१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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ध्यानबिन्दूपनिषत् ] [ २८३
और अग्नि का एक के ऊपर एक करके दर्शन करे। कमल के विकसित
होने से सूर्य, चन्द्र, अग्नि का बोध होता है। इनके बीज को ग्रहण करने
से स्थिर आत्म-स्थिति प्राप्त होती है ॥ ३४-३५ ॥
त्रिस्थानं च त्रिमागं च त्रिब्रह्मा च त्रयाक्षरम् ।
त्रिमात्रमर्धमात्रं वा यस्तं वेद स वेदवित् ॥३६
तैलधारामिवाच्छिन्नं दीर्घघण्टानिनादवत् ।
अवाच्यं प्रणवस्याग्रं यस्तं वेद स वेदवित् ॥३७
यथै वोत्पलनालेन तोयमाकर्षयेन्नरः ।
तथै वोत्कर्षयेद्वायुं योगी योगपथे स्थितः ॥३८
अर्धमात्रात्मकं कृत्वा कोशभूतं तु पङ्कजम् ।
कर्षयेन्नालमात्रेण भ्रुवोर्मध्ये लयं नयेत् ॥३६
भ्रू मध्ये तु ललाटे तु नासिकायास्तु मूलतः ।
जानीयादमृतस्थानं तद्ब्रह्मायतनं महत् ॥४०
तीन स्थान, तीन पात्र; तीन ब्रह्मा, तीन अक्षर, तीन मात्रा
और अर्धमात्रा में जो इनको जानता है वह वेदज्ञ है ॥ ३३ ॥ तेल की
धार के समान अविच्छन्न और दीर्घ घण्टानिनाद के सदृश्य विन्दु,
नाद, कला से अतीत को जो जानता है वह वेदज्ञ है ॥ ३७ ॥ जिस
प्रकार कमल की नाल से जल को खींच लिया जाता है, उसी प्रकार
वायु को खींचकर योगी योग साधन करे ॥ ३८ ॥ सम्पुटित कमल को
अर्धमात्रा रूप करके वायु को सुषुम्ना द्वारा खींचकर भ्रुकुटी स्थान में
लय करे ॥ ३६ ॥ भौंहों के मध्य में ललाट स्थान में, जहाँ नासिका
का मूल है, वहाँ पर अमृत स्थान है, वही ब्रह्म का महान् स्थान
है ॥ ४० ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
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२८४ ] [ ध्यानबिन्दूपनिषत्
आसनं प्राणसंरोधः प्रत्याहारश्च धारणा ।
ध्यानं समाधिरेतानि योगाङ्गानि भवन्ति षट् ॥४१
आसनानि च तावन्ति यावन्त्यो जीवजातयः ।
एतेषामतुलान्भेदान् विजानाति महेश्वरः ॥४२
सिद्धं भद्रं तथा सिंहं पद्मं चेति चतुष्टयम् ।
आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम् ॥४३
योनिस्यानं तयोर्मध्ये कामरूपं निगद्यते ।
आधाराख्ये गुदस्थाने पङ्कजं यच्चतुर्दलम् ॥४४
तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्धवन्दिता ।
योनिमध्ये स्थितं लिंगं पश्चिमाभिमुखं तथा ॥४५
आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—
ये योग के छः अंग हैं ॥ ४१ ॥ संसार में जितनी जीव योनियाँ हैं
उतने ही प्रकार के आसन हैं, इनके बहुसंख्यक भेदों को महेश्वर ही
जानते हैं ॥ ४२ ॥ सिद्ध, भद्र, सिंह, पद्म चार मुख्य आसन हैं । प्रथम
चक्र आधार है और दूसरा स्वाधिष्ठान है ॥ ४३ ॥ इन दोनों के मध्य
में कामरूप योनिस्यान है । गुदास्थान में जो आधार-चक्र है उसमें
चार दल वाला कमल है । उसके मध्य में काम नाम वाली योनि है
जिसकी वन्दना सिद्ध करते हैं । योनि के मध्य में पश्चिमाभिमुख लिङ्ग
वर्तमान है ॥ ४४-४५ ॥
मस्तके मणिवद्भिन्नं यो जानाति स योगवित् ।
तप्तचामीकराकरं तडिल्लेखेव विस्फुरत् ॥४६
चतुरस्रमुपर्यग्नेरधो मेढ्रात्प्रतिष्ठितम् ।
स्वशब्देन भवेत्प्राणः स्वाधिष्ठानं तदाश्रयम् ॥४७
स्वाधिष्ठानं ततश्चक्रं मेढ्रमेव निगद्यते ।
मणिवत्तन्तुना यद्वत्वायुना पूरितं वपुः ॥४८
ध्यानबिन्दूपनिषत् [ २८५
तन्नाभिमण्डलं चक्रं प्रोच्यते मणिपूरकम् ।
द्वादशारमहाचक्रे पुण्यपापनियन्त्रितः ॥४६
तावज्जीवो भ्रमत्येवं यावत्तत्त्वं न विन्दति ।
ऊर्ध्वं मेढ्रादधो नाभेः कन्दो योऽस्ति खगाण्डवत् ॥५०
तत्र नाड्यः समुत्पन्नाः सहस्राणि द्विसप्ततिः ।
तेषु नाडीसहस्रेषु द्विसप्ततिरुदाहृता ॥५१
उसके मस्तक में जो मणि के समान प्रकाश है उसे योगीजन
ही जानते हैं । तप्त सुवर्ण के से वर्ण वाला और बिजली की धारा के
समान सुप्रकाशित, अग्नि स्थान से चार अंगुल ऊर्ध्व और मेढ्र स्थान
