१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८६ ] [ ध्यानबिन्दूपनिष
सुषुम्ना मध्य देशस्था प्राणमार्गस्त्रयः स्मृताः ।
प्राणोऽपानः समानश्चोदानो व्यानस्तथैव च ॥५६
नागः कूर्मः कृकरको देवदत्तो धनंजयः ।
प्राणाद्याः पञ्च विख्याता नागाद्याः पञ्च वायवः ॥५७
इन बहत्तर में से दश प्रधान नाड़ियां प्राण को चलाने वाली
कही गई हैं जो इस प्रकार हैं—इड़ा, पिङ्गला, सुषुम्ना, गान्धारी,
हस्तिजिह्वा, पूषा, यशस्विनी, अलम्बुसा, कुहू और शङ्खिनी ॥ ५२—
५३ ॥ योगियों को इस नाड़ी-चक्र का ज्ञान होना परमावश्यक है।
इनमें इड़ा, पिङ्गला और सुषुम्ना ये तीन नाड़ियाँ सूर्य, चन्द्र, अग्नि
देवताओं द्वारा प्रतिष्ठित हैं और प्राण सदैव इन्हीं में चला करता है।
इड़ा बाँयी ओर, पिङ्गला दाहिनी ओर, सुषुम्ना दोनों के मध्य में स्थित
है, ये तीनों प्राण के मार्ग स्वरूप हैं। प्राण, अपान, समान, उदान,
व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त, धनञ्जय—इस प्रकार ये प्राणादि
पांच और नागादि पाँच वायु प्रसिद्ध हैं ॥ ५४—५७ ॥
एते नाडीसहस्रेषुवर्तन्ते जीवरूपिणः ।
प्राणापानवशो जीवो ह्यधश्चोर्ध्वं व धावति ॥५८
वामदक्षिणमार्गेण चञ्चलत्वान्न दृश्यते ।
आक्षिप्तो भुजदण्डेन यथोच्चलति कन्दुकः ॥५९
प्राणापानसमाक्षिप्तस्तद्वज्जीवो न विश्रमेत् ।
अपानात्कर्षति प्राणोऽपानः प्राणाच्च कर्षति ॥६०
खगरज्जुवदित्येतद्यो जानाति स योगवित् ।
हकारेण बहिर्याति सकारेण विशेत्पुनः ॥६१
हंसहंसेत्यमुं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा ।
शतानि षड् दिवारात्रं सहस्राण्येकविंशतिः ॥६२