१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
२२८ प्रणवापानषद्
सूर्यमण्डलमाभाति ह्यकारश्चन्द्रमध्यगः।
उकारश्चन्द्रसंकाशस्तस्य मध्ये व्यवस्थितः॥ ७॥
सूर्य मण्डल का जो स्वरूप है, वह ॐकार के अक्षरों में 'अकार' का स्वरूप है। चन्द्रमण्डल का
स्वरूप 'उकार' से निरूपित है, जो इस ॐकार के मध्य में अवस्थित है॥ ७॥
मकारश्चाग्निसंकाशो विधूमो विद्युतोपमः।
तिस्रो मात्रास्तथा ज्ञेयाः सोमसूर्याग्नितेजसः॥ ८॥
ॐकार का अन्तिम अक्षर मकार, उस अग्नि स्वरूप में है, जो धूम्ररहित है, विद्युत् सदृश है। ॐकार
की तीनों मात्राओं को चन्द्र, सूर्य और अग्नि के तेजस् के स्वरूप में समझना चाहिए॥ ८॥
शिखा च दीपसंकाशा यस्मिन्नु परिवर्तते।
अर्धमात्रा तथा ज्ञेया प्रणवस्योपरि स्थिता॥ ९॥
दीपक की ज्योतिशिखा के स्वरूप में, जिसमें शिखा ऊर्ध्वगामी हो, उस प्रणव अक्षर 'ॐकार' के
ऊपर स्थित अर्द्धचन्द्र-अर्द्ध मात्रा को समझना चाहिए॥ ९॥
पद्मसूत्रनिभा सूक्ष्मा शिखाभा दृश्यते परा।
नासादि सूर्यसंकाशा सूर्य हित्वा तथापरम्॥ १०॥
दूसरी कमल सूत्र (कमल नाल) के सदृश सूक्ष्म शिखा की कान्ति (मस्तक प्रदेश में) दृष्टिगोचर
होती है, वह नासारन्ध्र से सूर्यवत् तेज को धारण कर सूर्यमण्डल का भेदन कर वहाँ स्थित है॥ १०॥
द्विसप्ततिसहस्त्राणि नाडिभिस्त्वा तु मूर्धनि।
वरदं सर्वभूतानां सर्वं व्याप्यैव तिष्ठति॥ ११॥
अग्नि स्वरूप में वह शिखा (ॐकार की अर्द्धमात्रा) बहत्तर हजार नाड़ियों के द्वारा सम्पूर्ण प्राणियों
को वर (जीवन-प्राण) देने वाली और सबको व्याप्त करके अवस्थित है॥ ११॥
कांस्यघण्टानिनादः स्याद्यदा लिप्यति शान्तये।
ओङ्कारस्तु तथा योज्यः श्रुतये सर्वमिच्छति॥ १२॥
जब मुमुक्षु मोक्ष प्राप्ति के निकट शान्त स्थिति को प्राप्त होता है, तो काँसे के घण्टे के समान निनाद
सुनाई देता है, यह ॐ कार का ही स्वरूप है। इस स्वरूप को सभी साधक सुनने की इच्छा करते हैं॥ १२॥
यस्मिन् स लीयते शब्दस्तत्परं ब्रह्म गीयते।
सोऽमृतत्वाय कल्पते सोऽमृतत्वाय कल्पते इति॥ १३॥
जो साधक (उक्त) ओङ्कार स्वरूप शब्द नाद में लीन हो जाता है, वह ब्रह्मस्वरूप ही कहा जाता है।
वही अमृतत्व को प्राप्त हो जाता है, यह सुनिश्चित है॥ १३॥
॥ इति प्रणवोपनिषत् समाप्ता ॥
॥ प्रश्नोपनिषद् ॥
यह उपनिषद् अथर्ववेद के पिप्पलाद शाखा का ब्राह्मण भाग है। प्रश्नोपनिषद् में जिज्ञासुओं द्वारा
महर्षि पिप्पलाद से पूछे गये छः प्रश्न और उनके उत्तरों का वर्णन है। प्रथम प्रश्न में कबन्धी ने प्राण और रयि
के सम्बन्ध में जानना चाहा। द्वितीय प्रश्न में भार्गव ने प्रजा के आधार विषयक तीन प्रश्न किये हैं। तीसरे प्रश्न
के अन्तर्गत आश्वलायन द्वारा प्राण की उत्पत्ति के सन्दर्भ में छः प्रश्न पूछे गये हैं। चौथे प्रश्न में गार्ग्य द्वारा
जीवात्मा-परमात्मा के सम्बन्ध में पाँच जिज्ञासाएँ प्रकट की गयी हैं। पाँचवें प्रश्न के अन्तर्गत सत्यकाम ने
ॐकार-उपासना जाननी चाही है। छठा प्रश्न सुकेशा ने किया, जिसमें १६ कलायुक्त पुरुष के विषय में
जिज्ञासा की गयी है। अन्त में सभी प्रश्नों के समुचित समाधान पाकर जिज्ञासुओं द्वारा महर्षि पिप्पलाद के
प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उनकी वन्दना की गयी है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तु-
ष्टुवाग्ंसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
हे देवो ! हम कानों द्वारा कल्याणमय वचनों का श्रवण करें। हम नेत्रों से शुभ दृश्य देखें और
सुदृढ़ अंगों से युक्त शरीर वाले होकर आयु पर्यन्त देव हित में लगे रहें। इन्द्रदेव हमारे निमित्त
कल्याणकारी हों, पूषादेव हमारा कल्याण करें, अरिष्टनाशक गरुड़देव हमारे लिए कल्याणकारी हों
तथा बृहस्पति देव हमारे लिए स्वस्ति प्रदाता हों। त्रिविध तापों का शमन हो।
॥ प्रथमः प्रश्नः ॥
ॐ सुकेशा च भारद्वाजः शैब्यश्च सत्यकामः सौर्यायणी च गार्ग्यः कौसल्य-
श्चाश्वलायनो भार्गवो वैदर्भिः कबन्धी कात्यायनस्ते हैते ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणा
एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः ॥ १ ॥
भरद्वाज पुत्र सुकेशा, शिबि पुत्र सत्यकाम, गर्गसुत सौर्यायणि (सूर्य का पौत्र), अश्वलपुत्र
कौसल्य, विदर्भवासी भार्गव और कात्यायन (कत्यवंशी) कबन्धी आदि परब्रह्म के उपासक और
उसके अनुरूप अनुष्ठान में तत्पर छः ऋषिगण, परब्रह्म के प्रति जिज्ञासु भाव से हाथ में समिधा लेकर
महर्षि पिप्पलाद के निकट गये ॥ १ ॥
तान्ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ यथाकामं
प्रश्नान्पृच्छत यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ॥ २ ॥
उन (महर्षि पिप्पलाद) ने उन आगन्तुक ऋषियों से कहा कि आप ब्रह्मचर्यपूर्वक तपस्यारत
रहते हुए एक वर्ष तक श्रद्धापूर्वक यहीं रहें, तत्पश्चात् आप अपनी इच्छानुसार प्रश्न करें, यदि मैं
जानता होऊँगा, तो आपको अवश्य ही उनके उत्तर दूँगा ॥ २ ॥
अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ। भगवन्कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥
( एक वर्ष पिप्पलाद ऋषि के आश्रम में निवास करने के पश्चात् ) कात्यायन कबन्धी ने ऋषि
पिप्पलाद के निकट जाकर पूछा- भगवन्! यह प्रजा किससे प्रकट (उत्पन्न)होती है ? ॥ ३ ॥
२३० प्रश्नोपनिषद्
तस्मै स होवाच प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा स
मिथुनमुत्पादयते। रयिं च प्राणं चेत्येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति ॥ ४ ॥
महर्षि पिप्पलाद ने कहा कि प्रजा वृद्धि की इच्छा वाले प्रजापति ब्रह्मा ने तप किया। तदनन्तर
उन्होंने रयि और प्राण नामक एक युगल उत्पन्न किया और सोचा कि यह युगल ही अनेक प्रकार की
प्रजा का उत्पादन करेगा ॥ ४ ॥
[ प्राण गति प्रदान करने वाला चेतन तत्त्व या शक्ति है तथा रयि उसे धारण करके विविध रूप देने में
समर्थ प्रकृति है। वर्तमान विज्ञान की भाषा में इन्हें चेतना युक्त ऊर्जा (लाइव एनर्जी) तथा पदार्थ (मैटर)
भी कह सकते हैं। दोनों के संयोग से ही सृष्टि उत्पन्न होती है।]
आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमा रयिर्वा एतत्सर्वं यन्मूर्तं चामूर्तं च तस्मान्मूर्तिरेव रयिः ॥
आदित्य ही प्राण स्वरूप और रयि ही चन्द्र स्वरूप है। इस विराट् विश्व में जो कुछ मूर्त और
अमूर्त अर्थात् स्थूल एवं सूक्ष्म है, वह सब रयि ही है, अतएव मूर्ति ही रयि है ॥ ५ ॥
[ पृथ्वी पर प्राण संचार का दृश्य स्रोत सूर्य है। सूर्य प्रकाशक-प्रेरक है, अस्तु प्राण रूप है। चन्द्रमा
सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित-प्रेरित है, अस्तु रयि का प्रतीक है। स्थूल, सूक्ष्म प्रकृति के सभी घटक रयि ही
कहे जाते हैं।]
अथादित्य उद्यन्यत्प्राचीं दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान्प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ।
यद्दक्षिणां यत्प्रतीचीं यदुदीचीं यदधो यदूर्ध्वं यदन्तरा दिशो यत्सर्वं प्रकाशयति तेन
सर्वान्प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ॥ ६ ॥
रात्रि के समापन पर पूर्व में उदित होकर सूर्यदेव पूर्व दिशा के प्राणों को अपनी किरणों में धारण करते
हैं, तदनन्तर वे ही सूर्यदेव दक्षिण, पश्चिम, उत्तर, नीचे, ऊपर और दिशाओं के मध्य भागों को भी देदीप्यमान
करते हैं और उन सब दिशाओं के प्राणों को अपनी किरणों में धारण करते हैं ॥ ६ ॥
स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते। तदेतदृचाभ्युक्तम् ॥ ७॥
वे सूर्यदेव ही वैश्वानर अग्निरूप, विश्वरूप एवं प्राणरूप होकर प्रकट होते हैं। ऋचा (वेद मंत्रों)
द्वारा भी इसी तथ्य की पुष्टि की गई है ॥ ७ ॥
विश्वरूपं हरिणं जातवेदसं परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम्।
सहस्ररश्मिः शतधा वर्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ॥ ८ ॥
वे सूर्य सर्वरूप, सर्वाधार, रश्मिवान्, सर्वज्ञाता, तपोनिष्ठ एवं अद्वितीय हैं। वे सहस्रों किरणों वाले
सूर्यदेव सैकड़ों रूपों से विद्यमान रहते हुए समस्त प्राणधारियों के प्राणस्वरूप होकर उदित होते हैं॥ ८॥
संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च। तद्ये ह वै तदिष्टापूर्ते
कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते। त एव पुनरावर्तन्ते तस्मादेत ऽऋषयः
प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते। एष ह वै रयिर्यः पितृयाणः ॥ ९ ॥
(एक दृष्टि से) संवत्सर ही प्रजापति है तथा उसके दक्षिण और उत्तर दो अयन हैं। जो लोग
अपने अभीष्ट की पूर्ति हेतु कर्मपथ का आश्रय लेते हैं, वे चन्द्रलोक को प्राप्त कर आवागमन को प्राप्त
करते हैं। ये प्रजा की कामना करने वाले ऋषिगण दक्षिण की ओर पितृयान मार्ग से गमन करते हैं।
यह पितृयान मार्ग ही रयि है ॥ ९ ॥
प्रश्न १ मन्त्र १६ २३१
[ चन्द्र शब्द 'चदि' धातु से बना है। जिसका अर्थ 'सुख' है। लौकिक सुख को लक्ष्य करके अपनी
ऊर्जा को नियोजित करने वाले, प्रजा उत्पन्न करने वाले जीवन-मरण का चक्र चलाने में सहायक होते हैं।]
अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययात्मानमन्विष्यादित्यमभिजproperty यन्ते। एतद्वै
