे वे अपने कर्त्तव्यमें सावधान थे, इसलिये उन्होंने रावणसे कहा—॥ २१ ॥ "हे राजन् ! युद्धमें रघुनाथजीके सामने कुम्भकर्ण, इन्द्रजित्, महापाश्र्व, महोदर, निकुम्भ, कुम्भ तथा अतिकाय आदि कोई भी नहीं ठहर सकते ॥ २२ ॥ हे राजन् ! आपको सीता नामक एक प्रबल ग्रहने ग्रस्त कर लिया है, इससे आपका छुटकारा इस तरह नहीं हो सकता। अब आप उसे सत्कारपूर्वक बहुत-से धनके साथ श्रीरामचन्द्रजीको लौटा दीजिये और सुखी हो जाइये ॥ २३ ॥ जबतक श्रीरामचन्द्रजीके तीक्ष्ण बाण लंकामें व्याप्त होकर राक्षसोंके शिर नहीं काटते, तबतक ही उचित है कि आप उन्हें जानकीजीको सौंप दें ॥ २४ ॥ नख और दाढ़ोंसे ही लड़नेवाले, सिंहके समान महाबलवान् वे पर्वताकार वानर-गण जबतक लंकामें फैलकर उसे नष्ट-भ्रष्ट नहीं करते तभीतक आप सीताजीको जल्दी-से-जल्दी श्रीरघुनाथजीको सौंप दीजिये ॥ २५ ॥ नहीं तो, भले ही इन्द्र और शंकर भी आपकी रक्षा करें, अथवा देवराज इन्द्र और मृत्यु भी आपको गोदमें लेकर बचायें, या आप पातालमें भी घुस जायें, तो भी रामसे आप जीवित नहीं बच सकते" ॥ २६ ॥<br><br>विभीषणके इन शुभ, हितकर और पवित्र वचनोंको दुष्ट रावणने इसी प्रकार ग्रहण नहीं किया जैसे मरने-वालापुरुष औषध ग्रहण नहीं करता ॥ २७ ॥ बल्कि |

२४०अध्यात्मरामायण[ सर्ग २

कालेन नोदितो दैत्यो विभीषणमथाब्रवीत् ।<br>मद्दत्तभोगैः पुष्टाङ्गो मत्समीपे वसन्नपि ॥२८॥<br>प्रतीपमाचरत्येष ममैव हितकारिणः ।<br>मित्रभावेन शत्रुर्मे जातो नास्त्यत्र संशयः ॥२९॥<br>अनार्येण कृतघ्नेन सङ्गतिर्मे न युज्यते ।<br>विनाशमभिकाङ्क्षन्ति ज्ञातीनां ज्ञातयः सदा॥३०॥<br>योऽन्यस्त्वेवंविधं ब्रूयाद्वाक्यमेकं निशाचरः ।<br>हन्मि तस्मिन् क्षणे एव धिक् त्वां रक्षःकुलाधमम्॥३१<br>रावणेनैवमुक्तः सन्परुषं स विभीषणः ।<br>उत्पपात सभामध्याद्गदापाणिर्महाबलः ॥३२॥<br>चतुर्भिर्मन्त्रिभिः सार्धं गगनस्थोऽब्रवीद्वचः ।<br>क्रोधेन महताऽऽविष्टो रावणं दशकन्धरम् ।<br>मा विनाशमुपैहि त्वं प्रियवादिनमेव माम् ॥३३॥<br>धिक्करोषि तथापि त्वं ज्येष्ठो भ्राता पितुः समः ।<br>कालो राघवरूपेण जातो दशरथालये ॥३४॥<br>काली सीताऽभिधानेन जाता जनकनन्दिनी ।<br>तावुभावागतावत्र भूमेर्भारापनुत्तये ॥३५॥<br>तेनैव प्रेरितस्त्वं तु न शृणोषि हितं मम ।<br>श्रीरामः प्रकृतेः साक्षात्परस्तात्सर्वदा स्थितः॥३६॥<br>बहिरन्तश्च भूतानां समः सर्वत्र संस्थितः ।<br>नामरूपादिभेदेन तत्तन्मय इवामलः ॥३७॥