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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 247, कुल 505 में से

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पृष्ठ 247

अध्याय १ ब्राह्मण ३ मन्त्र १३ २४७
तब देवों ने अपने मुख में निवास करने वाले प्राण से निवेदन किया कि आप हमारे निमित्त उद्गीथ
पाठ करें। मुखस्थ प्राण ने इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और उद्गीथ गान किया, जब असुरों ने यह
जाना कि देवता (प्राणरूप) उद्गाता के द्वारा हमारे ऊपर आक्रमण करेंगे, तब उन्होंने प्राण के पास जाकर
उसे भी पाप से विद्ध करने का प्रयत्न किया, परन्तु मिट्टी के ढेले के पत्थर से टकराकर चूर-चूर हो जाने
के समान वे असुरगण (मुखस्थ प्राण से टकराकर) विभिन्न प्रकार से छिन्न-भिन्न होकर ध्वस्त हो गये। इस
प्रकार देवगण विजयी और असुर-गण पराजित हुए। जो इस तथ्य को इस प्रकार जानता है वह शत्रु को
पराजित करके स्वयं विजयी होता है ॥ ७॥
ते होचु क्व नु सोऽभूद्यो न इत्थमसक्तेत्ययमास्येऽन्तरितिसोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां
हि रसः ॥ ८ ॥
इसके पश्चात् उन देवताओं ने परस्पर चर्चा की कि जिसने हमें असक्त (स्व स्वरूप से युक्त) किया
अर्थात् हमारी रक्षा की और हमें देवत्व भाव को प्राप्त कराया, वे कहाँ स्थित हैं? किसी ने उत्तर दिया कि
वे (मुख्य प्राण) हमारे मुख में स्थित हैं, इसीलिए उनका नाम अयास्य हुआ। अङ्गों का रस होने के कारण
उन्हें आङ्गिरस भी कहते हैं ॥ ८॥
सा वा एषा देवता दुर्नाम दूरँ ह्यस्या मृत्युर्द्दूरँ ह वा अस्मान्मृत्युर्भवति य एवं वेद ॥
यह (प्राण नाम वाले) देवता 'दूर' नाम से युक्त हैं, क्योंकि मृत्यु इससे दूर रहती है। जो इस
(मृत्यु के प्राण से दूर रहने के रहस्य) को इस तरह जानता है, वह मृत्यु से बचा रहता है ॥ ९ ॥
स वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहृत्य यत्रासां दिशामन्तस्तद्गमयांचकार
तदासां पाप्मनो विन्यदधात्तस्मान्न जनमियान्नान्तमियान्नेत्पाप्मानं मृत्युमन्ववायानीति ॥ १० ॥
उस, इस प्राण रूप देवता ने इन्द्रियरूपी देवताओं के पाप रूपी मृत्यु को विनष्ट करके दिशाओं के
सीमान्त स्थल तक पहुँचा दिया और तिरस्कारपूर्वक उसने (प्राण ने) उन्हें (पापों को) वहाँ प्रतिष्ठित कर
दिया। अतः किसी को भी यह सोचकर कि मैं पापरूप मृत्यु के पाश में न फँसूँ, दिशाओं के सीमान्त प्रदेश
में नहीं जाना चाहिए (अर्थात् मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए) ॥ १० ॥
सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्याथैनां मृत्युमत्यवहत् ॥ ११ ॥
उस प्राण देवता ने इन्द्रियादि देवताओं के पाप रूप मृत्यु को विनष्ट कर उन्हें मृत्यु के उस पार पहुँचा
दिया अर्थात् मृत्यु रहित कर दिया (पाप का परित्याग कर मानव मोक्ष रूपी अमृतत्व को प्राप्त करता है) ॥
स वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत्सा यदा मृत्युमत्यमुच्यत सोऽग्निरभवत्सोऽयमग्निः
परेण मृत्युमतिक्रान्तो दीप्यते ॥ १२ ॥
उस प्राण देवता ने सर्वप्रथम वाग्देवता को मृत्यु के पार किया। वाग्देवता मृत्यु के पार होते ही (अमृतत्व
प्राप्त करके)अग्निरूप हो गये। अग्निरूप हुई वह वाणी ही मृत्यु का अतिक्रमण करके देदीप्यमान हो रही है ॥ १२ ॥
अथ ह प्राणमत्यवहत्स यदा मृत्युमत्यमुच्यत स वायुरभवत्सोऽयं वायुः परेण
मृत्युमतिक्रान्तः पवते ॥ १३ ॥
तदुपरान्त उस प्राण देवता ने घ्राणशक्ति को मृत्यु के पार किया। तब (पापरूपी) मृत्यु से पार हुई
वह घ्राण शक्ति वायुरूप हो गई। अब वही वायु मृत्यु के पाश से मुक्त होकर प्रवाहित हो रही है ॥ १३ ॥