१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय ८ खण्ड ७ मन्त्र ४ १८९
अध्याय ८ खण्ड ७ मन्त्र ४ १८९
में से एक नाड़ी 'सुषुम्ना' मूर्धा (मस्तिष्क) की ओर निकल गई है। उस (सुषुम्ना) के द्वारा ऊर्ध्व
की ओर गमन करने वाला जीव अमृतत्व को प्राप्त होता है। शेष अन्य यत्र-तत्र गमन करने वाली
नाड़ियाँ केवल उत्क्रमण अर्थात् बाहर निकलने की हेतुभूता, (सुषुम्ना के अतिरिक्त उन सभी
नाड़ियों से ऊर्ध्व लोकों की प्राप्ति नहीं होती है) ॥ ६॥
॥ सप्तमः खण्डः ॥
य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः
सत्यसंकल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वाँश्च लोकानाप्नोति सर्वाँश्च
कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच ॥ १॥
(अब आत्मा के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए इन्द्र और विरोचन की आख्यायिका का वर्णन करते हैं।
प्रजापति ब्रह्माजी ने कहा-) जो आत्मा पापशून्य, जरारहित, मृत्यु से रहित, विशोक (शोक रहित),
क्षुधारहित, पिपासारहित, सत्यकाम और सत्य संकल्प से युक्त है, उसे खोजना चाहिए, विशेष रूप से
जानने का प्रयास करना चाहिए। जो उस आत्मा की अनुभूति प्राप्त करता है, वह सभी लोकों तथा समस्त
कामनाओं को प्राप्त कर लेता है ॥ १॥
तद्धोभये देवासुरा अनुबुबुधिरे ते होचुर्हन्त तमात्मानमन्विच्छामो यमात्मानमन्विष्य
सर्वाँश्च लोकानाप्नोति सर्वाँश्च कामानितीन्द्रो हैव देवानामभिप्रवव्राज विरोचनोऽसुराणां
तौ हासंविदानावेव समित्पाणी प्रजापतिसकाशमाजग्मतुः ॥ २॥
(प्रजापति ब्रह्मा जी के इस व्याख्यान को) देव और असुर दोनों ने (कर्ण परम्परा से) जाना। उन्होंने
कहा कि उस आत्मा की जिज्ञासा करनी चाहिए। जिसके जानने से सभी लोकों और भोगों को प्राप्त किया
जाता है। ऐसा सोचकर देवों के राजा इन्द्र और दैत्यों के राजा विरोचन दोनों आपस में सद्भाव न रखते हुए,
(भी) हाथों में समिधाएँ लेकर (समित्पाणि होकर) प्रजापति के पास पहुँचे ॥ २॥
तौ ह द्वात्रिंशतं वर्षाणि ब्रह्मचर्यमूषतुस्तौ ह प्रजापतिरुवाच किमिच्छन्ता-ववास्तमिति ।
तौ होचतुर्य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः
सत्यसंकल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वाँश्च लोकानाप्नोति सर्वाँश्च
कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति भगवतो वचो वेदयन्ते तमिच्छन्ताववास्तमिति ॥
वे दोनों ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए प्रजापति के पास ३२ वर्ष तक रहे। तत्पश्चात् प्रजापति ने उनसे
कहा- आप सभी ने किस उद्देश्य विशेष की पूर्ति हेतु यहाँ वासस्थल बनाया है। उन दोनों ने कहा- जो
आत्मा पापरहित, जरारहित, मृत्युरहित, शोक रहित, क्षुधा रहित, तृषारहित, सत्यकाम तथा सत्य संकल्प से
युक्त है, वही जानने एवं अनुभव करने योग्य है, जो उस आत्मा को जानता एवं अनुभव करता है, वह
समस्त लोकों और भोगों को प्राप्त करता है। आपके इस तरह के उपदेश को सभी श्रेष्ठ लोग कहते हैं।
हम सभी (देव एवं असुरगणों) ने उसी श्रेष्ठ आत्मा को जानने के लिए यहाँ वास किया है ॥ ३ ॥
तौ ह प्रजापतिरुवाच य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतम-
भयमेतद्ब्रह्मेत्यथ योऽयं भगवोऽप्सु परिख्यायते यश्चायमादर्शे कतम एष इत्येष उ एवैषु
सर्वेष्वन्तेषु परिख्यायत इति होवाच ॥ ४॥
॥ अष्टमः खण्डः ॥
१९० छान्दोग्योपनिषद्
प्रजापति ने कहा- आँख के अन्दर पुरुष के रूप में जो दृष्टिगोचर होता है, यही आत्मा है और यही
अभय एवं ब्रह्मरूप है। उन्होंने प्रतिच्छाया को ही आत्मा समझकर प्रश्न किया कि - हे भगवन्! यह जो
जल एवं दर्पण में सब ओर दृष्टिगोचर होता है, उसके अन्तर्गत आत्मा कौन सा है ? तब प्रजापति ने बताया-
हमने चक्षुओं के अन्दर जो द्रष्टा कहा है, वही इन सभी में दिखाई पड़ता है ॥ ४ ॥
॥ अष्टमः खण्डः ॥
उदशराव आत्मानमवेक्ष्य यदात्मनो न विजानीथस्तन्मे प्रब्रूतमिति तौ होदशरावेऽ-
वेक्षांचक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथेति तौ होचतुः सर्वमेवेदमावां भगव आत्मानं
पश्याव आलोमभ्य आनखेभ्यः प्रतिरूपमिति ॥ १ ॥
प्रजापति ने उन दोनों से कहा कि जल से परिपूर्ण पात्र में स्वयं अपने को देखकर तुम आत्मा के
सन्दर्भ में जो भी कुछ न जान सको, वह मुझसे कहो। इस प्रकार उन दोनों ने जल से पूर्ण पात्र में दृष्टिपात
किया। उन दोनों से प्रजापति ने कहा- तुम क्या देखते हो ? तब उन्होंने कहा- भगवन्! हम अपने शरीर के
रोम (केश) से लेकर नख पर्यन्त प्रतिबिम्ब रूप में इस आत्मा को देखते हैं ॥ १ ॥
तौ ह प्रजापतिरुवाच साध्वलंकृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षेथामिति
तौ ह साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षांचक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच
किं पश्यथ इति ॥ २ ॥
प्रजापति ने उन दोनों से कहा- तुम सुन्दर आभूषण एवं वस्त्रों से समलंकृत होकर तथा सम्पूर्ण शरीर
को परिष्कृत करने के पश्चात् जल के अन्दर देखो। उन दोनों ने प्रजापति के कथनानुसार ही समस्त
अलंकरणों एवं शुभ्र वस्त्रों को धारण कर और परिष्कृत होकर जल पात्र में देखा। तभी प्रजापति ने पुनः
प्रश्न किया कि तुम दोनों क्या देख रहे हो ? ॥ २ ॥
तौ होचतुर्यथैवेदमावां भगवः साध्वलंकृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ स्व एवमेवेमौ
भगवः साध्वलंकृतौ सुवसनौ परिष्कृतावित्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति
तौ ह शान्तहृदयौ प्रवव्रजतुः ॥ ३ ॥
उन दोनों (इन्द्र और विरोचन) ने प्रजापति से कहा- हे भगवन् ! जिस तरह हम दोनों उत्तम अलकारों
एवं शुभ्र परिधानों से युक्त एवं परिष्कृत हैं, वैसे ही ये दोनों जल के मध्य में दिखाई पड़ने वाले प्रतिबिम्ब
भी उत्तम आभूषणों एवं शुभ्र वस्त्रों से युक्त एवं परिष्कृत हैं। तदनन्तर प्रजापति ने कहा- यही आत्मा है,
यही अमृत एवं अभय है और यही ब्रह्म है। तत्पश्चात् वे दोनों शान्त चित्त होकर चले गये ॥ ३ ॥
[ वे दोनों प्रजापति के कथन के मर्म को समझ न सके तथा विम्ब में दृश्यमान स्थूल काया को ही आत्मा के
रूप में समझकर लौट पड़े। प्रजापति उनके अज्ञान को समझ गये।]
तौ हान्वीक्ष्य प्रजापतिरुवाचानुपलभ्यात्मानमनुविद्य व्रजतो यतर एतदुपनिषदो
भविष्यन्ति देवा वासुरा वा ते पराभविष्यन्तीति स ह शान्तहृदय एव विरोचनोऽसुराञ्जगाम
तेभ्यो हैतामुपनिषदं प्रोवाचात्मैवेह महय्य आत्मा परिचर्य आत्मानमेवेह महयन्नात्मानं
परिचरन्नुभौ लोकाववाप्नोतीमं चामुं चेति ॥ ४ ॥
प्रजापति ने उन दोनों को (दूर जाता हुआ) देखकर कहा- ये दोनों (इन्द्र एवं विरोचन) आत्मा को
अध्याय ८ खण्ड ९ मन्त्र २ १९१
अध्याय ८ खण्ड ९ मन्त्र २ १९१
प्राप्त किये बिना अर्थात् उस आत्मतत्त्व का साक्षात्कार किये बिना ही जा रहे हैं। देव हों अथवा असुर जो
भी आत्मा के सम्बन्ध में ऐसा सोचने वाले होंगे, उनका पतन अवश्य होगा। उस विरोचन ने शान्त भाव से
असुरों के सम्मुख जाकर प्रजापति के द्वारा बतायी हुई आत्म विद्या को कह सुनाया। उसने कहा- इस
लोक में यह (देह ही) आत्मा है तथा आत्मा ही सेवा के योग्य है। आत्मा की सेवा एवं परिचर्या करने
वाला पुरुष इहलोक एवं परलोक दोनों को प्राप्त कर लेता है ॥ ४॥
तस्मादप्यद्येहाददानमश्रद्दधानमयजमानमाहुरासुरो बतेत्यसुराणाꣳ ह्येषोपनिषत्प्रेतस्य
शरीरं भिक्षया वसनेनालंकारेणेति संस्कुर्वन्त्येतेन ह्यमुं लोकं जेष्यन्तो मन्यन्ते ॥ ५॥
यही कारण है कि संसार में जो (व्यक्ति) दान नहीं देता, श्रद्धा नहीं रखता और न ही यजन करता
है, उसे श्रेष्ठ जन इस प्रकार कहते हैं- अरे यह तो आसुरी वृत्ति वाला है। यह उपनिषद् (विद्या) असुरों की
ही है। वे ही मृत व्यक्ति के शरीर को (गन्ध-पुष्प-अन्न आदि) भिक्षा, वस्त्र एवं आभूषणों से विभूषित
करते हैं। इसके द्वारा ही हम स्वर्गलोक को प्राप्त करेंगे-ऐसा मानते हैं ॥ ५॥
॥ नवमः खण्डः ॥
अथ हेन्द्रोऽप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श यथैव खल्वयमस्मिञ्छरीरे साध्वलंकृते
