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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

३४८ बृहदारण्यकोपनिषद्
उच्चारण करके फिर - 'अहमेवेदः सर्वं भूयासम्' - 'मैं ही सब कुछ हो जाऊँ' कह कर 'भूर्भुवः स्वः
स्वाहा' मन्त्र के साथ (समस्त मन्थ का अवशिष्ट) चौथा ग्रास ग्रहण करे। इसके पश्चात् हस्तप्रक्षालन करके
वेदी के पृष्ठ (पश्चिम) भाग में पूर्वाभिमुख होकर शयन करे। फिर प्रातःकाल सूर्योपस्थान करते हुए कहे-
आप समस्त दिशाओं रूपी पंखुड़ियों के आश्रय रूप कमल हैं, मैं भी मनुष्यों में कमल तुल्य होऊँ। इसके
पश्चात् उसी मार्ग से वापिस लौटकर अग्नि (वेदी) के पश्चिम ओर बैठकर (अगले मन्त्र) वंश को जपे ॥ ६ ॥
तः हैतमुद्दालक आरुणिर्वाजसनेयाय याज्ञवल्क्यायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य
एनः शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ७॥
इस मन्थ प्रक्रिया (विशिष्ट हवन पद्धति) का उपदेश अरुण पुत्र उद्दालक ने वाजसनेय याज्ञवल्क्य
को करते समय कहा था कि इस मन्थ को यदि कोई सिंचन के लिए (पूरी तरह) सूखे वृक्ष पर डाल देगा,
तो उसमें से कोपलें फूटकर शाखाएँ निकल आएँगी ॥ ७ ॥
एतमु हैव वाजसनेयो याज्ञवल्क्यो मधुकाय पैङ्ग्यायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य
एनः शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ८ ॥
इस मन्थ का उपदेश वाजसनेय याज्ञवल्क्य ने अपने शिष्य मधुक पैङ्ग्य को करते हुए कहा था- यदि कोई
सिंचन के निमित्त सूखे वृक्ष पर भी इस मन्थ को डालेगा, तो उसमें नये पत्ते व शाखाएँ प्रस्फुटित हो जाएँगी ॥ ८ ॥
एतमु हैव मधुकः पैङ्ग्यश्चूलाय भागवित्तयेऽन्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनः शुष्के
स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ९ ॥
मधुक पैङ्ग्य ने अपने शिष्य भागवित्ति चूल के प्रति इस मन्थ का उपदेश करते हुए कहा था कि यदि
कोई सींचने के लिए ठूँठ वृक्ष पर भी इस मन्थ को डालेगा, तो उसमें से पत्ते फूट पड़ेंगे और शाखाएँ
प्रस्फुटित हो जाएँगी ॥ ९ ॥
एतमु हैव चूलो भागवित्तिर्जानकय आयस्थूणायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनः
शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ १० ॥
भागवित्ति चूल ने अपने शिष्य जानकि आयस्थूण के प्रति उपदेश करते हुए, इस मन्थ के विषय में
कहा था- यदि कोई सिंचन के लिए बिल्कुल शुष्क वृक्ष पर इसे (मन्थ को) डालेगा, तो उसमें से पत्ते व
शाखाएँ प्रस्फुटित हो जाएँगे ॥ १० ॥
एतमु हैव जानकिरायस्थूणः सत्यकामाय जाबालायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य
एनः शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ११ ॥
जानकि आयस्थूण ने सत्यकाम जाबाल के प्रति इस मन्थ का उपदेश करते समय कहा था- यदि कोई
सींचने हेतु सूखे वृक्ष पर इस मन्थ को डालेगा, तो उसमें कोपलें और शाखाएँ निकल आएँगी ॥ ११ ॥
एतमु हैव सत्यकामो जाबालोऽन्तेवासिभ्य उक्त्वोवाचापि य एनः शुष्के स्थाणौ
निषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति तमेतन्नापुत्राय वानन्तेवासिने वा ब्रूयात् ॥ १२ ॥
इस मन्थ का उपदेश सत्यकाम जाबाल ने अपने अन्तेवासी (आश्रमवासी) शिष्यों के प्रति किया था

अध्याय ६ ब्राह्मण ४ मन्त्र ३ ३४९

अध्याय ६ ब्राह्मण ४ मन्त्र ३ ३४९
और कहा था कि यदि कोई सींचने के लिए शुष्क वृक्ष पर भी इसको डाल देगा, तो वह कोपल और
शाखाओं से युक्त हो जायेगा। यह मन्थविधि अपुत्र और अशिष्य को नहीं बतलानी चाहिए ॥ १२ ॥
चतुरौदुम्बरो भवत्यौदुम्बरः स्रुव औदुम्बरश्चमस औदुम्बर इध्म औदुम्बर्या उपमन्थिन्यौ
दश ग्राम्याणि धान्यानि भवन्ति व्रीहियवास्तिलमाषा अणुप्रियङ्गवो गोधूमाश्च मसूराश्च
खल्वाश्च खलकुलाश्च तान् पिष्टान्दधनि मधुनि घृत उपसिञ्चत्याज्यस्य जुहोति ॥ १३ ॥
यह मन्थकर्म चार औदुम्बर काष्ठ के बने पात्रों द्वारा सम्पन्न होता है। ये चार पात्र-स्रुवा, चमस,
समिधा उपमन्थनी और इध्म अर्थात् समिधा हैं। इसमें दस प्रकार के ग्रामीण धान्य प्रयुक्त होते हैं। ये धान्य-
व्रीहि (धान), यव (जौ), तिल, माष (उड़द), अणु (साँवा), प्रियङ्गु (काँगनी), गोधूम (गेहूँ), मसूर,
खल्व (एक प्रकार का धान) और खलकुल (कुलथी) हैं। इन सभी को पीसकर मधु और घृत डालकर
आहुति दी जाती है ॥ १३ ॥
॥ चतुर्थं ब्राह्मणम् ॥
इस ब्राह्मण में प्राणि-जगत् की आधारभूता प्रजनन प्रक्रिया पर प्रकाश डाला गया है। यह सृष्टि यज्ञमय है,
इसलिए सृष्टिचक्र की गतिशील रखने वाली प्रजनन-प्रक्रिया भी ऋषि की दृष्टि से यज्ञीय कर्मानुशासन का अंग
है। इसे इसी भाव से समझा और अपनाया जाना चाहिए-
एषां वै भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपोऽपामोषधय ओषधीनां पुष्पाणि पुष्पाणां
फलानि फलानां पुरुषः पुरुषस्य रेतः ॥ १ ॥
इन पंचभूतों का रस पृथिवी है, पृथिवी का रस आपः (जल) है, जल का रस ओषधियाँ हैं,
ओषधियों का रस पुष्प हैं, पुष्पों का रस (सार) फल हैं, फलों का रस पुरुष है और पुरुष का सार तत्त्व
रेतस् (वीर्य) है ॥ १ ॥
स ह प्रजापतिरीक्षांचक्रे हन्तास्मै प्रतिष्ठां कल्पयानीति स स्त्रियः ससृजे ताःसृष्ट्वाऽध
उपास्त तस्मात्स्त्रियमध उपासीत स एतं प्राञ्चं ग्रावाणमात्मन एव
समुदपारयत्तैनामभ्यसृजत् ॥ २ ॥
प्रजापति ने इच्छा की कि इस (पुरुष अथवा) रेतस् के लिए आश्रय तैयार करूँ। उसने स्त्री
(नारीत्व) का सृजन किया तथा आधार रूप में उसकी उपासना की। इसीलिए आज भी स्त्री आधार रूप
में उपासित है। उस (प्रजापति) ने अपनी ग्रावा (शिलाखण्ड) जैसी सुदृढ़ सामर्थ्य से उस (स्त्री जाति)
को परिपूर्ण किया। उस स्थापना से स्त्री के स्त्रीत्व की संसार में प्रतिष्ठा हुई ॥ २ ॥
तस्या वेदिरुपस्थो लोमानि बर्हिश्चर्माधिषवणे समिद्धो मध्यतस्तौ मुष्कौ
स यावान् ह वै वाजपेयेन यजमानस्य लोको भवति तावानस्य लोको भवति य
एवं विद्वानधोपहासं चरत्यासाः स्त्रीणाः सुकृतं वृङ्क्तेऽथ य इदमविद्वानधोपहासं
चरत्यस्य स्त्रियः सुकृतं वृञ्जते ॥ ३ ॥

