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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 361, कुल 505 में से

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पृष्ठ 361

॥ माण्डूक्यापानषद् ॥
यह उपनिषद् अथर्ववेद के अन्तर्गत है। इसमें 'ॐकार' को अक्षर ब्रह्म परमात्मा का श्रेष्ठ सम्बोधन
सिद्ध करते हुए उसके विभिन्न चरणों एवं मात्राओं का विवेचन किया गया है। अ, उ, म् तीन मात्राओं तथा
वैश्वानर, तैजस एवं प्राज्ञ इन तीन चरणों के साथ मात्रा रहित चौथे चरण निर्विशेष का उल्लेख किया गया है।
अव्यक्त परमात्मा के व्यक्त विराट् जगत् स्वरूप का भी वर्णन है। विश्व उसका स्थान है, सात लोक उसके
सात अंग तथा इन्द्रिय, प्राण, अन्तःकरण आदि उसके मुख कहे गये हैं। परमात्मा के निराकार-साकार
दोनों स्वरूपों की उपासना का मार्ग इससे प्रशस्त होता है।
॥ शान्ति पाठः ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा.....। स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ........... इति शान्तिः ॥
(द्रष्टव्य- प्रश्नोपनिषद्)
ओमित्येतदक्षरमिदꣳसर्वं तस्योपव्याख्यानभूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव।
यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥ १ ॥
ॐ यह अक्षर-अविनाशी (ब्रह्म का प्रतीक) है, उसकी महिमा को प्रकट करने वाला यह विश्व -
ब्रह्माण्ड है। भूत, भविष्यत् और वर्तमान-तीन कालों वाला यह संसार भी ॐकार ही है और तीन कालों
से अन्य जो भी तत्त्व है, वह भी ॐकार ही है ॥ १ ॥
सर्वꣳ ह्येतद्ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् ॥ २ ॥
यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म रूप ही है, यह आत्मा भी ब्रह्मरूप ही है। वह (ब्रह्म) और यह (आत्मा) चार
चरण वाला स्थूल या प्रत्यक्ष, सूक्ष्म, कारण एवं अव्यक्त रूपों में प्रभावी है ॥ २ ॥
अगले मंत्रों में चारों चरणों के स्थान और गुण-धर्मों को व्यक्त किया गया है-
जागरितस्थानो बहिःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः
पादः ॥ ३ ॥
प्रथम चरण स्थूल-वैश्वानर (प्रकट विश्व का संचालक) है, जो जाग्रत् स्थान में रहने वाला, बहिष्प्रज्ञ
(बाहर बोध कराने वाला), तथा सात अंगों (सप्तलोकों या सप्त किरणों से युक्त), उन्नीस मुखों (दस
इन्द्रियाँ, पाँच प्राण तथा अन्तःकरण चतुष्टय) वाला तथा स्थूल का भोक्ता है ॥ ३ ॥
स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक् तैजसो द्वितीयः
पादः ॥ ४ ॥
स्वप्न के सदृश अव्यक्त विश्व जिसका अधिष्ठान (स्थान) है, जिसके द्वारा अदृश्य लोक का ज्ञान
अन्तःचक्षुओं से होता है, जो सूक्ष्म विषयों (वासनादि) का भोक्ता है और ज्योतिर्मय है, वही तेजस् (ब्रह्म
या आत्मा का ) द्वितीय चरण है ॥ ४ ॥