साध्वलंकृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति
स्रामे स्रामः परिवृक्णे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति नाहमत्र भोग्यं
पश्यामीति ॥ १ ॥
जब तक इन्द्रदेव देवों के पास पहुँचें, इससे पूर्व उन्हें (यथार्थ बोध से) यह भय प्रकट हुआ कि
जिस प्रकार इस शरीर के अलंकृत किये जाने पर इसका प्रतिबिम्ब भी अलंकृत होता है, वस्त्रों से सुसज्जित
होने पर वह भी सज्जित होता है और परिष्कृत किये जाने पर वह भी परिष्कृत होता है, उसी प्रकार इस
शरीर के अन्धे हो जाने पर प्रतिबिम्ब शरीर भी अन्धा हो जाता है, स्राम (विकार स्रावित करने वाला) होने
पर स्राम हो जाता है, अपङ्ग होने पर अपङ्ग हो जाता है तथा इस शरीर के नष्ट होने पर वह भी विनष्ट हो
जाता है, अतः इस प्रतिबिम्ब शरीर में मुझे कुछ भी भोगने योग्य (श्रेष्ठ प्रतिफल) नहीं दिखाई पड़ता ॥ १ ॥
स समित्पाणिः पुनरेयाय तꣳ ह प्रजापतिरुवाच मघवन्यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः सार्धं
विरोचनेन किमिच्छन् पुनरागम इति स होवाच यथैव खल्वयं भगवोऽस्मिञ्छरीरे
साध्वलंकृते साध्वलंकृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायम-
स्मिन्नन्धेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः परिवृक्णे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति
नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥ २ ॥
तब इन्द्रदेव पुनः समिधा हाथ में लेकर प्रजापति के सम्मुख उपस्थित हुए। उनसे प्रजापति ने पूछा- हे इन्द्र! तुम
तो विरोचन के साथ हृदय से सन्तुष्ट हो गये थे, अब फिर किस इच्छा से लौटे हो? उन्होंने कहा- भगवन्! जिस प्रकार
इस शरीर के अलंकृत होने पर इसका प्रतिबिम्ब भी अलंकृत होता है। सुन्दर वस्त्रों से सज्जित किये जाने पर वह भी
सज्जित होता है। स्वच्छ किये जाने पर वह भी स्वच्छ होता है, उसी प्रकार इसके अंधे होने पर वह भी अन्धा होता
है, स्राम होने पर स्राम हो जाता है, अपङ्ग होने पर अपङ्ग हो जाता है तथा इस शरीर के नष्ट होने पर वह भी विनष्ट
हो जाता है, अतएव मुझे इसमें कुछ भी भोगने योग्य (श्रेष्ठ प्रतिफल) नहीं दिखाई पड़ता ॥ २ ॥
१९२ छान्दोग्योपनिषद
एवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि वसापराणि द्वात्रिंशतं
वर्षाणीति स हापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाण्युवास तस्मै होवाच ॥ ३ ॥
देव प्रजापति ने इन्द्रदेव से कहा- हे इन्द्र ! यह यथार्थ तथ्य ऐसा ही है, मैं तुम्हारे लिए इसकी व्याख्या
आगे करूँगा। अब तुम बत्तीस वर्ष यहाँ और वास करो। तब इन्द्रदेव ने वहाँ बत्तीस वर्ष व्यतीत किये। फिर
प्रजापति ने उन्हें उपदेश दिया॥ ३॥
॥ दशमः खण्डः ॥
य एष स्वप्ने महीयमानश्चरत्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति स ह
शान्तहृदयः प्रवव्राज स हाप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श तद्यद्यपीदं शरीरमन्धं भवत्यनन्धः
स भवति यदि स्राममस्रामो नैवैषोऽस्य दोषेण दुष्यति ॥ १ ॥
'जो स्वप्न में भी विचरणशील तत्त्व है, जो अत्यन्त पूज्यमान आत्मा है, वही अविनाशी, अभय और
ब्रह्म है।' इन वचनों से संतुष्ट होकर शान्त हृदय से इन्द्रदेव चले गये; परन्तु देवों तक पहुँचने के पूर्व उनमें
(यथार्थ बोध से) भय व्याप्त हुआ। यद्यपि यह शरीर अन्धा होता है, परन्तु वह स्वप्न शरीर (अन्तर्मन)
अनन्ध होता है और यह स्राम होता है, तो वह अस्राम रहता है। शरीर के दोषों से वह दोष मुक्त रहता है॥
न वधेनास्य हन्यते नास्य स्राम्येण स्रामो घ्नन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्तीवाप्रियवेत्तेव
भवत्यपि रोदितीव नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥ २ ॥
वह इस देह के वध से विनष्ट भी नहीं होता और वह इसकी स्रामता से स्राम भी नहीं होता; किन्तु
स्वप्न में भी ऐसा भान होता है कि कोई उसे मार रहा है, तिरस्कृत कर रहा है अथवा वह शोक कर रहा
है अथवा वह रो रहा है, अतएव इसमें मुझे भोगने योग्य (श्रेष्ठ प्रतिफल) कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता॥
स समित्पाणिः पुनरेयाय तं ह प्रजापतिरुवाच मघवन्द्यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः
किमिच्छन् पुनरागम इति स होवाच तद्यद्यपीदं भगवः शरीरमन्धं भवत्यनन्धः स भवति
यदि स्राममस्रामो नैवैषोऽस्य दोषेण दुष्यति ॥ ३ ॥
वे (इन्द्रदेव) पुनः देव प्रजापति के पास हाथ में समिधा लेकर आये। देव प्रजापति ने उनसे कहा-
हे इन्द्र ! तुम तो यहाँ से सन्तुष्ट होकर शान्त हृदय से गये थे, फिर किस इच्छा से लौटे हो? उन्होंने कहा-
भगवन्! यद्यपि यह शरीर अंधा होता है, तो भी वह (स्वप्न में विचरणशील अन्तर्मन) अनन्ध रहता है और
यह स्राम होता है, तो भी वह अस्राम रहता है। इस प्रकार वह शरीर के दोषों से दोषमुक्त ही रहता है॥३॥
न वधेनास्य हन्यते नास्य स्राम्येण स्रामो घ्नन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्तीवाप्रियवेत्तेव
भवत्यपि रोदितीव नाहमत्र भोग्यं पश्यामीत्येवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते
भूयोऽनुव्याख्यास्यामि वसापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणीति स हापराणि द्वात्रिंशतं
वर्षाण्युवास तस्मै होवाच ॥ ४॥
इसके वध से उसका वध नहीं होता है और इसकी स्रामता से वह स्राम नहीं होता; परन्तु ऐसा
अनुभव होता है कि कोई उसे मारता है, तिरस्कृत करता है, वह शोक करता है अथवा रोदन करता है।
अध्याय ८ खण्ड ११ मन्त्र ३ २९३
अध्याय ८ खण्ड ११ मन्त्र ३ २९३
इसमें मुझे कुछ भी भोगने योग्य (श्रेष्ठ प्रतिफल) दिखाई नहीं पड़ता। तब देव प्रजापति ने इन्द्रदेव से
कहा- हे इन्द्र ! यह तथ्य ऐसा ही है। इस आत्मतत्व की व्याख्या मैं आगे करूँगा, अभी तुम बत्तीस वर्ष और
यहाँ वास करो। तब इन्द्रदेव ने वहाँ बत्तीस वर्ष व्यतीत किया। फिर देव प्रजापति ने उन्हें उपदेश दिया ॥
॥ एकादशः खण्डः ॥
तद्यत्रैतत् सुप्तः समस्तः संप्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्येष आत्मेति होवाचैतदमृतम-
भयमेतद्ब्रह्मेति स ह शान्तहृदयः प्रवव्राज स हाप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श नाह
खल्वयमेवः संप्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो
भवति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥ १ ॥
'जब यह प्रसुप्त अवस्था में सम्पूर्ण रूप से आनन्दित और शान्त रहता है और स्वप्न का अनुभव भी
नहीं करता, वही आत्मा है। वही अनश्वर, अभय और ब्रह्म है'। इन वचनों को सुनकर इन्द्रदेव सन्तुष्ट
होकर शान्त हृदय से चले गये; किन्तु देवों तक पहुँचने के पूर्व उनमें फिर (यथार्थ बोध से) भय प्रकट
हुआ। उस अवस्था में तो उसे निश्चय ही यह बोध नहीं रहता कि यह मैं हूँ और न वह अन्य प्राणियों को
जानता है, उस अवस्था में तो वह विनाश जैसी स्थिति को प्राप्त हो जाता है। इसमें मुझे कुछ भी भोगने
योग्य (श्रेष्ठ प्रतिफल) नहीं दिखाई पड़ता ॥ १ ॥
स समित्पाणिः पुनरेयाय तं ह प्रजापतिरुवाच मघवन्यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः
किमिच्छन्पुनरागम इति स होवाच नाह खल्वयं भगव एवः संप्रत्यात्मानं जानात्यय-
महमस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥ २ ॥
(इस प्रकार विचार करते हुए) देवराज इन्द्र पुनः प्रजापति के पास हाथ में समिधा लेकर पहुँचे। उन्हें
देखकर प्रजापति ने पूछा- हे इन्द्र ! तुम तो स्थिर चित्त होकर चले गये थे, अब पुनः हमारे पास किस इच्छा
से आये हो ? इन्द्र ने कहा- 'हे भगवन् !' इस स्थिति में तो निश्चय ही इसे यह भी आभास नहीं होता कि
स्वयं ही यह मैं हूँ। न यह इन अन्य दूसरे भूतों (प्राणियों) को जानता है। यह निश्चय ही विनाश सा हो
जाता है। इसमें मुझे इष्ट दृष्टिगोचर नहीं होता ॥ २ ॥
एवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि नो एवान्यत्रैतस्मा-