प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधस्तदेष श्लोकः ॥
आत्मशोधी पुरुष तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा और विद्या द्वारा परमात्मा को प्राप्त करके उत्तरमार्ग
(उत्तरायण) द्वारा सूर्य लोक को प्राप्त करते हैं। वे सूर्यदेव ही प्राणों के आश्रय हैं, वे ही अभय हैं,
वे ही अविनाशी हैं और वे ही परमगति वाले हैं। अस्तु, इस सूर्यलोक को प्राप्त करके फिर पुनरावर्तन
नहीं होता। इस तथ्य को यह अगला मन्त्र स्पष्ट करता है ॥ १०॥
[ सूर्य (प्रेरक ऊर्जा स्रोत) को लक्ष्य करके अपनी ऊर्जा को नियोजित करने वाले साधक सृजेता
(परमात्मा) से एकात्मरूप हो जाते हैं। इस प्रक्रिया में ब्रह्मचर्य, श्रद्धा आदि का प्रयोग करना होता है।]
पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम्। अथेमे अन्य उ परे
विचक्षणं सप्तचक्रे षळर आहुरर्पितमिति ॥ ११ ॥
कुछ विद्वान् (प्रजापति को) पाँच पैरों (पंच प्राणों या पंच तत्त्वों) और बारह आकृतियों (बारह
मासों) वाला तथा द्युलोक के बीच (अन्तरिक्ष) में जल धारण करने वाला कहते हैं। अन्य विद्वानों ने उसे
सात चक्रों (सात वारों) और छः अरों (छः ऋतुओं) वाला कहा है ॥ ११ ॥
मासो वै प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः शुक्लः प्राणस्तस्मादेतऽ ऋषयः
शुक्ल इष्टिं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन् ॥ १२ ॥
(अन्य दृष्टि से) मास प्रजापति है। उसके कृष्ण पक्ष रयि तथा शुक्ल पक्ष प्राण हैं। इसलिए ये ऋषि
(द्रष्टागण) शुक्लपक्ष में इष्ट कर्म करते हैं तथा अन्य विद्वान् दूसरे कृष्ण पक्ष में इष्ट कार्य संपादित करते हैं ॥
[ शुक्ल पक्ष में प्रकाश बढ़ता है। शुक्ल पक्ष में इष्ट कर्म का भाव है-ऊर्जा उत्पादन कर्म। कृष्णपक्ष
में कर्म का भाव है-ऊर्जा नियोजन कर्म।]
अहोरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति।
ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥ १३॥
अन्य दृष्टि से अहोरात्र प्रजापति स्वरूप हैं। इनमें दिन, प्राण और रात्रि रयि हैं। इसलिए दिन के
समय स्त्री से विहार करने वाले पुरुष अपने प्राण को क्षीण करते हैं, पर रात्रि में रति हेतु संयोग करने
वाले पुरुष उसके कर्मफल से लिप्त नहीं होते, अतः वे ब्रह्मचारी ही माने जाते हैं ॥ १३ ॥
अन्नं वै प्रजापतिस्ततो ह वै तद्रेतस्तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ १४ ॥
अन्न ही प्रजापति है, उसी से वीर्य उत्पन्न होता है और वीर्य से ही समस्त प्राणियों की उत्पत्ति होती है ॥
तद्ये ह वै तत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते। तेषामेवैष ब्रह्मलोको
येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥
इस प्रकार प्रजापति के इस व्रत पालन करने वाले पुरुष (कन्या-पुत्र रूप) मिथुन का उत्पादन
करते हैं। तपस्वी और ब्रह्मचर्ययुक्त तथा सत्यावलम्बी पुरुष ब्रह्मलोक को प्राप्त करते हैं ॥ १५ ॥
तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति ॥ १६ ॥
जिन व्यक्तियों में कुटिलता, झूठ और माया (छल-कपट) नहीं है, वे विशुद्ध ब्रह्मलोक को प्राप्त करते हैं ॥
२३२ प्रश्नोपनिषद्
॥ द्वितीयः प्रश्नः ॥
अथ हैन भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ । भगवन्कत्येव देवाः प्रजां विधारयन्ते ? कतर
एतत्प्रकाशयन्ते ? कः पुनरेषां वरिष्ठः ? इति ॥ १ ॥
इसके पश्चात् विदर्भदेशीय भार्गव ने महर्षि पिप्पलाद से पूछा- हे भगवन्! प्रजाधारण करने वाले
देवताओं की संख्या कितनी है ? उनमें से कौन देवता इसे प्रकाशित करते हैं तथा उनमें से वरिष्ठ कौन है ? ॥
तस्मै स होवाचाकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च। ते
प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामः ॥ २ ॥
महर्षि पिप्पलाद ने उनसे (भार्गव ऋषि से) कहा कि निश्चित रूप से आकाश, अग्नि, जल, पृथिवी
(पंचभूत) तथा मन, वाणी, नेत्र और श्रोत्र आदि (इन्द्रियाँ) ये सब भी देव ही हैं। ये समस्त देवगण प्रकट
होकर कहते हैं कि हमने ही इस शरीर को धारण किया है। अस्तु, हम ही इसके आश्रयदाता हैं॥ २ ॥
तान्वरिष्ठः प्राण उवाच मा मोहमापद्यथा । अहमेवैतत्पञ्चधात्मानं प्रविभज्यैतद्-
बाणमवष्टभ्य विधारयामीति ॥ ३ ॥
इन सभी देवताओं में सर्वश्रेष्ठ प्राण ने कहा कि आप मोह का परित्याग करें, मैं ही अपने पाँच विभागों
(अवयवों) से इस शरीर को आश्रय प्रदान करके धारण करता हूँ ॥३ ॥
तेऽश्रद्दधाना बभूवुः सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इव तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व
एवोत्क्रामन्ते तस्मिंश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रतिष्ठन्ते तद्यथा मक्षिका मधुकरराजान-
मुत्क्रामन्तं सर्वा एवोत्क्रामन्ते एवमस्मिंश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रातिष्ठन्त एवं वाङ्मनश्चक्षुः
श्रोत्रं च ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति ॥ ४ ॥
प्राण की इस बात पर देवताओं को विश्वास नहीं हुआ। तब प्राण के अभिमान पूर्वक ऊपर उठने और
बाहर निकलने लगने के साथ ही वाक्, नेत्र, मन और श्रोत्रादि भी शरीर से बाहर निकलने लगे। जब वह
रुक गया, तो उपर्युक्त सभी इन्द्रियाँ भी ठहर गयीं। जैसे मधुमक्खियों में रानी मक्खी के छत्ते से ऊपर
निकलते ही, सभी मक्खियाँ उसके साथ ही बहिर्गमन करने लगती हैं और उसके बैठे रहने पर बैठी रहती
हैं, इस प्रकार प्राण की वरिष्ठता सिद्ध हो जाने पर वाक् आदि सभी देवों ने प्राण की अभ्यर्थना की ॥४॥
एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायुः।
एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत् ॥ ५ ॥
यह प्राण ही अग्नि होकर तपता है। यही सूर्य, इन्द्र, मेघ, वायु, पृथिवी एवं रयि है। सत्, असत् और
अमृत भी यह प्राण ही है ॥ ५ ॥
अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम्।
ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च ॥ ६ ॥
जिस प्रकार रथचक्र की नाभि में अरे लगे रहते हैं, उसी प्रकार प्राण में ऋग्वेद की ऋचाएँ,
यजुर्वेद और सामवेद के मन्त्र, ब्राह्मण, क्षत्रिय और यज्ञ-सभी सन्निहित हैं ॥ ६ ॥
प्रश्न २ मन्त्र १३ २३३
प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे। तुभ्यं प्राण! प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति
यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि ॥७॥
˙हे प्राण! आप ही प्रजापति हैं, गर्भ में आप ही निवास करते हैं और आप ही माता-पिता के समान
आकृति वाले होकर जन्म लेते हैं। हे प्राण! यह प्रजा आपको ही बलि प्रदान करती है, क्योंकि आप ही
सम्पूर्ण इन्द्रियों सहित प्रतिष्ठित हैं॥७॥
देवानामसि वह्नितमः पितॄणां प्रथमा स्वधा।
ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि ॥८॥
(हे प्राण!) आप ही देवताओं के लिए अग्नि हैं। पितृगणों के लिए स्वधा हैं। यह सत्य (तथ्य)
अथर्वा और आङ्गिरस ऋषियों द्वारा प्रमाणित किया गया है॥८॥
इन्द्रस्त्वं प्राण! तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता।
त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः ॥९॥
हे प्राण! आप ही इन्द्र हैं। अपने तेज के फलस्वरूप रुद्र हैं और सब ओर से हमारी सुरक्षा करने वाले
हैं। आप ही ज्योतियों के स्वामी सूर्य हैं। आप ही अन्तरिक्ष में विचरण करते हैं॥९॥
यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः।
आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति ॥१०॥
हे प्राण! जब आप मेघरूप होकर वर्षण करते हैं, तब यह समस्त प्रजा प्रभूत अन्न उत्पादन की आशा
से आह्लादित हो जाती है॥१०॥
व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः।
वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः ॥ ११॥
हे प्राण! आप व्रात्य (संस्कार विहीन) होकर भी एकर्षि नामक अग्नि हैं। हम आपके निमित्त जो
आहार प्रदान करते हैं, आप उसके भोक्ता हैं। आप इस जगत् के स्वामी हैं। हे प्राण! आप हमारे पिता हैं तथा
आप ही वायु रूप होकर आकाश में विचरण करने वाले मातरिश्वा हैं॥ ११॥
या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि।
या च मनसि संतता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥१२॥
आपका जो स्वरूप वाणी, श्रोत्र, नेत्र और मन में संव्याप्त है, आप उसे शान्त करें (कल्याणमय करें)।
आप शरीर से बहिर्गमन करने की चेष्टा न करें॥ १२॥
प्राणस्येदं वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम्।
मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥ १३॥
इस जगत् अथवा तृतीय द्युलोक (त्रिदिव-स्वर्ग) में जो भी प्रतिष्ठित है, वह सब प्राण के ही वश में
है। हे प्राण! आप हमारी उसी प्रकार रक्षा करें, जिस प्रकार माता पुत्र की सुरक्षा करती है। आप हमें श्री
(समृद्धि) और प्रज्ञा प्रदान करें॥ १३॥
[ भूलोक को 'प्रथम', भुवः (अन्तरिक्ष) लोक को द्वितीय तथा स्वः (स्वर्ग या त्रिदिव) लोक को
'तृतीय' की संज्ञा प्रदान की जाती है।]
२३४ प्रश्नोपनिषद्
॥ तृतीयः प्रश्नः ॥
अथ हैनं कौसल्यश्चाश्वलायनः पप्रच्छ। भगवन्कुत एष प्राणो जायते ?
