अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
पृष्ठ 67, कुल 423 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४६ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग २ |
|---|
| रत्नासने समावेश्य पादौ प्रक्षाल्य भक्तितः । | तब रघुनाथजीने गुरुजीको रत्नसिंहासनपर बैठा- |
| तदपः शिरसा धृत्वा सीतया सह राघवः ॥२०॥ | कर उनके चरण धोये और सीताजीके सहित उस |
| धन्योऽस्मीत्यब्रवीद्रामस्तव पादाम्बुधारणात् । | चरणोदकको भक्तिपूर्वक अपने शिरपर रखकर कहा- |
| श्रीरामेणैवमुक्तस्तु प्रहसनमुनिरब्रवीत् ॥२१॥ | "हे मुने ! आपके चरणोदकको धारण कर आज मैं |
| त्वत्पादसलिलं धृत्वा धन्योऽभूद्गिरिजापतिः । | कृतकृत्य हो गया।" भगवान् रामके इस प्रकार कहने- |
| ब्रह्मापि मत्पिता ते हि पादतीर्थहताशुभः ॥२२॥ | पर मुनिवर वसिष्ठने हँसकर कहा ॥ २०-२१ ॥ "हे |
| इदानीं भाषसे यत्त्वं लोकानामुपदेशकूत् । | राम ! आपके पादोदकको मस्तकपर धारण कर पार्वती- |
| जानामि त्वां परात्मानं लक्ष्म्या संजातमीश्वरम् २३ | वल्लभ भगवान् शंकर धन्य-धन्य हो गये तथा मेरे |
| देवकार्यार्थसिद्धयर्थं भक्तानां भक्तिसिद्धये । | पिता ब्रह्माजी भी आपके पादतीर्थका सेवन करनेसे ही |
| रावणस्य वधार्थाय जातं जानामि राघव ॥२४॥ | निष्पाप हो गये हैं ॥ २२ ॥ इस समय केवल संसारको |
| तथापि देवकार्यार्थं गुह्यं नोद्घाटयाम्यहम् । | यह उपदेश करनेके लिये ही कि 'गुरुके साथ किस |
| यथा त्वं मायया सर्वं करोषि रघुनन्दन ॥२५॥ | प्रकार व्यवहार करना चाहिये' आप इस प्रकार |
| तथैवानुविधास्येऽहं शिष्यस्त्वं गुरुरप्यहम् । | सम्भाषण कर रहे हैं। मैं भली प्रकार जानता हूँ |
| गुरुर्गुरूणां त्वं देव पितॄणां त्वं पितामहः ॥२६॥ | आप लक्ष्मीके सहित प्रकट हुए साक्षात् परमात्मा विष्णु |
| अन्तर्यामी जगद्यात्रावाहकस्त्वमगोचरः । | हैं॥ २३ ॥ हे राघव ! मैं जानता हूँ आपने देवताओंका |
| शुद्धसत्त्वमयं देहं धृत्वा स्वाधीनसम्भवम् ॥२७॥ | कार्य सिद्ध करनेके लिये, भक्तोंको भक्ति प्रदान करनेके |
| मनुष्य इव लोकेऽस्मिन् भासि त्वं योगमायया । | लिये और रावणका वध करनेके लिये ही अवतार लिया |
| पौरोहित्यमहं जाने विगर्ह्यं दूष्यजीवनम् ॥२८॥ | है ॥ २४ ॥ तथापि देवताओंके कार्य-सिद्धिके लिये |
| इक्ष्वाकूणां कुले रामः परमात्मा जनिष्यते । | मैं इस गुप्त रहस्यको प्रकट नहीं करता। हे रघुनन्दन ! |
| इति ज्ञातं मया पूर्वं ब्रह्मणा कथितं पुरा ॥२९॥ | जिस प्रकार मायाके आश्रयसे आप सब कार्य करेंगे |
| ततोऽहमाशया राम तव सम्बन्धकाङ्क्षया । | उसी प्रकार मैं भी 'तुम शिष्य हो और मैं गुरु हूँ' इस |
| अकार्षं गर्हितमपि तवाचार्यत्वसिद्धये ॥३०॥ | सम्बन्धके अनुकूल व्यवहार करूँगा । किन्तु हे देव ! |
| ततो मनोरथो मेऽद्य फलितो रघुनन्दन । | वास्तवमें तो आप ही गुरुओंके गुरु और पितृगणोंके |
| त्वदधीना महामाया सर्वलोकैकमोहिनी ॥३१॥ | भी पितामह हैं ॥ २५-२६ ॥ आप अन्तर्यामी, |
| मां यथा मोहयेन्नैव तथा कुरु रघूद्वह । | जगद्व्यवहारके प्रवर्त्तक और मन-वाणीके अविषय हैं; |
| गुरुनिष्कृतिकामस्त्वं यदि देह्येतदेव मे ॥३२॥ | और स्वेच्छासे यह शुद्ध सत्त्वमय शरीर धारण कर इस |
| | लोकमें अपनी योगमायासे मनुष्यके समान प्रतीत होते |
| | हैं। मैं यह जानता हूँ कि पुरोहिताई अति निन्दनीय |
| | और दूषित जीविका है ॥ २७-२८ ॥ तो भी जब |
| | पूर्वकालमें ब्रह्माजीके कहनेसे मुझे यह मालूम हुआ कि |
| | इक्ष्वाकुवंशमें परमात्मा राम अवतार लेंगे ॥ २९ ॥ तब |
| | हे राम ! आपसे सम्बन्ध जोड़नेकी इच्छासे आपका |
| | आचार्य बननेके लिये इस निन्दनीय पदको भी मैंने |
| | स्वीकार कर लिया ॥ ३० ॥ हे रघुनन्दन ! आज मेरी |
| | इच्छा पूर्ण हो गयी । अब यदि आप गुरुऋणसे |
| | उऋण होना चाहते हैं तो मुझे यही दीजिये कि |
| | आपके अधीन रहनेवाली आपकी सर्वलोकविमोहिनी |
| | महामाया मुझे मोहित न करे ॥ ३१-३२ ॥ हे |