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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

युद्धकाण्ड - सर्ग ७: कालनेमिका कपट, लक्ष्मणजीका सचेत होना और कुम्भकर्णको जगाना

सर्ग ७ ] युद्धकाण्ड २६५


सप्तम सर्ग

कालनेमिका कपट, हनुमान्जीद्वारा उसका वध, लक्ष्मणजीका सचेत होना और रावणका कुम्भकर्णको जगाना।

श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले—
कालनेमिवचः श्रुत्वा रावणोऽमृतसन्निभम् ।<br>जज्वाल क्रोधताम्राक्षः सर्पिरद्भिरिवाग्निमान् ॥ १ ॥हे पार्वति ! जैसे अग्निसे तपाया हुआ घृत जल डालनेसे छुनछुनाने लगता है वैसे ही कालनेमिके ये अमृततुल्य वचन सुनकर रावण जल उठा और क्रोधसे उसके नेत्र लाल हो गये ॥१॥
निहन्मि त्वां दुरात्मानं मच्छासनपराङ्मुखम् ।<br>परैः किञ्चिद्गृहीत्वा त्वं भाषसे रामकिंकरः ॥ २ ॥वह कहने लगा— "अरे ! मालूम होता है तू शत्रुसे कुछ लेकर ही इस प्रकार रामके दासकी भाँति बातें बनाता है। याद रख, मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन करनेवाले तुझ दुष्ट-को मैं अभी मार डालूँगा" ॥२॥
कालनेमिरुवाचेदं रावणं देव किं क्रुधा।<br>न रोचते मे वचनं यदि गत्वा करोमि तत् ॥ ३ ॥तब कालनेमिने रावण-से कहा— "देव ! क्रोधकी क्या बात है ? यदि आपको मेरा कथन अच्छा नहीं लगता तो मैं अभी जाकर (आप जैसा कहते हैं) वही करता हूँ" ॥ ३ ॥
इत्युक्त्वा प्रययौ शीघ्रं कालनेमिर्महासुरः ।<br>नोदितो रावणेनैव हनूमद्विघ्नकारणात् ॥ ४ ॥इतना कह महादैत्य कालनेमि रावणकी ही प्रेरणासे हनुमान्जीके कार्यमें विघ्न करनेके लिये वहाँसे तुरन्त चल दिया ॥ ४ ॥
स गत्वा हिमवत्पार्श्वं तपोवनमकल्पयत् ।<br>तत्र शिष्यैः परिवृतो मुनिवेषधरः खलः ॥ ५ ॥<br>गच्छतो मार्गमासाद्य वायुसूनोर्महात्मनः ।उसने हिमालयकी तराईमें पहुँचकर उधरसे जाते हुए वायुपुत्र महात्मा हनुमान्‌के मार्गमें एक तपोवन बनाया और वहाँ वह दुष्ट स्वयं मुनिवेष बनाकर शिष्यवर्गसे घिरकर बैठ गया ।
ततो गत्वा ददर्शाथ हनूमाना श्रमं शुभम् ॥ ६ ॥<br>चिन्तयामास मनसा श्रीमान्पवननन्दनः ।जिस समय हनुमान्जी वहाँ पहुँचे तो उन्होंने वह सुन्दर आश्रम देखा ॥५-६॥ उसे देखकर श्रीमान् पवन-नन्दन मन-ही-मन सोचने लगे,
पुरा न दृष्टमेतन्मे मुनिमण्डलमुत्तमम् ॥ ७ ॥<br>मार्गो विभ्रंशितो वा मे भ्रमो वा चित्तसम्भवः ।'मैंने पहले तो यह उत्तम मुनिमण्डल देखा नहीं था ॥ ७ ॥ क्या मैं मार्ग भूल गया हूँ, या मेरे चित्तमें कोई भ्रम हो गया है ?
यद्वाऽऽविश्याश्रमपदं दृष्ट्वा मुनिमशेषतः ॥ ८ ॥<br>पीत्वा जलं ततो यामि द्रोणाचलमनुत्तमम् ।<br>इत्युक्त्वा प्रविवेशाथ सर्वतो योजनायतम् ॥ ९ ॥<br>आश्रमं कदलीशालखर्जूरपनसादिभिः ।<br>समावृतं पक्वफलैर्नम्रशाखैश्च पादपैः ॥ १० ॥अथवा चलो, इस आश्रममें चलकर सब मुनीश्वरों-का दर्शन करूँ और जल पीऊँ, तदुपरान्त पर्वतश्रेष्ठ द्रोणाचलपर चलूँगा।' ऐसा विचार वे उस आश्रममें गये, वह सब ओरसे एक योजन विस्तारवाला था तथा उसमें सब ओर, पके हुए फलोंसे जिनकी शाखाएँ झुकी हुई हैं ऐसे कदली, शाल, खजूर और कटहल आदिके वृक्ष लगे हुए थे ॥ ८-१० ॥
वैरभावविनिर्मुक्तं शुद्धं निर्मललक्षणम् ।<br>तस्मिन्महाश्रमे रम्ये कालनेमिः स राक्षसः ॥ ११ ॥वह शुद्ध और निर्मल आश्रम वैरभावसे सर्वथा रहित था। उस अति सुरम्य महाश्रममें राक्षस कालनेमि इन्द्रजाल विद्याका आश्रय कर शिवजीका