कथमायात्यस्मिञ्छरीरे ? आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रातिष्ठते ? केनोत्क्रमते ? कथं
बाह्यमभिधत्ते ? कथमध्यात्ममिति ॥ १ ॥
तदुपरान्त कौसल्य आश्वलायन ने महर्षि पिप्पलाद से पूछा- भगवन् ! इस प्राण की उत्पत्ति कहाँ से होती
है ? यह इस शरीर में किस प्रकार प्रविष्ट होता है, यह किस प्रकार शरीर से बाहर आता है और किस प्रकार
बाहरी और भीतरी शरीर को धारण करता है ? ॥ १ ॥
तस्मै स होवाचातिप्रश्नान्पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमि ॥ २ ॥
महर्षि पिप्पलाद ने उनसे कहा कि आप बहुत जटिल प्रश्न पूछते हैं; किन्तु आप ब्रह्मनिष्ठ हैं, इसलिए
मैं आपके प्रश्नों के उत्तर देता हूँ॥ २ ॥
[ सामान्य रूप से प्राण तत्त्व की अनुभूति कठिन है, उसकी उत्पत्ति एवं नियोजन का क्रम और भी कठिन
है; लेकिन ब्रह्मनिष्ठ उसे समझ सकते हैं, इसलिए महर्षि उनके लिए वह विषय स्पष्ट करते हैं।]
आत्मन एष प्राणो जायते। यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृतेनाया-
त्यस्मिञ्छरीरे ॥ ३ ॥
इस प्राण की उत्पत्ति आत्मा से होती है। जिस प्रकार छाया देहधारी की देह से उत्पन्न होती है अथवा
छाया देहधारी के आश्रित है, उसी प्रकार प्राण आत्मा से उत्पन्न होकर, उसी के आश्रित रहता है। यह प्राण
मन के संकल्प के अनुसार शरीर में प्रविष्ट होता है॥ ३ ॥
यथा सम्राडेवाधिकृतान्विनियुङ्क्ते एतान्ग्रामानैतान्ग्रामान-
धितिष्ठस्वेत्येवमेवैष प्राण इतरान्प्राणान्पृथक्पृथगेव संनिधत्ते ॥ ४ ॥
जिस प्रकार राजा अपने विभिन्न अधिकारियों को पृथक्-पृथक् ग्रामों में नियुक्त करता है, उसी प्रकार
प्राण (प्रमुख प्राण) अन्य प्राणों (इतर प्राणों-इन्द्रियों) की पृथक्-पृथक् नियुक्ति करता है॥ ४ ॥
पायूपस्थेऽ पानं चक्षुःश्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रातिष्ठते मध्ये तु समानः।
एष ह्येतद्धुतमन्नं समं नयति तस्मादेताः सप्तार्चिषो भवन्ति ॥ ५ ॥
वह प्राण स्वयं मुख और नासिका से निकलता हुआ नेत्र और श्रोत्र में प्रतिष्ठित होता है तथा गुदा
(वायु) एवं उपस्थेन्द्रिय में अपान वायु को नियुक्त करता है। मध्य भाग में समान वायु रहता है, जो
अन्न को समानतापूर्वक शरीर के विभिन्न भागों को वितरित करता है। उसी प्राण रूपी अग्नि से सात
ज्वालाओं का प्रादुर्भाव होता है॥ ५॥
हृदि ह्येष आत्मा। अत्रैतदेकशंतं नाडीनां तासां शतं शतमेकैकस्यां द्वासप्ततिर्द्वा-
सप्ततिः प्रतिशाखानाडीसहस्राणि भवन्त्यासु व्यानश्चरति ॥ ६ ॥
यह आत्मा प्राणी के हृदय प्रदेश में स्थित है। इस हृदय प्रान्त में एक सौ एक नाड़ियाँ हैं, उन सभी
नाड़ियों में प्रत्येक की सौ-सौ शाखायें हैं और उन सभी नाड़ी शाखाओं में भी प्रत्येक की बहत्तर-बहत्तर
हजार प्रतिशाखायें हैं। इन सब नाड़ी शाखाओं में व्यान वायु सञ्चरित होता है॥ ६ ॥
प्रश्न ४ मन्त्र १ २३५
अथैकयोर्ध्व उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् ॥
इन नाड़ियों में एक नाड़ी (सुषुम्ना नाड़ी) ऊर्ध्वगामी है, जिसके माध्यम से उदान नामक वायु मनुष्य
को पुण्य कृत्यों द्वारा पुण्यलोक को और पाप कृत्यों द्वारा अधम लोक को ले जाता है। यह उदान वायु पाप-
पुण्य दोनों प्रकार के कर्मों द्वारा मनुष्य को मर्त्य लोक में प्रतिष्ठित करता है ॥७॥
आदित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः। पृथिव्यां या देवता
सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुर्व्यानः ॥ ८ ॥
आदित्य निश्चित रूप से बाहरी प्राण है। यह चाक्षुष (चक्षु सम्बन्धी) प्राण को अनुगृहीत करता हुआ
उदित होता है । पृथ्वी का देवता प्राणी के अपान वायु को आकर्षित करता है। इन दोनों (द्यु और पृथ्वी)
के बीच का रिक्त स्थान (आकाश) ही समान वायु है तथा बाह्य वायु, व्यापकता में (आन्तरिक व्यान
से) समानता होने से व्यान है ॥ ८ ॥
तेजो ह वा उदानस्तस्मादुपशान्ततेजाः। पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि संपद्यमानैः ॥ ९ ॥
विश्वविख्यात (आदित्यरूपी) तेज ही उदान है, जिनका तेजस् शीतल हो जाता है, उनकी इन्द्रियों का
मन में विलय हो जाता है, इस स्थिति में वे पुनर्जन्म प्राप्त करते हैं ॥ ९ ॥
यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः। सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं
नयति ॥ १० ॥
(मरणकाल में) इस (आत्मा) का जिस तरह का मनः संकल्प होता है, वह उसी प्रकार के संकल्प
के साथ प्राण को प्राप्त करता है। वह प्राण तेजस् सम्पन्न होकर जीव के संकल्पानुसार उसे विभिन्न लोकों
(योनियों) में ले जाता है ॥ १० ॥
य एवं विद्वान्प्राणं वेद न हास्य प्रजा हीयतेऽ मृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ११ ॥
जो विज्ञजन प्राण तत्त्व को इस प्रकार जानते हैं, उनकी प्रजा (वंश) कभी विनाश को प्राप्त नहीं होती
और वे अमृतत्व को प्राप्त कर लेते हैं। यह श्लोक इसी तथ्य का प्रतिपादन करता है ॥ ११ ॥
उत्पत्तिम्रायतिं स्थानं विभुत्वं चैव पञ्चधा ।
अध्यात्मं चैव प्राणस्य विज्ञायामृतमश्नुते विज्ञायामृतमश्रुत इति ॥ १२ ॥
जो मनुष्य प्राण तत्त्व की उत्पत्ति, आगमन, स्थान व्यापकत्व तथा बाहरी और आध्यात्मिक (आन्तरिक)
स्थिति के पाँचों भेदों को भली प्रकार जान लेता है, वह अमर पद प्राप्त कर लेता है-वह निश्चित ही अमरत्व
को प्राप्त कर लेता है ॥ १२ ॥
॥ चतुर्थः प्रश्नः ॥
अथ हैनं सौर्यायणी गार्ग्यः पप्रच्छ । भगवन्नेतस्मिन्पुरुषे कानि स्वपन्ति ? कान्यस्मिन्
जाग्रति ? कतर एष देवः स्वप्नान्पश्यति ? कस्यैतत्सुखं भवति ? कस्मिन्नु सर्वे संप्रतिष्ठिता
भवन्तीति ॥ १ ॥
तदुपरान्त सूर्य-पौत्र गार्ग्य ने महर्षि पिप्पलाद से प्रश्न किया-हे भगवन् ! इस पुरुष देह में कौन
(इन्द्रियाँ) शयन करती हैं और कौन जाग्रत् रहती हैं ? कौन देवता स्वप्न देखता है और कौन सुख
अनुभव करता है ? ये सब किसमें सम्प्रतिष्ठित होते हैं? ॥ १ ॥
२३६ प्रश्नोपनिषद्
तस्मै स होवाच। यथा गार्ग्य। मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डल
एकीभवन्ति। ताः पुनःपुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति। तेन
तर्ह्येष पुरुषो न श्रृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते
नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥ २ ॥
महर्षि पिप्पलाद ने गार्ग्य ऋषि से कहा- हे गार्ग्य ! जिस प्रकार सूर्य की रश्मियाँ उसके अस्त होने पर सिमटकर
उसी के तेजोमंडल में एकीभूत हो जाती है और सूर्योदय होने पर पुनः सर्वत्र फैल जाती है, उसी प्रकार समस्त इन्द्रियाँ
परमदेव मन में एकीभूत हो जाती हैं, तब यह पुरुष न देखता है, न सुनता है, न स्वाद लेता है, न सूँघता है, न स्पर्श
करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न मल का त्याग करता है, न आनंद का अनुभव करता है और न ही किसी
प्रकार की चेष्टा करता है, तब उसकी इस स्थिति को शयन करना (सो जाना) कहते हैं॥ २॥
प्राणाग्नय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति गार्हपत्यो ह वा एषोऽ पानो व्यानोऽ न्वाहार्यपचनो
यद्गार्हपत्यात्प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥ ३ ॥
(सोते समय) इस शरीररूप पुर (नगर) में प्राणरूप अग्नि ही जाग्रत् रहता है। यह अपान ही गार्हपत्य
अग्नि है। व्यान ही अन्वाहार्यपचन नामक अग्नि है। गार्हपत्य से ले जाया गया प्राण ही 'प्रणयन प्रक्रिया' के
कारण आहवनीय अग्निरूप है॥ ३॥
[ ऋषि यहाँ काया में सतत चलने वाली जीवन रूपी यज्ञीय प्रक्रिया का स्वरूप व्यक्त कर रहे हैं।]
यदुच्छ्वासनिःश्वासावेतावाहुती समं नयतीति स समानः। मनो ह वाव यजमान
इष्टफलमेवोदानः स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति ॥ ४॥
शरीरधारी में उच्छ्वास और निःश्वास (श्वास लेना और छोड़ना) ही यज्ञाहुतियाँ हैं। उन आहुतियों को
समानता पूर्वक विभक्त करने के कारण समान वायु (ही ऋत्विक्) है। मन निश्चित ही यजमान है और
अभीष्ट फल उदान है। यही उदान (इच्छित फल) मन को नित्य ही ब्रह्म में स्थित करता है॥ ४॥
अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति। यद्दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनु-
श्रृणोति देशादिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं
चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्य सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति ॥ ५ ॥