३५० बृहदारण्यकोपनिषद्
ऋषि देवमानव उत्पन्न करने वाले प्रजनन यज्ञ के उपादानों का वर्णन करते हुए कहते हैं-
नारी की जननेन्द्रिय ही यज्ञवेदी है, वहाँ स्थित लोम ही बर्हि (कुश का आसन) है, मध्यभाग का चर्म
अधिषवण फलक है, मध्यभाग प्रज्वलित अग्नि है और मुष्क (पार्श्व में स्थित दो मांस पिण्ड) समिधा है।
इस प्रकार इस (प्रजनन) यज्ञ का फल वाजपेय यज्ञ के समान होता है। इस प्रकार का ज्ञान रखकर प्रजनन
यज्ञ सम्पन्न करने वाला यजमान (पुरुष) स्त्री के पुण्यों को प्राप्त कर लेता है; किन्तु इस प्रकार का ज्ञान
न रखकर (भोग बुद्धि से) प्रजनन करने वाले के पुण्यों को स्त्रियाँ प्राप्त कर लेती हैं॥ ३॥
[जो व्यक्ति प्रजनन यज्ञ का महत्त्व समझकर प्रजनन की आवश्यकता की पूर्ति के लिए निर्धारित मर्यादाओं
के अनुसार रतिकर्म में प्रवृत्त होता है, उसे उस यज्ञीय प्रक्रिया की पूर्ति का पुण्य प्राप्त होना स्वाभाविक है; किन्तु
यदि कोई व्यक्ति अपने असंयत कामावेग के कारण रतिक्रिया में प्रवृत्त होता है, तो उसके द्वारा मर्यादा भंग होने
के कारण उसका पुण्य क्षीण होता है।]
एतद्ध स्म वै तद्विद्वानुद्दालक आरुणिराहैतद्ध स्म वै तद्विद्वान्नाको मौद्गल्य आहेत्तद्ध
स्म वै तद्विद्वान्कुमारहारित आह बहवो मर्या ब्राह्मणायना निरिन्द्रिया विसुकृतोऽस्माल्लो-
कात्प्रयन्ति य इदमविद्वांःसोऽथोपहासं चरन्तीति बहु वा इदंः सुप्तस्य वा जाग्रतो वा रेतः
स्कन्दति ॥ ४॥
इस (यज्ञ) विषय के ज्ञाता आरुणि उद्दालक तथा मौद्गल्य और कुमार हारित कहते हैं कि बहुत से
ऐसे मरणधर्मा और बुद्धिहीन ब्राह्मण हैं, जो इस प्रजनन यज्ञ को इस (पवित्र) रूप में नहीं जानते। वे
निरिन्द्रिय और सुकृतहीन होकर, इस रतिकर्म में आसक्त होकर परलोक (श्रेष्ठलोक) से पतित हो जाते हैं।
पत्नी का ऋतुकाल प्राप्त होने से पूर्व ही यदि कोई प्राणतत्त्वोपासक दिन अथवा रात्रि में न्यूनाधिक रूप में
स्वतः स्खलित हो जाते हैं, तो उन्हें (अगले मंत्र में उल्लिखित) प्रायश्चित्त करना चाहिए॥ ४॥
तदभिमृशेदद्नु वा मन्त्रयेत यन्मेऽद्य रेतः पृथिवीमस्कान्त्सीद्यदोषधीरप्यसरद्यदप इदमहं
तद्रेत आददे पुनर्मामैत्विन्द्रियं पुनस्तेजःपुनर्भगः पुनरग्निर्धिष्ण्या यथास्थानं
कल्पन्तामित्यनामिकाङ्गुष्ठाभ्यामादायान्तरेण स्तनौ वा भ्रुवौ वा निमृज्यात् ॥ ५॥
उस गिरे हुए (अपने रेतस्) को अभिमन्त्रित करते हुए उसे हाथ से स्पर्श करे और कहे कि आज यह
मेरा वीर्य जो पृथिवी पर गिरा है और पूर्व में भी कभी ओषधि तथा जल में गिरा है (अर्थात् पृथिवी, ओषधि
और जल को दूषित किया है), उस वीर्य को मैं फिर से धारण करना चाहता हूँ। इस प्रकार कहने के बाद
अनामिका और अङ्गुष्ठ से उसे उठाकर वक्षस्थल अथवा दोनों भौंहों के बीच में लेप करे और कहे- जो यह
मेरी (वीर्यरूप) इन्द्रिय शक्ति बाहर चली गई थी, वह पुनः मेरे पास आ जाए। मुझे पुनः अपना तेजस् और
सौभाग्य प्राप्त हो। अग्नि देव एवं अन्य देवगण पुनः मेरे शरीर में उचित स्थान पर इसे प्रतिष्ठित कर दें॥ ५॥
अथ यद्युदक आत्मानं पश्येत्तदभिमन्त्रयेत मयि तेज इन्द्रियं यशो द्रविणंः सुकृतमिति
श्रीर्ह वा एषां स्त्रीणां यन्मलोद्वासास्तस्मान्मलोद्वाससं यशस्विनीमभिक्रम्योपमन्त्रयेत ॥
इसके बाद वह प्रायश्चित्त कर्त्ता जल में अपने प्रतिबिम्ब को देखता हुआ उस (जल) को अभिमन्त्रित

अध्याय ६ ब्राह्मण ४ मन्त्र ११ ३५१

अध्याय ६ ब्राह्मण ४ मन्त्र ११ ३५१
करता हुआ कहे कि देवगण मुझे तेजस्, इन्द्रिय, यश, सम्पदा और सत्कर्म प्रदान करें। इसके पश्चात् स्त्री
की प्रशंसा करते हुए कहे कि मेरी यह धर्मपत्नी स्त्रियों में लक्ष्मी स्वरूपा है। तब उस मलरहित वसन
अथवा धुले वस्त्र के समान पाप रहिता यशस्विनी स्त्री के पास पुरुष स्वयं भी विकार रहित आच्छादन युक्त
होकर जाये, अन्यत्र (काम-वासना से किसी अन्य के पास) न जाए॥ ६॥
सा चेदस्मै न दद्यात्काममेनामवक्रीणीयात् सा चेदस्मै नैव दद्यात्काममेनां यष्ट्या वा
पाणिना वोपहत्यातिक्रामेदिन्द्रियेण ते यशसा यश आदद इत्ययशा एव भवति ॥ ७॥
वह स्त्री (पत्नी) यदि स्वेच्छापूर्वक स्वयं को समर्पित न करे, तो उसकी आकांक्षाएँ पूरी करके
(वस्त्र, आभूषण आदि प्रदान करके) प्रेम प्रदर्शित करे। यदि इसके बाद भी वह सहमत न हो, तो दण्ड का
भय दिखाकर सहमत करे। (अपना भाव व्यक्त करते हुए) पुरुष यह समझाये कि सहमत न होने से मैं
अपने यश और इन्द्रियों से तुम्हारे यश का हरण कर (स्त्री की ओर से अपने ध्यान एवं इन्द्रियों का लगाव
हटा) सकता हूँ। इससे स्त्री अयश हुए की तरह (समर्पित) हो जाती है ॥ ७॥
सा चेदस्मै दद्यादिन्द्रियेण ते यशसा यश आदधामीति यशस्विनावेव भवतः ॥ ८ ॥
पत्नी द्वारा पति के प्रति आत्म समर्पण कर दिये जाने पर पति को चाहिए कि उसे आशीर्वाद प्रदान करे और कहे
कि मैं अपनी यश स्वरूप इन्द्रिय द्वारा तेरे अन्दर यश को स्थापित करता हूँ। इस प्रकार वे दोनों यशस्वी ही होते हैं॥
स यामिच्छेत्कामयेत मेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखꣳ संधायोपस्थमस्या
अभिमृश्य जपेदङ्गादङ्गात्संभवसि हृदयादधि जायसे। स त्वमङ्गकषायोऽसि दिग्घविद्धा-
मिव मादयेमाममूं मयीति ॥ ९॥
जब पत्नी सहमत हो जाये, तो उसे अंक में लेकर संयोग के समय यह (अंगात् अंगात् संभवसि
आदि) मंत्र जपे अथवा संकल्प करे- हे कामदेव या कामभाव! आप अंग-अंग में संयोग और हृदय (के
भावों के साम्य) से प्रकट होते हैं। अतः आप मेरे अङ्गों के साररूप हैं। आप विष बुझे तीर से घायल
हरिणी की तरह स्त्री को मदोन्मत्त करके मेरे अधीन बना दें॥ ९॥
अथ यामिच्छेन्न गर्भं दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखꣳ संधायाभिप्राण्यापा-
न्यादिन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदद इत्यरेता एव भवति ॥ १०॥
यदि पुरुष की यह इच्छा हो कि समागम के समय पत्नी गर्भ धारण न करे, तो वह (पुरुष) पूर्व वर्णित
क्रिया करते हुए अभिप्राणन के द्वारा रति क्रिया के समय पहले प्राण, फिर अपानन क्रिया करे और
संकल्प करे, हे स्त्री! मैं अपने रेतस् (ओज या वीर्य) और इन्द्रिय के द्वारा तेरे रेतस् (रज) को ग्रहण करता
हूँ। ऐसा करने से स्त्री रज हीन हो जाती है और गर्भ नहीं ठहरता ॥ १०॥
[ यहाँ प्राणन और अपानन प्रक्रिया क्या है और कैसे की जाती है, यह प्रकरण शोध का विषय है। कुछ
आचार्य इसे रतिक्रिया के साथ ऊर्ध्व रेतस् होने के लिए किया गया प्राणायाम कहते हैं।]
अथ यामिच्छेद्दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखꣳ संधायापान्याभिप्राण्यादिन्द्रियेण
ते रेतसा रेत आदधामीति गर्भिण्येव भवति ॥ ११॥

३५२ बृहदारण्यकोपनिषद्
यदि पुरुष यह आकांक्षा करे कि उसकी पत्नी गर्भ धारण करे, तो पूर्ववत् क्रिया करके पहले अपानन,
फिर अभिप्राणन प्रक्रिया सम्पन्न करे। संकल्प करे- 'मैं' अपनी इन्द्रिय के रेतस् (वीर्य या ओज) को तेरे
रेतस् में स्थापित करता हूँ। ऐसा करने से गर्भ स्थिर हो ही जाता है॥ ११ ॥
[ गर्भ न ठहरने के क्रम में पहले प्राणन और फिर अपानन तथा गर्भ ठहराने के लिए पहले अपानन, फिर
प्राणन क्रिया के निर्देश हैं। इसका अभ्यास संभवतः गुरु करा देते रहे होंगे।]
अथ यस्य जायायै जारः स्यात्तं चेद् द्विष्यादामपात्रेऽग्निमुपसमाधाय प्रतिलोमग्
शरबर्हिस्तीर्त्वा तस्मिन्नेताः शरभृष्टीः प्रतिलोमाः सर्पिषाक्ता जुहुयान्मम समिद्धेऽहौषीः
प्राणापानौ त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीः पुत्रपशूग्स्त आददेऽसाविति मम
समिद्धेऽहौषीरिष्टासुकृते त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीराशापराकाशौ त
आददेऽसाविति । स वा एष निरिन्द्रियो विसुकृतोऽस्माल्लोकात्प्रैति यमेवंविद्ब्राह्मणः
शपति तस्मादेवंविच्छ्रोत्रियस्य दारेण नोपहासमिच्छेदुत ह्येवंवित्परो भवति ॥ १२ ॥
यदि किसी को अपनी नारी के प्रति किसी अन्य पुरुष के अवैध सम्बन्ध होने की शंका हो और वह
उस पुरुष को दण्ड देना चाहे, तो कच्चे मिट्टी के पात्र में अग्नि रखे और उसमें उल्टी तरफ तिर्यक् (तिरछे)
सरकंडों का बर्हिष् बिछाये, इसके पश्चात् बाणों के आकार की सींकें घृत में भिगोकर चार आहुतियाँ प्रदान
करे। प्रत्येक आहुति देते समय उसका नाम लेकर कहे- हे दुष्ट पुरुष ! तुमने मेरी जलती हुई अग्नि में आहुति
दी है, अतः मैं तेरे प्राण और अपान को खींचता हूँ। मैं तेरे पुत्र, पशु, पुण्य, आशा और पराकाशा (प्रत्याशा)
को भी ग्रहण करता हूँ। इस अभिचार कृत्य को जानने वाला विद्वान् ब्राह्मण जिस (परस्त्रीगामी) को शाप देता
है, उसकी शक्ति क्षीण हो जाती है और वह पुण्य हीन होकर परलोकवासी हो जाता है। अतः किसी ब्रह्मनिष्ठ
(की पत्नी) के प्रति इस प्रकार का निकृष्ट (परस्त्री गमन का) भाव कभी मन में भी नहीं लाना चाहिए ॥१२॥
अथ यस्य जायामार्तवं विन्देत्त्र्यहं कग्सेन पिबेदहतवासा नैनां वृषलो न
वृषल्युपहन्यात्त्रिरात्रान्त आप्लुत्य व्रीहीनवघातयेत् ॥ १३ ॥
जब स्त्री रजस्वला हो अर्थात् जब ऋतुकाल प्राप्त हो, तब उसे तीन दिन तक काँसे के पात्र में नहीं
खाना चाहिए। चतुर्थ दिन स्नान के पश्चात् साफ-सुथरा और ऐसा वस्त्र धारण करना चाहिए, जो फटा न हो।
उस स्त्री को कोई धर्महीन पुरुष (अथवा स्त्री) स्पर्श न करे। तीन रात्रियाँ बीत जाने पर उस स्त्री को धान
कूटने (जैसे श्रम वाले काम) में लगाया जाना उचित है ॥ १३ ॥
[ रजस्वला काल में स्त्री को अधिक शीत-उष्ण तथा श्रम से बचना चाहिए, ताकि मासिक परिशोधन क्रम
में काय-ऊर्जा भली प्रकार लग सके। आहार - विहार का संयम भी बरता जाता है। तीन दिन बाद पुनः सामान्य
जीवन क्रम प्रारंभ किया जाना उचित है।]
स य इच्छेत्पुत्रो मे शुक्लो जायेत वेदमनुब्रुवीत सर्वमायुरियादिति क्षीरौदनं पाचयित्वा
सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १४ ॥
जो दम्पती यह चाहते हों कि उन्हें गौरवर्ण, एक वेद के ज्ञाता और शतायु पुत्र की प्राप्ति हो, वे दूध और चावल
की खीर पकाकर उसमें घृत मिला कर सेवन करें। इससे वे वैसे पुत्र को प्राप्त करने में समर्थ होते हैं॥ १४॥