द्वसापराणि पञ्च वर्षाणीति स हापराणि पञ्च वर्षाण्युवास तान्येकशतं संपेदुरेतत्तद्य-
दाहुरेकशतं ह वै वर्षाणि मघवान्प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमुवास तस्मै होवाच ॥ ३ ॥
प्रजापति ने पुनः उपदेश देते हुए इन्द्र से कहा- हे इन्द्र ! 'यह बात ऐसी ही है'। अब मैं तुम्हें पुनः
समझाइएा । अभी तुम पाँच साल तक यहाँ पर और ब्रह्मचर्य पूर्वक निवास करो। तदनन्तर देवराज इन्द्र ने
पाँच साल तक निवास किया। यह सभी वर्ष मिलाकर एक सौ एक वर्ष हो गये। इसी से कहते हैं कि इन्द्र
ने प्रजापति के यहाँ एक सौ एक वर्ष तक ब्रह्मचर्य पूर्वक निवास किया तत्पश्चात् प्रजापति ने कहा ॥ ३ ॥
॥ द्वादशः खण्डः ॥
१९४ छान्दोग्यापानषद
॥ द्वादशः खण्डः ॥
मघवन्मर्त्यं वा इदँशरीरमात्तं मृत्युना तदस्यामृतस्याशरीरस्यात्मनोऽधिष्ठानमात्तो
वै सशरीरः प्रियाप्रियाभ्यां न वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्त्यशरीरं वाव सन्तं
न प्रियाप्रिये स्पृशतः ॥ १ ॥
हे इन्द्र ! यह शरीर मरणधर्मा एवं सदैव मृत्यु से आच्छादित है। अविनाशी एवं अशरीरी
आत्मा का यह (शरीर) वास स्थल है। सशरीर आत्मा निश्चय ही प्रिय एवं अप्रिय से घिरा हुआ है,
शरीर युक्त होते हुए इसके प्रिय व अप्रिय का विनाश नहीं होता। साथ ही अशरीर (शरीररहित)
होने पर प्रिय और अप्रिय इसका स्पर्श रञ्च मात्र भी नहीं कर सकते ॥ १ ॥
अशरीरो वायुरभ्रं विद्युत्तस्तनयित्नुरशरीराण्येतानि तद्यथैतान्यमुष्मादाकाशात्समुत्थाय
परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यन्ते ॥ २ ॥
वायु शरीर से रहित है, अभ्र (बादल), विद्युत् और मेघ की गर्जना भी अशरीरी है। जिस तरह ये
सभी उस आकाश से ऊपर उठकर सूर्य (सविता) की परम ज्योति को प्राप्त कर अपने स्वरूप में परिणत
हो जाते हैं ॥ २ ॥
एवमेवैष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभि-
निष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः स तत्र पर्येति जक्षत्क्रीडन्रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वाज्ञातिभिर्वा
नोपजनँ स्मरन्निदँ शरीरँ स यथा प्रयोग्य आचरणे युक्त एवमेवायमस्मिञ्छरीरे प्राणो
युक्तः ॥ ३ ॥
उसी तरह यह सम्प्रसाद (जीव) आकाश से वायु आदि की भाँति इस शरीर से ऊर्ध्व की ओर उठकर
परम ज्योति को पाकर अपने आत्मस्वरूप में केन्द्रित हो जाता है। वह ही उत्तम पुरुष है, ऐसी अवस्था में
वह (जीव) हँसता, क्रीड़ा करता और स्त्री, यान अथवा ज्ञातिजनों (बन्धुओं) के साथ रमण करता हुआ
अपने साथ प्रकट हुए इस शरीर को स्मरण न करता हुआ, सभी ओर संचरित होता है। जैसे अश्व अथवा
वृषभ गाड़ी में जुता रहता है, ठीक वैसे ही यह प्राण रथ स्थानीय शरीर में जुता हुआ है ॥ ३ ॥
अथ यत्रैतदाकाशमनुविषण्णं चक्षुः स चाक्षुषः पुरुषो दर्शनाय चक्षुरथ यो वेदेदं
जिघ्राणीति स आत्मा गन्धाय घ्राणमथ यो वेदेदमभिव्याहराणीति स आत्माभिव्याहाराय
वागथ यो वेदेदँ शृणवानीति स आत्मा श्रवणाय श्रोत्रम् ॥ ४ ॥
जहाँ जाग्रत् अवस्था में वह चक्षु द्वारा उपलक्षित आकाश रूप में अनुगत है, वह ही चाक्षुष अर्थात्
चक्षु में रहने वाला पुरुष है। उसके ज्ञान के साधन नेत्र हैं। जो यह अनुभव करता है कि मैं इसे सूँघूँ यानी
ग्रहण करूँ; वही आत्मा है। उसके गन्ध ग्रहण के लिए नासिका है तथा जो जानता है कि मैं यह शब्द
उच्चारण करूँ, वह ही आत्मा है। उसके वाक्योच्चारण के लिए वाणी है और जो यह समझता है कि मैं यह
श्रवण करूँ, वह भी आत्मा ही है और उसके सुनने के साधन स्वरूप श्रोत्रेन्द्रिय है ॥ ४ ॥
अथ यो वेदेदं मन्वानीति स आत्मा मनोऽस्य दैवं चक्षुः स वा एष एतेन दैवेन चक्षुषा
मनसैतान् कामान् पश्यन् रमते ॥ ५ ॥
अध्याय ८ खण्ड १४ मन्त्र १ १९५
अध्याय ८ खण्ड १४ मन्त्र १ १९५
और जो यह अनुभव करता है कि मैं मनन करूँ, वही आत्मा है। मन ही उसका दिव्य चक्षु है। वह
यह आत्मा इस दिव्य नेत्र द्वारा भोगों का दर्शन करता हुआ रमण करता है ॥ ५ ॥
य एते ब्रह्मलोके तं वा एतं देवा आत्मानमुपासते तस्मात्तेषाँ सर्वे च लोका
आत्ताः सर्वे च कामाः स सर्वाँश्च लोकानाप्नोति सर्वाँश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य
विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच प्रजापतिरुवाच ॥ ६ ॥
और जो यह सभी प्रकार के भोग इस ब्रह्मलोक में विद्यमान हैं। उन्हें वह देखता हुआ रमण करता
है। उस महान् आत्मा की देवगण उपासना करते हैं। इसी कारण से उन्हें समस्त लोक और सभी तरह के
भोग प्राप्त हैं। जो भी उस आत्मा को शास्त्र और आचार्य के उपदेशानुसार समझकर प्रत्यक्ष रूप से समझता
है, वह सभी लोक और सभी तरह के भोगों को पा जाता है, ऐसा प्रजापति ने कहा ॥ ६ ॥
॥ त्रयोदशः खण्डः ॥
श्यामाच्छबलं प्रपद्ये शबलाच्छ्यामं प्रपद्येऽश्व इव रोमाणि विधूय पापं चन्द्र इव
राहोर्मुखात्प्रमुच्य धूत्वा शरीरमकृतं कृतात्मा ब्रह्मलोकमभिसंभवामीत्यभिसंभवामीति ॥
मैं शरीर के नष्ट होने के पश्चात् श्याम (हृदय कमल में स्थित) ब्रह्म से शबल (ब्रह्मलोक)
को प्राप्त करूँ। साथ ही शबल ब्रह्मलोक से श्याम को प्राप्त करूँ। जिस तरह अश्व अपने रोमों को
झाड़कर स्वच्छ एवं मलरहित हो जाता है, उसी प्रकार मैं पापों से निवृत्त होकर राहु के मुख से
प्रकट हुए चन्द्रमा की भाँति शरीर का परित्याग कर कृतकृत्य होता हूँ। इस प्रकार मैं अकृत ब्रह्म
को प्राप्त करता हूँ, ब्रह्मलोक को प्राप्त करता हूँ॥ १ ॥
॥ चतुर्दशः खण्डः ॥
आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म तदमृतँ स आत्मा प्रजापतेः
सभां वेश्म प्रपद्ये यशोऽहं भवामि ब्राह्मणानां यशो राज्ञां यशो विशां यशोऽहमनुप्रापत्सि
स हाहं यशसां यशः श्येतमदत्कमदत्कँ श्येतं लिन्दु माभिगां लिन्दु माभिगाम् ॥ १ ॥
'आकाश' इस नाम से श्रुतियों में प्रसिद्ध आत्मा नाम और रूप का निर्वाह करने वाला है। वे
(नाम एवं रूप) जिस (ब्रह्म) के अन्तर्गत हैं, वही ब्रह्म है, वही आत्मा है और वही अमृत है। मैं
प्रजापति के सभागृह को प्राप्त करता हूँ, यश रूप आत्मा हूँ, मैं ही ब्राह्मणों के यश, क्षत्रियों के यश
एवं वैश्यों के यश को प्राप्त करना चाहता हूँ। मैं यशों का भी यश हूँ। मैं दन्तरहित होने पर भी
'अदत्क' अर्थात् बिना दाँतों के ही भक्षण करने वाले लालवर्ण युक्त श्वेत बिन्दु (पिच्छिल स्त्री
चिह्न) को प्राप्त न करूँ अर्थात् स्त्री गर्भ में गमन न करूँ॥ १ ॥
॥ पञ्चदशः खण्डः ॥
१९६
॥ पञ्चदशः खण्डः ॥
तद्धैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्य आचार्यकुलाद्वेदमधीत्य
यथाविधानं गुरोः कर्मातिशेषेणाभिसमावृत्य कुटुम्बे शुचौ देशे स्वाध्यायमधीयानो
धार्मिकान्विदधदात्मनि सर्वेन्द्रियाणि संप्रतिष्ठाप्याहिँ सन्त्सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः स
खल्वेवं वर्तयन्यावदायुषं ब्रह्मलोकमभिसंपद्यते न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते ॥ १ ॥
इस श्रेष्ठ आत्मज्ञान का वर्णन ब्रह्माजी ने प्रजापति से किया, प्रजापति ने मनु से तथा मनु ने
समस्त प्रजा वर्ग को सुनाया। जो गुरु के प्रति अपने कर्त्तव्यों को नियमानुसार पूर्ण करके वेदों के
ज्ञान को प्राप्त कर आचार्य के घर (गुरुकुल ) से विदा होकर अपने स्वजन सम्बन्धियों के साथ
पवित्र स्थल में स्वाध्याय करता है। जो अपने पुत्रों व शिष्यों को धर्म पथ पर आरूढ़ कर समस्त
इन्द्रियों को अपने अन्तःकरण में स्थिर कर लेता है तथा जो शास्त्रानुसार भूतों की हिंसा नहीं करता।
वह निश्चित ही जीवन पर्यन्त श्रेष्ठ आचरण करता हुआ ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है, तत्पश्चात् वापस
नहीं लौटता, वापस नहीं आता (आवागमन से मुक्त हो जाता है।) ॥ १ ॥
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि.......इति शान्तिः ॥
॥ इति छान्दोग्योपनिषत्समाप्ता ॥
(शीक्षा वल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली तथा भृगुवल्ली) हैं।
॥ तैत्तिरीयोपनिषद् ॥
यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा के तैत्तिरीय आरण्यक का एक भाग है। आरण्यक के १०
अध्यायों में से क्रमशः सातवें, आठवें एवं नौवें अध्यायों को ही उपनिषदीय मान्यता मिली है। इसमें तीन वल्लियाँ
(शीक्षा वल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली तथा भृगुवल्ली) हैं।
शीक्षावल्ली के प्रारम्भ में अधिलोक, अधिज्यौतिष, अधिविद्या, अधिप्रज और अध्यात्म नामक पाँच महासंहिताओं
का वर्णन है तथा उनकी फलश्रुति भी दी गयी है। साधना क्रम में ॐकार तथा भूः भुवः स्वः महः आदि व्याहृतियों
के महत्त्व का उल्लेख है। अन्त में अध्ययन एवं अध्यापन करने के लिए सदाचार परक मर्यादा सूत्रों का उल्लेख करके
विचार के साथ आचार की महत्ता का बोध कराया गया है।
ब्रह्मानन्दवल्ली में हृदयगुहा में स्थित परमेश्वर को जानने का महत्त्व समझाते हुए उसके अन्नमय, प्राणमय,
मनोमय, विज्ञानमय एवं आनन्दमय कलेवरों का विवेचन है। आनन्द की मीमांसा में लौकिक आनन्द से लेकर
उसके उत्तरोत्तर श्रेष्ठ स्वरूपों के वर्णन के साथ ब्रह्मानन्द तक की समीक्षा की गयी है। परमात्मा के आनन्द स्वरूप
को समझने वालों की स्थिति का भी वर्णन है।
भृगुवल्ली में भृगु की ब्रह्मपरक जिज्ञासा का समाधान उनके पिता वरुण ने किया है। तत्त्वज्ञान को
समझाकर उन्हें तपश्चर्या द्वारा स्वयं अनुभव करने का निर्देश दिया गया है। उन्होंने क्रमशः अन्न, प्राण, मन, विज्ञान
एवं आनन्द को ब्रह्म रूप में अनुभव किया। तब वरुण ने उन्हें अन्नादि का दुरुपयोग न करके उसके सुनियोजन का
विज्ञान समझाया। अन्त में भगवद्भाव प्राप्त साधक की स्थिति तथा उसके समतायुक्त उद्गारों का उल्लेख है।
॥ शान्ति-पाठः ॥
ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो
विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म
वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् ।
अवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
॥ अथ शीक्षावल्ली ॥
॥ प्रथमोऽनुवाकः ॥
ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो
विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म
वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् ।
अवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ १ ॥
मित्र देवता हमारे लिए कल्याणकारी हों। वरुणदेव हमारे लिए सुखप्रद हों। अर्यमादेव कल्याणकारी
हों। इन्द्र तथा बृहस्पतिदेव सुखदायक हों। जिनके डग बहुत विशाल हैं, वे विष्णुदेव हमारे लिए शान्तिप्रद
हों। ब्रह्म को नमस्कार है। हे वायो! आपको नमस्कार हो, क्योंकि आप प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं। आपको ही प्रत्यक्ष
ब्रह्म कहते हैं। सत्य और ऋत भी आपको कहते हैं। वह (ब्रह्म) हमारी रक्षा करे। हमारे आचार्य की रक्षा
करे। हमारी तथा हमारे आचार्य दोनों की रक्षा करे। त्रिविध तापों से सर्वत्र शान्ति ॥ १ ॥
१९८ तैत्तिरीयोपनिषद्
[ इस मन्त्र में वायु को प्रत्यक्ष ब्रह्म कहा है, क्योंकि प्राण प्रवाह वायु के साथ संचरित होता है। ब्रह्म में सभी
समाये हुए हैं और ब्रह्म सभी प्राणियों के जीवन रूप में संचरित है। इस सत्य के अनुरूप यह प्राणरूप-वायुमय
परमात्म तत्त्व प्रत्यक्ष रूप में अनुभव गम्य है। सम्भवतः इसीलिए ऋषि ने वायु को प्रत्यक्ष ब्रह्म कहा है। ]
॥ द्वितीयोऽनुवाकः ॥
ॐ शीक्षां व्याख्यास्यामः। वर्णः स्वरः। मात्रा बलम्। साम संतानः। इत्युक्तः
शीक्षाध्यायः ॥ १ ॥
हम शिक्षा = (शीक्षा) की व्याख्या करते हैं। वर्ण, स्वर, मात्रा, बल, साम तथा सन्धि - ये सब शिक्षा
की सार वस्तुएँ हैं। इस प्रकार इसे शिक्षा अध्याय कहा गया है ॥ १ ॥
[ वर्ण = अ, आ, आदि, स्वर = उदात्त, अनुदात्त, स्वरित आदि वैदिक स्वर, मात्रा= ह्रस्व, दीर्घ आदि मात्रा,
बल = वर्णोच्चारण में लगने वाली प्राणशक्ति, साम=मध्यम वृत्ति से उच्चारण करने की विधि तथा सन्तान=शब्दों
की मिलन प्रक्रिया ( सन्धि ) है। शिक्षा का शीक्षा रूप वैदिक प्रयोग है। ]
॥ तृतीयोऽनुवाकः ॥
सह नौ यशः। सह नौ ब्रह्मवर्चसम्। अथातः सꣳहिताया उपनिषदं व्याख्यास्यामः ॥
पञ्चस्वधिकरणेषु। अधिलोकमधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रजमध्यात्मम्। ता महासꣳहिता
इत्याचक्षते। अथाधिलोकम्। पृथिवी पूर्वरूपम्। द्यौरुत्तररूपम्। आकाशः संधिः ॥ १ ॥
वायुःसंधानम्। इत्यधिलोकम्। अथाधिज्यौतिषम्। अग्निः पूर्वरूपम्। आदित्य उत्तररूपम्।
आपः संधिः। वैद्युतः संधानम्। इत्यधिज्यौतिषम्। अथाधिविद्यम्। आचार्यः पूर्वरूपम् ॥२ ॥
अन्तेवास्युत्तररूपम्। विद्या संधिः। प्रवचनꣳ संधानम्। इत्यधिविद्यम्। अथाधिप्रजम्।
माता पूर्वरूपम्। पितोत्तररूपम्। प्रजा संधिः। प्रजननꣳ संधानम्। इत्यधिप्रजम्॥ ३ ॥
हम दोनों (शिष्य और आचार्य) का यश साथ-साथ बढ़े, हम दोनों का ब्रह्मतेज भी साथ-साथ बढ़े।
अब हम पाँच अधिकरणों में संहिता की-उपनिषद् की व्याख्या करते हैं। ये पाँच अधिकरण - अधिलोक,
अधिज्योतिष, अधिविद्य, अधिप्रज और अध्यात्म हैं। विद्वज्जन उन्हें महासंहिता कहते हैं। अब लोक
सम्बन्धी संहिता का वर्णन करते हैं। इसका पूर्वरूप पृथ्वि है। उत्तररूप द्युलोक है। पृथिवी और द्यु के बीच
का अन्तरिक्ष इसका संधि रूप है। वायु संधान (संयोजक) रूप है। यह लोक संबन्धी संहिता है। अब
ज्योति सम्बन्धी संहिता का वर्णन करते हैं। (पृथ्वी स्थित) अग्नि पूर्व रूप है। (द्युलोक स्थित) आदित्य
- सूर्य उत्तर रूप है, जल इन दोनों का संधि रूप है। (अन्तरिक्ष स्थित) विद्युत् इस संधि स्थान में
संयोजक है। यह ज्योति सम्बन्धी संहिता है। अब विद्या सम्बन्धी संहिता का वर्णन करते हैं। गुरु इसका पूर्व
रूप है। शिष्य उत्तररूप है और विद्या संधि रूप है। प्रवचन संधि में संयोजक है। यह विद्या सम्बन्धी संहिता
है। अब संतति (प्रजा) सम्बन्धी संहिता का वर्णन करते हैं। माता पूर्व रूप है। पिता उत्तर रूप है। सन्तान
संधि रूप है। प्रजनन कर्म संयोजक है। यह संतति सम्बन्धी संहिता है ॥ १-३ ॥
अथाध्यात्मम्। अधरा हनुः पूर्वरूपम्। उत्तरा हनुरुत्तररूपम्। वाक् संधिः। जिह्वा
संधानम्। इत्यध्यात्मम्। इतीमा महासꣳहिताः। य एवमेता महासꣳहिता व्याख्याता वेद।
संधीयते प्रजया पशुभिः। ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन सुवर्गेण लोकेन ॥ ४॥
शीक्षावल्ली अनुवाक ४ मन्त्र ३ १९९
शीक्षावल्ली अनुवाक ४ मन्त्र ३ १९९
अब आत्मा (शरीर) सम्बन्धी संहिता का वर्णन करते हैं। नीचे का जबड़ा पूर्व रूप है। ऊपर का
जबड़ा उत्तर रूप है। वाणी सन्धि रूप है। जिह्वा इसमें संयोजक है। यह आत्मा सम्बन्धी संहिता है। इस
प्रकार ये पाँच संहिताएँ कही गयी हैं। जो पुरुष इन महासंहिताओं के सार तत्त्व को जान लेता है, वह प्रजा,
पशु, ब्रह्मवर्चस, अन्नादि भोग्य पदार्थ और स्वर्ग लोक आदि से सम्पन्न हो जाता है॥४॥
[ सामान्य रूप से संहिता, वर्णों के संयोजित समूह को कहते हैं। आचरण सूत्रों के संयोजित समूह को
आचरण संहिता कहते हैं। इसी प्रकार जब विराट् इकाइयों लोक, ज्योति आदि के संयोजित समूहों का उल्लेख
होता है, तो उन्हें 'महासंहिता' कहते हैं। वर्णों की संधि के चार भाग होते हैं :- पूर्व (पहले वाला), पर या उत्तर
(बाद वाला), संधि (दोनों का संयुक्त रूप) तथा संधान (संयोजक नियम)। महासंधियों के वर्णन में भी ऋषि
ने इन चारों भागों का उल्लेख किया है।]
॥ चतुर्थोऽनुवाकः॥
यश्छन्दसामृषभो विश्वरूपः। छन्दोभ्योऽध्यमृतात्संबभूव। स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु।
अमृतस्य देव धारणो भूयासम्। शरीरं मे विचर्षणम्। जिह्वा मे मधुमत्तमा। कर्णाभ्यां
भूरि विश्रुवम्। ब्रह्मणः कोशोऽसि मेधया पिहितः। श्रुतं मे गोपाय ॥ १ ॥
जो वेदों में सर्वश्रेष्ठ हैं, सर्वरूप हैं। जिनका वेदों से विशेष रूप से प्राकट्य हुआ है, वे इन्द्रदेव
(परमेश्वर) मुझे मेधा सम्पन्न बनाएँ। हे देव! मैं अमृत स्वरूप परमात्मा को धारण करने वाला बनूँ। मेरा