स्वप्न की स्थिति में यह देव अपनी महिमा का अनुभव करता है। जाग्रत् अवस्था में इसने जो देखा था,
उसी को पुनः (स्वप्न में) देखता है, जो सुना था उसे ही सुनता है, विभिन्न दिशाओं में अनुभव किये हुए
को पुनः-पुनः अनुभव करता है। (इतना ही नहीं) यह देखे-अनदेखे, सुने-अनसुने, अनुभूत-अननुभूत,
सत् और असत् समस्त पदार्थों को देखता है और स्वयं भी सर्वरूप बनकर देखता है॥ ५॥
स यदा तेजसाभिभूतो भवत्यत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ तदैतस्मिञ्छरीरे एतत्सुखं भवति ॥
जब यह जीवात्मा तेजस् से सम्पन्न होता है, तब यह स्वप्न नहीं देखता। उस समय शरीर में यह
आनन्द (सुषुप्ति सुख) अनुभव करता है॥ ६॥
स यथा सोम्य ! वयांसि वासोवृक्षं संप्रतिष्ठन्ते एवं ह वै तत्सर्वं पर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥
हे सोम्य ! जिस प्रकार पक्षी अपने निवास स्थान वृक्ष पर जाकर बैठ जाते हैं, उसी प्रकार ये
समस्त तत्त्व परम आत्मा में प्रतिष्ठित हो जाते हैं ॥ ७ ॥
प्रश्न ५ मन्त्र १ २३७
पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा
चाकाशश्चाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च
रसयितव्यं च त्वक् च स्पर्शयितव्यं च वाक् च वक्तव्यं च हस्तौ चादातव्यं
चोपस्थश्चानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च पादौ च गन्तव्यं च मनश्च मन्तव्यं च
बुद्धिश्च बोद्धव्यं चाहङ्कारश्चाहङ्कर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च
प्राणश्च विधारयितव्यं च॥ ८॥
(गत मन्त्रों में जिन तत्त्वों का संकेत है, वे ये हैं) पृथ्वी एवं उसकी तन्मात्रा (गन्ध), जल एवं उसकी
तन्मात्रा (रस), आकाश एवं उसकी तन्मात्रा (शब्द), वायु और उसकी तन्मात्रा (स्पर्श), तेज (अग्नि) और
उसकी तन्मात्रा (रूप), नेत्र और देखने योग्य (दृश्य), कान और सुनने योग्य (शब्द), घ्राण और सूंघने
योग्य (गंध), रसना और स्वाद ग्रहण करने योग्य (रस), त्वचा और स्पर्श करने योग्य (पदार्थ), हाथ और
ग्रहण करने योग्य पदार्थ, वाक् शक्ति और वक्तव्य-विषय, उपस्थ और उससे सम्बंधित विषय, गुदा और
विसर्जन योग्य (मल), पैर और गन्तव्य स्थल, मन और मननीय विषय, बुद्धि और जानने योग्य विषय,
अहंकार और उसका विषय, चित्त और चिंतनीय विषय, तेजस् और प्रकाशित करने योग्य पदार्थ, प्राण एवं
उसके आश्रित रहने वाले पदार्थ (ये सब) परम आत्मा में विलीन हो जाते हैं॥ ८॥
एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धाकर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः स
परेऽक्षर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥ ९॥
यही द्रष्टा (देखने वाला), स्प्रष्टा (स्पर्श करने वाला), श्रोता (सुनने वाला), घ्राता (सूँघने वाला),
रसयिता (रस लेने वाला), मन्ता (मनन करने वाला), कर्त्ता (कर्म करने वाला) और बोद्धा (जानने वाला)
विज्ञानात्मा पुरुष है; जो परम अविनाशी ब्रह्म में स्थित हो जाता है॥ ९॥
परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु
सोम्य! स सर्वज्ञः सर्वो भवति॥ तदेष श्लोकः॥ १०॥
हे सोम्य! जो पुरुष, इस छायारहित, शरीररहित, अलोहित, शुभ्र अक्षर परमात्मा को भली-भाँति
जानता है, वह सर्वज्ञ और सर्वरूप होकर उसी को प्राप्त हो जाता है-ऐसा इस श्लोक में भी वर्णित है ॥१०॥
विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र। तदक्षरं वेदयते यस्तु
सोम्य! स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥ ११॥
हे सोम्य ! जिस अविनाशी परब्रह्म में समस्त देवगण, समस्त प्राण और समस्त भूत भली प्रकार
प्रतिष्ठित होते हैं, उसे जानने वाला सर्वज्ञाता भी उसी में (परमात्मा में) प्रविष्ट हो जाता है॥ ११॥
॥ पञ्चमः प्रश्नः ॥
अथ हैनं शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ। स यो ह वै तद्भगवन्मनुष्येषु प्रायणान्त-
मोङ्कारमभिध्यायीत। कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति॥ १॥
इसके उपरान्त शिबि पुत्र सत्यकाम ने महर्षि पिप्पलाद से पूछा- हे भगवन्! यह बताने का अनुग्रह
करें कि जो मनुष्य जीवन भर (मरण पर्यन्त) ॐ का ध्यान करे, वह इस (ओंकारोपासना) द्वारा
किस लोक पर विजय प्राप्त कर लेता है?॥ १॥
२३८ प्रश्नोपनिषद्
तस्मै स होवाच। एतद्वै सत्यकाम। परं चापरं च ब्रह्म यदोंकारस्तस्माद्विद्वा-
नेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति॥ २॥
महर्षि पिप्पलाद ने कहा- हे सत्यकाम ! यह ॐ कार ही निश्चित रूप से परब्रह्म और अपरब्रह्म है।
अतः जो विद्वान् इसे इस प्रकार जानता है, वह इनमें से किसी एक (ब्रह्म) को प्राप्त कर लेता है ॥२॥
स यद्येकमात्रमभिध्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्यामभिसंपद्यते। तमृचो
मनुष्यलोकमपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संपन्नो महिमानमनुभवति॥३॥
वह साधक यदि एक मात्रा वाले ॐकार का ध्यान करता है, तो उसके माध्यम से वह अतिशीघ्र इस
जगत् को प्राप्त कर लेता है। वहाँ वह ब्रह्मचर्य, तप और श्रद्धा से सम्पन्न होकर महिमावान् होता है॥ ३॥
अथ यदि द्विमात्रेण मनसि संपद्यते सोऽन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकं स
सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते॥ ४॥
यदि वह द्विमात्रिक ॐकार का ध्यान करे, तो उसे यजुर्वेद के मन्त्र अन्तरिक्ष में स्थित सोम लोक
में ले जाते हैं। वह वहाँ (सोम लोक में) विभूतियों का अनुभव करके पुनः (मर्त्यलोक में) वापस
लौट आता है ॥४॥
यः पुनरेतन्त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये संपन्नः।
यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं
स एतस्माज्जीवघनात्परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते। तदेतौ श्लोकौ भवतः ॥ ५ ॥
जो पुरुष त्रिमात्रिक ॐकार के ध्यान द्वारा साधना करता है, वह तेजोमय सूर्यलोक को प्राप्त करता है।
जिस प्रकार सर्प केंचुलि से मुक्त होकर बाहर आ जाता है, उसी प्रकार वह पापों से छूट जाता है और साम-
मन्त्रों द्वारा ब्रह्मलोक पहुँचा दिया जाता है। वह विद्वान् इस जीवनघन से भी श्रेष्ठ समस्त शरीरों में प्रविष्ट
(हृदय में स्थित) परमात्मा का दर्शन करता है। ये दो श्लोक इसी तथ्य के प्रतिपादक हैं ॥ ५॥
तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योन्यसक्ता अनविप्रयुक्ताः ।
क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु सम्यक्प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥ ६॥
ॐ कार मंत्र की तीनों मात्राएँ (अलग-अलग होने पर भी) परस्पर संबद्ध हैं - मृत्यु से युक्त हैं। ये
(ध्यान प्रक्रिया में ) प्रयुक्त होती हैं एवं आपस में ऐसी हैं, जिनका प्रतिकूल रूप में प्रयोग नहीं किया गया
है । अस्तु, (इन्हें) बाहर-भीतर और बीच की क्रियाओं में भली प्रकार प्रयुक्त करने वाला विद्वान् पुरुष दृढ़
संकल्प वाला हो जाता है, जो कभी विचलित नहीं होता ॥ ६॥
ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं सामभिर्यत्तत्कवयो वेदयन्ते । तमोंकारेणैवायतनेनान्वेति
विद्वांन्यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति ॥ ७॥
(एक मात्रिक ॐकार की साधना द्वारा) साधक को ऋग्वेद की ऋचाएँ इस लोक की प्राप्ति
कराती हैं, (द्विमात्रिक ओंकार साधना से ) यजुर्वेद के मंत्र अंतरिक्ष लोक की और (त्रिमात्रिक
ॐकार साधना द्वारा) सामवेद के मंत्र उसे उस (तृतीय ब्रह्म लोक) लोक की प्राप्ति कराते हैं, ऐसा
विद्वज्जन जानते हैं। उस ॐकार मंत्र का आश्रय लेकर ही विद्वान् उस परमब्रह्म लोक को प्राप्त करता
है, जो शांतिपूर्ण, अजर-अमर भयरहित एवं सर्वोत्कृष्ट है ॥ ७॥
प्रश्न ६ मन्त्र ५ २३९
॥ षष्ठः प्रश्नः ॥
अथ हैनँ सुकेशा भारद्वाजः पप्रच्छ। भगवन्हिरण्यनाभः कौसल्यो राजपुत्रो
मामुपेत्यैतं प्रश्नमपृच्छत। षोडशकलं भारद्वाज! पुरुषं वेत्थ? तमहं कुमारमब्रुवं नाहमिमं
वेद यद्यहमिममवेदिषं कथं ते नावक्ष्यमिति। समूलो वा एष परिशुष्यति योऽ
नृतमभिवदति तस्मान्नार्हाम्यनृतं वक्तुम्। स तूष्णीं रथमारुह्य प्रवव्राज। तं त्वा पृच्छामि
क्वासौ पुरुषः? इति ॥ १ ॥
इसके बाद भरद्वाज ऋषि के पुत्र सुकेशा ने महर्षि पिप्पलाद से पूछा- हे भगवन्! कोसल देश के
राजपुत्र हिरण्यनाभ ने मेरे निकट आकर जो प्रश्न किया था, वह मैं आपसे निवेदन कर रहा हूँ- हे भारद्वाज !