अध्याय ६ ब्राह्मण ४ मन्त्र १९ ३५३

अध्याय ६ ब्राह्मण ४ मन्त्र १९ ३५३
अथ य इच्छेत्पुत्रो मे कपिलः पिङ्ग्लो जायेत द्वौ वेदावनुब्रुवीत सर्वमायुरियादिति
दध्योदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्रीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १५ ॥
जिनकी यह आकांक्षा हो कि वे पिङ्गल वर्ण, दो वेदों के ज्ञाता और शतायु पुत्र की प्राप्ति करें, वे
(दम्पती) दही में चावल का मिश्रण करके पकाएँ और उसमें घी मिश्रित करके खायें, इससे वे उपर्युक्त
गुणों से सम्पन्न पुत्र प्राप्ति में समर्थ होते हैं ॥ १५ ॥
अथ य इच्छेत्पुत्रो मे श्यामो लोहिताक्षो जायेत त्रीन्वेदाननुब्रुवीत सर्वमायुरि-
यादित्युदौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्रीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १६ ॥
जिन्हें श्याम वर्ण, अरुण नेत्र और तीन वेदों के ज्ञाता पुत्र की अपेक्षा हो, वे दम्पती जल में चावल
मिलाकर भात ( ओदन ) पकाएँ और उसमें घृत मिलाकर सेवन करें। इससे वे उपर्युक्त गुणों वाले पुत्र प्राप्त
करने में सक्षम होते हैं ॥ १६ ॥
अथ य इच्छेद्दुहिता मे पण्डिता जायेत सर्वमायुरियादिति तिलौदनं पाचयित्वा
सर्पिष्मन्तमश्रीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १७॥
जिन्हें विदुषी और पूर्णायुष्य वाली पुत्री की कामना हो, वे दम्पती तिल और चावल की खिचड़ी
बनाकर उसमें घृत मिलाकर सेवन करें। इससे वे उपर्युक्त गुणसम्पन्न पुत्री की प्राप्ति में समर्थ हो जाते हैं ॥
अथ य इच्छेत्पुत्रो मे पण्डितो विगीतः समितिंगमः शुश्रूषितां वाचं भाषिता जायेत
सर्वान्वेदाननुब्रुवीत सर्वमायुरियादिति मांः सौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्रीयातामीश्वरौ
जनयितवा औक्षेण वार्षभेण वा ॥ १८ ॥
जिनकी यह इच्छा हो कि मेरा पुत्र प्रख्यात विद्वान्, विद्वानों की सभा में सम्मान पाने वाला कुशल
वक्ता , प्रियभाषी और सभी वेदों का ज्ञाता और शतायु हो, वे दम्पती उक्षा या ऋषभ नामक ओषधि के गूदे
और चावल का भात (खिचड़ी) पकाकर उसमें घृत मिलाकर सेवन करें। इस क्रिया से वे उपर्युक्त गुण
सम्पन्न पुत्र प्राप्ति में सक्षम होते हैं ॥ १८ ॥
अथाभिप्रतरेव स्थालीपाकावृताज्यं चेष्टित्वा स्थालीपाकस्योपघातं जुहोत्यग्नये
स्वाहानुमतये स्वाहा देवाय सवित्रे सत्यप्रसवाय स्वाहेति हुत्वोद्धृत्य प्राश्नाति प्राश्येतरस्याः
प्रयच्छति प्रक्षाल्य पाणी उदपात्रं पूरयित्वा तेनैनां त्रििरभ्युक्षत्युत्तिष्ठातो विश्वावसोऽन्यामिच्छ
प्रपूर्व्यां सं जायां पत्या सहेति ॥ १९ ॥
इसके पश्चात् चौथे दिन प्रातः (पत्नी द्वारा कूटे हुए चावल से) स्थाली पाक पद्धति से घृत को
संस्कारित करके, इन मन्त्रों के साथ आहुतियाँ प्रदान करे- अग्नये स्वाहा, अनुमतये स्वाहा, देवाय सवित्रे
सत्यप्रसवाय स्वाहा। तत्पश्चात् 'स्विष्टकृत् होमः' के अनन्तर अवशिष्ट चरु को पहले स्वयं ग्रहण करे और
बाद में (बचा हुआ) पत्नी को खिला दे। फिर जल से पूरित पात्र को लेकर उस जल से तीन बार पत्नी का
अभिषेक करे। अभिषेक करते हुए कहे- हे विश्वपोषक! सुयोग्य पुत्र की कामना करने वाली यह स्त्री,
हर्ष युक्त होकर पति के साथ संयोजित हो ॥ १९ ॥

३५४ बृहदारण्यकोपनिषद्
अथैनामभिपद्यतेऽमोऽहमस्मि सा त्वं सा त्वमस्यमोऽहं सामाहमस्मि ऋक्त्वं द्यौरहं
पृथिवी त्वं तावेहि सँरभावहै सह रेतो दधावहै पुँसे पुत्राय वित्तय इति ॥ २० ॥
इसके बाद इच्छित सन्तान के अनुरूप (विधान-वाली) खीर पत्नी को खिलाने के बाद शयनकाल
आ जाने पर पत्नी का आलिङ्गन करता हुआ कहे- हे देवी! मैं प्राण हूँ और तुम वाक् हो, मैं साम हूँ, तुम
ऋक् हो; मैं द्यौ हूँ और तुम पृथिवी हो; अतः आओ हम दोनों पुत्र रूपी धन प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ करें ॥
अथास्या ऊरू विहापयति विजिहीथां द्यावापृथिवी इति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन
मुखँ संधाय त्रिरेनामनुलोमामनुमार्ष्टि विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिँशतु ।
आसिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते । गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि पृथुष्टुके । गर्भं
ते अश्विनौ देवावाधत्तां पुष्करस्रजौ ॥ २१ ॥
तत्पश्चात् स्त्री के ऊरुद्वय को पृथक् करके गर्भाधान कृत्य में दोनों (पति-पत्नी) के नियोजित हो जाने
पर पुरुष कहे-हे प्रिये! सर्वव्यापी भगवान् विष्णु तुम्हारे गर्भाशय को समर्थ बनाएँ, जिससे तुम श्रेष्ठ पुत्र
को जन्म दे सको। भगवान् त्वष्टा (भावी सन्तति के) अङ्गों को पुष्ट और सुन्दर बनाएँ। भगवान् प्रजापति
मुझमें स्थित होकर तुम्हारे अन्दर वीर्याधान करें। भगवान् धाता तुम्हारे अन्दर गर्भ धारण करें और उसे
पोषित करें। हे देवि! तुम स्वयं सिनीवाली हो, अतः गर्भधारण करो, गर्भ धारण करो। अश्विद्वय स्वयं मेरे
अन्दर स्थित होकर अपने रश्मि रूपी कमलों की माला को धारण कर तुम्हारे अन्दर गर्भाधान करें॥ २१ ॥
हिरण्मयी अरणी याभ्यां निर्मन्थतामश्विनौ । तं ते गर्भं हवामहे दशमे मासि सूतये ।
यथाऽग्निगर्भा पृथिवी यथा द्यौरिन्द्रेण गर्भिणी। वायुर्दिशां यथा गर्भ एवं गर्भं दधामि
तेऽसाविति ॥ २२ ॥
दो ज्योतिर्मयी अरणियों से अश्विनीकुमारों ने मन्थन किया था। उस मन्थन से अमृतस्वरूप गर्भ
(अग्नि) का प्राकट्य हुआ था। उसी प्रकार हे देवि! उस अमृत स्वरूप गर्भ को हम तेरे अन्दर स्थापित
करते हैं, जिससे तुम दशम मास में इसे उत्पन्न कर सको। जिस प्रकार पृथिवी अग्नि को गर्भरूप में धारण
किए हैं, द्यौ इन्द्र को धारण किये हैं, दिशाएँ वायु को धारण किये हैं, उसी प्रकार हे देवि ! तुझमें पुत्र रूप
गर्भ प्रतिष्ठित करता हूँ॥ २२ ॥
सोष्यन्तीमद्भिरभ्युक्षति यथा वायुः पुष्करिणीँसमिङ्गयति सर्वतः । एवा ते गर्भ
एजतु सहावैतु जरायुणा । इन्द्रस्यायं व्रजः कृतः सार्गलः सपरिश्रयः । तमिन्द्र निर्जहि
गर्भेण सावराँसहेति ॥ २३ ॥
प्रसवकाल में गर्भिणी स्त्री का अभिमन्त्रित जल से सिंचन करे और कहे-जिस प्रकार वायु
पोखरी (सरोवर) के जल को चञ्चल कर देता है, उसी प्रकार हे देवि ! तेरा भी यह गर्भ चञ्चल
हो जाए और जरायु सहित बहिर्गमन करे। जीव का यह पथ जरायुयुक्त और अवरोध रहित है। हे
जीवात्मन् ! तुम गर्भ आवरण सहित बाहर निकलो ॥ २३ ॥