के नीचे स्वशब्दयुक्त प्राण स्थित है, जो स्वाधिष्ठान चक्र के आश्रय में
रहता है ॥ ४६-४७ ॥ मेढ्र के मूल में स्वाधिष्ठान चक्र है। वहाँ
मणि के तन्तु के समान वायु से पूर्ण शरीर है ॥ ४८ ॥ नाभिमण्डल
में जो चक्र है वह मणिपूरक कहा जाता है । वहीं पर बारह आरा वाले
महाचक्र में पुण्य-पाप का नियंत्रण होता है ॥ ४६ ॥ जब तक जीव
इस तत्व को नहीं जान लेता तब तक उसे भ्रमते रहना पड़ता है ।
मेढ्र से ऊपर और नाभि से नीचे पक्षी के अण्डे के आकार वाला कन्द है,
उसी से बहत्तर हजार नाड़ियां निकली हैं, जिनमें से बहत्तर को मुख्य
कहा गया है ॥ ५०-५१ ॥
प्रधानाः प्राणवाहिन्यो भूयस्तत्र दश स्मृताः ।
इडा च पिंगला चैव सुषुम्ना च तृतीयका ॥५२
गान्धारी हस्तिजिह्वा च पूषा चैव यशस्विनी ।
अलम्बुसा कुहुरत्र शङ्खिनी दशमी स्मृता ॥५३
एवं नाडीमयं चक्रं विज्ञेयं योगिनां सदा ।
सततं प्राणवाहिन्यः सोमसूर्याग्निदेवताः ॥५४
इडापिंगलासुषुम्नास्तिस्रो नाड्यः प्रकीर्तिताः ।
इडा वामे स्थिता नाडी पिङ्गला दक्षिणे स्थिता ॥५५
२८६ ] [ ध्यानबिन्दूपनिष
सुषुम्ना मध्य देशस्था प्राणमार्गस्त्रयः स्मृताः ।
प्राणोऽपानः समानश्चोदानो व्यानस्तथैव च ॥५६
नागः कूर्मः कृकरको देवदत्तो धनंजयः ।
प्राणाद्याः पञ्च विख्याता नागाद्याः पञ्च वायवः ॥५७
इन बहत्तर में से दश प्रधान नाड़ियां प्राण को चलाने वाली
कही गई हैं जो इस प्रकार हैं—इड़ा, पिङ्गला, सुषुम्ना, गान्धारी,
हस्तिजिह्वा, पूषा, यशस्विनी, अलम्बुसा, कुहू और शङ्खिनी ॥ ५२—
५३ ॥ योगियों को इस नाड़ी-चक्र का ज्ञान होना परमावश्यक है।
इनमें इड़ा, पिङ्गला और सुषुम्ना ये तीन नाड़ियाँ सूर्य, चन्द्र, अग्नि
देवताओं द्वारा प्रतिष्ठित हैं और प्राण सदैव इन्हीं में चला करता है।
इड़ा बाँयी ओर, पिङ्गला दाहिनी ओर, सुषुम्ना दोनों के मध्य में स्थित
है, ये तीनों प्राण के मार्ग स्वरूप हैं। प्राण, अपान, समान, उदान,
व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त, धनञ्जय—इस प्रकार ये प्राणादि
पांच और नागादि पाँच वायु प्रसिद्ध हैं ॥ ५४—५७ ॥
एते नाडीसहस्रेषुवर्तन्ते जीवरूपिणः ।
प्राणापानवशो जीवो ह्यधश्चोर्ध्वं व धावति ॥५८
वामदक्षिणमार्गेण चञ्चलत्वान्न दृश्यते ।
आक्षिप्तो भुजदण्डेन यथोच्चलति कन्दुकः ॥५९
प्राणापानसमाक्षिप्तस्तद्वज्जीवो न विश्रमेत् ।
अपानात्कर्षति प्राणोऽपानः प्राणाच्च कर्षति ॥६०
खगरज्जुवदित्येतद्यो जानाति स योगवित् ।
हकारेण बहिर्याति सकारेण विशेत्पुनः ॥६१
हंसहंसेत्यमुं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा ।
शतानि षड् दिवारात्रं सहस्राण्येकविंशतिः ॥६२
ध्यानबिन्दूपनिषत् [ २८७
एतत्संख्याऽन्वितं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा ।
अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्षदा सदा ॥६३
इस प्रकार ये वायु जीव रूप से सहस्रों नाड़ियों में रहते हैं ।
प्राण और वायुओं के वश में पड़कर जीव ऊपर नीचे आता-जाता रहता
है । वह कभी बाएँ और कभी दाहिने मार्ग से चलता है, पर चञ्चल
होने से दिखाई नहीं पड़ता । जैसे हाथों से इधर-उधर फेंकी हुई गेंद
दौड़ती रहती है, इसी प्रकार प्राण और अपान वायुओं के फेंकने से
जीव को कहीं विश्राम का स्थान नहीं मिलता । अपान प्राण को खींचता
है और प्राण अपान को खींचता है, उसी प्रकार जैसे रस्सी में बँधा
हुआ पक्षी खींच लिया जाता है । इस रहस्य को जो जानता है वह
योगी है । यह प्राण 'ह'कार ध्वनि द्वारा बाहर जाता है और 'स'कार
से भीतर आता है । इस प्रकार जीव सदा 'हँस-हँस' मन्त्र का जप
करता रहता है और एक दिन रात्रि में इस जप की संख्या इक्कीस
हजार छः सौ होती है । इसको अजपा गायत्री कहते हैं, यह योगियों
के लिए मोक्ष प्रदायिनी है ॥ ६०—६३ ॥