क्या आप सोलह कला से सम्पन्न पुरुष के विषय में जानते हैं? मैंने उस राजकुमार से कहा- मैं उसे नहीं
जानता, यदि मैं जानता होता, तो आपको क्यों नहीं बताता? जो व्यक्ति झूठ बोलता है, वह समूल सूख जाता
है, अस्तु, मैं झूठ नहीं बोल सकता। तदनन्तर वह राजकुमार चुपचाप रथारूढ़ होकर चला गया। आप हमारा
समाधान करें कि वह 'पुरुष' कहाँ रहता है (जिसके विषय में राजकुमार ने पूछा था) ? ॥ १ ॥
तस्मै स होवाच। इहैवान्तःशरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभवन्तीति ॥
आचार्य पिप्पलाद ने उनसे कहा- हे सोम्य! जिस पुरुष में षोडश कलाएँ उत्पन्न होती हैं, वह इस शरीर
के ही अन्दर विद्यमान है ॥ २ ॥
स ईक्षांचक्रे। कस्मिन्नहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते
प्रतिष्ठास्यामीति ॥ ३ ॥
उस (देह-स्थित) पुरुष ने चिन्तन किया कि किसके निकल जाने पर मैं निकल जाऊँगा और किसके
प्रतिष्ठित रहने पर मैं प्रतिष्ठित रहूँगा ॥ ३ ॥
स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनोऽन्नमन्नाद्वीर्यं तपो
मंत्राः कर्मलोका लोकेषु च नाम च ॥ ४ ॥
उस पुरुष ने सर्वप्रथम प्राण का सृजन किया, तदुपरान्त प्राण से श्रद्धा, आकाश, वायु, ज्योति,
जल, पृथ्वी, इन्द्रियाँ, मन और अन्न सृजा गया। अन्न से वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक एवं नाम आदि
(सोलह कलाओं) की रचना हुई ॥ ४ ॥
स यथेमा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते तासां
नामरूपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते। एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडशकलाः पुरुषायणाः
पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते चासां नामरूपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एषोऽ कलोऽ
मृतो भवति। तदेष श्लोकः॥ ५ ॥
जिस प्रकार नदियाँ बहते-बहते समुद्र में जा मिलती हैं और उसमें ही विलीन होकर
अपना नाम-रूप विनष्ट करके 'समुद्र' ही हो जाती हैं। उसी प्रकार सर्वद्रष्टा परम पुरुष की
षोडश कलाएँ उस परम पुरुष में ही विलीन हो जाती हैं, उनके नाम-रूप भी विनष्ट हो जाते
हैं और वे पुरुष ही कहलाती हैं। इसके बाद भी वह पुरुष कलारहित और अमर है, इस तथ्य
के प्रतिपादन स्वरूप यह श्लोक है॥ ५॥
२४० प्रश्नोपनिषद्
अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन्प्रतिष्ठिताः ।
तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा मा वो मृत्युः परिव्यथा इति ॥ ६ ॥
रथ की नाभि में जिस तरह अरे लगे होते हैं, उसी प्रकार जिस परम पुरुष (परमेश्वर) में
समस्त कलाएँ प्रतिष्ठित हैं, उस ज्ञातव्य पुरुष को जानो, ताकि मृत्यु तुम्हें व्यथा न पहुँचा सके ॥ ६ ॥
तान्होवाचैतावदेवाहमेतत्परं ब्रह्म वेद नातः परमस्तीति ॥ ७ ॥
इसके बाद उन महर्षि पिप्पलाद ने समस्त ऋषियों से कहा इस परब्रह्म के विषय में मैं इतना ही
ज्ञान रखता हूँ, इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है ॥ ७ ॥
ते तमर्चयन्तस्त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसीति। नमः
परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ८ ॥
तदुपरान्त ऋषियों ने उन (महर्षि पिप्पलाद) की अर्चना करते हुए कहा-आप हमारे पिता हैं,
क्योंकि आपने हमें अविद्या (अज्ञान) के उस पार कर दिया है। आप परम ऋषि हैं, हमारा आपको
नमन है-नमन है ॥ ८ ॥
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम......... ॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः .....इति शान्तिः ॥
॥ इति प्रश्नोपनिषत्समाप्ता ॥
अध्याय हैं तथा प्रत्येक अध्याय में अनेक ब्राह्मण हैं।
॥ बृहदारण्यकोपनिषद् ॥
शुक्ल यजुर्वेद की काण्व-शाखा के वाजसनेयि ब्राह्मण-शतपथ ब्राह्मण के अन्तर्गत यह उपनिषद् है।
बृहत् (बड़ी) और आरण्यक (वन) में विकसित होने के कारण इसे 'बृहदारण्यक' कहा गया है। इसमें छ:
अध्याय हैं तथा प्रत्येक अध्याय में अनेक ब्राह्मण हैं।
प्रथम अध्याय में छ: ब्राह्मण हैं। प्रथम ब्राह्मण (अश्वमेध परक) में सृष्टि रूप यज्ञ को एक विराट् अश्व की
उपमा से व्यक्त किया गया है और दूसरे में प्रलय के बाद सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन है। तीसरे में देवों - असुरों के
प्रसंग से प्राण की महिमा और उसके भेद स्पष्ट किये गये हैं। चौथे में ब्रह्म को सर्वरूप कहकर उसके द्वारा चार
वर्णों के विकास का उल्लेख है। छठवें में विभिन्न अन्नों की उत्पत्ति तथा मन, वाणी एवं प्राण के महत्त्व का वर्णन
है। साथ ही नाम, रूप एवं कर्म की प्रतिष्ठा भी है। दूसरे अध्याय के प्रथम ब्राह्मण में डींग हाँकने वाले गार्ग्य
बालाकि एवं ज्ञानी राजा अजातशत्रु के संवाद के द्वारा ब्रह्म एवं आत्म तत्त्व को स्पष्ट किया गया है। दूसरे-तीसरे
में प्राणोपासना तथा ब्रह्म के दो (मूर्त्त और अमूर्त्त) रूपों का वर्णन है। चौथे में याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद है। यह
संवाद अध्याय ४ ब्राह्मण ५ में भी लगभग एक ही प्रकार से है। पाँचवें-छठें ब्रा० में मधुविद्या और उसकी परम्परा
का वर्णन है। तीसरे अध्याय के नौ ब्राह्मणों के अन्तर्गत राजा जनक के यज्ञ में याज्ञवल्क्य से विभिन्न तत्त्ववेत्ताओं
की प्रश्नोत्तरी है। गार्गी ने दो बार प्रश्न किए हैं, पहली बार अतिप्रश्न करने पर याज्ञवल्क्य ने उन्हें मस्तक गिरने की
बात कहकर रोक दिया। दुबारा वे सभा की अनुमति से पुनः दो प्रश्न करती हैं तथा समाधान पाकर लोगों से कह
देती हैं कि इनसे कोई जीत नहीं सकेगा, किन्तु शाकल्य विदग्ध नहीं माने और अतिप्रश्न करने के कारण उनका
मस्तक गिर गया। चौथे अध्याय में याज्ञवल्क्य-जनक संवाद एवं याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद है। अन्त में इस काण्ड
की परम्परा है। पाँचवें अध्याय में विविध रूपों में ब्रह्म की उपासना के साथ मनोमय पुरुष एवं वाक् की उपासना
भी कही गयी है। मरणोत्तर ऊर्ध्वगति के साथ अन्न एवं प्राण की विविध रूपों में उपासना समझायी गयी है। गायत्री
उपासना में जपनीय तीनों चरणों के साथ चौथे 'दर्शत' पद का भी उल्लेख है। छठें अध्याय में प्राण की श्रेष्ठता,
पञ्चाग्नि विद्या, मन्थ विद्या तथा सन्तानोत्पत्ति के विज्ञान का वर्णन है। अन्त में समस्त प्रकरण के आचार्य परम्परा
की श्रृंखला व्यक्त की गयी है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं.......इति शान्तिः ॥ - (द्रष्टव्य-ईशावास्योपनिषद् )
॥ अथ प्रथमोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमं ब्राह्मणम् ॥
उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः। सूर्य्यश्चक्षुर्वातः प्राणो व्यात्तमग्निर्वैश्वानरः संवत्सर
आत्माश्वस्य मेध्यस्य। द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरं पृथिवी पाजस्यम्। दिशः पार्श्वे अवान्तरदिशः
पर्शव ऋतवोऽङ्गानि मासाश्चार्धमासाश्च पर्वाण्यहोरात्राणि प्रतिष्ठा नक्षत्राण्यस्थीनि नभो
मांसानि। ऊवध्यः सिकताः सिन्धवो गुदा यकृच्च क्लोमानश्च पर्वता ओषधयश्च
वनस्पतयश्च लोमानि उद्यन् पूर्वार्धो निम्लोचञ्जघनार्धो यद्विजृम्भते यद्विद्योतते यद्विधूनुते
