१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 367, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुण्डक २ खण्ड १ मन्त्र १ ३६७
अविद्यायां बहुधा वर्तमाना वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति बालाः ।
यत्कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात्तेनातुराः क्षीणलोकाश्च्यवन्ते ॥ ९ ॥
अज्ञानी पुरुष अविद्या में अनेक प्रकार से फँसकर 'हम कृतार्थ हो गये हैं', ऐसा मानते हुए अभिमान
करते हैं; क्योंकि सकाम कर्म करने वाले कर्मफल में आसक्त होने से तत्त्वज्ञान नहीं समझते, अतः वे दुःखों
से व्याकुल होते और कर्मफल क्षीण होने पर स्वर्ग से च्युत हो जाते हैं ॥ ९ ॥
इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः ।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥ १० ॥
इष्ट और पूर्त कर्मों को ही श्रेष्ठ मानते हुए वे महामूढ़ किसी अन्य को श्रेयस्कर नहीं जानते हैं। सकाम कर्म के
फल को वे स्वर्ग से भी उच्च अनुभव करते हैं; परन्तु वे इस लोक या उससे भी निम्न लोक में प्रवेश करते हैं ॥ १० ॥
तपः श्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो भैक्षचर्यां चरन्तः ।
सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥ ११ ॥
जो वन में निवास करते हुए, तपः साधना करते हुए, श्रद्धालुयुक्त जीवन जीते हुए और भिक्षाटन करते
हुए संतोषी जीवन जीते हैं, वे मल-विक्षेपों से रहित होकर सूर्यद्वार (उत्तरायण मार्ग) से वहाँ जाते हैं,
जहाँ अमर और अविनाशी ब्रह्म का परम धाम है ॥ ११ ॥
परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन ।
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्सम्पित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ १२ ॥
कर्मों द्वारा प्राप्त होने वाले लोकों (की असारता) को जानकर ब्राह्मण (ब्रह्मविद्या के अधिकारी)
वैराग्य को प्राप्त हो; क्योंकि केवल किये हुए (सकाम) कर्म से ब्रह्म की प्राप्ति नहीं हो सकती, अतः उस ब्रह्म
का ज्ञान प्राप्त करने के लिए जिज्ञासु को हाथ में समिधा लेकर वेदज्ञ और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाना चाहिए ॥
तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय ।
येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् ॥ १३ ॥
वह ज्ञानवान् गुरु पास में आये हुए उस पूर्णतया शान्तचित्त एवं जितेन्द्रिय शिष्यरूप जिज्ञासु को तत्त्वतः
ब्रह्मविद्या का उपदेश करे, जिससे शिष्य को सत्यस्वरूप अविनाशी ब्रह्म का सम्यक् ज्ञान हो सके ॥ १३ ॥
॥ द्वितीयं मुण्डकम् ॥
॥ प्रथमः खण्डः ॥
तदेतत्सत्यं यथा सुदीप्तात्पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः ।
तथाक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ॥ १ ॥
वह (ब्रह्म और) यह (जगत्) सत्य है, जैसे प्रदीप्त अग्नि के समान सहस्रों चिनगारियाँ उत्पन्न होती हैं, वैसे
ही हे प्रिय ! उस ब्रह्म से अनेक प्रकार के भाव प्रकट होते हैं और उसमें ही विलीन भी हो जाते हैं ॥१ ॥