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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

बालकाण्ड - सर्ग १: रामहृदय

ॐ

अध्यात्मरामायण

बालकाण्ड


प्रथम सर्ग

रामहृदय

संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
यः पृथ्वीभरवारणाय दिविजैः<br>  संप्रार्थितश्चिन्मयः<br>संजातः पृथिवीतले रविकुले<br>  मायामनुष्योऽव्ययः ।<br>निश्चक्रं हतराक्षसः पुनरगाद्<br>  ब्रह्मत्वमाद्यं स्थिरां<br>कीर्तिं पापहरां विधाय जगतां<br>  तं जानकीशं भजे ॥ १ ॥जिन चिन्मय अविनाशी प्रभुने पृथिवीका भार उतारनेके लिये देवताओंकी प्रार्थनासे पृथिवीतलपर सूर्यवंशमें माया-मानवरूपसे अवतार लिया और जो राक्षसोंके समूहको मारकर तथा संसारमें अपनी पापविनाशिनी अविचल कीर्ति स्थापितकर पुनः अपने आद्य ब्रह्मस्वरूपमें लीन हो गये उन श्रीजानकीवल्लभका मैं भजन करता हूँ ॥ १ ॥
विश्वोद्भवस्थितिलयादिषु हेतुमेकं<br>  मायाश्रयं विगतमायमचिन्त्यमूर्तिम् ।<br>आनन्दसान्द्रममलं निजबोधरूपं<br>  सीतापतिं विदिततत्त्वमहं नमामि ॥ २ ॥जो विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और लय आदिके एकमात्र कारण हैं, मायाके आश्रय होकर भी मायातीत हैं, अचिन्त्यस्वरूप हैं, आनन्दघन हैं, उपाधिकृत दोषोंसे रहित हैं, तथा स्वयंप्रकाशस्वरूप हैं उन तत्त्ववेत्ता श्रीसीतापतिको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥
पठन्ति ये नित्यमनन्यचेतसः<br>  शृण्वन्ति चाध्यात्मिकसंज्ञितं शुभम् ।<br>रामायणं सर्वपुराणसंमतं<br>  निर्धूतपापा हरिमेव यान्ति ते ॥ ३ ॥जो लोग इस सर्व-पुराण-सम्मत पवित्र अध्यात्मरामायणका एकाग्र-चित्तसे नित्य पाठ करते हैं और जो इसे सुनते हैं वे पापरहित होकर श्रीहरिको ही प्राप्त करते हैं ॥ ३ ॥
अध्यात्मरामायणमेव नित्यं<br>  पठेद्यदीच्छेद्भवबन्धमुक्तिम् ।<br>गवां सहस्रायुतकोटिदानात्<br>  फलं लभेद्यः शृणुयात्स नित्यम् ॥ ४ ॥यदि कोई संसार-बन्धनसे मुक्त होना चाहता हो तो वह अध्यात्मरामायणका ही नित्य पाठ करे। जो कोई मनुष्य इसका नित्य श्रवण करता है वह लाखों करोड़ गो-दानका फल प्राप्त करता है ॥ ४ ॥
पुरारिगिरिसंभूता श्रीरामार्णवसंगता ।<br>अध्यात्मरामगङ्गेयं पुनाति भुवनत्रयम् ॥ ५ ॥श्रीशंकररूप पर्वतसे निकली हुई रामरूप समुद्रमें मिलनेवाली यह अध्यात्मरामायणरूपिणी गंगा त्रिलोकीको पवित्र कर रही है ॥ ५ ॥
४अध्यात्मरामायण[ सर्ग १

कैलासाग्रे कदाचिद्रविशतविमले मन्दिरे रत्नपीठे
संविष्टं ध्याननिष्ठं त्रिनयनमभयं सेवितं सिद्धसंघैः ।
देवी वामाङ्कसंस्था गिरिवरतनया पार्वती भक्तिनम्रा
प्राहैदं देवमीशं सकलमलहरं वाक्यमानन्दकन्दम् ॥ ६ ॥