शरीर स्फूर्तियुक्त हो। मेरी जिह्वा मधुर-भाषिणी हो। मेरे कान शुभ श्रवण करने वाले हों। आप मेधा से युक्त
ब्रह्म की निधि के समान हैं। मेरे द्वारा सुनी गयी वाणियाँ विस्मृत न हों (रक्षित हों) ॥ १ ॥
आवहन्ती वितन्वाना। कुर्वाणाचीरमात्मनः। वासांसि मम गावश्च। अन्नपाने च
सर्वदा। ततो मे श्रियमावह। लोमशां पशुभिः सह स्वाहा। आमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा।
विमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। प्रमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। दमायन्तु ब्रह्मचारिणः
स्वाहा। शमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा ॥ २ ॥
हे देव! हमारे निमित्त उस श्री-सम्पदा को ले आएँ, जो तत्काल ही विविध वस्त्र, गौएँ, अन्नादि पदार्थ प्रदान
करने वाली हो तथा रोमयुक्त पशुओं के साथ वैभव की वृद्धि करती हो। यह आहुति इसी निमित्त समर्पित है।
ब्रह्मचारीगण हमारे पास आएँ। वे कपट रहित हों, वे प्रामाणिक ज्ञान को धारण करने वाले हों। वे इन्द्रियों का दमन
करने वाले हों। वे मन का निग्रह करने वाले हों, इन सबके निमित्त आहुतियाँ समर्पित की जाती हैं॥ २ ॥
यशो जनेऽ सानि स्वाहा। श्रेयान् वस्यसोऽसानि स्वाहा। तं त्वा भग प्रविशानि
स्वाहा। स मा भग प्रविश स्वाहा। तस्मिन् सहस्रशाखे। निभगाहं त्वयि मृजे स्वाहा।
यथापः प्रवता यन्ति। यथा मासा अहर्जरम्। एवं मां ब्रह्मचारिणः। धातरायन्तु सर्वतः
स्वाहा। प्रतिवेशोऽसि प्र मा भाहि प्र मा पद्यस्व ॥ ३॥
हम सब लोगों में यशस्वी हों। धनवानों में अधिक धनसम्पन्न हों। हे भगवन्! हम आपमें प्रविष्ट हों,
आप हममें प्रविष्ट हों, हे सहस्र रूप वाले भगवन्! आपकी उपासना से हम पवित्र हों। इन सबके निमित्त
आहुतियाँ समर्पित की जाती हैं। जैसे जल निम्न स्थानों की ओर प्रवाहित होते हुए समुद्र में पहुँच जाता है
और माह, दिनों का क्षय करते हुए संवत्सर में विलीन हो जाते हैं। हे विधातः! उसी प्रकार ब्रह्मचारीगण
सब ओर से हमारे पास आएँ, आप हमारे आश्रयस्थल हैं। आप हमें प्रकाशित करें। आप हमें प्राप्त हों ॥ ३ ॥
२०० तैत्तिरीयोपनिषद
॥ पञ्चमोऽनुवाकः ॥
भूर्भुवः सुवरिति वा एतास्तिस्रो व्याहृतयः । तासामुह स्मैतां चतुर्थीं माहाचमस्यः
प्रवेदयते। मह इति । तद्ब्रह्म। स आत्मा। अङ्गान्यन्या देवताः। भूरिति वा अयं लोकः ।
भुव इत्यन्तरिक्षम्। सुवरित्यसौ लोकः ॥ १॥ मह इत्यादित्यः। आदित्येन वाव सर्वे
लोका महीयन्ते। भूरिति वा अग्निः। भुव इति वायुः। सुवरित्यादित्यः। मह इति चन्द्रमाः।
चन्द्रमसा वाव सर्वाणि ज्योतीꣳषि महीयन्ते। भूरिति वा ऋचः। भुव इति सामानि।
सुवरिति यजूंषि॥ २॥ मह इति ब्रह्म। ब्रह्मणा वाव सर्वे वेदा महीयन्ते। भूरिति वै
प्राणः। भुव इत्यपानः। सुवरिति व्यानः। मह इत्यन्नम्। अन्नेन वाव सर्वे प्राणा महीयन्ते।
ता वा एताश्चतस्रश्चतुर्धा । चतस्रश्चतस्रो व्याहृतयः। ता यो वेद। स वेद ब्रह्म। सर्वेऽस्मै देवा
बलिमावहन्ति ॥ ३ ॥
भूः, भुवः, स्वः - ये तीन व्याहृतियाँ हैं। उनसे भिन्न जो चौथी व्याहृति महः है, जिसे सर्वप्रथम
महाचमस के पुत्र ने जाना था। वह महः ही ब्रह्म है। वही ब्रह्म की आत्मा है। अन्य देवता उसके अंग हैं।
भूः - यह व्याहृति पृथिवी लोक है। भुवः - यह व्याहृति अन्तरिक्ष लोक है। स्वः - यह व्याहृति
स्वर्गलोक है। महः - आदित्य है। उस आदित्य से ही सम्पूर्ण लोक महिमा को प्राप्त होते हैं। भूः - यह
व्याहृति ही अग्नि है। भुवः- यह व्याहृति वायु है। स्वः- यह व्याहृति आदित्य है। महः - यह व्याहृति
चन्द्रमा है। चन्द्रमा से ही समस्त ज्योतियाँ महिमा को प्राप्त होती हैं। भूः - यह ऋग्वेद है। भुवः - यह
सामवेद है। स्वः- यह यजुर्वेद है। महः- यह ब्रह्म है। ब्रह्म से ही समस्त वेद महिमा को प्राप्त होते हैं। भूः
- यह प्राण है। भुवः- यह अपान है। स्वः- यह व्यान है। महः- यह अन्न है। अन्न से ही सभी प्राणों में
बल संचार होता है। ये चारों व्याहृतियाँ चार प्रकार की हैं। एक-एक के चार-चार भेद होने से कुल
सोलह व्याहृतियाँ होती हैं। इस प्रकार जो जानता है, वह ब्रह्म को जान लेता है। उस पुरुष के लिए सम्पूर्ण
देवता अपने अनुदान प्रदान करते हैं॥ १-३॥
॥ षष्ठोऽनुवाकः ॥
स य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः। तस्मिन्नयं पुरुषो मनोमयः। अमृतो हिरण्मयः। अन्तरेण
तालुके । य एष स्तन इवावलम्बते। सेन्द्रयोनिः । यत्रासौ केशान्तो विवर्तते। व्यपोह्य
शीर्षकपाले। भूरित्यग्नौ प्रतितिष्ठति । भुव इति वायौ ॥ १ ॥ सुवरित्यादित्ये। मह इति
ब्रह्मणि । आप्नोति स्वाराज्यम् । आप्नोति मनसस्पतिम् । वाक्पतिश्चक्षुष्पतिः ।
श्रोत्रपतिर्विज्ञानपतिः। एतत्ततो भवति। आकाशशरीरं ब्रह्म। सत्यात्म प्राणारामं मन
आनन्दम् । शान्तिसमृद्धममृतम् । इति प्राचीनयोग्योपास्व ॥ २ ॥
इस हृदयस्थ आकाश भाग में, वह मनोमय अमृत स्वरूप, प्रकाश स्वरूप परम पुरुष प्रतिष्ठित है।
दोनों तालुओं के बीच जो यह स्तन के समान लटक रहा है, (उसके ऊपर) जहाँ केशों का मूल भाग है।
शीर्ष कपाल को भेदकर सुषुम्ना नाड़ी जाती है, वह (सहस्रार या ब्रह्मरंध्र) इन्द्र योनि है। निर्वाण काल में
साधक भूः स्वरूप अग्नि में प्रतिष्ठित होता है। भुवः स्वरूप वायु में प्रतिष्ठित होता है। स्वः स्वरूप आदित्य
शीक्षावल्ली अनुवाक ९ मन्त्र १ २०१
शीक्षावल्ली अनुवाक ९ मन्त्र १ २०१
में तथा महः स्वरूप ब्रह्म में अधिष्ठित होता है। (ब्रह्मवेत्ता साधक) अपने राज्य में अधिष्ठित होता है, वह सम्पूर्ण मन
का स्वामी, वाणी, नेत्रों, कर्णों और विज्ञान का स्वामी हो जाता है। पूर्वोक्त साधन का यह फल मिलता है। वह ब्रह्म
आकाश के सदृश विशाल है। वह सत्यरूप आत्म तत्त्व है, वह प्राणों को विश्राम देने वाला, मन को आनन्द देने वाला,
शान्त और अमृत स्वरूप है। वही सर्वथा पुरातन पुरुष उपासना के योग्य है॥ १-२॥
[ इन्द्र शासक-संगठक के प्रतीक हैं। मनुष्य शरीर में स्थित देवता स्वरूप प्राण धाराओं को नियमित करने
की सामर्थ्य सहस्रार एवं ब्रह्मरन्ध्र में सन्निहित होने से उसे इन्द्र योनि कहा गया है।]
॥ सप्तमोऽनुवाकः ॥
इस अनुवाक में ऋषि ने पाँच-पाँच तत्त्वों की विभिन्न पंक्तियों-शृंखलाओं का उल्लेख किया है और उन्हें एक
दूसरे का पूरक कहा है-
पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौर्दिशोऽवान्तरदिशाः। अग्निर्वायुरादित्यश्चन्द्रमा नक्षत्राणि। आप
ओषधयो वनस्पतय आकाश आत्मा। इत्यधिभूतम्। अथाध्यात्मम्। प्राणो व्यानोऽपान
उदानः समानः। चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक् त्वक् । चर्म मांसः स्नावास्थिमज्जा। एतदधि-
विधाय ऋषिरवोचत्। पाङ्क्तं वा इदं सर्वम्। पाङ्क्तेनैव पाङ्क्तः स्पृणोतीति॥ १॥
पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक, दिशाएँ तथा अवान्तर दिशाएँ (दिशाओं के बीच के कोण) यह लोकों की
पंक्ति है। अग्नि, वायु, आदित्य, चन्द्रमा तथा समस्त नक्षत्र (यह ज्योति श्रृंखला में है)। जल, ओषधियाँ,
वनस्पतियाँ, आकाश तथा आत्मा (यह काया से सम्बद्ध है), यह आधिभौतिक वर्णन हुआ। अब आध्यात्मिक
वर्णन करते हैं- प्राण, व्यान, अपान, उदान और समान (यह प्राण समूह है)। चक्षु, श्रोत्र, मन, वाणी तथा
त्वचा (यह करणों-इन्द्रियों की पंक्ति है)। चर्म, मांस, नाड़ी, हड्डी और मज्जा (यह शरीर के धातु समूह में
है)। यह परिपूर्ण कल्पना करते हुए ऋषि ने कहा है- यह सब पंक्तियों का समूह है। पंक्तियों से ही
पंक्तियों की पूर्ति होती है॥ १॥
॥ अष्टमोऽनुवाकः ॥
ओमिति ब्रह्म। ओमितीदःसर्वम्। ओमित्येतदनुकृतिर्हस्म वा अप्यो श्रावयेत्या-
श्रावयन्ति। ओमिति सामानि गायन्ति। ओऽशोमिति शस्त्राणि शःसन्ति। ओमित्यध्वर्युः
प्रतिगरं प्रतिगृणाति। ओमिति ब्रह्मा प्रसौति। ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति। ओमिति
ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाप्नवानीति। ब्रह्मैवोपाप्नोति ॥ १ ॥
ॐ ही ब्रह्म है। ॐ ही यह प्रत्यक्ष जगत् है। ॐ ही इसकी (जगत् की) अनुकृति है। हे आचार्य!