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२६६अध्यात्मरामायण[ सर्ग ७

इन्द्रयोगं समास्थाय चकार शिवपूजनम् ।
हनूमानभिवाद्याह गौरवेण महासुरम् ॥१२॥

भगवन् रामदूतोऽहं हनूमान्नाम नामतः ।
रामकार्येण महता क्षीराब्धिं गन्तुमुद्यतः ॥१३॥

तृषा मां बाधते ब्रह्मन्नुदकं कुत्र विद्यते ।
यथेच्छं पातुमिच्छामि कथ्यतां मे मुनीश्वर ॥१४॥

तच्छ्रुत्वा मारुतेर्वाक्यं कालनेमिस्तमब्रवीत् ।
कमण्डलुगतं तोयं मम त्वं पातुमर्हसि ॥१५॥

भुङ्क्ष्व चेमानि पक्वानि फलानि तदनन्तरम् ।
निवसस्व सुखेनारत्र निद्रामेहि त्वरास्तु मा ॥१६॥

भूतं भव्यं भविष्यं च जानामि तपसा स्वयम् ।
उत्थितो लक्ष्मणः सर्वे वानरा रामवीक्षिताः ॥१७॥

तच्छ्रुत्वा हनुमानाह कमण्डलुजलेन मे ।
न शाम्यत्यधिका तृष्णा ततो दर्शय मे जलम् ॥१८॥

तथेत्याज्ञापयामास वटुं मायाविकल्पितम् ।
वटो दर्शय विस्तीर्णं वायुसूनोर्जलाशयम् ॥१९॥

निमील्य चाक्षिणी तोयं पीत्वाऽऽगच्छ ममान्तिकम्।
उपदेक्ष्यामि ते मन्त्रं येन द्रक्ष्यसि चौषधीः ॥२०॥

तथेति दर्शितं शीघ्रं वटुना सलिलाशयम् ।
प्रविश्य हनुमांस्तोयमपिबन्मीलितेक्षणः ॥२१॥

ततश्चागत्य मकरी महामाया महाकपिम् ।
अग्रसत्तं महावेगान्मार्कति घोररूपिणी ॥२२॥

ततो ददर्श हनुमान् ग्रसन्तीं मकरीं रुषा ।
दारयामास हस्ताभ्यां वदनं सा ममार ह ॥२३॥

ततोऽन्तरिक्षे ददृशे दिव्यरूपधराङ्गना ।
धान्यमालीति विख्याता हनूमन्तमथाब्रवीत् ॥२४॥