तत्स्तनयति यन्मेहति तद्वर्षति वागेवास्य वाक् ॥ १ ॥
प्रथम ब्राह्मण में विराट् 'मेध्य अश्व' का वर्णन किया गया है। जिसके अंग-अवयव तीनों लोकों में कण-
कण में संव्याप्त हैं। यह एक आलंकारिक व्याख्या है। 'अश्व' शब्द शक्ति एवं गति का परिचायक है। यह ब्रह्माण्ड
२४२ बृहदारण्यकोपनिषद्
गतिशील है। इसे जो शक्ति गतिशील किये है, उसे 'अश्व' कहा गया है। अशु-व्याप्रोति के अनुसार तीव्रगति से
संचरित होने वाले को 'अश्व' कहना उचित है। यह अश्व 'मेध्य' है। 'मेध' शब्द 'यज्ञ' का पर्यायवाची है। अस्तु, यह
शक्ति का संचार जो विश्व का संवाहक है, निश्चित रूप से 'मेध्य' (यजनीय) है। इसका उपयोग यज्ञीय दिव्य
अनुशासन में ही किया जाना चाहिए। मेध (मेधृ) धातु के तीन अर्थ हैं - मेधा, हनन और संगम- संयोजन। इस
विराट् यज्ञीय प्रक्रिया को हननीय-हिंसनीय तो नहीं ही कह सकते; अस्तु, यह अर्थ यहाँ अग्राह्य है। इसे मेध्य-मेधा
से प्रभावित करने योग्य या मेधा से ग्रहण करने योग्य अवश्य कह सकते हैं। यह संगम योग्य भी है ही। इसके साथ
जुड़ जाना या इस शक्ति प्रवाह को अपने साथ जोड़कर रखना आवश्यक भी है।
इस यज्ञीय अश्व या विश्वव्यापी शक्ति प्रवाह का सिर उषाकाल है। आदित्य ही नेत्र हैं, वायु ही प्राण
है, वैश्वानराग्नि व्यात्त (खुला हुआ) मुख है और संवत्सर ही आत्मा है। द्युलोक उस यज्ञाश्व का पृष्ठ (ऊपरी
या अव्यक्त) भाग, अन्तरिक्ष उसका उदर, पृथिवी पैर रखने का स्थल, दिशाएँ पार्श्व भाग, अवान्तर दिशाएँ-
पसलियाँ, ऋतुएँ अन्य अङ्ग, मास और पक्ष-सन्धिस्थल, दिन और रात्रि दोनों पैर, नक्षत्र समूह-अस्थियाँ
और आकाश उसका मांस है। अपरिपक्व (उदर स्थित) अन्न-सिकता (वस्तु या सूक्ष्मकण) है, नदियाँ-
नाड़ी समूह, पर्वत समूह-यकृत् और हृदयगत मांस है। वनस्पतियाँ-रोम (लोम समूह), ऊर्ध्वगामी सूर्य -
नाभि से ऊपर का स्थल, अधोगामी (अस्ताचल को जाता हुआ) सूर्य-कमर से नीचे का भाग है। विद्युत्
चमकना मानों इस यज्ञाश्व का जमुहाई लेना है, मेघों का गरजना उसका अँगड़ाई लेना है, जल वर्षा ही
मानों उसका मूत्र त्यागना है और शब्द घोष उसकी (अश्व) वाणी है॥ १॥
[उपमाएँ यथार्थ का बोध कराती हैं, वे स्वयं यथार्थ नहीं होतीं। अस्तु, अश्व के अङ्गों के साथ सिर आदि को
जो उपमाएँ दी गयी हैं, वे बहुत अंशों तक सटीक हैं। अश्व का उदर 'अन्तरिक्ष' को कहा गया है, अस्तु (उदर में)
अपरिपक्व अन्न 'सिकता' सामान्य बालू के कण नहीं, अन्तरिक्ष में स्थित सूक्ष्म कण (सब पार्टिकल्स) समझे जाने
चाहिए, जो अभी अपरिपक्व हैं-पदार्थ रूप में परिवर्तित नहीं हुए हैं।]
अहर्वा अश्वं पुरस्तान्महिमान्वजायत तस्य पूर्वे समुद्रे योनी रात्रिरेनं पश्चान्महिमान्वजायत
तस्यापरे समुद्रे योनिरेतौ वा अश्वं महिमानावभितः संबभूवतुः। हयो भूत्वा देवानवहद्वाजी
गन्धर्वानर्वाऽसुरानश्वो मनुष्यान् समुद्र एवास्य बन्धुः समुद्रो योनिः ॥ २ ॥
विराट् विश्व अथवा यज्ञाश्व की महिमा स्वरूप सर्वप्रथम दिन का प्राकट्य हुआ, उसकी पूर्व
दिशा में समुद्र योनि विद्यमान है। इसकी द्वितीय महिमा के रूप में रात्रि का प्राकट्य हुआ, उसकी
पश्चिम दिशा में समुद्र योनि है। ये दोनों समुद्र योनियाँ इस यज्ञाश्व के आगे-पीछे की महिमा संज्ञा
वाले ग्रह हैं। इस (विराट् अश्व) ने हय (त्याग) रूप में देवों को वहन किया, वाजी (भोग)
बनकर गन्धर्वों को वहन किया, अर्वा (चंचल-आक्रामक) रूप धारण कर असुरों और अश्व
(अधिक भोजन करने वाला) रूप से मानवों को वहन किया है। इस यज्ञाश्व अथवा विराट् विश्व का
उद्गम स्थल और बन्धु (बाँधकर रखने वाला प्रेमी-सहयोगी) भी समुद्र ही है ॥ २ ॥
[हय, वाजी, अर्वा, अश्व यह सभी शब्द पर्यायवाची हैं, सभी का अर्थ गतिशील होता है; किन्तु भाव-भेद
से इनमें कुछ अन्तर है। त्याग कर बढ़ने वाला 'हय' है। वाजीकरण औषधियाँ भोग शक्ति को बढ़ाने वाली होती
हैं; अस्तु, वाजी योगपरक है। अर्वा चंचल-आक्रामक है और अश्व को महाशनो, बहुभोजी कहा गया है। अश्व का
उद्गम स्थल और बन्धु समुद्र कहा गया है। यह सामान्य समुद्र नहीं 'आपः तत्त्व' कारण प्रकृति जिसमें हिलोरें लेती
है, जिसकी लहरों से लोक - लोकान्तर बनते-बिगड़ते रहते हैं, वह विराट् सक्रिय व्योम है। वेद ने इसे ही 'समुद्रो
अर्णवः' आदि कहा है।]
अध्याय १ ब्राह्मण २ मन्त्र ४ २४३
अध्याय १ ब्राह्मण २ मन्त्र ४ २४३
॥ द्वितीयं ब्राह्मणम् ॥
नैवेह किंचनाग्र आसीन्मृत्युनैवेदमावृतमासीत्। अशनाययाशनाया हि मृत्युस्तन्मनो-
ऽकुरुतात्मन्वी स्यामिति। सोऽर्चन्नचरत्तस्यार्चत आपोऽजायन्तार्चते वै मेकमभूदिति
तदेवार्कस्यार्कत्वम् कः ह वा अस्मै भवति य एवमेतदर्कस्यार्कत्वं वेद॥ १॥
प्रारम्भ में इस विश्व में और कुछ भी न था। सब कुछ मृत्यु से आवृत था। यह अशनाया (क्षुधा) से आवृत था।
क्षुधा ही मृत्यु है। (संसार को अपने अन्दर विलीन कर लेने के कारण ईश्वर को भी मृत्यु कहते हैं।) उसने सङ्कल्प
किया कि मैं मन (संकल्पशक्ति) से युक्त हो जाऊँ। उसने अर्चन (इसके लिए प्रयत्न) किया, जिससे आपः (कारण
रूप सक्रिय तत्त्व या प्रकृति) की उत्पत्ति हुई। यह (आपः) ही अर्क (ब्रह्माण्ड) का अर्कत्व (ऐश्वर्य) है। इस अर्क
(मूल तत्त्व) को इस प्रकार जानने वाले को 'क' (सुख) की प्राप्ति होती है॥ १॥
[ सब कुछ मृत्यु एवं क्षुधा से आवृत था, यह आलंकारिक उक्ति है। मृत्यु निष्क्रियता की स्थिति है- प्रलय
की स्थिति है। ब्रह्माण्ड को अपने में लय कर लेने की ईश्वरीय इच्छा को उसकी क्षुधा कह सकते हैं। लय करने
की इच्छा या क्षुधा के फलस्वरूप ही प्रलय-मृत्यु की स्थिति आती है। उसी ब्रह्म की इच्छा पुनः उगल देने की-सृष्टि
को प्रकट करने की हुई, तो वह चक्र पुनः चल पड़ा। अर्क शब्द 'अर्च' धातु से बना है। इसे अर्च्+क या अर्कू+क
( = अर्चक-अर्क) कह सकते हैं। इसे देव संज्ञक मानते हैं। इस देव रहस्य को जानने वाले को सुख या देवत्व की
प्राप्ति होना उचित है।]
आपो वा अर्कस्तद्यदपाᳵ शर आसीत्तत्समहन्यत सा पृथिव्यभवत्तस्यामश्राम्यत्तस्य
श्रान्तस्य तप्तस्य तेजोरसो निरवर्तताग्निः ॥ २॥
आपः (मूलतत्त्व) ही अर्क है। उस आपः के ऊपर स्थूल भाग एकत्र हो जाने से पृथिवी की उत्पत्ति
हुई। तदुपरान्त उस पृथिवी पर सृजेता के श्रम और तपश्चर्या के परिणाम स्वरूप उसका (ईश्वर का) सारभूत
तेज अग्नि के रूप में प्रकट हुआ॥ २॥
स त्रेधात्मानं व्यकुरुतादित्यं तृतीयं वायुं तृतीयंᳵ स एष प्राणस्त्रेधा विहितः। तस्य
प्राची दिक़्शिरोऽसौ चासौ चेमौ। अथास्य प्रतीची दिक् पुच्छमसौ चासौ च सक्थ्यौ
दक्षिणा चोदीची च पार्श्वे द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरमियमुरः स एषोऽप्सु प्रतिष्ठितो यत्र क्वचैति
तदेव प्रतितिष्ठत्येवं विद्वान् ॥ ३॥
उस परमेश्वर ने अपने (अग्निरूप अवतरण) के तृतीयांश को सूर्य, तृतीयांश को वायु (तथा शेष
तृतीयांश अग्नि) इस प्रकार तीन भागों में विभक्त किया । पूर्व दिशा उस विराट् का शीर्ष भाग (सिर),
ईशान दिशाएँ और आग्नेय दिशाएँ उसकी दोनों बाँहें, पश्चिम दिशा उसकी पूँछ तथा वायव्य और नैऋत्य
दिशाएँ उस विराट् की जंघाएँ हैं। उत्तर और दक्षिण दिशाओं को उसका पार्श्व भाग तथा द्युलोक को पृष्ठ