अध्याय ६ ब्राह्मण ४ मन्त्र २८ ३५५

अध्याय ६ ब्राह्मण ४ मन्त्र २८ ३५५
जातेऽग्निमुपसमाधायाङ्क आधाय कंसे पृषदाज्यꣳ संनीय पृषदाज्यस्योपघातं
जुहोत्यस्मिन्सहस्रं पुष्यासमेधमानः स्वे गृहे। अस्योपसंद्यां मा च्छेत्सीत् प्रजया च पशुभिश्च
स्वाहा। मयि प्राणꣳस्त्वयि मनसा जुहोमि स्वाहा। यत्कर्मणात्यरीरिचं यद्वा न्यूनमिहाकरम्।
अग्निष्टत्स्विष्टकृद्विद्वान्स्विष्टꣳ सुहुतं करोतु नः स्वाहेति॥ २४॥
यहाँ जात कर्म संस्कार का वर्णन प्रस्तुत हुआ है-
उत्पन्न होने के पश्चात् शिशु को गोद में लेकर अग्नि स्थापन करके दही मिला घी काँसे के कटोरे में
रखे और उस पदार्थ के कई भाग करके 'अस्मिन्-सहस्रम्.......स्वाहा' आदि मंत्रों से आहुतियाँ प्रदान
करे। मन्त्र का भाव यह है- मैं इस घर में पुत्र रूप समृद्धि को प्राप्त हुआ हूँ। मैं सहस्रों मनुष्यों का पोषक
होऊँ। इसी प्रकार इस पुत्र के घर में भी कभी सन्तति, सम्पत्ति और पशुओं की कमी न हो। मैं अपने प्राणों
को तुझमें मानसिक रूप से होम करता हूँ। इस (यज्ञादि-कर्म) में मैंने जो कुछ अधिक अथवा कम किया
है, विद्वान् अग्निदेव स्विष्टकृत् होकर हमारे उस कर्म को न्यून और अधिक के दोष से मुक्त करके स्विष्ट
और सुहुत करें॥ २४॥
अथास्य दक्षिणं कर्णमभिनिधाय वाग्वागिति त्रिरथ दधिमधुघृतꣳ संनीयानन्तर्हितेन
जातरूपेण प्राशयति। भूस्ते दधामि भुवस्ते दधामि स्वस्ते दधामि भूर्भुवः स्वः सर्वं त्वयि
दधामीति॥ २५॥
स्विष्टकृत् होम के पश्चात् पिता शिशु के दाहिने कान को अपनी ओर करके उसमें तीन बार 'वाक्,
वाक्, वाक्' कहे। इसके बाद घी, दही और मधु मिला कर उसे स्वर्ण निर्मित चम्मच में लेकर शिशु को
चटाए। चटाते समय कहे कि मैं तुझे भूः, भुवः और स्वः में प्रतिष्ठित करता हूँ॥ २५॥
अथास्य नाम करोति वेदोऽसीति तदस्य तद्गुह्यमेव नाम भवति ॥ २६॥
इसके बाद उस शिशु का नामकरण करे। तुम 'वेद' हो- यह कहे, वेद ही उस बालक का गुह्य
नाम होता है॥ २६॥
अथैनं मात्रे प्रदाय स्तनं प्रयच्छति यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभूर्यो रत्नधा वसुविद्यः
सुदत्रः। येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि सरस्वति तमिह धातवे करिति ॥ २७॥
तत्पश्चात् शिशु को माता की गोद में दे और उसे स्तन पिलाने के लिए कहे। स्तन पिलाते समय ये मन्त्र
(यस्ते स्तनः) पढ़े- (भाव यह है) हे देवि सरस्वती ! आपका स्तन इस शिशु के लिए अक्षय दुग्ध का भण्डार
है, जो पोषण प्रदान करने वाला है। यह रत्नों की खान, सम्पत्ति प्रदाता और कल्याणकारी है। जिससे आप
समस्त वरण करने योग्य पदार्थों को पोषण प्रदान करती हैं। ऐसे स्तन को आप इस बालक को पिलाएँ॥
अथास्य मातरमभिमन्त्रयते इलासि मैत्रावरुणी वीरे वीरमजीजनत्। सा
त्वं वीरवती भव यास्मान् वीरवतोऽकरदिति। तं वा एतमाहुरतिपिता
बताभूरतिपितामहो बताभूः परमां बत काष्ठां प्रापच्छ्रिया यशसा ब्रह्मवर्चसेन
य एवंविदो ब्राह्मणस्य पुत्रो जायत इति ॥ २८॥

३५६ बृहदारण्यकोपनिषद्
इसके पश्चात् शिशु की माता को 'इलासि' आदि मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित करे। कहे- हे देवि ! तुम
स्तुत्य मैत्रावरुणी हो। तुमने वीर पुत्र को उत्पन्न किया है और हमें वीर बालक का पिता बनाया है, इसलिए
तुम वीरवती होओ। इस शिशु को देखकर जन सामान्य कहे कि यह अपने पिता और पितामह से भी श्रेष्ठ
हुआ है, यह लक्ष्मी, यश और ब्रह्मवर्चस को प्राप्त कर प्रगति की पराकाष्ठा पर पहुँच गया है। जिस ब्राह्मण
के यहाँ इस प्रकार का विद्वान् पुत्र जन्म लेता है (वह भी इसी प्रकार स्तुति करने योग्य होता है) ॥ २८ ॥
॥ पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥
अथ वंशः पौतिमाषीपुत्रः कात्यायनीपुत्रात् कात्यायनीपुत्रो गौतमीपुत्राद्गौतमीपुत्रो
भारद्वाजीपुत्राद्भारद्वाजीपुत्रः पाराशरीपुत्रात्पाराशरीपुत्र औपस्वस्तीपुत्रादौपस्वस्तीपुत्रः
पाराशरीपुत्रात्पाराशरीपुत्रः कात्यायनीपुत्रात्कात्यायनीपुत्रः कौशिकीपुत्रात्कौशिकीपुत्र
आलम्बीपुत्राच्च वैयाघ्रपदीपुत्राच्च वैयाघ्रपदीपुत्रः काण्वीपुत्राच्च कापीपुत्राच्च
कापीपुत्रः ॥ १ ॥ आत्रेयीपुत्रादात्रेयीपुत्रो गौतमीपुत्राद्गौतमीपुत्रो भारद्वाजीपुत्राद्भारद्वाजीपुत्रः
पाराशरीपुत्रात्पाराशरीपुत्रो वात्सीपुत्राद्वात्सीपुत्रः पाराशरीपुत्रात्पाराशरीपुत्रो
वार्कारुणीपुत्राद्वार्कारुणीपुत्रो वार्कारुणीपुत्राद्वार्कारुणीपुत्र आर्तभागीपुत्रादार्तभागीपुत्रः
शौङ्गीपुत्राच्छौङ्गीपुत्रः सांकृतीपुत्रात्सांकृतीपुत्र आलम्बायनीपुत्रादालम्बायनीपुत्र
आलम्बीपुत्रादालम्बीपुत्रो जायन्तीपुत्राज्जायन्तीपुत्रो माण्डूकायनीपुत्रान्माण्डूकायनीपुत्रो
माण्डूकीपुत्रान्माण्डूकीपुत्रः शाण्डिलीपुत्राच्छाण्डिलीपुत्रो राथीतरीपुत्राद्राथीतरीपुत्रो
भालुकीपुत्राद्भालुकीपुत्रः क्रौञ्चिकीपुत्राभ्यां क्रौञ्चिकीपुत्रौ वैदभृतीपुत्राद्वैदभृतीपुत्रः
कार्शकेयीपुत्रात्कार्शकेयीपुत्रः प्राचीनयोगीपुत्रात्प्राचीनयोगीपुत्रः सांजीवीपुत्रा-
त्सांजीवीपुत्रः प्राश्नीपुत्रादासुरिवासिनः प्राश्नीपुत्र आसुरायणादासुरयण आसुरेरासुरिः ॥२॥
याज्ञवल्क्याद्याज्ञवल्क्य उद्दालकादुद्दालकोऽरुणादरुण उपवेशेरुपवेशिः कुश्रेःकुश्रि-
र्वाजश्रवसो वाजश्रवा जिह्वावतो बाध्योगाज्जिह्वावान्बाध्योगोऽसिताद्वार्षगणादसितो वार्ष-
गणो हरितात्कश्यपाद्धरितः कश्यपः शिल्पात्कश्यपाच्छिल्पः कश्यपः कश्यपान्नैध्रुवेः
कश्यपो नैध्रुविर्वाचो वागम्भिण्या अम्भिण्यादित्यादित्यानीमानि शुक्लानि यजूंषि
वाजसनेयेन याज्ञवल्क्येनाख्यायन्ते ॥ ३ ॥
अब (ब्रह्मवेत्ता ऋषियों की) वंशावली का वर्णन किया जाता है। पौतिमाषी पुत्र ने कात्यायनी सुत
से, कात्यायनी सुत ने गौतमी पुत्र से, गौतमी पुत्र ने भारद्वाजी पुत्र से, भारद्वाजी पुत्र ने पाराशरी के पुत्र से,
पाराशरी सुत ने औपस्वस्ती सुत से, औपस्वस्ती सुत ने पाराशरी पुत्र से, पाराशरी पुत्र ने कात्यायनी पुत्र से,
कात्यायनी पुत्र ने कौशिकी के पुत्र से, कौशिकी के पुत्र ने आलम्बी तनय और वैयाघ्रपदी तनय से,
वैयाघ्रपदी तनय ने काण्वी पुत्र तथा कापी पुत्र से शिक्षा प्राप्त की। कापी पुत्र ने आत्रेयी सुत से, आत्रेयी पुत्र
ने गौतमी सुत से, गौतमी सुत ने भारद्वाजी पुत्र से, भारद्वाजी पुत्र ने पाराशरी पुत्र से, पाराशरी पुत्र ने वात्सी