पूजन कर रहा था । हनुमान्‌जीने उस महादैत्यको बड़े गौरवसे नमस्कार कर कहा—॥११-१२॥
"भगवन् ! मैं भगवान् रामका दूत हूँ, मेरा नाम हनुमान् है और मैं श्रीरामचन्द्रजीके एक महान् कार्यसे क्षीर-सागरको जा रहा हूँ ॥१३॥ ब्रह्मन् ! मुझे बहुत प्यास लगी हुई है, मैं खूब जल पीना चाहता हूँ। हे मुनीश्वर ! कृपया बतलाइये यहाँ जल कहाँ है ?" ॥१४॥

हनुमान्‌जीके ये वचन सुनकर कालनेमिने कहा—
"तुम मेरे कमण्डलुका जल पी सकते हो ॥१५॥ यहाँ ये फल मौजूद हैं, इन्हें खाओ और फिर सुखपूर्वक यहाँ विश्राम लेकर कुछ सो लो, ऐसी जल्दी मत करो ॥१६॥ मैं अपने तपोबलसे भूत, भविष्यत् और वर्तमान तीनों कालोंकी बात जानता हूँ। इस समय रामचन्द्रजीके देखनेसे ही लक्ष्मणजी और समस्त वानर-गण सचेत होकर उठ बैठे हैं" ॥१७॥ यह सुनकर हनुमान्‌जीने कहा— "मुझे बड़े जोरकी प्यास लगी हुई है, इस कमण्डलुके जलसे वह शान्त नहीं हो सकती, अतः मुझे जलाशय ही दिखला दीजिये" ॥१८॥

तब 'अच्छी बात है' ऐसा कहकर उसने एक माया-कल्पित ब्रह्मचारीको आज्ञा दी, "ब्रह्मचारिन् ! हनुमान्‌जी-को वह विस्तृत जलाशय दिखला दो" ॥१९॥ (फिर हनुमान्‌जीसे बोला—) "देखो, तुम आँखें मूँदकर जल पीना और फिर तुरन्त मेरे पास चले आना । मैं तुम्हें एक मन्त्रका उपदेश करूँगा, जिससे तुम ओषधिको देख सकोगे" ॥२०॥

तब वटुने 'जो आज्ञा' कह तुरन्त ही जलाशय दिखला दिया। उसमें घुसकर हनुमान्‌जी आँख मूँदकर जल पीने लगे ॥२१॥ इतनेहीमें वहाँ एक महामायाविनी घोररूपिणी मकरी आकर बड़ी शीघ्रतासे महाकपि हनुमान्‌जीको निगलने लगी ॥२२॥ हनुमान्‌जीने उस मकरीको अपनेको निगलते देख अति क्रुद्ध अपने हाथोंसे उसका मुख फाड़ डाला, जिससे तत्काल मर गयी ॥२३॥

इसी समय आकाशमें एक दिव्यरूप स्त्री दिखलायी दी, उसका नाम धान्य-

सर्ग ७ ] युद्धकाण्ड २६९


त्वत्प्रसादादहं शापाद्विमुक्तास्मि कपीश्वर ।
शप्ताऽहं मुनिना पूर्वमप्सरा कारणान्तरे ॥२५॥

आश्रमे यस्तु ते दृष्टः कालनेमिर्महासुरः ।
रावणप्रहितो मार्गे विघ्नं कर्तुं तवानघ ॥२६॥

मुनिवेषधरो नासौ मुनिर्विप्रविहिंसकः ।
जहि दुष्टं गच्छ शीघ्रं द्रोणाचलमनुत्तमम् ॥२७॥

गच्छाम्यहं ब्रह्मलोकं त्वत्स्पर्शाद्धतकल्मषा ।
इत्युक्त्वा सा ययौ स्वर्गं हनूमानप्यथाश्रमम् ॥२८॥