ॐ के विषय में और भी सुनाएँ। आचार्य सुनाते हैं। ॐ से प्रारम्भ करके सामगायक सामगान करते हैं।
ॐ-ॐ कहते हुए ही शस्त्र रूप मन्त्र पढ़े जाते हैं। ॐ से ही अध्वर्यु प्रतिगर मन्त्रों का उच्चारण करता
है। ॐ कहकर अग्निहोत्र आरम्भ किया जाता है। अध्ययन के समय ब्राह्मण ॐ कहकर ब्रह्म को प्राप्त
करने की बात कहता है। ॐ के द्वारा वह ब्रह्म को प्राप्त करता है॥ १॥
॥ नवमोऽनुवाकः ॥
ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च। सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च। तपश्च स्वाध्यायप्रवचने
च। दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च। शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च। अग्नयश्च स्वाध्यायप्रवचने
२०२ तैत्तिरीयोपनिषद्
च। अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च। अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च। मानुषं च
स्वाध्यायप्रवचने च। प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च। प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च। प्रजातिश्च
स्वाध्यायप्रवचने च। सत्यमिति सत्यवचा राथीतरः। तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः।
स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः। तद्धि तपस्तद्धि तपः॥ ९ ॥
सत्य आचरण, सत्यवाणी के साथ-साथ शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन भी करें। तपश्चर्या,
इन्द्रियों के दमन, मन के निग्रह के साथ-साथ शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन भी करें। प्रजा उत्पत्ति,
प्रजनन, प्रजा-वृद्धि के कर्म के साथ-साथ शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन भी करें। रथीतर के पुत्र
सत्यवचा ऋषि कहते हैं- सत्य ही इनमें श्रेष्ठ है। पुरुशिष्ट के पुत्र तपोनित्य नामक ऋषि कहते हैं-तप
ही सर्वोत्तम है। मुद्गल के पुत्र नाक मुनि कहते हैं- शास्त्रों का अध्ययन और अध्यापन ही सर्वश्रेष्ठ
है, क्योंकि वही तप है, वही तप है ॥ ९॥
[ यहाँ ऋषि ने मनुष्य के लिए स्वाध्याय की अनिवार्यता प्रकट की है।]
॥ दशमोऽनुवाकः ॥
अहं वृक्षस्य रेरिवा। कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव। ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीवस्वमृतमस्मि।
द्रविणः सवर्चसम्। सुमेधा अमृतोक्षितः। इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम्॥ १॥
मैं विश्व वृक्ष का उच्छेदक हूँ। मेरा यश गिरि शिखर के सदृश ऊँचा है। अन्नोत्पादक सूर्य में व्याप्त
अमृत के सदृश मैं भी अतिपवित्र अमृत स्वरूप हूँ। मैं तेजोयुक्त सम्पदावान्, उत्तम मेधावान् और अमृत
से अभिषिक्त हूँ - यह त्रिशङ्कु ऋषि की ज्ञान-अनुभव से युक्त वाणी है॥ १ ॥
॥ एकादशोऽनुवाकः ॥
वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति। सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः।
आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः। सत्यान्न प्रमदितव्यम्। धर्मान्न
प्रमदितव्यम्। कुशलान्न प्रमदितव्यम्। भूत्यै न प्रमदितव्यम्। स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न
प्रमदितव्यम्। देव पितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्॥ १॥ मातृदेवो भव। पितृदेवो भव।
आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव। यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो
इतराणि। यान्यस्माकंः सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि ॥ २ ॥ नो इतराणि। ये के
चास्मच्छ्रेयांसो ब्राह्मणाः तेषां त्वयाऽऽसने न प्रश्वसितव्यम्। श्रद्धया देयम्। अश्रद्धयाऽ
देयम्। श्रिया देयम्। ह्रिया देयम्। भिया देयम्। संविदा देयम्। अथ यदि ते
कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात् ॥ ३ ॥ ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः। युक्ता
आयुक्ताः। अलूक्षा धर्मकामाः स्युः। यथा ते तत्र वर्तेरन्। तथा तत्र वर्तेथाः।
अथाभ्याख्यातेषु। ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः। युक्ता आयुक्ताः। अलूक्षा धर्मकामाः
स्युः। यथा ते तेषु वर्तेरन्। तथा तेषु वर्तेथाः। एष आदेशः। एष उपदेशः। एषा वेदोपनिषत्।
एतदनुशासनम्। एवमुपासितव्यम्। एवमु चैतदुपास्यम् ॥ ४ ॥
शीक्षावल्ली अनुवाक १२ मन्त्र १ २०३
शीक्षावल्ली अनुवाक १२ मन्त्र १ २०३
वेद अध्यापन के बाद आचार्य आश्रम के विद्यार्थियों को शिक्षण देते हैं - सत्य बोलो। धर्म
का आचरण करो। स्वाध्याय में प्रमाद न करो। आचार्य को अभीष्ट धन प्रदान करो। प्रजाओं
(सन्तान) की परम्परा विच्छिन्न न होने दो। सत्य से न डिगो, धर्म से न डिगो, शुभ कर्मों में प्रमाद
न करो, प्रगति के साधन न छोड़ो, शास्त्रों के अध्ययन-अध्यापन में प्रमाद न करो। देव और पितृ
कर्मों का त्याग न करो। माता-पिता को देव रूप मानो, आचार्य को देवता समझो। अतिथि को
देवरूप मानो। जो दोष रहित कर्म वर्णित हैं, उन्हीं का आचरण करो। अन्य का नहीं। हमारे
(शास्त्रादि में वर्णित) जो श्रेष्ठ चरित्र हैं, उसी की उपासना करो, अन्य की नहीं। हमसे (स्वयं से)
श्रेष्ठ जो ब्राह्मण (आचार्य आदि) आएँ, उन्हें उत्तम आसन देकर विश्राम देना चाहिए। दानादि (श्रद्धा
पूर्वक) देने योग्य है। बिना श्रद्धा के दान देने योग्य नहीं। आर्थिक स्थिति के अनुरूप दान देने योग्य
है। लज्जा (सामाजिकता की शर्म) तथा (सिद्धान्त के) भय से भी दान देना उचित है। संविद्-मैत्री
आदि के निर्वाह के लिए देना चाहिए। यदि आपको कर्म और आचरण के विषय में किसी तरह का
सन्देह हो। (ऐसी स्थिति में) विचारशील, परामर्शदाता, आचरणनिष्ठ, निर्मल बुद्धि वाले धर्माभिलाषी
ब्राह्मण से परामर्श करना चाहिए। वे जिस व्यवहार का आदेश करें, वैसा ही व्यवहार वहाँ करना
चाहिए। किसी अपराध से लाञ्छित व्यक्ति के विषय में कोई सन्देह उपस्थित हो, तो विचारशील,
परामर्शकुशल, आचरणनिष्ठ, निर्मल मति वाले, धर्माभिलाषी ब्राह्मण से परामर्श करना चाहिए। वे
जैसे व्यवहार का आदेश करें, वैसा ही व्यवहार करना चाहिए। यही आपके लिए आदेश और
उपदेश है। यही वेद आज्ञा है। यही ईश्वर का अनुशासन है। इन सिद्धान्तों की ही उपासना करनी
चाहिए। यही उपास्य है ॥ १-४ ॥
[ आचार्य अपनी ओर से अनुशासन समझाते हैं; किन्तु शिष्यों को स्वयं तक सीमित नहीं रखते। शंका होने
पर किसी धर्माचरण युक्त ब्राह्मण से परामर्श लेने का परामर्श देते हैं। ब्राह्मण संज्ञा उस व्यक्ति के लिए है, जो
ज्ञानयुक्त और निस्पृह हैं। जिसने ज्ञान को धर्माचरण के रूप में अपने जीवन में उतार लिया है, वही व्यक्ति मोह और
भय से मुक्त होकर सही परामर्श दे सकता है। आचार्य श्रेष्ठ जीवन-श्रेष्ठ सिद्धान्तों को ही उपास्य मानते हैं।]
॥ द्वादशोऽनुवाकः॥
शं नो मित्रः शं वरुणः। शं नो भवत्वर्यमा। शं नो इन्द्रो बृहस्पतिः। शं नो
विष्णुरुरुक्रमः। नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो। त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं
ब्रह्मावादिषम्। ऋतमवादिषम्। सत्यमवादिषम्। तन्मामावीत्। तद्वक्तारमावीत्।
आवीन्माम्। आवीद्वक्तारम्॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ १ ॥
मित्रदेव हमारे लिए कल्याणप्रद हों। वरुण देव कल्याणकारी हों। अर्यमादेव हमारे लिए कल्याणकारी
हों। इन्द्रदेव, बृहस्पतिदेव भी हमारे लिए शान्तिप्रद हों। विशाल डग (पादक्षेप) वाले विष्णु देव हमारे लिए
कल्याणप्रद हों। ब्रह्म को नमस्कार है। हे वायुदेव ! आपको नमस्कार है। आप ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं। आपको
ही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहा गया है। आप ही ऋत और सत्य नाम से कहे गये हैं। उस ब्रह्म ने हमारी और आचार्य
की रक्षा की है। त्रिविध तापों से सर्वत्र शान्ति हो ॥ १ ॥
॥ अथ ब्रह्मानन्दवल्ली ॥
२०४ तैत्तिरीयोपनिषद्
॥ अथ ब्रह्मानन्दवल्ली ॥
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा
विद्विषावहै॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
वह परमात्मा हम दोनों (आचार्य और शिष्य) की साथ-साथ रक्षा करे। हम दोनों का साथ-साथ
पोषण करे। हम दोनों साथ-साथ पराक्रम करें। हमारा अध्ययन (ज्ञान) तेजोयुक्त हो। हम परस्पर द्वेष-भाव
से दूर हों। त्रिविध तापों की शान्ति हो।
॥ प्रथमोऽनुवाकः ॥