अस्याः संकल्पमात्रेण नरः पापैः प्रमुच्यते ।
अनया सदृशो विद्या अनया सदृशो जपः ॥६४
अनया सदृशं पुण्यं न भूतं न भविष्यति ।
येन मार्गेण गन्तव्यं ब्रह्मस्थानं निरामयम् ॥६५
मुखेनाच्छाद्यं तद्द्वारं प्रसुप्ता परमेश्वरी ।
प्रबुद्धा वह्नियोगेन मनसा मरुता सह ॥६६
सूचिवद्गुणमादाय प्रजत्यूर्ध्वं सुषुम्नया ।
उद्घाटयेत्कपाटं तु यथा कुञ्चिकया हठात् ॥६७
कुण्डलिन्या तथा योगी मोक्षद्वारं विभेदयेत् ॥६८
२८८ ] [ अमृतबिन्दूपनि
कृत्वा संपुटितौ करौ दृढतरं बध्वाऽथ पद्मासनं
गाढं वक्षसि सन्निधाय चुबुकं ध्यानं च तच्चेतसि ।
वारंवारमपानमूर्ध्वमनिलं प्रोच्चारयन्पूरितं
मुञ्चन्प्राणमुपैति बोधमतुलं शक्ति प्रभावान्नरः ॥६६॥
पद्मासनस्थितो योगी नाडीद्वारेषु पूरयन् ।
मारुतं कुम्भयन्यस्तु स मुक्तो नात्र संशयः ॥७०
इस अजपा गायत्री के संकल्प मात्र से मनुष्य पापों से छूट जाता
है। न तो इसके समान कोई विद्या है, न जप है, न कोई पुण्य है, न हो
सकता है। इसके द्वारा मनुष्य बिना कठिनाई के ब्रह्म-स्थान तक पहुँच
जाता है ॥ ६४-६५ ॥ परमेश्वरी-शक्ति उस मार्ग को अपने मुख
से ढक कर सोई हुई है। वह वह्नियोग द्वारा जागृत होती है और तब
सुषुम्ना में मन और प्राण वायु सहित ऊपर जाती है, उसी प्रकार जैसे
सुई तागे को ले जाती है और जैसे ताली से द्वार को खोल लिया जाता
है वैसे ही योगी कुण्डलिनी शक्ति द्वारा मोक्ष द्वार को खोलते हैं ॥ ६६-
६८ ॥ हाथों को सम्पुटित करके, दृढ़तापूर्वक पद्मासन लगाकर, ठोड़ी
से उरु प्रदेश को मजबूती से दबाकर, ब्रह्म का चित्त में ध्यान करते हुए,
अपान वायु को बारम्बार ऊपर की ओर चलाता हुआ और खींची
हुई प्राणवायु को नीचे लेता हुआ साधक कुण्डलिनी शक्ति के प्रभाव को
अनुभव करता है ॥ ६९ ॥ जो योगी पद्मासन पर स्थित होकर
नाड़ियों में वायु को भर कर कुम्भक द्वारा रोकता है वह निःसंशय रूप से
मुक्ति पाता है ॥ ७० ॥
अङ्गानां मर्दन कृत्वा श्रमजातेन वारिणा ।
कट्वम्ललवणत्यागी क्षीरपानरतः सुखी ॥७१
ब्रह्मचारी मिताहारी योगी योगपरायणः ।
अब्दादूर्ध्वं भवेत्सिद्धो नात्र कार्या विचारणा ॥७२
ध्यानबिन्दूपनिषद् In Public Domain. Digitization by eGangotri २८१
कन्दोर्ध्वकुण्डलीशक्तिः स योगी सिद्धिभाजनम् ।
अपानप्राणयोरैक्यं क्षयान्मूत्रपुरीषयोः ॥ ७३
युवा भवति वृद्धोऽपि सततं मूलबन्धनात् ।
पाष्णिभागेन संपीड्य योनिमाकुञ्चयेद्गुदम् ॥ ७४
अपानमूर्ध्वमुत्कृष्य मूलबन्धोऽयमुच्यते ।
उड्याणं कुरुते यस्मादविश्रान्तंमहाखगः ॥ ७५
उड्डियाणं तदेव स्यात्तत्र बन्धो विधीयते ।
उदरे पश्चिमं ताणं नाभेरुर्ध्वं तु कारयेत् ॥ ७६
श्रम करने से जो पसीना निकले उसे शरीर में ही मल लेना
चाहिये; कटु, अम्ल और नमक को त्याग कर दूध का भोजन करना
चाहिये । इस प्रकार साधन करने वाला मिताहारी, ब्रह्मचारी योगी
एक वर्ष के भीतर सिद्धि प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं ॥७१-७२॥
कन्द के ऊर्ध्वभाग में रहने वाली कुण्डलिनी द्वारा योगी निश्चय रूप से
सिद्ध होता है । नियमित रूप से मूलबन्ध का अभ्यास करने से प्राण
और अपान की एकता होती है, मल-मूत्र कम हो जाता है और वृद्ध
भी युवा हो जाता है । एड़ी से योनि स्थान को दबा कर गुदा को
आकुञ्चित करे और अपानवायु को ऊपर की तरफ खींचे । इसको
मूलबन्ध कहते हैं । अब उड्डियाण की विधि कहते हैं कि जिस प्रकार
महाखग विश्राम करता है उस प्रकार होकर उदर की पश्चिम 'ताण' को
नाभि के ऊपर करे ॥७३-७६॥
उड्डियाणोऽप्ययं बन्धो मृत्युमातङ्गकेसरी ।
बध्नाति हि शिरोजात्मधोगामिनभोजलम् ॥ ७२
ततो जालन्धरो बन्धः कण्ठदुःखौघनाशनः ।
जालन्धरे कृते बन्धे कण्ठसंकोचलक्षणे ॥ ७८
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२६० ] [ ध्यानबिन्दूपनिषत्
न पीयूषं पतत्यग्नौ न च वायुः प्रधावति ।
कपालकुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा ॥ ७६
भ्रुवोरन्तर्गता दृष्टिर्मुद्रा भवति खेचरी ।
न रोगो मरणं तस्य न निद्रा न क्षुधा तृषा ॥ ८०
यह उड्डियाण बन्ध मृत्यु के लिये ऐसा ही है जैसे हाथी के लिए
सिंह । अब जालन्धर बन्ध को कहते हैं जिससे शिरोकाश से उत्पन्न
होने वाले जल ( अमृत ) को ऊपर ही रोक दिया जाता है और इस
प्रकार कर्म बन्धन और क्लेशों को निवारण किया जाता है । जालन्धर
बन्ध में कण्ठ का संकोचन किया जाता है जिससे अमृत अग्नि में नहीं
गिरता और वायु नहीं दौड़ता । अब खेचरी को बतलाते हैं कि जिह्वा
को लोटाकर कपाल कुहर में ले जाय और दोनों भौंहों के मध्य में
दृष्टि जमाकर रखे । इसके अभ्यास से रोग और मरण का भय जाता
रहता है और निद्रा, भूख, प्यास भी नहीं सताती ॥८०॥
न च मूर्च्छा भवेत्तस्य यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम् ।
पीड्यते न च रोगेण लिप्यते न च कर्मणा ॥ ८१
बध्यते न च कालेन यस्य मुद्राऽस्ति खेचरी ।
चित्तं चरति खे यस्माज्जिह्वा भवति खेगता ॥ ८२
तेनैषा खेचरी नाम मुद्रा. सिद्धनमस्कृता ।
खेचर्या मुद्रया यस्य विवरं लम्बि कोर्ध्वतः ॥ ८३
बिन्दुः क्षरति नो यस्य कामिन्यालिङ्गितस्य च ।
यावद्विन्दुः स्थितो देहे तावन्मृत्युभयं कुतः ॥ ८४
यावद्बद्धा नभोमुद्रा तावद्विन्दुर्न गच्छति ।
गलितोऽपि यदा बिन्दुः संप्राप्तो योनिमण्डले ॥ ८५
व्रजत्यूर्ध्वं हठाच्छक्त्या निबद्धो योनिमुद्रया ।
स एव द्विविधो बिन्दुः पाण्डरो लोहितस्तथा ॥ ८६
पाण्डरं शुक्लम इत्याहुर्लोहिताख्यं महारजः ।
विद्रुमद्रुमसंकाशं योनिस्थाने स्थितं रजः ॥ ८७
शशिस्थाने वसेद्विन्दुस्तयोरैक्यं सुदुर्लभम् ।
बिन्दुः शिवो रजः शक्तिर्बिन्दुरिन्दू रजो रविः ॥ ८८
जो खेचरी को जानता है उसे मूर्छा नहीं होती, न रोगों से
पीड़ित होता है, न कर्मों में लिप्त रहता है। जिसका चित्त खेचरी मुद्रा
के साधन से आकाश में रहता है और जिह्वा की आकाशगामिनी
होती है वह काल के बन्धन में नहीं पड़ता ॥८१-८२॥ इसलिए इस
खेचरी मुद्रा को सिद्ध योगी नमस्कार करते हैं। खेचरी मुद्रा द्वारा
जिसने तालू के छेद को बन्द कर लिया है, उसका वीर्य क्षय नहीं होता
चाहे वह स्त्री का आलिंगन ही क्यों न करे और जब तक वीर्य देह में
स्थित है तब तक मृत्यु का भय कैसा ? ॥८३-८४॥ जब तक खेचरी
मुद्रा रहेगी तब तक वीर्य पतन नहीं हो सकता और यदि किसी प्रकार
वीर्य स्खलित होकर योनिस्थान में चला भी जाय तो योनिमुद्रा द्वारा
उसे शक्तिपूर्वक फिर ऊपर की तरफ खींच लिया जाता है। वह वीर्य
श्वेत तथा रक्तवर्ण—दो प्रकार का होता है। श्वेतवर्ण वाला शुक्ल
कहा जाता है और लाल रङ्ग वाला महाराज कहलाता है। मूंगे के
समान रङ्ग वाला रज (योगी के) योनि स्थान में स्थित है और
शुक्ल चन्द्रस्थान में रहता है। उन दोनों का एक होना बड़ा कठिन है।
शुक्ल शिव रूप है और रज शक्ति रूप है, वीर्य चन्द्रमा है और रज सूर्य
है ॥८५-८८॥
उभयोः संगमादेव प्राप्यते परमं वपुः ।
वायुना शक्ति चालेन प्रेरितं खे यथा रजः ॥ ८९
रविणैकत्वमायाति भवेद्दिव्यवपुस्तदा ।
शुक्लं चन्द्रेण संयुक्तं रजः सूर्यसमन्वितम् ॥ ६०
द्वयोः समरसीभावं यो जानाति स योगवित् ।
शोधनं मलजालानां घटनं चन्द्रसूर्ययोः ॥ ६१
रसानां शोषणं सम्यङ् महामुद्राऽभिधीयते ॥ ६२
वक्षोन्यस्तहनुर्निपीड्य सुषिरं योनेश्च वामाङ्घ्रिणा ।
हस्ताभ्यामनुधारयन् प्रविततं पादं तथा दक्षिणम् ।
आपूर्य श्वसनेन कुक्षियुगलं बध्वा शनै रेचये—
देषा पातक नाशिनी ननु महामुद्रा नृणां प्रोच्यते ॥ ६३
इन दोनों के संयोग से परम देह प्राप्त होती है । वायु द्वारा
शक्ति को चलित करने से जब रज आकाश को प्रेरित होता है और
सूर्य के साथ मिल जाता है तब शरीर दिव्य हो जाता है । शुक्ल वर्ण