आगतं तं समालोक्य कालनेमिरभाषत ।
किं विलम्बेन महता तव वानरसत्तम ॥२९॥

गृहाण मत्तो मन्त्रांस्त्वं देहि मे गुरुदक्षिणाम् ।
इत्युक्तो हनुमान्मुष्टिं दृढं बद्ध्वाऽऽह राक्षसम् ॥३०॥

गृहाण दक्षिणामेतामित्युक्त्वा निजघान तम् ।
विसृज्य मुनिवेषं स कालनेमिर्महासुरः ॥३१॥

युयुधे वायुपुत्रेण नानामायाविधानतः ।
महामायिकदूतोऽसौ हनूमान्मायिनां रिपुः ॥३२॥

जघान मुष्टिना शीर्ष्णि भग्नमूर्धा ममार सः ।
ततः क्षीरनिधिं गत्वा दृष्ट्वा द्रोणं महागिरिम् ॥३३॥

अदृष्ट्वा चौषधीस्तत्र गिरिमुत्पाट्य सत्वरः ।
गृहीत्वा वायुवेगेन गत्वा रामस्य सन्निधिम् ॥३४॥

उवाच हनुमान् राममानीतोऽयं महागिरिः ।
यद्युक्तं कुरु देवेश विलम्बो नात्र युज्यते ॥३५॥

श्रुत्वा हनूमतो वाक्यं रामः सन्तुष्टमानसः ।
गृहीत्वा चौषधीः शीघ्रं सुषेणेन महामतिः ॥३६॥


हनूमान्‌जीसे बोली—॥२४॥ “हे कपीश्वर ! आपकी कृपासे मैं आज शाप-मुक्त हो गयी। पहले मैं एक अप्सरा थी। किसी कारणवश मुझे एक मुनीश्वरने शाप दिया था। (इसीसे मैं मकरी हो गयी थी) ॥२५॥ इस आश्रममें आपने जिस पुरुषको देखा है वह कालनेमि नामक महादैत्य है। हे अनघ ! इसे रावणने आपके मार्गमें विघ्न डालनेके लिये भेजा है ॥२६॥ यह मुनिवेष धारण करनेवाला वस्तुतः कोई मुनि नहीं है, बल्कि ब्राह्मणोंकी हिंसा करनेवाला है। इस दुष्टको शीघ्र ही मारकर आप पर्वतश्रेष्ठ द्रोणाचलको जाइये ॥२७॥ मैं आपके स्पर्शसे निष्पाप होकर अब ब्रह्मलोकको जाती हूँ।” ऐसा कह वह स्वर्गलोकको चली गयी और हनुमान्‌जी भी आश्रमको चले ॥२८॥

हनूमान्‌जीको आये देख कालनेमिने कहा—"हे वानरश्रेष्ठ ! अब बहुत विलम्ब करनेसे तुम्हें क्या लाभ है? ॥२९॥ लो, मुझसे मन्त्र ग्रहण करो और मुझे गुरुदक्षिणा दो।” उसके इस प्रकार कहनेपर हनुमान्‌जीने अपनी मुट्ठी कसकर बाँधी और उस राक्षससे कहा—॥३०॥ “लो दक्षिणा तो यह लो”—ऐसा कह उसके एक मुक्का मारा। उसके लगते ही महादैत्य कालनेमि मुनिवेष त्यागकर नाना प्रकारकी मायाओंसे पवनपुत्रके साथ लड़ने लगा। किन्तु हनुमान्‌जी तो महामायावी (मायापति भगवान् राम) के दूत और इन तुच्छ मायावी राक्षसोंके शत्रु थे, (उनपर इन तुच्छ मायाओंका क्या प्रभाव हो सकता था?) ॥३१-३२॥ उन्होंने उसके शिरमें एक मुक्का मारा जिससे मस्तक फट जानेके कारण वह तुरन्त मर गया।