अध्याय ६ ब्राह्मण ५ मन्त्र ४ ३५७

अध्याय ६ ब्राह्मण ५ मन्त्र ४ ३५७
के पुत्र से, वात्सी सुत ने पाराशरी सुत से, पाराशरी सुत ने वार्कारुणी पुत्र से, वार्कारुणी पुत्र ने आर्तभागी
पुत्र से, आर्तभागी तनय ने शौङ्गी सुत से, शौङ्गी सुत ने सांकृती पुत्र से, सांकृती पुत्र ने आलम्बायनी के पुत्र
से, आलम्बायनी पुत्र ने आलम्बी के पुत्र से, आलम्बी पुत्र ने जायन्ती के पुत्र से, जायन्ती पुत्र ने
माण्डूकायनी पुत्र से, माण्डूकायनी तनय ने माण्डूकी तनय से, माण्डूकी तनय ने शाण्डिली पुत्र से,
शाण्डिली पुत्र ने राथीतरी के पुत्र से, राथीतरी पुत्र ने भालुकी सुत से, भालुकी सुत ने दो क्रौञ्चिकी सुतों
से, दोनों क्रौञ्चिकी सुतों ने वैद्धृती पुत्र से, वैद्धृती पुत्र ने कार्शकेयी पुत्र से, कार्शकेयी पुत्र ने प्राचीन
योगी पुत्र से, प्राचीन योगी पुत्र ने साञ्जीवी पुत्र से, साञ्जीवी पुत्र ने आसुरिवासी प्राश्री पुत्र से, प्राश्रीपुत्र
ने आसुरायण से, आसुरायण ने आसुरि से ज्ञान प्राप्त किया। आसुरि ने याज्ञवल्क्य से, याज्ञवल्क्य ने उद्दालक
से, उद्दालक ने अरुण से, अरुण ने उपवेशि से, उपवेशि ने कुश्रि से , कुश्रि ने वाजश्रवा से, वाजश्रवा ने
जिह्वावान् बाध्योग से, जिह्वावान् बाध्योग ने असित वार्षगण से, असित वार्षगण ने हरित कश्यप से, हरित
कश्यप ने शिल्प कश्यप से, शिल्प कश्यप ने नैध्रुवि कश्यप से, नैध्रुविकश्यप ने वाक् से, वाक् ने अम्भिणी
से, अम्भिणी ने आदित्य से शिक्षा प्राप्त की। आदित्य द्वारा प्रदत्त शुक्ल यजुर्वेद की श्रुतियाँ ही वाजसनेय
याज्ञवल्क्य द्वारा प्रसारित की गई हैं॥ १-३॥
समानमा सांजीवीपुत्रात्सांजीवीपुत्रो माण्डूकायनेर्माण्डूकायनिर्माण्डव्यान्माण्डव्यः
कौत्सात्कौत्सो माहित्थेर्माहित्थिर्रामकक्षायणाद्वामकक्षायणः शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यो
वात्स्याद्वात्स्यः कुश्रेः कुश्रिर्यज्ञवचसो राजस्तम्बायनाद्यज्ञवचा राजस्तम्बायनस्तुरा-
त्कावषेयात्तुरः कावषेयः प्रजापतेः प्रजापतिर्ब्रह्मणो ब्रह्म स्वयंभु ब्रह्मणे नमः ॥ ४॥
साञ्जीवी पुत्र तक एक ही वंश है। (इसके पश्चात्) साञ्जीवी पुत्र ने माण्डूकायनि से, माण्डूकायनि
ने माण्डव्य से, माण्डव्य ने कौत्स से, कौत्स ने माहित्थि से, माहित्थि ने वामकक्षायण से, वामकक्षायण ने
शाण्डिल्य से, शाण्डिल्य ने वात्स्य से, वात्स्य ने कुश्रि से, कुश्रि ने यज्ञवचा राजस्तम्बायन से, यज्ञवचा
राजस्तम्बायन ने तुर कावषेय से, तुर कावषेय ने प्रजापति से, प्रजापति ने ब्रह्म से ज्ञान प्राप्त किया। ब्रह्म तो
स्वयंभू है। उस स्वयंभू ब्रह्म को नमन है ॥ ४॥
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ पूर्णमदःपूर्णमिदं .........इति शान्तिः ॥
॥ इति बहदारण्यकोपनिषत्समाप्ता ॥

॥ मान्त्रिकापानषद् ॥
यह उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद से सम्बद्ध है। उपनिषदकार कहते हैं कि यह जीवात्मा स्वयं को परमात्मा का
अंश अनुभव करता हुआ भी उसे सहज रूप में देख नहीं पाता। जब देहासक्ति तथा देहाभिमान रूपी अंधकार
छँटता है, तभी उसे देख पाना सम्भव होता है। सामान्य रूप से लोग अविनाशी और अविचल माया का ही ध्यान
करते हैं, उसमें संव्यास हंस रूप उस परमात्मा का अनुभव करना आवश्यक है। उसी को व्यक्त-अव्यक्त, द्वैत-
अद्वैत, सूक्ष्म एवं विराट् रूपों में गाया गया है। सभी मंत्रों का रहस्य वही ब्रह्म है। ऋषि ने उसे ब्रह्मचारी, स्तंभ की
तरह अडिग, संसार रूप में फलित होने वाला तथा विश्व शकट को खींचने वाला कहा है।
॥ शान्ति पाठः ॥
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं ...........इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य - ईशावास्योपनिषद)
ॐ अष्टपादं शुचिं हंसं त्रिसूत्रमणुमव्ययम्।
त्रिवर्त्मानं तेजसोऽहं सर्वतःपश्यन्न पश्यति ॥ १ ॥
आठ चरणों वाले, पवित्र स्वरूप, हंस (परमात्मा) रूप, त्रिसूत्र (व्यष्टि, समष्टि, तदुभय) रूप,
अतिसूक्ष्म, अव्यय और देदीप्यमान उस परमात्म चेतना को हम (भक्ति, ज्ञान, कर्म) तीन मार्गों से सर्वत्र
अनुभव करते हैं; परन्तु देख नहीं पाते ॥ १ ॥
भूतसंमोहने काले भिन्ने तमसि वैखरे। अन्तः पश्यन्ति सत्त्वस्था निर्गुणं गुणगह्वरे ॥
यद्यपि वह परमात्म चेतना निर्गुण है, तो भी वह गुण रूपी गुहा में समाया हुआ है। सामान्य पुरुष
मोहादि से सम्मोहित अवस्थाजन्य अन्धकार में निमग्न रहते हैं; परन्तु सात्त्विक गुणों में अवस्थित रहने
वाले पुरुष उसे अपने अन्तःकरण में देखते हैं ॥ २ ॥
अशक्यः सोऽन्यथा द्रष्टुं ध्यायमानः कुमारकैः ।
विकारजननीमज्ञामष्टरूपामजां ध्रुवाम् ॥ ३ ॥
अन्य किसी प्रकार से भी ध्यान किया जाए, तो भी उस परमात्म चेतना को अज्ञानी पुरुष नहीं देख
सकते, क्योंकि जगत् में विकारों को जन्म देने वाली, अज्ञान रूप वाली, आठरूप वाली (पंचभूत, मन,
बुद्धि, अहंकार), अजन्मा (प्रकृति रूप) माया का प्रभाव अविचल रहता है ॥ ३ ॥
ध्यायतेऽध्यासिता तेन तन्यते प्रेर्यते पुनः । सूयते पुरुषार्थं च तेनैवाधिष्ठितं जगत् ॥
ध्यान (चिन्तन) के द्वारा ही उस माया के ज्ञान की प्राप्ति होती है। उसी (माया) के द्वारा यह
(आध्यात्मिक-जीव) विस्तार को प्राप्त होता है और (बन्धन से मुक्त होने के लिए ) प्रेरित होता है।
वस्तुतः पुरुष जो (आध्यात्मिक) पुरुषार्थ करता है, उसी पुरुषार्थ के द्वारा यह जगत् अधिष्ठित है ॥ ४ ॥
गौरनाद्यन्तवती सा जनित्री भूतभाविनी ।
सितासिता च रक्ता च सर्वकामदुघा विभोः ॥ ५ ॥
यह गौरूपी माया उत्पत्ति और प्रलय से युक्त है, सबकी सहायिका है, प्राणि-मात्र की पोषिका है।
यह श्वेत, कृष्ण और रक्तवर्णा (सत्, रज, तम) है तथा सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाली है ॥ ५ ॥
पिबन्त्येनामविषयामविज्ञातां कुमारकाः ।
एकस्तु पिबते देवः स्वच्छन्दोऽत्र वशानुगः ॥ ६ ॥