<br>यथा नानाप्रकारेपु वृक्षेष्वेको महानलः ।<br>तत्तदाकृतिभेदेन भिद्यतेऽज्ञानचक्षुषाम् ॥३८॥<br>पञ्चकोशादिभेदेन तत्तन्मय इवावभौ ।<br>नीलपीतादियोगेन निर्मलः स्फटिको यथा ॥३९॥<br>स एव नित्यमुक्तोऽपि स्वमायागुणबिम्बितः ।<br>कालः प्रधानं पुरुषोऽव्यक्तं चेति चतुर्विधः ॥४०॥ | वह दुष्ट दैत्य कालकी प्रेरणासे विभीषणसे इस प्रकार कहने लगा—“देखो, यह मेरे ही दिये हुए भोगोंसे पुष्ट होकर और मेरे ही पास रहकर भी मुझ अपने हितकर्ताके ही विरुद्ध चलता है; निःसन्देह यह मित्ररूपसे मेरा शत्रु ही प्रकट हुआ है॥ २८-२९ ॥ इस अनार्य और कृतघ्नका मेरे साथ रहना ठीक नहीं है। प्रायः यह देखनेमें आता है कि जातिवाले अपने ही जाति-भाइयोंके नाशकी सदा इच्छा किया करते हैं॥ ३० ॥ यदि कोई और राक्षस ऐसा एक भी वाक्य कहता तो मैं उसे उसी क्षण मार डालता ! अरे नीच ! तू राक्षसकुलमें अत्यन्त अधम है, तुझे धिक्कार है" ॥ ३१ ॥<br><br>रावणके इस प्रकार कटुवचन कहनेपर महाबली विभीषण हाथमें गदा लेकर सभासे उड़े ॥ ३२ ॥ और अपने चार मन्त्रियोंके साथ आकाशमें स्थित होकर अत्यन्त क्रोधमें भरकर दशशीश रावणसे कहा—॥ ३३ ॥ “मैं तुम्हारे हितकी बात कहनेवाला हूँ; फिर भी तुम मुझे धिक्कारते हो ! तथापि मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा नाश न हो, क्योंकि तुम मेरे बड़े भाई हो; अतः पिताके समान हो। तुम्हारा काल रघुनाथजीके रूपसे महाराज दशरथके घरमें प्रकट हो गया है ॥३४॥ और महाशक्ति काली 'सीता' नामसे जनकजीकी पुत्री हुई है। ये दोनों पृथिवीका भार उतारनेके लिये ही यहाँ आये हैं ॥ ३५ ॥ उन्हींकी प्रेरणासे तुम मेरा हितकर वचन नहीं सुनते। भगवान् राम सर्वदा साक्षात् प्रकृतिसे परे हैं ॥ ३६ ॥ वे प्राणियोंके बाहर-भीतर सर्वत्र समान भावसे स्थित हैं और नित्य निर्मल होते हुए भी नाम-रूप आदि भेदसे विभिन्न-से भासते हैं ॥३७॥ जिस प्रकार अज्ञानी पुरुषोंकी दृष्टिमें एक ही महाग्नि नाना प्रकारके वृक्षोंमें उनके आकार-भेदसे भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है, अथवा जैसे शुद्ध स्फटिक मणि नील-पीतादि रङ्गोंकी सन्निधिमात्रसे ही नील-पीत आदि वर्णोंवाली प्रतीत होती है, वैसे ही पञ्चकोश आदिके भेदसे आत्मा तद्रूप-सा भासता है ॥ ३८-३९ ॥ वे (श्रीभगवान् ही) नित्यमुक्त होकर भी अपनी मायाके गुणोंमें प्रतिबिम्बित होकर काल, प्रधान, पुरुष और अव्यक्त इन चार प्रकारके नामोंसे कहे जाते हैं॥ ४० ॥ वे