बिन्दु चन्द्रमा से संयुक्त है और रज सूर्य से समन्वित है, जो इन दोनों
की समरसता ( एकता ) को जाता है वह योगवित् है । मलों के
शोधन के लिए चन्द्र और सूर्य का संयोग किया जाता है । अब रसों
का सम्यक प्रकार शोषण करने वाली महामुद्रा को कहते हैं । छाती
को ठोड़ी से दबाकर और बांयी एड़ी से योनिस्थान को दबाकर तथा
फैलाये हुए दूसरे पैर को पकड़ कर, दोनों कुक्षियों को बांधकर भरी
हुई श्वास को धीरे-धीरे छोड़े—इसको पापनाशिनी महामुद्रा कहा जाता
है ॥५६-६३॥
अथात्मनिर्णयं व्याख्यास्ये—हृदि स्थाने अष्टदलपद्मं वर्तते
तन्मध्ये रेखावलयं कृत्वा जीवात्मरूपं ज्योतीरूपमणुमात्रं वर्तते ।
तस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितं भवति सर्वं जानाति सर्वं करोति सर्वमेतच्च-
ध्यानबिन्दूपनिषत् [२६३]
रितमहं कर्ताऽहं भोक्ता सुखी दुःखी काणः खंजो बधिरो मूकः
कृशः स्थूलोऽनेन प्रकारेण स्वतन्त्रवादेन वर्तते । पूर्वदले विश्र-
मते पूर्वदलं श्वेतवर्णं तदा भक्तिपुरः सरं धर्मे मतिर्भवति ।
यदाऽऽग्नेयदले विश्रमते तदाग्नेयदलं रक्तवर्णं तदा निद्रालस्य-
मतिर्भवति । यदा दक्षिणदले विश्रमते तद्दक्षिणदलं कृष्णवर्णं
तदा द्वेषकोपमतिर्भवति । यदा नैर्ऋतदले विश्रमते तन्नैर्ऋत-
दलं नीलवर्णं तदा पापकर्महिंसामतिर्भवति ॥ यदा पश्चिम-
दले विश्रमते तत्पश्चिमदलं स्फटिकवर्णं तदा क्रीडा विनोदमति-
र्भवति । यदा वायव्यदले विश्रमते वायव्यदलं माणिक्यवर्णं
तदा गमन चालनवैराग्यमतिर्भवति । यदोत्तरदले विश्रमते
तदुत्तरदलं पीतवर्णं तदा सुखशृङ्गारमतिर्भवति । यदेशानदले
विश्रमते तदीशानदलं वैडूर्यवर्णं तदा दानादिकृपामतिर्भवति ।
यदा संधिसंधिषु मतिर्भवति तदा वातपित्तश्लेष्ममहाव्याधि
प्रकोपॊ भवति । यदा मध्ये तिष्ठति तदा सर्वं जानाति गायति
नृत्यति पठत्यानन्दं करोति । यदा नेत्रश्रमो भवति श्रमनिर्ह-
रणार्थं प्रथमरेखावलयं कृत्वा मध्ये किमज्जनं कुरुते प्रथम-
रेखा बन्धूकपुष्पवर्णं तदा निद्रावस्था भवति । निद्रावस्थामध्ये
स्वप्नावस्था भवति । स्वप्नावस्थामध्ये दृष्टं श्रुतमनुमानसंभव-
वार्ता इत्यादिकल्पनां करोति तदादिश्रमो भवति । श्रमनिर्ह-
रणार्थं द्वितीयरेखावलयं कृत्वा मध्ये निमज्जनं कुरुते द्वितीय-
रेखा इन्द्रकोपवर्णं तदा सुषुप्त्यावस्था भवति सुषुप्तौ केवल-
परमेश्वरसम्बन्धिनी बुद्धिर्भवति नित्यबोधस्वरूपा भवति पश्चा-
त्परमेश्वररूपेण प्राप्तिर्भवति । तृतियरेखावलयं कृत्वा मध्ये
निमज्जनं कुरुते तृतीयरेखा पद्मरागवर्णं तदा तुरीयावस्था
भवति तुरीये केवलपरमात्म संबन्धिनी मतिर्भवति नित्यबोध-
स्वरूपो भवति तदा ॥
२६४ ध्यानबिन्दूपनिषत्
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥
तदा प्राणापानयोरैक्यं कृत्वा सर्वं विश्वमात्मस्वरूपेण लक्ष्यं
धारयति यदा तुरीयातीतावस्था तदा सर्वेषामानन्दस्वरूपो भवति
द्वन्द्वातीतो भवति यावद्देहधारणा वर्तते तावत्तिष्ठति पश्चात्परमा-
त्मस्वरूपेण प्राप्तिर्भवति इत्यनेन प्रकारेण मोक्षो भवतीदमेवा-
त्मदर्शनोपायं भवति ॥ -
चतुष्पथसमायुक्तमहाद्वारगवायुना ।
सहस्थित त्रिकोणोर्ध्वगमने दृश्यतेच्युतः ॥ ९४
अब आत्मा के निर्णय के विषय में विचार करते हैं । हृदय
स्थान में अष्टदल कमल है, उसमें रेखाओं का आश्रय लेकर जीवात्मा
ज्योतिरूप अणुमात्र रूप में रहता है । उसी में सब कुछ प्रतिष्ठित है,
वही सब कुछ जानता है, सब कुछ करता है । वही ऐसा विचार करता
है कि मैं सब चरित्रों का करता हूँ, भोक्ता हूँ, सुखी, दुखी, काना
खंज, बहिरा, गूँगा, दुबला, मोटा हूँ। इस प्रकार वह स्वतन्त्रता का
व्यवहार करता है। उस कमल का पूर्वदल श्वेत वर्ण का है और
उसमें निवास करने से भक्ति और धर्म में मति रहती है । तब
आग्नेय दिशा के रक्त वर्ण के दल में निवास होता है तब निद्रा और