तदनन्तर वे क्षीर-समुद्रपर पहुँचे और महापर्वत द्रोणाचलको देखा। किन्तु उन्हें वह ओषधि न मिली। अतः फौरन ही उस पर्वतको उखाड़ लिया और उसे वायुवेगसे रामचन्द्रजीके पास ले जाकर उनसे कहा—"हे देवेश्वर ! मैं इस महापर्वतको ले आया हूँ। आप जो उचित समझें शीघ्र ही करें, इस कार्यमें विलम्ब करना ठीक नहीं है” ॥३३-३५॥

हनूमान्‌जीका यह वचन सुनकर भगवान् राम अति प्रसन्न हुए और उन महामति प्रभुने तुरन्त ही

२६८अध्यात्मरामायण[ सर्ग ७

चिकित्सां कारयामास लक्ष्मणाय महात्मने ।
ततः सुप्तोत्थित इव बुद्ध्वा प्रोवाच लक्ष्मणः ॥३७॥
तिष्ठ तिष्ठ क्व गन्तासि हन्मीदानीं दशानन ।
इति ब्रुवन्तमालोक्य मूर्ध्न्यवघ्राय राघवः ॥३८॥
मारुतिं प्राह वत्साद्य त्वत्प्रसादान्महाकपे ।
निरामयं प्रपश्यामि लक्ष्मणं भ्रातरं मम ॥३९॥
इत्युक्त्वा वानरैः सार्धं सुग्रीवेण समन्वितः ।
विभीषणमतेनैव युद्धाय समवस्थितः ॥४०॥
पाषाणैः पादपैश्चैव पर्वताग्रैश्च वानराः ।
युद्धायाभिमुखा भूत्वा ययुः सर्वे युयुत्सवः ॥४१॥

रावणो विव्यथे रामवाणैर्विद्धो महासुरः ।
मातङ्ग इव सिंहेन गरुडेनेव पन्नगः ॥४२॥
अभिभूतोऽगमद्राजा राघवेण महात्मना ।
सिंहासने समाविश्य राक्षसानिदमब्रवीत् ॥४३॥
मानुषेणैव मे मृत्युमाह पूर्वं पितामहः ।
मानुषो हि न मां हन्तुं शक्तोऽस्ति भुवि कश्चन ॥४४॥
ततो नारायणः साक्षान्मानुषोऽभून्न संशयः ।
रामो दाशरथिर्भूत्वा मां हन्तुं समुपस्थितः ॥४५॥
अनरण्येन यत्पूर्वं शप्तोऽहं राक्षसेश्वर ।
उत्पत्स्यते च मद्बंशे परमात्मा सनातनः ॥४६॥
तेन त्वं पुत्रपौत्रैश्च बान्धवैश्च समन्वितः ।
हनिष्यसे न सन्देह इत्युक्त्वा मां दिवं गतः ॥४७॥
स एव रामः संजातो मदर्थे मां हनिष्यति ।
कुम्भकर्णस्तु मूढात्मा सदा निद्रावशं गतः ॥४८॥
तं विबोध्य महासत्त्वमानयन्तु समान्तिकम् ।
इत्युक्तास्ते महाकायास्तूर्णं गत्वा तु यत्नतः ॥४९॥


उस पर्वतसे ओषधि लेकर सुषेणसे महात्मा लक्ष्मणकी चिकित्सा करायी। तब नींदसे उठे हुएके समान लक्ष्मणजीने सचेत होकर कहा—॥३६-३७॥ "अरे दुष्ट दशानन ! खड़ा रह, खड़ा रह, तू जायगा कहाँ ? मैं तुझे अभी मारे डालता हूँ।" उन्हें इस प्रकार कहते देख रघुनाथजीने उनका शिर सूँघकर हनुमान्जीसे कहा—"हे वत्स ! हे महाकपे ! आज तुम्हारी कृपासे ही मैं अपने भाई लक्ष्मणको सकुशल देख रहा हूँ" ॥३८-३९॥ हनुमान्जीसे इस प्रकार कह श्रीरामचन्द्रजी सुग्रीव और अन्यान्य वानरोंके साथ विभीषणकी सम्मतिसे युद्धकी तैयारी करने लगे ॥४०॥ तब युद्धके लिये अत्यन्त उत्सुक समस्त वानरगण पाषाण, वृक्ष और पर्वतशिखर आदि लेकर लड़नेके लिये चले ॥४१॥