भाग कहते हैं। अन्तरिक्ष उसका उदर प्रदेश और पृथिवी वक्षस्थल (हृदय) है। यह (अग्नि रूप विराट्
तत्त्व) आपः तत्त्व में प्रतिष्ठित है। इस विराट् को जो इस प्रकार जानता है, वह प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ३॥
सोऽकामयत द्वितीयो म आत्मा जायेतेति स मनसा वाचं मिथुनᳵ समभवदशनाया
मृत्युस्तद्यद्रेत आसीत्स संवत्सरोऽभवत्। न ह पुरा ततः संवत्सर आस तमेतावन्तं
कालमबिभः। यावान्संवत्सरस्तमेतावतः कालस्य परस्तादसृजत। तं जातमभिव्याददात्स
भाणकरोत्सैव वागभवत्॥ ४॥
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बृहदारण्यकोपनिषद् [Header]
उस विराट् ने इच्छा की कि मेरा द्वितीय (भिन्न) रूप या प्रयास भी प्रकट हो। अस्तु, उस क्षुधारूप
मृत्यु ने मन के साथ वाणी की कामना की। दोनों के सम्बद्ध होने से जो रेतस् प्रकट हुआ, वही संवत्सर
हुआ। उससे पूर्व संवत्सर अथवा काल नहीं था। उस संवत्सर को उतने ही समय तक वे मृत्यु स्वरूप
प्रजापति गर्भ में धारण किये रहे। निर्धारित समय पूरा हो चुकने के बाद उस (संवत्सर) को प्रकट किया।
उस उत्पन्न कुमार को खाने के लिए मृत्यु ने मुँह फैलाया, तब उस (कुमार के) मुख से 'भाण्' (शब्द)
निकला, वही वाणी हो गई ॥४॥
[यह आलंकारिक वर्णन है। मन के साथ वाणी के संयोग से रेतस् अर्थात् प्रवहमान तेजस्-ज्ञान
प्रकट हुआ। वही घनीभूत होकर संवत्सर (संवित्+सर) अर्थात् मन एवं वाणी के संयोग से बना ज्ञान
सरोवर बना। वह ज्ञान काल-कवलित न हो जाये, इसलिए उसने भा=शोभायुक्त, ण=प्राण प्रयोग (शोभनीय
प्राण प्रयोग अर्थात् ज्ञानयुक्त जीवों का विस्तार) किया। यह बात आगे सिद्ध होती है।]
स ऐक्षत यदि वा इममभिमांᳵस्ये कनीयोऽन्नं करिष्य इति स तया वाचा तेनात्मनेदꣳ
सर्वमसृजत यदिदं किंचर्चो यजूंषि सामानि छन्दाꣳसि यज्ञान् प्रजाः पशून्। स
यद्यदेवासृजत तत्तदत्तुमध्रियत सर्वं वा अत्तीति तददितेरदितित्वꣳ सर्वस्यैतस्यात्ता भवति
सर्वमस्यान्नं भवति य एवमेतददितेरदितित्वं वेद ॥५॥
उस (मृत्यु) ने कुमार को भयभीत देखकर सोचा कि यदि मैं इसका भक्षण कर लूँ, तो यह अत्यल्प
अन्न ही ग्रहण करूँगा। अस्तु, मृत्यु ने मन और वाणी के संयोग से ऋक्, यजु, साम, छन्द और यज्ञ, पशु और
प्रजा की रचना की। इन सभी सृजित वस्तुओं को उसने भक्षण कर लेने का विचार किया। वह सबका भक्षण
करता है। ईश्वर भी सभी को अपने में लीन कर लेता है। अतः यही उस अदिति (अखण्ड रूप ईश्वर) का
अदितित्व (एकरस-एकरूप) है। जो इस प्रकार इस अदिति के अदितित्व का ज्ञान रखता है, वह इन सबका
अत्ता होता है अर्थात् वह समस्त वस्तुओं और अन्नों का खाने वाला (आत्मसात् करने वाला) होता है ॥५॥
सोऽकामयत भूयसा यज्ञेन भूयो यजेयेति सोऽश्राम्यत्स तपोऽतप्यत तस्य श्रान्तस्य
तप्तस्य यशो वीर्यमुदक्रामत् प्राणा वै यशो वीर्यं तत्प्राणेषूत्क्रान्तेषु शरीरꣳ श्वयितुमध्रियत
तस्य शरीर एव मन आसीत् ॥६॥
उस (प्रजापति) ने कामना की कि मैं फिर से एक विराट् यज्ञ द्वारा यजन कार्य करूँ, सो उसने श्रम
और तप किया। तप और श्रम से यश और बल प्रकट हुए। प्राण तत्त्व ही यश और बल (वीर्य) है। प्राणों
के विस्तार के साथ ही शरीर फूलने (विस्तार पाने) लगा। तब भी उसका मन शरीर में (उस विकास
प्रक्रिया में) ही लगा रहा ॥६॥
[वर्तमान वैज्ञानिक-अनुसंधान के आधार पर भी सृष्टि का उद्भव बिगबैंग-महाविस्फोट के साथ
प्राण-प्रक्रिया का विस्तार हुआ और दृश्य जगत् फैल गया। पहले पदार्थ अत्यधिक घनीभूत था। उसके
फैलने-फूलने से ही यह मेध्य समझ जाने योग्य ब्रह्माण्ड विकसित हुआ।]
सोऽकामयत मेध्यं म इदꣳ स्यादात्मन्व्यनेन स्यामिति ततोऽश्वः समभवद्यदश्व-
त्तन्मेध्यमभूदिति तदेवाश्वमेधस्याश्वमेधत्वं । एष ह वा अश्वमेधं वेद य एनमेवं वेद तमनवरु-
द्ध्यैवामन्यत तꣳ संवत्सरस्य परस्तादात्मन आलभत पशून्देवताभ्यः प्रत्यौहत् तस्मात्सर्वदेवतं
प्रोक्षितं प्राजापत्यमालभन्ते । एष ह वा अश्वमेधो य एष तपति तस्य संवत्सर आत्मायम-
अध्याय १ ब्राह्मण ३ मन्त्र ३ २४५
अध्याय १ ब्राह्मण ३ मन्त्र ३ २४५
ग्रिरर्कस्तस्येमे लोका आत्मानस्तावेतावर्काश्वमेधौ सोपुनरेकैव देवता भवति मृत्युरेवाप
पुनर्मृत्युं जयति नैनं मृत्युराप्नोति मृत्युरस्यात्मा भवत्येतासां देवतानामेको भवति ॥ ७ ॥
तदुपरान्त उसने कामना की कि मेरा यह शरीर जानने योग्य अथवा यज्ञीय (मेध्य) हो जाए और मैं
इसके माध्यम से शरीरवान् हो जाऊँ। तब यह शरीर अश्वत् (फैलकर बड़ा) हो गया। अस्तु, वह अश्व
कहलाया और वह अश्व ही मेध्य (जानने योग्य या संगति बिठाने योग्य अथवा यजनीय) हुआ। यही
अश्वमेध का अश्वमेधत्व है। इसे इस प्रकार जानने वाला ही वस्तुतः अश्वमेध को जानता है। उसने
(प्रजापति ने) उस अश्वमेध को अवरोध रहित ही विचार किया (दर्शन किया)। उसने (प्रजापति ने )
संवत्सर के बाद उसका (अश्व का) अपने निमित्त आलभन किया और अन्य पशुओं को भी देवों के
निमित्त प्रस्तुत किया। अस्तु, यजनकर्त्ता मन्त्र से संस्कारित समस्त देवों से सम्बन्धित प्राजापत्य पशु को
आलभित करते हैं। यह तप्यमान (आदित्य) ही अश्वमेध है। संवत्सर उसकी देह है। अग्नि अर्क है और
समस्त लोक ही इस (अश्व) की आत्मा हैं। ये अग्नि और आदित्य दोनों ही अर्क और अश्वमेध हैं; किन्तु
वे मृत्यु स्वरूप देवता एक ही हैं। इस प्रकार से मृत्यु को जानने वाला मृत्युजित् या मृत्युंजय हो जाता है।
वह स्वयं भी मृत्यु स्वरूप होकर देवों में भी मुख्य स्थान प्राप्त कर लेता है ॥ ७ ॥
॥ तृतीयं ब्राह्मणम् ॥
उद्गीथ विद्या की यह आख्यायिका कतिपय परिवर्तनों के साथ छान्दोग्य उपनिषद् के अध्याय-१ के
द्वितीय खण्ड में भी आई है-
द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च ततः कनीयसा एव देवा ज्यायसा असुरास्त एषु
लोकेष्वस्पर्धन्त ते ह देवा ऊचुर्हन्तासुरान्यज्ञ उद्गीथेनात्ययामेति ॥ १ ॥
प्रजापति के पुत्रों के दो वर्ग थे- देवता और असुर। उनमें देवता अल्प और असुर बहु संख्यक थे।
विभिन्न लोकों में निवास करते हुए वे परस्पर प्रतिस्पर्धा करने लगे। देवताओं ने निश्चय किया कि हम
लोग यज्ञ में 'उद्गीथ' के द्वारा असुरों का अतिक्रमण करें ॥ १ ॥
ते ह वाचमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो वागुदगायत् यो वाचि भोगस्तं देवेभ्य
आगायद्यत् कल्याणं वदति तदात्मने ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य
पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं वदति स एव स पाप्मा ॥ २ ॥
तदुपरान्त देवों ने उद्गीथ गान हेतु वाणी के अभिमानी देवता वाक् से निवेदन किया। उनके निवेदन
को स्वीकार कर वाक् ने उद्गीथ पाठ किया। उसने अपने भोग को देवताओं के निमित्त गाया और अपने
लिए शुभ वचनों का गान किया, जिससे असुर जान गये कि देवगण उद्गाता के माध्यम से हम पर
आक्रमण करेंगे। अस्तु, उन्होंने वाक् के निकट जाकर उसे पाप से विद्ध कर दिया। वाक् का निषिद्ध
(अनुचित) वचन ही वस्तुतः पाप है ॥ २ ॥
अथ ह प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यः प्राण उदगायद्यः प्राणे भोगस्तंदेवेभ्य
आगायद्यत् कल्याणं जिघ्रति तदात्मने ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य
पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं जिघ्रति स एव स पाप्मा ॥ ३ ॥
२४६ बृहदारण्यकोपनिषद्
तब देवों ने प्राण से कहा कि आप हमारे लिए उद्गाता बन जाएँ। प्राण ने 'तथास्तु' कहकर इसे
स्वीकार कर लिया और उद्गीथ गायन सम्पन्न किया। उसने (प्राण ने) प्राण तत्त्व के भोग को देवताओं के
लिए और जिस (श्रेष्ठ) गंध को वह सूँघता है, उसे अपने लिए गाया। असुरों को विदित हो गया कि देवता
प्राण रूप उद्गाता द्वारा हमारा अतिक्रमण करेंगे। अस्तु, वे प्राण के पास गये और उसे पाप से बींध दिया।
घ्राण (प्राण शक्ति) जिस अनुपयुक्त अथवा निषिद्ध को सूँघता है, वही पाप है॥ ३॥
अथ ह चक्षुरूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यश्चक्षुरुदगायद् यश्चक्षुषि भोगस्तं देवेभ्य
आगायद्यत्कल्याणं पश्यति तदात्मने ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य
पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं पश्यति स एव स पाप्मा ॥ ४॥
तब देवों ने चक्षु से उद्गीथ गान करने के लिए निवेदन किया। उसे स्वीकार कर चक्षु इन्द्रिय ने
उद्गीथ गान किया। चक्षु में स्थित भोग सामर्थ्य को उसने देवों के निमित्त गाया और उसमें जो शुभ दर्शन
का गुण है, उसे अपने लिए गाया। इस तथ्य को असुरगण जान गये कि देवता चक्षुरूप उद्गाता के द्वारा
हमारा अतिक्रमण करेंगे, तब असुरों ने चक्षु के निकट जाकर (आक्रमण करके) उसे पाप से विद्ध कर
दिया। नेत्रेन्द्रिय जिस अनुचित को देखती है, वही पाप है॥ ४॥
अथ ह श्रोत्रमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यः श्रोत्रमुद्रायद्यः श्रोत्रे भोगस्तं देवेभ्य
आगायद्यत्कल्याणःशृणोति तदात्मने ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य
पाप्मनाऽविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपःशृणोति स एव स पाप्मा ॥ ५॥
इसके बाद देवताओं ने श्रोत्र (कर्णेन्द्रिय) से कहा कि आप हमारे लिए उद्गान करें। श्रोत्र ने स्वीकार करके
देवों के लिए उद्गान किया। श्रोत्रेन्द्रिय के भोग को उसने देवताओं के लिए और वह जो शुभ सुनता है, उसे अपने
लिए गाया। असुर यह जान गये कि श्रोत्र रूप उद्गाता के द्वारा देवता हमारे ऊपर आक्रमण करेंगे, तब उनने श्रोत्र पर
आक्रमण किया और उन्हें पाप- रूप अस्त्र से बींध दिया। अनुचित और अनुपयुक्त सुनना ही पाप है॥५॥
अथ ह मन ऊचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो मन उद्गायद्यो मनसि भोगस्तं देवेभ्य
आगायद्यत् कल्याणः संकल्पयति तदात्मने ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य
पाप्मनाऽविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपः संकल्पयति स एव स पाप्मैवमु खल्वेता
देवताः पाप्मभिरुपासृजन्नेवमेनाः पाप्मेनाविध्यन् ॥ ६ ॥
तत्पश्चात् देवताओं ने मन से उद्गान करने की प्रार्थना की। मन ने उसे स्वीकार कर लिया और
उद्गान सम्पन्न किया। मन के भोगों को उसने देवताओं के लिए और उसके शुभ संकल्पों का अपने लिए
गान किया। इससे असुर यह जान गये कि देवगण मनरूप उद्गाता द्वारा हमारा अतिक्रमण करेंगे। तब
उन्होंने (असुरों ने) मन पर आक्रमण करके उसे पाप से विद्ध कर दिया। अनुपयुक्त और अशुभ संकल्प
करना ही पाप है। अतः देवगण पाप का संसर्ग पाकर (असुरों द्वारा) पाप से विद्ध हुए ॥ ६ ॥
अथ हेममासन्यं प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्य एष प्राण उदगायत्ते विदुरनेन
वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यत्सयन्स यथाश्मानमृत्वा लोष्टो विध्वग्ंसे
तैवग्ं हैव विध्वग्ंसमाना विष्वञ्चो विनेशुस्ततो देवा अभवन् परासुरा भवत्यात्मना परास्य
द्विषन्भ्रातृव्यो भवति य एवं वेद ॥७॥
अध्याय १ ब्राह्मण ३ मन्त्र १३ २४७
अध्याय १ ब्राह्मण ३ मन्त्र १३ २४७
तब देवों ने अपने मुख में निवास करने वाले प्राण से निवेदन किया कि आप हमारे निमित्त उद्गीथ
पाठ करें। मुखस्थ प्राण ने इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और उद्गीथ गान किया, जब असुरों ने यह
जाना कि देवता (प्राणरूप) उद्गाता के द्वारा हमारे ऊपर आक्रमण करेंगे, तब उन्होंने प्राण के पास जाकर
उसे भी पाप से विद्ध करने का प्रयत्न किया, परन्तु मिट्टी के ढेले के पत्थर से टकराकर चूर-चूर हो जाने
के समान वे असुरगण (मुखस्थ प्राण से टकराकर) विभिन्न प्रकार से छिन्न-भिन्न होकर ध्वस्त हो गये। इस
प्रकार देवगण विजयी और असुर-गण पराजित हुए। जो इस तथ्य को इस प्रकार जानता है वह शत्रु को
पराजित करके स्वयं विजयी होता है ॥ ७॥
ते होचु क्व नु सोऽभूद्यो न इत्थमसक्तेत्ययमास्येऽन्तरितिसोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां
हि रसः ॥ ८ ॥
इसके पश्चात् उन देवताओं ने परस्पर चर्चा की कि जिसने हमें असक्त (स्व स्वरूप से युक्त) किया
अर्थात् हमारी रक्षा की और हमें देवत्व भाव को प्राप्त कराया, वे कहाँ स्थित हैं? किसी ने उत्तर दिया कि
वे (मुख्य प्राण) हमारे मुख में स्थित हैं, इसीलिए उनका नाम अयास्य हुआ। अङ्गों का रस होने के कारण
उन्हें आङ्गिरस भी कहते हैं ॥ ८॥
सा वा एषा देवता दुर्नाम दूरँ ह्यस्या मृत्युर्द्दूरँ ह वा अस्मान्मृत्युर्भवति य एवं वेद ॥
यह (प्राण नाम वाले) देवता 'दूर' नाम से युक्त हैं, क्योंकि मृत्यु इससे दूर रहती है। जो इस
(मृत्यु के प्राण से दूर रहने के रहस्य) को इस तरह जानता है, वह मृत्यु से बचा रहता है ॥ ९ ॥
स वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहृत्य यत्रासां दिशामन्तस्तद्गमयांचकार
तदासां पाप्मनो विन्यदधात्तस्मान्न जनमियान्नान्तमियान्नेत्पाप्मानं मृत्युमन्ववायानीति ॥ १० ॥
उस, इस प्राण रूप देवता ने इन्द्रियरूपी देवताओं के पाप रूपी मृत्यु को विनष्ट करके दिशाओं के
सीमान्त स्थल तक पहुँचा दिया और तिरस्कारपूर्वक उसने (प्राण ने) उन्हें (पापों को) वहाँ प्रतिष्ठित कर
दिया। अतः किसी को भी यह सोचकर कि मैं पापरूप मृत्यु के पाश में न फँसूँ, दिशाओं के सीमान्त प्रदेश
में नहीं जाना चाहिए (अर्थात् मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए) ॥ १० ॥
सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्याथैनां मृत्युमत्यवहत् ॥ ११ ॥
उस प्राण देवता ने इन्द्रियादि देवताओं के पाप रूप मृत्यु को विनष्ट कर उन्हें मृत्यु के उस पार पहुँचा
दिया अर्थात् मृत्यु रहित कर दिया (पाप का परित्याग कर मानव मोक्ष रूपी अमृतत्व को प्राप्त करता है) ॥
स वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत्सा यदा मृत्युमत्यमुच्यत सोऽग्निरभवत्सोऽयमग्निः
परेण मृत्युमतिक्रान्तो दीप्यते ॥ १२ ॥
उस प्राण देवता ने सर्वप्रथम वाग्देवता को मृत्यु के पार किया। वाग्देवता मृत्यु के पार होते ही (अमृतत्व
प्राप्त करके)अग्निरूप हो गये। अग्निरूप हुई वह वाणी ही मृत्यु का अतिक्रमण करके देदीप्यमान हो रही है ॥ १२ ॥
अथ ह प्राणमत्यवहत्स यदा मृत्युमत्यमुच्यत स वायुरभवत्सोऽयं वायुः परेण
मृत्युमतिक्रान्तः पवते ॥ १३ ॥
तदुपरान्त उस प्राण देवता ने घ्राणशक्ति को मृत्यु के पार किया। तब (पापरूपी) मृत्यु से पार हुई
वह घ्राण शक्ति वायुरूप हो गई। अब वही वायु मृत्यु के पाश से मुक्त होकर प्रवाहित हो रही है ॥ १३ ॥