मन्त्र १५ ३५९
सभी जीव (कुमार) इस माया रूपी गौ के पय का दोहन करते हैं; परन्तु वह परम पुरुष इस माया
के विषयों से भिन्न और अविज्ञात है, वह स्वयं स्वच्छन्द रहकर, सभी प्राणियों को वश में रखकर अकेला
ही (सम्पूर्ण प्राणियों में-आत्म रूप में) माया का पयःपान (निर्लिप्त रहकर) करता है ॥ ६ ॥
ध्यानक्रियाभ्यां भगवान्भुङ्क्तेऽसौ प्रसहद्भिभूः ।
सर्वसाधारणीं दोग्ध्रीं पीयमानां तु यज्वभिः ॥ ७ ॥
सर्व साधारण द्वारा दुही जाती और याज्ञिकों द्वारा यजन की जाती हुई इस माया रूपी गौ का वह
भगवान् (ऐश्वर्यशाली) ध्यान (चिन्तन) और क्रिया (यौगिक क्रिया) द्वारा उपभोग करता है और उसे
अत्यन्त व्यापक बनाता जाता है ॥ ७ ॥
पश्यन्त्यस्यां महात्मानः सुवर्णं पिप्पलाशनम् ।
उदासीनं ध्रुवं हंसं स्नातकाध्वर्यवो जगुः ॥ ८ ॥
महात्मा पुरुष सु-रूप (वर्ण) वाले इस जगत् रूप पीपल का फल खाते हैं और इस जगत् की माया में उस
उदासीन परम पुरुष और परमहंस को ही देखते हैं। सभी स्नातक और अध्वर्युगण उसी का गान करते हैं ॥ ८ ॥
शंसन्तमनुशंसन्ति बह्वचाः शास्त्रकोविदाः । रथन्तरं बृहत्साम सप्तवैधैस्तु गीयते ॥
शास्त्रज्ञ जन ऋचाओं के माध्यम से तथा स्तोता जन (स्तुतियों के द्वारा) उसी परम पुरुष की स्तुति
करते हैं और उसी के लिए रथन्तर संज्ञक तथा बृहत्साम का सप्तविध गान करते हैं ॥ ९ ॥
मन्त्रोपनिषदं ब्रह्म पदक्रमसमन्वितम् । पठन्ति भार्गवा होते ह्वाथर्वाणो भृगूत्तमाः ॥
मन्त्रों का रहस्य ही ब्रह्म है, उसी को भृगुवंशी श्रेष्ठ 'भार्गव' लोग अथर्ववेदीय पद और क्रम के
अनुसार पढ़ते हैं ॥ १० ॥
सब्रह्मचारिवृत्तिश्च स्तम्भोऽथ फलितस्तथा।
अनड्वाञ्रोहितोच्छिष्टः पश्यन्तो बहुविस्तरम् ॥ ११ ॥
यह परम-पुरुष ब्रह्मचारी वृत्ति वाला, स्तम्भ के सदृश अटल, जगत् रूप में फलयुक्त, जगत् रूप
शकट का वाहक, रजोगुण से रहित, सत्त्वगुण सम्पन्न तथा अत्यन्त व्यापक रूप में दिखाई देने वाला है ॥ ११ ॥
कालः प्राणश्च भगवान्मृत्युः शर्वो महेश्वरः ।
उग्रो भवश्च रुद्रश्च ससुरः सासूरस्तथा ॥ १२ ॥
(षडैश्वर्य सम्पन्न) यह परमपुरुष भगवान् कालरूप, प्राणरूप, मृत्युरूप, शर्वरूप, महेश्वररूप, भवरूप,
रुद्ररूप, उग्ररूप, ससुर (देवयुक्त) तथा सासूर (असुरयुक्त) भी हैं ॥ १२ ॥
प्रजापतिर्विराट् चैव पुरुषः सलिलमेव च । स्तूयते मन्त्रसंस्तुत्यैरथर्वाविदितैर्विभुः ॥
वह परमदेव, प्रजापति, विराट् पुरुष और जलादि देवताओं के रूप में सबके लिए स्तुति करने योग्य
है। अथर्ववेद द्वारा उसके व्यापक रूप का परिज्ञान होता है ॥ १३ ॥
तं षड्विंशक इत्येते सप्तविंशं तथापरे । पुरुषं निर्गुणं सांख्यमथर्वशिरसो विदुः ॥
कोई उसे छब्बीसवाँ तत्त्व कहते हैं, कोई सत्ताईसवाँ तत्त्व कहते हैं। अथर्वशिर (उपनिषद्) के ज्ञाता
उसे निर्गुण सांख्यपुरुष कहते हैं ॥ १४ ॥
चतुर्विंशतिसंख्यातं व्यक्तमव्यक्तमेव च। अद्वैतं द्वैतमित्याहुस्त्रिधा तं पञ्चधा तथा ॥

३६० मन्त्रिकोपनिषद्
कोई उसे चौबीस संख्यक तत्त्वों वाला (सांख्य दर्शन), कोई उसे व्यक्त (जगत्) और कोई अव्यक्त
(प्रकृति) मानते हैं। कोई उसे द्वैत (जीव-ब्रह्म) और कोई अद्वैत (ब्रह्म) मानते हैं। इसी प्रकार कोई उसे तीन रूपों
(ब्रह्मा, विष्णु, महेश) वाला और कोई पाँच रूपों वाला (ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गौरी और गणेश) मानते हैं॥ १५ ॥
ब्रह्माद्यं स्थावरान्तं च पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ।
तमेकमेव पश्यन्ति परिशुभ्रं विभुं द्विजाः ॥ १६ ॥
अनेक ज्ञान-दृष्टि सम्पन्न विद्वान् ब्रह्म (सबसे बड़ा तथा चैतन्य रूप) से लेकर जड़-पदार्थों तक
में एक ही अतिशुभ्र (शुद्ध) व्यापक सर्वोच्च सत्ता को व्याप्त हुआ अनुभव करते हैं॥ १६ ॥
यस्मिन्सर्वमिदं प्रोतं ब्रह्म स्थावरजंगमम् ।
तस्मिन्नेव लयं यान्ति स्रवन्त्यः सागरे यथा ॥ १७॥
यह सम्पूर्ण जड़-चेतन जगत् उस ब्रह्म में ही समाया हुआ है। जिस प्रकार नदियाँ बहती हुई समुद्र
में विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् भी उस ब्रह्म में ही लय को प्राप्त होता है॥ १७॥
यस्मिन्भावाः प्रलीयन्ते लीनाश्चाव्यक्ततां ययुः ।
पश्यन्ति व्यक्ततां भूयो जायन्ते बुद्बुदा इव ॥ १८ ॥
जिस प्रकार पानी का बुल-बुला पानी से उत्पन्न होता है और पानी में ही लय हो जाता है; उसी
प्रकार जिसमें सम्पूर्ण जीव-पदार्थ जन्म लेते हैं तथा जिसमें लय होकर अदृश्य हो जाते हैं, उसी को
ज्ञानीजन ब्रह्म कहते हैं॥ १८॥
क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं चैव कारणैर्विद्यते पुनः ।
एवं स भगवान्देवं पश्यन्त्यन्ये पुनःपुनः ॥ १९ ॥
वह 'क्षेत्रज्ञ' रूप में सम्पूर्ण प्राणियों में अधिष्ठित होता है और वह कार्य के पीछे (समस्त) कारणों
को जानने वाला होता है। ऐसे उस परम पुरुष को विद्वान् साधक बार-बार देखते हैं ॥ १९ ॥
ब्रह्म ब्रह्मेत्यथायान्ति ये विदुर्ब्राह्मणास्तथा।
अत्रैव ते लयं यान्ति लीनाश्चाव्यक्तशालिनः ॥
लीनाश्चाव्यक्तशालिन इत्युपनिषत् ॥ २० ॥
जो विद्वान् (ब्रह्मवेत्ता) उस ब्रह्म को जानते हैं, वे उसी ब्रह्म में लीन हो जाते हैं, उसी में लय होकर
वे अव्यक्त रूप से सुशोभित होते हैं, यह सुनिश्चित है। यही उपनिषद् (रहस्य) है॥ २० ॥
॥ शान्तिपाठः ॥
॥ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं........ इति शान्तिः ॥
॥ इति मन्त्रिकोपनिषत्समाप्ता ॥

॥ माण्डूक्यापानषद् ॥
यह उपनिषद् अथर्ववेद के अन्तर्गत है। इसमें 'ॐकार' को अक्षर ब्रह्म परमात्मा का श्रेष्ठ सम्बोधन
सिद्ध करते हुए उसके विभिन्न चरणों एवं मात्राओं का विवेचन किया गया है। अ, उ, म् तीन मात्राओं तथा
वैश्वानर, तैजस एवं प्राज्ञ इन तीन चरणों के साथ मात्रा रहित चौथे चरण निर्विशेष का उल्लेख किया गया है।
अव्यक्त परमात्मा के व्यक्त विराट् जगत् स्वरूप का भी वर्णन है। विश्व उसका स्थान है, सात लोक उसके
सात अंग तथा इन्द्रिय, प्राण, अन्तःकरण आदि उसके मुख कहे गये हैं। परमात्मा के निराकार-साकार
दोनों स्वरूपों की उपासना का मार्ग इससे प्रशस्त होता है।
॥ शान्ति पाठः ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा.....। स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ........... इति शान्तिः ॥
(द्रष्टव्य- प्रश्नोपनिषद्)
ओमित्येतदक्षरमिदꣳसर्वं तस्योपव्याख्यानभूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव।
यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥ १ ॥
ॐ यह अक्षर-अविनाशी (ब्रह्म का प्रतीक) है, उसकी महिमा को प्रकट करने वाला यह विश्व -
ब्रह्माण्ड है। भूत, भविष्यत् और वर्तमान-तीन कालों वाला यह संसार भी ॐकार ही है और तीन कालों
से अन्य जो भी तत्त्व है, वह भी ॐकार ही है ॥ १ ॥
सर्वꣳ ह्येतद्ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् ॥ २ ॥
यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म रूप ही है, यह आत्मा भी ब्रह्मरूप ही है। वह (ब्रह्म) और यह (आत्मा) चार
चरण वाला स्थूल या प्रत्यक्ष, सूक्ष्म, कारण एवं अव्यक्त रूपों में प्रभावी है ॥ २ ॥
अगले मंत्रों में चारों चरणों के स्थान और गुण-धर्मों को व्यक्त किया गया है-
जागरितस्थानो बहिःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः
पादः ॥ ३ ॥
प्रथम चरण स्थूल-वैश्वानर (प्रकट विश्व का संचालक) है, जो जाग्रत् स्थान में रहने वाला, बहिष्प्रज्ञ
(बाहर बोध कराने वाला), तथा सात अंगों (सप्तलोकों या सप्त किरणों से युक्त), उन्नीस मुखों (दस
इन्द्रियाँ, पाँच प्राण तथा अन्तःकरण चतुष्टय) वाला तथा स्थूल का भोक्ता है ॥ ३ ॥
स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक् तैजसो द्वितीयः
पादः ॥ ४ ॥
स्वप्न के सदृश अव्यक्त विश्व जिसका अधिष्ठान (स्थान) है, जिसके द्वारा अदृश्य लोक का ज्ञान
अन्तःचक्षुओं से होता है, जो सूक्ष्म विषयों (वासनादि) का भोक्ता है और ज्योतिर्मय है, वही तेजस् (ब्रह्म
या आत्मा का ) द्वितीय चरण है ॥ ४ ॥