इधर, भगवान् रामके बाणोंसे विद्ध होकर महाराक्षस रावण ऐसा व्याकुल हो रहा था जैसे सिंहसे हाथी और गरुडसे सर्प हो जाता है। अतः वह राक्षसराज महात्मा रामसे परास्त होकर लंकापुरीमें गया और अपने राजसिंहासनपर बैठकर राक्षसोंसे इस प्रकार कहने लगा—॥४२-४३॥ "पूर्वकालमें पितामह ब्रह्माजीने मेरी मृत्यु मनुष्यके ही हाथसे बतलायी थी, किन्तु संसारमें ऐसा कोई मनुष्य नहीं है जो मुझे मार सके ॥४४॥ अतः इसमें सन्देह नहीं साक्षात् नारायणहीने मनुष्यका अवतार लिया है और वे दशरथकुमार राम होकर मुझे मारनेके लिये आये हैं ॥४५॥ पूर्वकालमें मुझे जो अनरण्यने शाप दिया था कि 'हे राक्षसराज ! मेरे वंशमें सनातन पुरुष परमात्मा अवतार लेंगे और उन्हींके हाथसे तुम निःसन्देह अपने पुत्र, पौत्र और बान्धवोंके सहित मारे जाओगे' और ऐसा कहकर वह स्वर्गको चला गया था, सो उन्हीं रामने मेरेलिये अवतार लिया है और ये मुझे अवश्य मारेंगे। हमारा भाई कुम्भकर्ण तो बड़ा ही मूढ़ है, वह सदा ही निद्राके वशीभूत रहता है ॥४६-४८॥ तुम उस महावीरको जगाकर मेरे पास ले आओ।" रावणके इस प्रकार कहनेपर वे महाकाय राक्षसगण तुरन्त ही गये और प्रयत्नपूर्वक कुम्भकर्णको जगाकर