आलस्य में मति होती है । जब दक्षिण वाले कृष्ण-दल में निवास करते
हैं तब द्वेष और कोप की मति होती है । जब नैर्ऋत्य दिशा के नील-
वर्ण दल में निवास करता है तब पापकर्म और हिंसा में मति रहती
है । जब पश्चिम के स्फटिक वर्ण वाले दल में निवास करता है तब
क्रीड़ा, विनोद में मति रहती है । जब वायव्यकोण के माणिक्य के से
रङ्ग वाले दल में निवास करता है तब चलने और वैराग्य की भावना
होती है । जब उत्तर के पीतवर्ण दल में निवास करता है तब सुख,
शृङ्गार में मति होती है । जब ईशानकोण के वैडूर्यमणि के वर्ण के दल
में निवास करता है तब दानादि, कृपा करने में मति रहती है । जब
संधियों की संधि में मति रहती है तब वात, पित्त, कफ सम्बन्धी महा-
व्याधियों का प्रकोप होता है। जब मध्य में मति रहती है तब सब जानने
गाने, नृत्य करने, पढ़ने, आनन्द करने में लगी रहती है । जब नेत्र को
श्रम होता है तो उसे दूर करने के उद्देश्य से प्रथम रेखा के मध्य में
डुबकी लगाती है जिससे निद्रावस्था होती है । वह प्रथम रेखा बन्धूक
पुष्प के रङ्ग वाली है । निद्रावस्था के मध्य में ही स्वप्न अवस्था रहती
है । स्वप्न में देखी हुई सुनी हुई, अनुमान की हुई, बातों की कल्पना
की जाती है तो उससे श्रम होता है । उस श्रम के दूर करने के हेतु
दूसरी रेखा के मध्य में डुबकी लगाती है जिसका वर्ण वीर-बहूटी
का सा है । तब सुषुप्ति अवस्था होती है जिसमें बुद्धि ईश्वर के सम्बन्ध
वाली तथा नित्य बोधरूप होती है, इससे बाद में परमेश्वर की प्राप्ति
होती है । जब दूसरी पद्मराग के वर्ण वाली रेखा के मध्य में डुबकी
लगाई जाती है तब तुरीयावस्था होती है । तुरीया में बुद्धि परमात्मा से
सम्बन्ध वाली और नित्य बोधरूप होती है । तब शनैः शनैः सबसे पृथक
होकर धैर्ययुक्त हो मन को आत्मा में स्थित करे और अन्य कुछ भी
चिन्तन न करे । तब प्राण अपान में एक्यभाव स्थापित करके समस्त
विश्व को आत्मरूप समझते हुये उसी का लक्ष्य रखा जाता है । जब
तुरीयातीत अवस्था प्राप्त हो जाती है तब सब आनन्दरूप होकर द्वन्द्वभाव
मिट जाता है । इसके पश्चात् प्रारब्ध को पूरा करने की अवधि तक
ही जीव देह में ठहरता हैं फिर परमात्मतत्व में मिल जाता है । यही
मोक्ष प्राप्ति का मार्ग है और इसी मार्ग से आत्म-दर्शन होता है । चारों
२६६ ] [ ध्यानबिन्दूपनिषत्
पथ संयुक्त महाद्वार में जाने वाले वायु के साथ स्थित होकर, अर्ध
त्रिकोण में होकर अच्युत दिखाई देता है ॥९४॥
पूर्वोक्तत्रिकोणस्थानादुपरि
पृथिव्यादिपञ्चवर्णकं ध्येयम् ।
प्राणादिपंचवायुश्च बीजं वर्णं च स्थानकम् ।
यकारं प्राणबीजं च नीलजीमूतसन्निभम्
रकारमग्निबीजं च अपानादित्यसंनिभम् ॥ ९५
लकारं पृथिवीरूपं व्यानं बन्धूकसन्निभम् ।
वकार जीवबीजं च उदानं शङ्खवर्णकम् ॥ ९६
हकारं वियत्स्वरूपं च समानं स्फटिकप्रभम् ।
हृन्नाभि नासिकाकण्ठपादांगुष्ठादिसंस्थितः ॥ ९७
द्विसप्ततिसहस्राणि नाडिमार्गेषु वर्तते ।
अष्टाविंशतिकोटीषु रोमकूपेषु संस्थितः ॥ ९८
समानप्राण एकस्तु जीवः स एक एव हि ।
रेचकादित्रयं कुर्याद्दृढचित्तः समाहितः ॥ ९९
शनैः समस्तमाकृष्य हृत्सरोरुहकोटरे ।
प्राणापानौ च बध्वा तु प्रणवेन समुच्चरेत् ॥ १००
पूर्वोक्त त्रिकोण स्थान के ऊपर पांच वर्ण वाले पृथिवी आदि
तत्व ध्यान करने योग्य हैं । बीज, वर्ण और स्थान वाले पांच वायु
ध्यान करने योग्य हैं । 'य'कार वायु रूप प्राण का बीज है जो
नीले बादल के तुल्य है । 'र'कार आदित्य रूप अपान का बीज है
॥९५॥ 'ल'कार पृथ्वी रूप का ध्यान बन्धूक पुष्प के वर्ण
ध्यानबिन्दूपनिषत् [ २९७
फा है। 'व'कार शङ्ख के वर्ण का जलरूप उदान का बीज है ॥९६॥
'ह'कार स्फटिक वर्ण का आकाश के समान है। हृदय, नाभि, नासिका,
कान और पैर का अंगूठा समान के स्थान हैं ॥९७॥ यह समान वायु