ॐ ब्रह्मविदाप्नोति परम्। तदेषाऽभ्युक्ता। सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। यो वेद निहितं गुहायां परमे
व्योमन्। सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति। तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः
संभूतः। आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी। पृथिव्या ओषधयः।
ओषधीभ्योऽन्नम्। अन्नात्पुरुषः। स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः। तस्येदमेव शिरः। अयं दक्षिणः
पक्षः। अयमुत्तरः पक्षः। अयमात्मा। इदं पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥
श्रुति में यह कहा गया है कि ब्रह्मवेत्ता साधक परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। वह ब्रह्म सत्य, ज्ञान-
स्वरूप और अनन्त है। जो साधक परम आकाश में और प्राणियों की हृदय गुहा में सन्निहित उस ब्रह्म को
जान लेता है, वह विशिष्ट ज्ञान स्वरूप उस ब्रह्म के साथ समस्त भोगों का उपभोग करता है। निश्चय ही उस
परमात्मा से सर्वप्रथम आकाश तत्त्व प्रकट हुआ। तदनन्तर आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल
और जल से पृथिवी तत्त्व उत्पन्न हुआ। पृथिवी से ओषधियाँ और ओषधियों से अन्न प्राप्त हुआ। अन्न से
पुरुष वृद्धि को प्राप्त हुआ। पुरुष निश्चय ही उस अन्न के रस स्वरूप में है। उसका यह (मनुष्य रूपी पक्षी
का) सिर है। एक बाहु दक्षिण पंख है। अन्य बाहु वाम पंख है। आत्मा मध्य भाग है। ये पैर ही पूँछ और
प्रतिष्ठा हैं। उसी विषय में ये श्लोक उल्लिखित हैं ॥ १॥
॥ द्वितीयोऽनुवाकः ॥
आगे के मन्त्रों में ईश्वर से पंचभूतों की उत्पत्ति तथा मनुष्य की काया में संव्यास पंच कोशों का वर्णन किया गया
है। मनुष्य की काया में समाहित उन सभी कोशों का आकार मनुष्य की स्थूल काया के अनुरूप ही होता है। मनुष्य को
पक्षी मानकर उसके सिर, पंख, मध्यभाग एवं पूँछ की संगति बिठाते हुए पाँचों कोशों का वर्णन किया गया है-
अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते । याः काश्च पृथिवीं श्रिताः। अथो अन्नेनैव जीवन्ति । अथैनदपि
यन्त्यन्ततः। अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम् । तस्मात्सर्वौषधमुच्यते । सर्वं वै तेऽन्नमाप्नुवन्ति । येऽन्नं
ब्रह्मोपासते। अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम्। तस्मात्सर्वौषधमुच्यते। अन्नाद्भूतानि जायन्ते। जातान्यन्नेन
वर्धन्ते। अद्यतेऽत्ति च भूतानि तस्मादन्नं तदुच्यत इति। तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयात्। अन्योऽन्तर
आत्मा प्राणमयः। तेनैष पूर्णः। स वा एष पुरुषविध एव। तस्य पुरुषविधताम्। अन्वयं
पुरुषविधः। तस्य प्राण एव शिरः। व्यानो दक्षिणः पक्षः। अपान उत्तरः पक्षः। आकाश आत्मा।
पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥
ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवाक ४ मन्त्र १ २०५
ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवाक ४ मन्त्र १ २०५
वे सभी प्राणी अन्न से ही उत्पन्न होते हैं, जो पृथिवी के आश्रय में स्थित हैं। अन्न से ही वे जीवित रहते
और अन्त में अन्न में ही विलीन हो जाते हैं। अन्न ही सभी तत्त्वों में श्रेष्ठ है। इसीलिए यह सर्वौषधिरूप कहा
गया है। जो अन्नरूपी ब्रह्म की उपासना करते हैं, वे पुरुष सम्पूर्ण अन्न को प्राप्त करते हैं। अन्न ही सभी तत्त्वों
में श्रेष्ठ है। इसलिए यह सर्वौषधिरूप कहा गया है। अन्न से ही समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं। प्राणियों की
वृद्धि अन्न से ही होती है। प्राणियों द्वारा अन्न खाया जाता है और अन्न भी प्राणियों को खाता है, इसीलिए
वह अन्न ( अद्यते वा अत्ति च वा अन्नं ) कहा जाता है। उस अन्न रस युक्त देह से भिन्न इस देह के अन्दर
प्राण रूप आत्मा पूर्ण रूप से व्याप्त है। यह प्राणरूप आत्मा निश्चय ही पुरुष के आकार का है। पुरुष की
आकृति में व्याप्त होने से यह पुरुष के ही आकार का है। उस प्राणगत देह का प्राण ही सिर है। व्यान
दाहिना पंख है। अपान वाम पंख है। आकाश उस देह का मध्य भाग है और पृथिवी उसका पुच्छ एवं आधार
भाग है। यह श्लोक उस प्राणगत देह के विषय में है॥ १॥
॥ तृतीयोऽनुवाकः ॥
प्राणं देवा अनु प्राणन्ति। मनुष्याः पशवश्च ये। प्राणो हि भूतानामायुः। तस्मा
त्सर्वायुषमुच्यते। सर्वमेव त आयुर्यन्ति। ये प्राणं ब्रह्मोपासते। प्राणो हि भूतानामायुः ।
तस्मात्सर्वायुषमुच्यत इति। तस्यैष एव शारीर आत्मा। यः पूर्वस्य। तस्माद्वा
एतस्मात्प्राणमयात्। अन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः। तेनैष पूर्णः। स वा एष पुरुषविध
एव। तस्य पुरुषविधताम्। अन्वयं पुरुषविधः। तस्य यजुरेव शिरः। ऋग् दक्षिणः पक्षः।
सामोत्तरः पक्षः। आदेश आत्मा। अथर्वाङ्गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येष श्लोको भवति ॥
जो देवगण, मनुष्य और पशु आदि प्राणी हैं, वे प्राण के आश्रय से ही चेष्टा करते हैं, क्योंकि प्राण ही
समस्त प्राणियों की आयु है, अतः यह सभी प्राणियों का जीवन है। जो प्राण रूप ब्रह्म की उपासना करते
हैं, वे पुरुष दीर्घ आयु को प्राप्त करते हैं। निश्चय ही प्राण सम्पूर्ण प्राणियों का जीवन है, इसी से यह सभी
प्राणियों की आयु कहा गया है। यही उस पूर्वोक्त अन्नमय शरीर की अन्तरात्मा है। उस प्राणमय देह के
अन्तर्गत उससे भिन्न एक मनोमय आत्मा पूर्णरूप से व्याप्त है। यह निश्चय ही पुरुष के आकार का है।
प्राणमय पुरुष की आकृति में व्याप्त होने से यह मनोमय देह भी पुरुष के ही आकार का है। उस मनोमय
देह का सिर यजुर्वेद है। ऋग्वेद दाहिना पक्ष है। सामवेद बायाँ पक्ष है। आदेश उस देह का मध्य भाग है।
अथर्वा और अङ्गिरा ऋषि द्वारा दृष्ट अथर्व के मन्त्र ही उसका पुच्छ एवं आधार भाग है। यह श्लोक उस
मनोमय देह के विषय में है ॥ १ ॥
॥ चतुर्थोऽनुवाकः ॥
यतो वाचो निवर्तन्ते। अप्राप्य मनसा सह। आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्। न बिभेति
कदाचनेति। तस्यैष एव शारीर आत्मा। यः पूर्वस्य। तस्माद्वा एतस्मान्मनोमयात्। अन्योऽन्तर
आत्मा विज्ञानमयः। तेनैष पूर्णः। स वा एष पुरुषविध एव। तस्य पुरुषविधताम्। अन्वयं
पुरुषविधः। तस्य श्रद्धैव शिरः। ऋतं दक्षिणः पक्षः। सत्यमुत्तरः पक्षः। योग आत्मा।
महः पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥
२०६ तैत्तिरीयोपनिषद्
जिस ब्रह्म के आनन्द की अनुभूति में मन के साथ वाणी भी असमर्थ रहती है, उसका बोध
(आनुभविक ज्ञान) करने वाला विद्वान् कभी भयग्रस्त नहीं होता। यह मनोमय शरीर अपने पूर्ववर्ती
प्राणमय शरीर का आत्मा (आधार) है। उस मनोमय शरीर से भिन्न आत्मा विज्ञानमय है, जो मनोमय शरीर
में पूर्ण व्याप्त है। वह विज्ञानमय देह पुरुष के आकार का है। यह मनोमय देह के अन्तर्गत पुरुष की आकृति
में समाहित है। उस विज्ञानमय देह का सिर श्रद्धा है। ऋत (सनातन सत्य) उसका दाहिना पक्ष है। सत्य
(प्रत्यक्ष सत्य) उसका बायाँ पक्ष है। योग उसका मध्य भाग है। 'महः' को उसका पुच्छ और आधार भाग
कहा गया है। उस विज्ञानमय देह के विषय में यह श्लोक है॥ १॥
॥ पञ्चमोऽनुवाकः ॥
विज्ञानं यज्ञं तनुते। कर्माणि तनुतेऽपि च। विज्ञानं देवाः सर्वे। ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते।
विज्ञानं ब्रह्म चेद्वेद। तस्माच्चेन्न प्रमाद्यति। शरीरे पाप्मनो हित्वा। सर्वान्कामान्समश्नुत
इति। तस्यैष एव शारीर आत्मा। यः पूर्वस्य। तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयात्। अन्योऽन्तर
आत्मानन्दमयः। तेनैष पूर्णः। स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधताम्। अन्वयं
पुरुषविधः। तस्य प्रियमेव शिरः। मोदो दक्षिणः पक्षः। प्रमोद उत्तरः पक्षः । आनन्द
आत्मा। ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येष श्लोको भवति ॥ १॥
विज्ञान ही यज्ञों और कर्मों की वृद्धि करता है। सम्पूर्ण देवगण विज्ञान की, श्रेष्ठ ब्रह्म रूप में उपासना
करते हैं। जो विज्ञान को ब्रह्म स्वरूप में जानते हैं, उसी प्रकार के चिंतन में रत रहते हैं, तो वे इसी शरीर
से पापों से मुक्त होकर सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि प्राप्त करते हैं। उस विज्ञानमय देह के अन्तर्गत वह
आत्मा ही ब्रह्मरूप है। उस विज्ञानमय आत्मा से भिन्न उसके अन्तर्गत आनन्दमय आत्मा पूर्णतः व्याप्त है।
यह भी पुरुष के आकार का ही है। यह उस विज्ञानमय पुरुष देह में व्याप्त होने से पुरुष आकृति का ही