३६२ माण्डूक्योपनिषद्
यत्र सुप्तो न कंचन कामं कामयते न कंचन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम् । सुषुप्तस्थान
एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥ ५॥
जिस अवस्था में प्रसुप्त मनुष्य किसी भोग की कामना नहीं करता और न ही स्वप्न देखता है, ऐसी
सुषुप्तावस्था में जो एकाग्र वृत्ति वाला, प्रकृष्ट ज्ञान स्वरूप और आनन्द रूप ही है एवं जो एकमात्र आनन्द
का ही भोक्ता है, जिसका मुख तेजोमय चैतन्य रूप है, वह 'प्राज्ञ' ही ब्रह्म का तृतीय चरण है ॥ ५ ॥
एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ॥ ६ ॥
वह ब्रह्म ही सबका ईश्वर है, वह सर्वज्ञ अन्तर्यामी और सम्पूर्ण जगत् का कारण भूत है। वही सब
भूतों की उत्पत्ति, स्थिति तथा विनाश का कारण है ॥ ६ ॥
नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्य-
वहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं
चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ ७॥
जो अन्तः अथवा बाह्य प्रज्ञा वाला नहीं है, जो दोनों ओर की प्रज्ञा वाला नहीं है, जो प्रकृष्ट ज्ञानपुञ्ज
नहीं है, न ज्ञान रूप है, न अज्ञान ही है, जो ज्ञानेन्द्रियगम्य नहीं है, जो कर्मेन्द्रियगम्य भी नहीं है, जो क्रिया
रहित है, जो प्रतीकों से भिन्न है, जो चिन्तन की सीमा से परे तथा कथन की सीमा से भी परे है, जो एकमात्र
अनुभवगम्य है, जो सम्पूर्ण प्रपञ्चों का लय स्थान है, जो शान्तस्वरूप, कल्याणरूप और अद्वैतरूप है,
वही ब्रह्म का चतुर्थ चरण है, वही आत्मा (या परमात्मा) है, वही जानने योग्य है ॥ ७ ॥
सोऽयमात्माध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार
इति ॥ ८ ॥
वह (ब्रह्म) और यह (आत्मा) अक्षर ॐकार रूप ही है । यह ॐकार मात्राओं में सन्निहित है।
इसकी मात्राएँ ही इसके चरण हैं और इसके चरण ही इसकी मात्राएँ हैं। ये मात्राएँ अकार, उकार और
मकार हैं ॥ ८ ॥
[ इस मंत्र में वर्णित ब्रह्म या आत्मा की मात्राएँ अनेक अर्थों में प्रकट होती हैं, ॐ में तीन मात्राएँ - अ, उ, म्
हैं। विश्व त्रि आयामी (थ्री डाइमेंशनल) है। सापेक्षवाद (थ्योरी आफ रिलेटिविटी) के अनुसार समय (टाइम),
आयतन (स्पेस) तथा भार (मांस) यह तीन आयाम हैं। समय में भी भूत, वर्तमान एवं भविष्यत् तीन मात्राएँ हैं।
आयतन में लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई यह तीन आयाम हैं। गुण रूप में भी सत्, रज, तम हैं। इस प्रकार यह ब्रह्म
तीन मात्राओं में व्यक्त है, यह कथन प्रमाणित होता है।]
जागरितस्थानो वैश्वानरोऽ कारः प्रथमा मात्राप्तेरादिमत्त्वाद्वा आप्नोति ह वै
सर्वान्कामानादिश्च भवति य एवं वेद ॥ ९॥
जाग्रत् स्थान वाला वैश्वानर व्याप्त होने और आदि तत्त्व होने के कारण ॐकार का प्रथम चरण है। इस
प्रकार का ज्ञान रखने वाला ज्ञानी सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त करता हुआ सबमें वरिष्ठता पाता है ॥९॥
[ सारे कौशल तथा स्थूल पुरुषार्थ वैश्वानर के अन्तर्गत आते हैं। उसे पाकर सब प्रकार की कामनाएँ पूर्ण
होती हैं।]
स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षादुभयत्वाद्वोत्कर्षति ह वै ज्ञानसंततिं
समानश्च भवति नास्याऽब्रह्मवित्कुले भवति य एवं वेद ॥ १०॥

मन्त्र १२ ३६३
स्वप्न स्थान वाला तेजस् श्रेष्ठ होने और द्विभाव में रहने से ॐकार का द्वितीय चरण है। इस प्रकार का
ज्ञान रखने वाला पुरुष ज्ञान का उत्कर्ष करता हुआ समान भाव में निमग्न रहता है। उसके कुल में ब्रह्म को
न जानने वाला कोई नहीं रहता ॥ १० ॥
[ तेजस् के अन्तर्गत सभी प्रकार के ज्ञान की धाराएँ आती हैं। उसे पाकर व्यक्ति ज्ञान की उच्चतम अवस्था
तक पहुँच जाता है।]
सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा मितेरपीतेर्वा मिनोति ह वा इदं
सर्वमपीतिश्च भवति य एवं वेद ॥ ११ ॥
सुषुप्ति स्थान वाला प्राज्ञ विश्व का मापक (विश्व की परिसीमा) और प्रलय करने वाला होने से ॐ
कार का तृतीय चरण है। इस प्रकार का ज्ञान रखने वाला ज्ञानी सम्पूर्ण विश्व का यथार्थ स्वरूप जानता हुआ
इन सबको स्वयं में लय करने वाला होता है ॥ ११ ॥
[ प्राज्ञ कारणसत्ता चेतना का ज्ञाता होता है। उस स्थिति में एक ही चेतन सर्वत्र सक्रिय दिखाई देता है। सभी
को बीजरूप में स्वयं में अनुभव किया जा सकता है।]
अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोङ्कार आत्मैव संविशत्या-
त्मनात्मानं य एवं वेद य एवं वेद ॥ १२ ॥
मात्रा रहित ॐकार क्रिया से रहित है। जगत् के प्रपंचों का शमन करने वाला, कल्याणकारी एवं
अद्वैत रूप है, यही ब्रह्म का चतुर्थ चरण है। जो इस प्रकार का ज्ञान रखता है, वह आत्मज्ञानी ज्ञान के द्वारा
आत्मा को परब्रह्म में प्रविष्ट कराता है ॥ १२ ॥
[ इस चरण में साधक निर्विकल्पक-अद्वैत बोध में पहुँच जाता है।]
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा....। स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ....... इति शान्तिः ॥
॥ इति माण्डूक्योपनिषत्समाप्ता ॥

॥ मुण्डकापानषद् ॥
यह अथर्ववेद की शौनकीय शाखा की उपनिषद् है, जिसमें तीन मुण्डक हैं तथा प्रत्येक मुण्डक में दो-दो
खण्ड हैं। 'मुण्डक' शब्द का तात्पर्यार्थ 'मन का मुण्डन कर अविद्या से मुक्त करने वाला ज्ञान' है। इसमें महर्षि
अङ्गिरा ने शौनक जी को परा-अपरा विद्या समझायी है। प्रथम मुण्डक के प्रथम खण्ड में ब्रह्मविद्या की परम्परा
के बाद ऋषि संवाद के रूप में परा-अपरा विद्या का विवेचन है एवं परा विद्या से ब्रह्मबोध तथा परमेश्वर से जगत्
की उत्पत्ति का वर्णन है। दूसरे खण्ड में अपरा विद्या, यज्ञ और उसके फल, भोगों से विरक्ति तथा ब्रह्मबोध के
लिए ब्रह्मनिष्ठ गुरु तथा अधिकारी शिष्य के सम्मिलन को आवश्यकता बतायी गयी है। द्वितीय मुण्डक में अग्नि की
चिनगारियों की तरह ब्रह्म से जगत् की उत्पत्ति एवं लय का वर्णन करते हुए ॐकार रूपी धनुष एवं आत्मा रूपी
बाण से परमात्मा का लक्ष्यवेध, ब्रह्म का स्वरूप एवं ब्रह्म प्राप्ति का महत्त्व है। तृतीय मुण्डक में शरीर रूपी एक ही
वृक्ष पर जीवात्मा और परमात्मा रूपी दो पक्षियों के उदाहरण सहित अन्तःकरण की शुद्धि द्वारा ब्रह्म प्राप्ति तथा
ब्रह्मवेत्ता की गति तथा महत्ता का वर्णन है।
॥ शान्ति पाठः ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम .......इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य- प्रश्नोपनिषद्)
॥ अथ प्रथमं मुण्डकम् ॥
॥ प्रथमः खण्डः ॥
ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः संबभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता ।
स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥ १ ॥
देव ब्रह्मा सभी देवों में प्रथम उत्पन्न हुए। वे विश्व का निर्माण करने वाले हैं और चौदह भुवनों के
रक्षक हैं। उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को समस्त विद्याओं की आधारभूता 'ब्रह्मविद्या' का उपदेश दिया ॥
अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्माथर्वा तां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम् ।
स भारद्वाजाय सत्यवाहाय प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम् ॥ २ ॥
अथर्वा को देव ब्रह्मा ने जिस ब्रह्म विद्या का उपदेश दिया था, अथर्वा ने वह विद्या अङ्गिर (अंगी
मुनि) को प्रदान की । अङ्गिर ने उसका उपदेश भरद्वाज पुत्र सत्यवाह को दिया। सत्यवाह ने वही विद्या
अङ्गिरस् को प्रदान की ॥ २ ॥
शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ ।
कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति ॥ ३ ॥
प्रसिद्ध सद्गृहस्थ शौनक ने अङ्गिरस् के पास शिक्षार्थी के रूप में विधिवूर्वक जाकर पूछा- हे
भगवन् ! किसके जान लेने पर यह सब कुछ जान लिया जाता है ॥ ३ ॥