सर्ग ७ ]
युद्धकाण्ड
२६९


विवोध्य कुम्भश्रवणं निन्यू रावणसन्निधिम् ।<br>नमस्कृत्य स राजानमासनोपरि संस्थितः ॥५०॥रावणके पास ले आये । वहाँ पहुँचनेपर वह राजाको प्रणाम कर आसनपर बैठ गया ॥४९-५०॥
तमाह रावणो राजा भ्रातरं दीनया गिरा ।<br>कुम्भकर्ण निबोध त्वं महत्कष्टमुपस्थितम् ॥५१॥तब राजा रावणने अत्यन्त दीन-वाणीसे उस अपने भाईसे कहा—"कुम्भकर्ण ! इस समय हमारे ऊपर बड़ा संकट है, सो तुम सुनो ॥ ५१ ॥
रणे निहताः शूराः पुत्राः पौत्राश्च बान्धवाः ।<br>किं कर्तव्यमिदानीं मे मृत्युकाल उपस्थिते ॥५२॥रामने हमारे बड़े-बड़े वीर, पुत्र, पौत्र और बन्धु-बान्धवगण मार डाले हैं। भाई, इस समय मेरा मृत्युकाल आ गया है, अब मुझे क्या करना चाहिये ॥ ५२ ॥
एष दाशरथी रामः सुग्रीवसहितो बली ।<br>समुद्रं सबलस्तीर्त्वा मूलं नः परिकृन्तति ॥५३॥यह महाबली दशरथकुमार राम सुग्रीवके सहित दलबलके साथ समुद्र पारकर सब ओरसे हमारी जड़ काट रहा है ॥ ५३ ॥
ये राक्षसा मुख्यतमास्ते हता वानरैर्युधि ।<br>वानराणां क्षयं युद्धे न पश्यामि कदाचन ॥५४॥हमारे जो मुख्य-मुख्य राक्षस थे वे सब युद्धमें वानरोंके हाथसे मारे गये, किन्तु इस युद्धमें हमें वानरोंका क्षय होता कभी दिखायी नहीं देता ॥ ५४ ॥
नाशयस्व महाबाहो यदर्थं परिबोधितः ।<br>भ्रातुरर्थे महासत्त्व कुरु कर्म सुदुष्करम् ॥५५॥हे महाबाहो ! तुम इनका नाश करो, मैंने इसीलिये तुम्हें जगाया है । हे महावीर ! अपने भाईके लिये इस दुष्कर कार्यको करो" ॥ ५५ ॥
श्रुत्वा तद्रावणेन्द्रस्य वचनं परिदेवितम् ।<br>कुम्भकर्णो जहासोच्चैर्वचनं चेदमब्रवीत् ॥५६॥राजा रावणके ये दुःखमय वचन सुनकर कुम्भकर्ण बड़े जोरसे ठट्ठा मारकर हँसा और इस प्रकार कहने लगा—॥५६॥
पुरा मन्त्रविचारे ते गदितं यन्मया नृप ।<br>तदद्य त्वामुपगतं फलं पापस्य कर्मणः ॥५७॥"राजन् ! आपने जब पहले सम्मतिकी थी उस समय मैंने जो कुछ कहा था आपके पापका वह फल आज उपस्थित हो ही गया ॥ ५७ ॥
पूर्वमेव मया प्रोक्तो रामो नारायणः परः ।<br>सीता च योगमायेति बोधितोऽपि न बुध्यसे ॥५८॥मैंने तो आपसे पहले ही कहा था कि राम साक्षात् परब्रह्म नारायण हैं और सीताजी योगमाया हैं, किन्तु आप तो समझानेपर भी नहीं समझते ॥ ५८ ॥
एकदाऽहं वने सानौ विशालायां स्थितो निशि ।<br>दृष्टो मया मुनिः साक्षान्नारदो दिव्यदर्शनः ॥५९॥एक दिन मैं रात्रिके समय वनमें एक विशाल शिलापर बैठा था । इसी समय मैंने दिव्यमूर्ति साक्षात् नारद मुनिको देखा ॥ ५९ ॥
तमब्रुवं महाभाग कुतो गन्तासि मे वद ।<br>इत्युक्तो नारदः प्राह देवानां मन्त्रणे स्थितः ॥६०॥उन्हें देखकर मैंने कहा—"हे महाभाग ! कहिये, इस समय आप कहाँ जा रहे हैं ।" मेरे इस प्रकार पूछनेपर नारदजीने कहा—"मैं अभीतक देवताओं-
तत्रोत्पन्नमुदन्तं ते वक्ष्यामि शृणु तत्त्वतः ।<br>युवाभ्यां पीडिता देवाः सर्वे विष्णुमुपागताः ॥६१॥की एक गुप्त गोष्ठीमें था ॥ ६० ॥ वहाँ जो कुछ हुआ वह मैं तुम्हें ज्यों-का-त्यों सुनाता हूँ । तुम दोनों भाइयोंसे अत्यन्त पीड़ित होकर समस्त देवगण विष्णु-
ऊचुस्ते देवदेवेशं स्तुत्वा भक्त्या समाहिताः ।<br>जहि रावणमक्षोभ्यं देव त्रैलोक्यकण्टकम् ॥ ६२ ॥भगवान्‌के पास गये ॥ ६१ ॥ और उन देवदेवेश्वरकी अत्यन्त भक्ति और एकाग्रतासे स्तुति कर कहने लगे-