पार्वत्युवाच
नमोऽस्तु ते देव जगन्निवास सर्वात्मदृक् त्वं परमेश्वरोऽसि ।
पृच्छामि तत्त्वं पुरुषोत्तमस्य सनातनं त्वं च सनातनोऽसि ॥ ७ ॥
गोप्यं यदत्यन्तमनन्यवाच्यं वदन्ति भक्तेषु महानुभावाः ।
तदप्यहोऽहं तव देव भक्ता प्रियोऽसि मे त्वं वद यत्तु पृष्टम् ॥ ८ ॥
ज्ञानं सविज्ञानमथाशुभक्ति-वैराग्ययुक्तं च मितं विभास्वत् ।
जानाम्यहं योषिदपि त्वदुक्तं यथा तथा ब्रूहि तरन्ति येन ॥ ९ ॥
पृच्छामि चान्यच्च परं रहस्यं तदेव चाग्रे वद वारिजाक्ष ।
श्रीरामचन्द्रेऽखिललोकसारे भक्तिर्दृढा नौर्भवति प्रसिद्धा ॥ १० ॥
भक्तिः प्रसिद्धा भवमोक्षणाय नान्यत्ततः साधनमस्ति किञ्चित् ।
तथापि हृत्संशयबन्धनं मे विभेत्तुमर्हस्यमलोक्तिभिस्त्वम् ॥ ११ ॥
वदन्ति रामं परमेकमाद्यं निरस्तमायागुणसंप्रवाहम् ।
भजन्ति चाहर्निशमप्रमत्ताः परं पदं यान्ति तथैव सिद्धाः ॥ १२ ॥
वदन्ति केचित्परमोऽपि रामः स्वाविद्यया संवृतमात्मसंज्ञम् ।
जानाति नात्मानमतः परेण सम्बोधितो वेद परात्मतत्त्वम् ॥ १३ ॥


हिन्दी-अनुवाद

एक समय कैलाशपर्वतके शिखरपर सैकड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान शुभ्र भवनमें रत्नसिंहासनपर ध्यानावस्थित बैठे हुए, सिद्ध-समूह-सेवित, नित्यनिर्भय, सर्वपापपहारी आनन्दकन्द देवदेव भगवान् त्रिनयनसे उनके वामाङ्कमें विराजमान श्रीगिरिराजकुमारी पार्वती ने भक्तिभावसे नम्रतापूर्वक ये वाक्य कहे ॥ ६ ॥

श्रीपार्वतीजी बोलीं—हे देव! हे जगन्निवास! आपको नमस्कार है; आप सबके अन्तःकरणोंके साक्षी और परमेश्वर हैं। मैं आपसे श्रीपुरुषोत्तम भगवान्‌का सनातन-तत्त्व पूछना चाहती हूँ, क्योंकि आप भी सनातन हैं ॥ ७ ॥ महानुभावलोग जो अत्यन्त गोपनीय विषय होता है तथा अन्य किसीसे कहने योग्य नहीं होता उसे भी अपने भक्तजनोंसे कह देते हैं। हे देव! मैं भी आपकी भक्त हूँ, मुझे आप अत्यन्त प्रिय हैं। इसलिये मैंने जो कुछ पूछा है वह वर्णन कीजिये ॥ ८ ॥ जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य संसार-समुद्रसे पार हो जाते हैं उस भक्ति और वैराग्यसे परिपूर्ण प्रकाशमय आत्मज्ञानका वर्णन आप विज्ञानसहित इस प्रकार स्वल्प शब्दोंमें कीजिये जिससे मैं स्त्री होनेपर भी आपके वचनोंको (सहज ही) समझ सकूँ ॥ ९ ॥ हे कमलनयन! मैं एक परम गुह्य रहस्य आपसे और पूछती हूँ, कृपया आप पहले उसे ही वर्णन करें। यह तो प्रसिद्ध ही है कि अखिल-लोक-सार श्रीरामचन्द्रजीकी विशुद्ध भक्ति संसार-सागरको तरनेके लिये सुदृढ़ नौका है ॥ १० ॥ संसारसे मुक्त होनेके लिये भक्ति ही प्रसिद्ध उपाय है उससे श्रेष्ठ और कोई भी साधन नहीं है; तथापि आप अपने विशुद्ध वचनोंसे मेरे हृदयकी संशय-ग्रन्थिका छेदन कीजिये ॥ ११ ॥ प्रमादरहित सिद्धगण श्रीरामचन्द्रजीको परम अद्वितीय, सबके आदिकारण और प्रकृतिके गुण-प्रवाहसे परे बतलाते हैं तथा वे अहर्निश उनका भजन करके परमपद भी प्राप्त करते हैं ॥ १२ ॥ परन्तु कोई-कोई कहते हैं कि राम परब्रह्म होनेपर भी अपनी मायासे आवृत्त हो जानेके कारण अपने आत्मस्वरूपको नहीं जानते थे। इसलिये अन्य (वशिष्ठादि) के उपदेशसे उन्होंने आत्मतत्त्वको जाना ॥ १३ ॥ (अतः मैं पूछती

सर्ग १ ]बालकाण्ड५

यदि स्म जानाति कुतो विलापः
सीताकृतेऽनेन कृतः परेण।
जानाति नैवं यदि केन सेव्यः
समो हि सर्वैरपि जीवजातैः ॥१४॥
अत्रोत्तरं किं विदितं भवद्भि-
स्तद्ब्रूत मे संशयभेदि वाक्यम् ॥१५॥

