१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 237, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रश्न ५ मन्त्र १ २३७
पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा
चाकाशश्चाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च
रसयितव्यं च त्वक् च स्पर्शयितव्यं च वाक् च वक्तव्यं च हस्तौ चादातव्यं
चोपस्थश्चानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च पादौ च गन्तव्यं च मनश्च मन्तव्यं च
बुद्धिश्च बोद्धव्यं चाहङ्कारश्चाहङ्कर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च
प्राणश्च विधारयितव्यं च॥ ८॥
(गत मन्त्रों में जिन तत्त्वों का संकेत है, वे ये हैं) पृथ्वी एवं उसकी तन्मात्रा (गन्ध), जल एवं उसकी
तन्मात्रा (रस), आकाश एवं उसकी तन्मात्रा (शब्द), वायु और उसकी तन्मात्रा (स्पर्श), तेज (अग्नि) और
उसकी तन्मात्रा (रूप), नेत्र और देखने योग्य (दृश्य), कान और सुनने योग्य (शब्द), घ्राण और सूंघने
योग्य (गंध), रसना और स्वाद ग्रहण करने योग्य (रस), त्वचा और स्पर्श करने योग्य (पदार्थ), हाथ और
ग्रहण करने योग्य पदार्थ, वाक् शक्ति और वक्तव्य-विषय, उपस्थ और उससे सम्बंधित विषय, गुदा और
विसर्जन योग्य (मल), पैर और गन्तव्य स्थल, मन और मननीय विषय, बुद्धि और जानने योग्य विषय,
अहंकार और उसका विषय, चित्त और चिंतनीय विषय, तेजस् और प्रकाशित करने योग्य पदार्थ, प्राण एवं
उसके आश्रित रहने वाले पदार्थ (ये सब) परम आत्मा में विलीन हो जाते हैं॥ ८॥
एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धाकर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः स
परेऽक्षर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥ ९॥
यही द्रष्टा (देखने वाला), स्प्रष्टा (स्पर्श करने वाला), श्रोता (सुनने वाला), घ्राता (सूँघने वाला),
रसयिता (रस लेने वाला), मन्ता (मनन करने वाला), कर्त्ता (कर्म करने वाला) और बोद्धा (जानने वाला)
विज्ञानात्मा पुरुष है; जो परम अविनाशी ब्रह्म में स्थित हो जाता है॥ ९॥
परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु
सोम्य! स सर्वज्ञः सर्वो भवति॥ तदेष श्लोकः॥ १०॥
हे सोम्य! जो पुरुष, इस छायारहित, शरीररहित, अलोहित, शुभ्र अक्षर परमात्मा को भली-भाँति
जानता है, वह सर्वज्ञ और सर्वरूप होकर उसी को प्राप्त हो जाता है-ऐसा इस श्लोक में भी वर्णित है ॥१०॥
विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र। तदक्षरं वेदयते यस्तु
सोम्य! स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥ ११॥
हे सोम्य ! जिस अविनाशी परब्रह्म में समस्त देवगण, समस्त प्राण और समस्त भूत भली प्रकार
प्रतिष्ठित होते हैं, उसे जानने वाला सर्वज्ञाता भी उसी में (परमात्मा में) प्रविष्ट हो जाता है॥ ११॥
॥ पञ्चमः प्रश्नः ॥
अथ हैनं शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ। स यो ह वै तद्भगवन्मनुष्येषु प्रायणान्त-
मोङ्कारमभिध्यायीत। कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति॥ १॥
इसके उपरान्त शिबि पुत्र सत्यकाम ने महर्षि पिप्पलाद से पूछा- हे भगवन्! यह बताने का अनुग्रह
करें कि जो मनुष्य जीवन भर (मरण पर्यन्त) ॐ का ध्यान करे, वह इस (ओंकारोपासना) द्वारा
किस लोक पर विजय प्राप्त कर लेता है?॥ १॥