बहत्तर हजार नाड़ियों में तथा शरीर के रोम कूपों तक में रहती है
॥९८॥ समान और प्राण एक ही है, वही एक जीव है। चित्त को भली
प्रकार समाहित करके, रेचक, कुम्भक तीनों करे । सब को शनैः-शनैः
खींचकर हृदय कमल के कोटर में प्राणवायु और अपानवायु को रोककर
प्रणव का उच्चारण करे ॥१००॥
कण्ठसंकोचनं कृत्वा लिङ्गसंकोचनं तथा ।
मूलाधारात्सुषुम्ना च बिसतन्तुनिभा शुभा ॥ १०१
अमूर्तो वर्तते नादो वीणादण्डसमुत्थितः ।
शङ्खनादादिभिश्चैव मध्यमेव ध्वनिर्यथा ॥ १०२
व्योमरन्ध्रगतो नादो मायूरं नादमेव च ।
कपालकुहरे मध्ये चतुर्द्वारस्य मध्यमे ॥ १०३
यदात्मा राजते तत्र यथा व्योम्नि दिवाकरः ।
कोदण्डद्वयमध्ये तु ब्रह्मरन्ध्रे तु शक्ति च ॥ १०४
स्वात्मानं पुरुषं पश्येन्मनस्तत्र लय गतम् ।
रत्नानि ज्योतिस्ननादं तु बिन्दु माहेश्वरं पदम् ॥ १०५
य एवं वेद पुरुषः स कैवल्यं समुश्नुते ॥ १०६
इत्युपनिषत् ॥
कण्ठ और लिंग का संकोचन करे, फिर मूलाधार से पद्मतंतु
के समान निकलने वाली सुषुम्ना का संकोचन करे ॥१०१॥ वीणा
२६८ ] [ ध्यानबिन्दूपनिषत्
से उठने वाला अमूर्तं नाद जान पड़ता है, उसी के मध्य में शङ्ख आदि
के समान ध्वनि होती है ॥१०२॥ कपाल कुहर के मध्य में चारों द्वारों
का मध्य-स्थान है, वहाँ आकाशरन्ध्र में से जाता हुआ नाद मोर के
शब्द के तुल्य होता है ॥१०३। जैसे आकाश में सूर्य है वैसे ही यहाँ
विराजमान है और ब्रह्मरन्ध्र में दो कोदण्ड के मध्य शक्ति विराजमान
है ॥१०४॥ वहाँ पुरुष अपने मन को लय करके स्वात्मा को देखे, वहाँ
रत्नों की ज्योति रूप नाद विन्दु महेश्वर का पद है । जो इसको जानता
है वह कैवल्य को प्राप्त करता है । यह उपनिषद है ॥१०५-१०६॥
॥ ध्यानबिन्दूपनिषद समाप्त ॥
अक्षमालिकोपनिषत्
ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमा-
विरावीर्म एधि वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे माप्रहासीरनेना-
धीतेनाहोरात्रान्संदधाम्यृतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि ।
तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु। अवतु माम्। अवतु वक्तारमवतु
वक्तारम्। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
शान्तिपाठ – ॐ। मेरी वाणी मन में स्थिर हो, मन वाणी में स्थिर
हो, हे स्वयं प्रकाश आत्मा ! मेरे सम्मुख तुम प्रकट होओ। हे वाणी
और मन ! तुम दोनों मेरे वेद ज्ञान के आधार हो, इसलिये मेरे
वेदाभ्यास का नाश न करो। इस वेदाभ्यास ही मैं रात्रि-दिन व्यतीत
करता हूँ। मैं ऋत भाषण करूँगा, सत्य भाषण करूँगा, मेरी रक्षा करो,
वक्ता की रक्षा करो, मेरी रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो, वक्ता की
रक्षा करो। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
अथ प्रजापतिर्गुहं पप्रच्छ—भो भगवन् अक्षमालाभेदविधिं
ब्रूहीति। सा किल्लक्षणा कतिभेदा अस्याः कति सूत्राणि कथं
घटनाप्रकारः के वर्णाः का प्रतिष्ठा कैषाऽधिदेवता किं फलं चेति
॥१॥
तं गुहः प्रत्युवाच—प्रवालमौक्तिकस्फटिकशंखरजताष्टा-
पदचन्दनपुत्रजीविकाब्जरुद्राक्षा इत्यादिक्षान्तरमूर्त्तिसंविधानुभावाः
सौवर्णं राजतं ताम्रं चेति सूत्रत्रयम्। तद्विवरे सौवर्णं तद्दक्षपार्श्वे
राजतं तद्वामे ताम्रं तन्मुखे मुखं तत्पुच्छे पुच्छं तदन्तरावर्तनक्रमेण
योजयेत् ॥२॥
३०० ] [ अक्षमालिकोपनिषत्
यदस्यान्तरं सूत्रं तद्ब्रह्म । यद्दक्षपार्श्वं तच्छैवम् । यद्वामे
तद्वैष्णवम् । यन्मुखं सा सरस्वती । यत् पुच्छं सा गायत्री । यत्
सुषिरं सा विद्या । या ग्रन्थिः सा प्रकृतिः । ये स्वरास्ते धवलाः ।
ये स्पर्शास्ते पीताः । ये परास्ते रक्ताः ॥३॥
किसी समय प्रजापति ने गुह से पूछा—हे भगवन् !
अक्षमाला की भेद-विधि को कहिए। उसका क्या लक्षण है ? कितने
भेद हैं ? इसके कितने सूत्र हैं ? कैसे घटना प्रकार है ?