श्रीमहादेव उवाच

धन्यासि भक्तासि परात्मनस्त्वं
यज्ज्ञातुमिच्छा तव रामतत्त्वम्।
पुरा न केनाप्यभिचोदितोऽहं
वक्तुं रहस्यं परमं निगूढम् ॥१६॥
त्वयाद्य भक्त्या परिनोदितोऽहं
वक्ष्ये नमस्कृत्य रघूत्तमं ते।
रामः परात्मा प्रकृतेरनादि-
रानन्द एकः पुरुषोत्तमो हि ॥१७॥
स्वमायया कृत्स्नमिदं हि सृष्ट्वा
नभोवदन्तर्बहिरस्थितो यः।
सर्वान्तरस्थोऽपि निगूढ आत्मा
स्वमायया सृष्टमिदं विचेष्टे ॥१८॥
जगन्ति नित्यं परितो भ्रमन्ति
यत्सन्निधौ चुम्बकलोहवद्धि।
एतन्न जानन्ति विमूढचित्ताः
स्वाविद्यया संवृतमानसा ये ॥१९॥
स्वाज्ञानमप्यात्मनि शुद्धबुद्धे-
स्वारोपयन्तीह निरस्तमाये।
संसारमेवानुसरन्ति ते वै
पुत्रादिसक्ताः पुरुकर्मयुक्ताः ॥२०॥
जानन्ति नैवं हृदये स्थितं वै
चामीकरं कण्ठगतं यथाऽज्ञाः।
यथाऽन्धकारो न तु विद्यते रवौ
ज्योतिःस्वभावे परमेश्वरे तथा।
विशुद्धविज्ञानघने रघूत्तमे-
ऽविद्या कथं स्यात्परतः परात्मनि ॥२१॥
यथा हि चाक्ष्णा भ्रमता गृहादिकं
विनष्टदृष्टेर्भमतीव दृश्यते।


हूँ कि) यदि वे आत्मतत्त्वको जानते थे, तो उन परमात्माने सीताके लिये इतना विलाप क्यों किया? और यदि उन्हें आत्मज्ञान नहीं था, तो वे अन्य सामान्य जीवोंके समान ही हुए; फिर उनका भजन क्यों किया जाना चाहिये? इस विषयमें आपका क्या विचार है सो ऐसे वाक्योंमें कहिये जिससे मेरा सन्देह निवृत्त हो जाय ॥१४-१५॥

श्रीमहादेवजी बोले—देवि! तुम धन्य हो, तुम परमात्माकी परम भक्त हो, जो तुम्हें रामका तत्त्व जाननेकी इच्छा हुई है। इससे पूर्व, इस परमगूढ़ रहस्यका वर्णन करनेके लिये मुझसे और किसीने नहीं कहा ॥१६॥ आज तुमने मुझसे भक्तिपूर्वक प्रश्न किया है इसलिये मैं श्रीरघुनाथजीकी वन्दनाकर तुम्हारे प्रश्नका उत्तर देता हूँ। श्रीरामचन्द्रजी निःसन्देह प्रकृतिसे परे, परमात्मा, अनादि, आनन्दघन, अद्वितीय और पुरुषोत्तम हैं ॥१७॥ जो अपनी मायासे ही इस सम्पूर्ण जगतको रचकर इसके बाहर-भीतर सब ओर आकाशके समान व्याप्त हैं तथा जो आत्मारूपसे सबके अन्तःकरणमें स्थित हुए अपनी मायासे इस विश्वको परिचालित कर रहे हैं ॥१८॥ चुम्बकके निकट होनेसे जिसप्रकार जड लोहेमें गति उत्पन्न हो जाती है उसी प्रकार जिनकी सन्निधिमात्रसे यह विश्व सदा सब ओर भ्रमता रहता है उन परमात्मा रामको, जिनका हृदय आत्माके अज्ञानसे ढँका हुआ है वे मूढ़जन नहीं जान सकते ॥१९॥ वे मूढ़ उन मायातीत शुद्ध-बुद्ध परमात्मामें भी अपने अज्ञानको आरोपित करते हैं अर्थात् उन्हें भी अपने समान ही अज्ञानी मानते हैं, तथा वे सर्वदा स्त्री-पुत्रादिमें आसक्त रहनेवाले पामर जीव बहुत-से कर्मोंमें लगे रहकर संसार-चक्रमें ही पड़े रहते हैं ॥२०॥ वे अज्ञान अपने गलेमें पड़े हुए कण्ठेको न जाननेके समान अपने ही हृदयमें स्थित परमात्मा रामको नहीं जानते (इसीलिये उनमें अज्ञानादिका आरोप करते हैं)। वास्तवमें तो जिस प्रकार सूर्यमें कभी अन्धकार नहीं रहता उसी प्रकार प्रकृत्यादिसे अतीत, विशुद्ध-विज्ञानघन, ज्योतिःस्वरूप, परमेश्वर परमात्मा राममें भी अविद्या नहीं रह सकती ॥२१॥ और जिस प्रकार चक्कर लगाते समय मनुष्यको नेत्रोंके घूमनेसे गृह आदि भी घूमते हुए प्रतीत होते हैं उसी प्रकार लोग अपने देह और इन्द्रियरूप कतकि