मुण्डक १ खण्ड २ मन्त्र १ ३६५
तस्मै स होवाच। द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च ॥
अङ्गिरस् ऋषि ने शौनक को उत्तर दिया-ब्रह्मवेत्ताओं ने ब्रह्मविद्या के अन्तर्गत दो विद्याएँ जानने योग्य
बतायी हैं- एक परा विद्या और दूसरी अपरा विद्या ॥ ४ ॥
तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो
ज्योतिषमिति। अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ ५ ॥
जिसमें ऋग्, यजुष्, साम, अथर्व, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष् का ज्ञान होता
है-वह अपरा विद्या है तथा जिसमें उस अक्षर 'ब्रह्म' (ॐकार) का ज्ञान होता है, वह परा विद्या है ॥ ५ ॥
यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादं नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं
तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥ ६ ॥
वह जो देखा न जा सके, न पकड़ा जा सके, जिसका कोई गोत्र नहीं, कोई वर्ण नहीं, जिसे चक्षु और
श्रोत्र की आवश्यकता नहीं, जिसे हाथ और पैरों की आवश्यकता नहीं, जो सदैव नित्य, व्यापक, सर्वत्र
व्याप्त और अत्यन्त सूक्ष्म है, जो क्षयरहित अथवा अनश्वर है, जो सम्पूर्ण भूतों का कारणभूत है, उस परब्रह्म
को विवेकीजन सर्वत्र देखते हैं ॥ ६ ॥
यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः संभवन्ति।
यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि तथाक्षरात्संभवतीह विश्वम् ॥ ७ ॥
मकड़ी जैसे अपने पेट से जाले को उत्पन्न करती और अपने भीतर ही निगल लेती है, पृथ्वी जैसे
विभिन्न प्रकार की ओषधियाँ उत्पन्न करती है, मनुष्य शरीर से जैसे केश और लोम (रोयें) उत्पन्न होते हैं,
वैसे ही उस अनश्वर ब्रह्म से ही यह विश्व उत्पन्न होता है ॥ ७ ॥
तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते । अन्नात्प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु
चामृतम् ॥ ८ ॥
तप के द्वारा ब्रह्म बढ़ता है (बीज रूप को प्राप्त होता है)। उससे अन्न उत्पन्न होता है, अन्न से प्राण,
उससे मन, उससे सत्य (पञ्चभूत), उससे लोक और मनुष्यादि, उनसे कर्म और कर्म से अमृतरूप फल
प्राप्त होता है ॥ ८ ॥
यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद्ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥ ९ ॥
जो सर्वज्ञ और सर्वविद् है, उसका तप भी ज्ञान युक्त होता है। उसी परब्रह्म से इस ब्रह्माण्ड में
नाम, रूप और अन्न उत्पन्न होता है ॥ ९ ॥
[ परब्रह्म कायारहित है, इसलिए उसके द्वारा किया हुआ तप लौकिक प्रचलन के आधार पर नहीं समझा जा
सकता। वह अविरल-शान्त, अगम स्थिति में संकल्प पूर्वक जो हलचल उत्पन्न करता है, वही उसका तप है।]
॥ द्वितीयः खण्डः ॥
तदेतत्सत्यं मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यंस्तानि त्रेतायां बहुधा संततानि ।
तान्याचरथ नियतं सत्यकामा एष वः पन्थाः सुकृतस्य लोके ॥ १ ॥

३६६ मुण्डकोपनिषद्
सूक्ष्मदर्शी ज्ञानियों ने वेदमन्त्रों में जिन कर्मों का दर्शन किया, त्रेतायुग में उन्हीं का विविध प्रकार से
विस्तार हुआ। हे सत्य की कामना से युक्त पुरुषो ! अपने कर्मों का श्रेष्ठ फल प्राप्त करने के लिए इस जगत्
में यही मार्ग है कि आप सब नित्य ही श्रेष्ठ आचरण करें ॥ १ ॥
यदा लेलायते ह्यर्चिःसमिद्धे हव्यवाहने
तदाज्यभागावन्तरेणाहुतीःप्रतिपादयेच्छ्रद्धया हुतम् ॥ २ ॥
देवताओं तक हव्य पहुँचाने वाले अग्नि के प्रदीप्त होने पर समिधाओं के बीच से जब ज्वालाएँ धधक
उठें, उस समय आज्य भाग आहुतियों के बीच में श्रद्धापूर्वक क्रमशः आहुतियाँ प्रदान करें ॥ २ ॥
यस्याग्निहोत्रमदर्शमपौर्णमासमचातुर्मास्यमनाग्रयणमतिथिवर्जितं च ।
अहुतमवैश्वदेवमविधिना हुतमासप्तमांस्तस्य लोकान्हिनस्ति ॥ ३ ॥
जिसका अग्निहोत्र दर्श (अमावस्या)-पौर्णमास (पूर्णमासी) से रहित, चातुर्मास्य सम्बन्धी यज्ञ तथा
आग्रयण (शरद् ऋतु में निर्दिष्ट यज्ञ) से रहित, अतिथि पूजन से रहित, यथा समय किये जाने वाले यज्ञ तथा
बलिवैश्व से रहित एवं विधि रहित है, ऐसा अग्निहोत्री अपने सात जन्मों के पुण्य का विनाश करता है ॥ ३ ॥
काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा ।
स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥ ४ ॥
काली, कराली (अत्यन्त तीक्ष्ण), मनोजवा (मन के समान चञ्चल), लाल वर्ण वाली, धूम्र वर्ण
वाली, चिनगारी वाली तथा देदीप्यमान विश्वरुची ये अग्नि की सप्त जिह्वाएँ हैं ॥ ४ ॥
एतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकालं चाहुतयो ह्याददायन् ।
तन्नयन्त्येताः सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽ धिवासः ॥ ५ ॥
जो पुरुष इन देदीप्यमान अग्नि ज्वालाओं में यथासमय आहुतियाँ देता हुआ अग्निहोत्र कृत्य सम्पन्न
करता है, उसे वे आहुतियाँ ही सूर्य रश्मियों के साथ देवाधिपति इन्द्रदेव के पास(स्वर्ग में) ले जाती हैं ॥
एह्येहीति तमाहुतयः सुवर्चसः सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति।
प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्य एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः ॥ ६ ॥
वे आहुतियाँ यजमान का सत्कार करती हुई उसे सूर्यरश्मियों के साथ ले जाती हुई कहती हैं कि
आओ-आओ, यह आपके शुभ कर्मों के पुण्य (फल) से प्राप्त हुआ ब्रह्मलोक है ॥ ६ ॥
प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म ।
एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापि यन्ति ॥ ७ ॥
ये यज्ञरूप अग्निहोत्रादि कर्म जिनमें अट्ठारह ऋत्विज् ( १६ ऋत्विज्, यजमान और यजमान पत्नी) कहे
जाते हैं। सकाम कर्म के आदेश में आने से अस्थिर एवं नाशवान् बताये गये हैं। जो मूढ़ लोग 'यही श्रेय
है' कहकर इनकी प्रशंसा करते हैं, वे बार-बार जरा-मरण को प्राप्त होते रहते हैं ॥ ७ ॥
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः ।
जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ८ ॥
अविद्याग्रस्त रहते हुए भी अपने को बड़ा बुद्धिमान् तथा बड़ा पण्डित समझने वाले वे मूढ़ लोग
अन्धे के नेतृत्व में चलने वाले अन्धों के समान भटकते और अनेक कष्ट सहन करते हैं ॥ ८ ॥

मुण्डक २ खण्ड १ मन्त्र १ ३६७
अविद्यायां बहुधा वर्तमाना वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति बालाः ।
यत्कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात्तेनातुराः क्षीणलोकाश्च्यवन्ते ॥ ९ ॥
अज्ञानी पुरुष अविद्या में अनेक प्रकार से फँसकर 'हम कृतार्थ हो गये हैं', ऐसा मानते हुए अभिमान
करते हैं; क्योंकि सकाम कर्म करने वाले कर्मफल में आसक्त होने से तत्त्वज्ञान नहीं समझते, अतः वे दुःखों
से व्याकुल होते और कर्मफल क्षीण होने पर स्वर्ग से च्युत हो जाते हैं ॥ ९ ॥
इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः ।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥ १० ॥
इष्ट और पूर्त कर्मों को ही श्रेष्ठ मानते हुए वे महामूढ़ किसी अन्य को श्रेयस्कर नहीं जानते हैं। सकाम कर्म के
फल को वे स्वर्ग से भी उच्च अनुभव करते हैं; परन्तु वे इस लोक या उससे भी निम्न लोक में प्रवेश करते हैं ॥ १० ॥
तपः श्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो भैक्षचर्यां चरन्तः ।
सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥ ११ ॥
जो वन में निवास करते हुए, तपः साधना करते हुए, श्रद्धालुयुक्त जीवन जीते हुए और भिक्षाटन करते
हुए संतोषी जीवन जीते हैं, वे मल-विक्षेपों से रहित होकर सूर्यद्वार (उत्तरायण मार्ग) से वहाँ जाते हैं,
जहाँ अमर और अविनाशी ब्रह्म का परम धाम है ॥ ११ ॥
परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन ।
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्सम्पित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ १२ ॥
कर्मों द्वारा प्राप्त होने वाले लोकों (की असारता) को जानकर ब्राह्मण (ब्रह्मविद्या के अधिकारी)
वैराग्य को प्राप्त हो; क्योंकि केवल किये हुए (सकाम) कर्म से ब्रह्म की प्राप्ति नहीं हो सकती, अतः उस ब्रह्म
का ज्ञान प्राप्त करने के लिए जिज्ञासु को हाथ में समिधा लेकर वेदज्ञ और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाना चाहिए ॥
तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय ।
येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् ॥ १३ ॥
वह ज्ञानवान् गुरु पास में आये हुए उस पूर्णतया शान्तचित्त एवं जितेन्द्रिय शिष्यरूप जिज्ञासु को तत्त्वतः
ब्रह्मविद्या का उपदेश करे, जिससे शिष्य को सत्यस्वरूप अविनाशी ब्रह्म का सम्यक् ज्ञान हो सके ॥ १३ ॥
॥ द्वितीयं मुण्डकम् ॥
॥ प्रथमः खण्डः ॥
तदेतत्सत्यं यथा सुदीप्तात्पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः ।
तथाक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ॥ १ ॥
वह (ब्रह्म और) यह (जगत्) सत्य है, जैसे प्रदीप्त अग्नि के समान सहस्रों चिनगारियाँ उत्पन्न होती हैं, वैसे
ही हे प्रिय ! उस ब्रह्म से अनेक प्रकार के भाव प्रकट होते हैं और उसमें ही विलीन भी हो जाते हैं ॥१ ॥