( पिरोने का प्रकार ) कौन अक्षर हैं ? क्या प्रतिष्ठा है ? और कौन
इसका अधिदेवता है ? और क्या फल है ? ॥ १ ॥ तब
उन्हें गुह ने उत्तर दिया—प्रबाल, मोती, स्फटिक, शंख, चांदी, सोना
चंदन, पुत्र जीविका, कमल तथा रुद्राक्ष ये दस प्रकार की होती है जो
कि अ से लेकर क्ष तक के अक्षरों से अनुभावित करके
धारण की जाती है। इसमें सोना, चांदी तथा तांबा ये तीन सूत्र होते
हैं। उस ( मणके ) के छेद में सोना, दाहिने भाग में चाँदी तथा
बाँये हिस्से में तांबा, उसके मुख में मुख, पूँछ स्थान में पूँछ उसके अन्दर
का सूत्र है वह ब्रह्मा है। जो दाहिने भाग में है वह शैव है। जो बायें
हिस्से में है वह वैष्णव है। जो मुख है वह सरस्वती है जो पूँछ है।
वह गायत्री है । जो छेद है वह विद्या है। जो गांठ है
यह प्रकृति है। जो स्वर है वह सात्विक होने के कारण धवल अर्थात्
सफेद है तथा जो स्पर्श है वह सत्व तथा तम मिश्रित होने
के कारण पीले हैं एवं जो पर हैं वे राजस के कारण लाल हैं
॥ ३ ॥
अथ तां पञ्चभिर्गव्यैरमृतैः पञ्चभिर्गव्यैस्तनुभिः शोध-
यित्वा पञ्चभिर्गव्यैर्गन्धोदकेन तस्नाप्य तुस्मात् सोङ्कारेण पत्र-
अक्षमालिकोपनिषत् [ ३०१:
कूर्चेन स्नपयित्वाऽष्टभिर्गन्धैराषिच्य सुमनःस्थले निवेश्याक्षत-
पुष्पैराराध्य प्रत्यक्षमादिक्षान्तवर्णैर्भावयेत् ॥४॥
ओमंकार मृत्युञ्जय सर्वव्यापक प्रथमेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
ओमांक आकर्षणात्मक सर्वगत द्वितीयेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमिंकार
पुष्टिदाक्षोभकर तृतीयेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमींकार वाक्प्रसादकर
निर्मल चतुर्थेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमुंकार सर्वबलप्रद सारतर पञ्च-
मेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमूॅकारोच्चाटनकर दुःसह षष्ठेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
ओम्ॄकार संक्षोभकर चञ्चल सप्तमेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओम्ॄंकार
सम्मोहनकरोज्ज्वलाष्टमेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओम्लूंकार विद्वेषणकर
शूहक नवमेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओम्लॄंकार मोहकर दशमेऽक्षे प्रति-
तिष्ठ । ओमेंकार सर्ववश्यकर शुद्धसत्त्वैकादशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
ओमैकार शुद्धसात्विक पुरुषवश्यकर द्वादशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमों-
काराखिलवाङ्मय नित्यशुद्ध त्रयोदशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमौंकार
सर्ववाङ्मय वश्यकर शान्त चतुर्दशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमंकार
गजादिवश्यकर मोहन पञ्चदशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमःकार मृत्यु-
नाशनकर रौद्र षोडशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं कंकार सर्वविषहर
कल्याणद सप्तदशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं खंकार सर्वक्षोभकर व्याप-
काष्टादशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं गंकार सर्वविघ्नशमन महत्तरैको-
नविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं घंकार सौभाग्यद स्तरम्भनकर विंशेऽक्षे
प्रतितिष्ठ । ओं ङंकार सर्वविषनाशकरोग्रैकविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
ओं चंकाराभिचारघ्न क्रूर द्वाविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं छंकार
भूतनाशकर भीषण त्रयोविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं जंकार
३०२ ] [ अक्षमालिकोपनिषत्
कृत्याऽदिनाशकर दुर्धर्ष चतुर्विंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं झंकार
भूतनाशकर पञ्चविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं ञंकार मृत्युप्रमथन
षड्विंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं टंकार सर्वव्याधिहर सुभग सप्तविं-
शेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं ठंकार चन्द्ररूपाष्टाविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
ओं डंकार गरुडात्मक विषघ्न शोभनैकोनत्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
ओं ढंकार सर्वसंपत्प्रद सुभग त्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं णंकार
सर्वसिद्धिप्रद मोहकरैकत्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं तंकार धन-
धान्यादिसंपत्प्रद प्रसन्न द्वात्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं थंकार
धर्मप्राप्तिकर निर्मल त्रयस्त्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं दंकार
पुष्टिवृद्धिकर प्रियदर्शन चतुस्त्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं धंकार
विषज्वरनिघ्न विपुल पञ्चत्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं नंकार भुक्ति-
मुक्तिप्रद शान्त षट्त्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं पंकार विषविघ्न-
नाशन भव्य सप्तत्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं फंकाराणिमादिसिद्धि-
प्रद ज्योतीरूपाष्टात्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं बंकार सर्वदोषहर
शोभनैकोनचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं भंकार भूत प्रशान्तिकर
भयानक चत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं मंकार विद्वेषिमोहनकरै-
कचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं यंकार सर्वव्यापक पावन
द्विचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं रंकार दाहकर विकृत
त्रिचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं लंकार विश्वम्भर भासुर
चतुश्चत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं वंकार सर्वाप्यायकर निर्मल
पञ्चचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं शंकार सर्वफलप्रद पवित्र
षट्चत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं षंकार धर्मार्थकामद धवल