सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 295, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 295

ध्यानबिन्दूपनिषत् [ २८७
एतत्संख्याऽन्वितं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा ।
अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्षदा सदा ॥६३
इस प्रकार ये वायु जीव रूप से सहस्रों नाड़ियों में रहते हैं ।
प्राण और वायुओं के वश में पड़कर जीव ऊपर नीचे आता-जाता रहता
है । वह कभी बाएँ और कभी दाहिने मार्ग से चलता है, पर चञ्चल
होने से दिखाई नहीं पड़ता । जैसे हाथों से इधर-उधर फेंकी हुई गेंद
दौड़ती रहती है, इसी प्रकार प्राण और अपान वायुओं के फेंकने से
जीव को कहीं विश्राम का स्थान नहीं मिलता । अपान प्राण को खींचता
है और प्राण अपान को खींचता है, उसी प्रकार जैसे रस्सी में बँधा
हुआ पक्षी खींच लिया जाता है । इस रहस्य को जो जानता है वह
योगी है । यह प्राण 'ह'कार ध्वनि द्वारा बाहर जाता है और 'स'कार
से भीतर आता है । इस प्रकार जीव सदा 'हँस-हँस' मन्त्र का जप
करता रहता है और एक दिन रात्रि में इस जप की संख्या इक्कीस
हजार छः सौ होती है । इसको अजपा गायत्री कहते हैं, यह योगियों
के लिए मोक्ष प्रदायिनी है ॥ ६०—६३ ॥
अस्याः संकल्पमात्रेण नरः पापैः प्रमुच्यते ।
अनया सदृशो विद्या अनया सदृशो जपः ॥६४
अनया सदृशं पुण्यं न भूतं न भविष्यति ।
येन मार्गेण गन्तव्यं ब्रह्मस्थानं निरामयम् ॥६५
मुखेनाच्छाद्यं तद्द्वारं प्रसुप्ता परमेश्वरी ।
प्रबुद्धा वह्नियोगेन मनसा मरुता सह ॥६६
सूचिवद्गुणमादाय प्रजत्यूर्ध्वं सुषुम्नया ।
उद्घाटयेत्कपाटं तु यथा कुञ्चिकया हठात् ॥६७
कुण्डलिन्या तथा योगी मोक्षद्वारं विभेदयेत् ॥६८