है। प्रेम उस आनन्दमय शरीर का सिर है। मोद दाहिना पक्ष है। प्रमोद बायाँ पक्ष है। आनन्द उस विज्ञानमय
देह का मध्यभाग है। ब्रह्म ही उसका पुच्छ एवं आधार है। उसी आनन्दमय देह के विषय में यह श्लोक है॥
॥ षष्ठोऽनुवाकः॥
असन्नेव स भवति। असद्ब्रह्मेति वेद चेत्। अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद। सन्तमेनं ततो
विदुरिति। तस्यैष एव शारीर आत्मा। यः पूर्वस्य । अथातोऽनुप्रश्नाः । उताविद्वानमुं लोकं
प्रेत्य। कश्चन गच्छती३ । आहो विद्वानमुं लोकं प्रेत्य। कश्चित्समश्नुता ३ उ। सोऽ
कामयत। बहुस्यां प्रजायेयेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा। इदँ सर्वमसृजत। यदिदं
किंच। तत्सृष्ट्वा। तदेवानुप्राविशत्। तदनुप्रविश्य। सच्च त्यच्चाभवत्। निरुक्तं चानिरुक्तं
च। निलयनं चानिलयनं च। विज्ञानं चाविज्ञानं च। सत्यं चानृतं च। सत्यमभवत्। यदिदं
किंच। तत्सत्यमित्याचक्षते। तदप्येष श्लोको भवति ॥ १॥
जो ब्रह्म के अस्तित्व को सत्य नहीं मानता, वह असत्य ही हो जाता है, परन्तु जो ब्रह्म को सत्य
स्वीकार करता है, उसे विद्वज्जन सन्त समझते हैं। जो विज्ञानमय शरीर का आत्मा है, वही आनन्दमय शरीर
का भी है। अब अनु प्रश्न प्रारम्भ होते हैं। अज्ञानी पुरुष मरने के बाद परलोक गमन करता है या नहीं,
ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवाक ८ मन्त्र १ २०७
ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवाक ८ मन्त्र १ २०७
अथवा ज्ञानी पुरुष मरने के बाद परलोक गमन करता है या नहीं ? उस परमात्मा ने अनेक रूपों में प्रकट
होने की कामना की। तब उसने तप किया। तप करके उसने इस सम्पूर्ण जगत् की रचना की। जगत् की
उत्पत्ति के बाद वह उसी में प्रविष्ट हो गया। प्रविष्ट होने पर वह साकार और निराकार हो गया। वह वर्ण्य
और अवर्ण्य हो गया तथा आश्रयरूप एवं निराश्रयरूप हो गया। वही चैतन्य एवं जड़ रूप हुआ। वही सत्य
स्वरूप परमात्मा ही सत्य एवं मिथ्यारूप हो गया। विद्वज्जन कहते हैं, जो कुछ भी अनुभव में आता है, वह
सत्य ही है। इसी विषय में यह श्लोक है ॥ १ ॥
॥ सप्तमोऽनुवाकः ॥
असद्वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सदजायत। तदात्मानँ स्वयमकुरुत। तस्मात्त-
त्सुकृतमुच्यत इति। यद्वै तत्सुकृतम्। रसो वै सः। रसँ ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति। को
ह्येवान्यात्कः प्राण्यात्। यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्। एष ह्येवानन्दयाति। यदा
ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते। अथ सोऽभयं गतो
भवति यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते। अथ तस्य भयं भवति। तत्त्वेव भयं
विदुषोऽमन्वानस्य। तदप्येष श्लोको भवति ॥ १॥
सृष्टि से पूर्व यह सम्पूर्ण जगत् असत् (अव्यक्त) रूप में ही था, उससे ही यह दृश्यमान जगत् उत्पन्न
हुआ है। वह ब्रह्म स्वयं ही जगत् रूप में प्रकट हुआ है; अतः वह सुकृत कहा जाता है। जो सुकृत है, वही
रसरूप है। इस रस को पाकर जीव आनन्दित होता है। वही आकाश की भाँति व्यापक और आनन्द स्वरूप
है। यदि वह न होता, तो कौन जीवित रहता ? कौन चेष्टाएँ करता ? निश्चय ही वही सबको आनन्द प्रदान करने
वाला है। जब कोई जीवात्मा उस अदृश्य, शरीर रहित, अवर्ण्य, निराश्रय परमात्मा में निर्भय होकर स्थित हो
जाता है, तो वह अभयपद को प्राप्त होता है। जब तक वह (जीवात्मा) परमात्मा से विमुक्त रहता है, तब तक
भय से युक्त होता है। वही भय अहंकारी विद्वान् को भी होता है। उस सन्दर्भ में यह (अगला) मन्त्र है ॥ १ ॥
॥ अष्टमोऽनुवाकः ॥
भीषाऽस्माद्वातः पवते। भीषोदेति सूर्यः। भीषाऽस्मादग्निश्चेन्द्रश्च। मृत्युर्धावति पञ्चम
इति। सैषाऽऽनन्दस्य मीमाँसा भवति। युवा स्यात्साधुयुवाध्यायकः। आशिष्ठो द्रढिष्ठो
बलिष्ठः। तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात्। स एको मानुष आनन्दः। ते ये शतं
मानुषा आनन्दाः। स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य। ते ये
शतं मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दाः। स एको देवगन्धर्वाणामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।
ते ये शतं देवगन्धर्वाणामानन्दाः। स एकः पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दः। श्रोत्रियस्य
चाकामहतस्य। ते ये शतं पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दाः। स एक आजानजानां
देवानामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य। ते ये शतमाजानजानां देवानामानन्दाः। स
एकः कर्मदेवानां देवानामानन्दः। ये कर्मणा देवानपि यन्ति। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।
ते ये शतं कर्मदेवानां देवानामानन्दाः। स एको देवानामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।
ते ये शतं देवानामानन्दाः। स एक इन्द्रस्यानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य। ते ये
२०८ तैत्तिरीयोपनिषद्
शतमिन्द्रस्यानन्दाः। स एको बृहस्पतेरानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य। ते ये शतं बृहस्पतेरानन्दाः।
स एकः प्रजापतेरानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य। ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः। स एको ब्रह्मण
आनन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य। स यश्चायं पुरुषे। यश्चासावादित्ये। स एकः। स य
एवंवित्। अस्माल्लोकात्प्रेत्य। एतमन्नमयमात्मानमुपसंक्रामति। एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रामति।
एतंमनोमयमात्मानमुपसंक्रामति। एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसंक्रामति। एतमानन्दमयमा-
त्मानमुपसंक्रामति। तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥
इस (परब्रह्म) के भय से ही वायु बहता है। इसके भय से ही सूर्य उदित होता है। इसके भय
से ही अग्नि, इन्द्र और पाँचवें मृत्यु के देवता यम-सभी अपने-अपने कर्मों में प्रवृत्त हैं। अब आनन्द
विषयक विवेचन किया जाता है- कोई सदाचारी युवक, जो वेदों के अध्ययन से युक्त हो, सुदृढ़
अंगों वाला, बलिष्ठ, व्यवहार कुशल हो, साथ ही उसे समस्त वैभव से परिपूर्ण पृथिवी प्राप्त हो जाए,
तो यह इस लोक (मनुष्य) का एक आनन्द है। जो मनुष्यलोक के सौ आनन्द हैं। वह मानव गन्धर्व
के एक आनन्द के तुल्य है। वह शुद्ध अन्तःकरण वाले श्रोत्रिय मनुष्य को स्वाभाविक रूप से प्राप्त
है। जो मानव गन्धर्व के सौ आनन्द हैं, वे देवगन्धर्व के एक आनन्द के तुल्य है, वह कामना रहित
श्रोत्रिय मनुष्य को स्वाभाविक रूप से प्राप्त है। जो देव गन्धर्व के सौ आनन्द हैं, वह पितृलोक को
प्राप्त हुए पितरों के एक आनन्द के तुल्य है, वह कामनाओं से विरक्त श्रोत्रिय मनुष्य को सहज ही
प्राप्त है। जो पितृगण स्थायी रूप से पितृलोक को प्राप्त हुए हैं, उनके सौ आनन्द आजानज संज्ञक
देवों का एक आनन्द है, वह कामनाओं से विरक्त श्रोत्रिय मनुष्य को सहज ही प्राप्त है। जो आजानज
संज्ञक देवों के सौ आनन्द हैं, वह कर्मदेव संज्ञक देवों के एक आनन्द के तुल्य है। जो मनुष्य अपने
शुभकर्मों द्वारा देवत्व को प्राप्त हुए हैं, जो कामनाओं से विरत हैं, उन्हें वह आनन्द स्वाभाविक रूप
से ही प्राप्त है। जो कर्मदेव संज्ञक देवों के सौ आनन्द हैं, वह देवों के एक आनन्द के तुल्य है, वह
आनन्द कामना रहित श्रोत्रिय मनुष्य को सहज ही प्राप्त है। जो देवों के सौ आनन्द हैं, वह इन्द्र का
एक आनन्द है, वह कामनारहित श्रोत्रिय मनुष्य को सहज प्राप्त है। जो इन्द्रदेव के सौ आनन्द हैं, वह
बृहस्पतिदेव के एक आनन्द के तुल्य है, जो श्रोत्रिय मनुष्य उस आनन्द की कामना से मुक्त है, उसे
वह आनन्द सहज ही प्राप्त है। जो देव प्रजापति के सौ आनन्द हैं, वह ब्रह्मा के एक आनन्द के तुल्य
है, जो श्रोत्रिय मनुष्य उस आनन्द की कामना भी नहीं रखता, उसे वह आनन्द सहज ही प्राप्त है।
जो ब्रह्म इस मनुष्य में है, वही सूर्य में भी है। जो साधक इस रहस्य को जान लेता है, वह इस लोक
से जाते हुए अन्नमय आत्मा को प्राप्त कर लेता है। वह इस प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और
आनन्दमय आत्मा को भी प्राप्त कर लेता है। उसी के विषय में यह श्लोक है ॥ १ ॥
[यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि केवल पृथ्वी एवं सम्पत्ति से आनन्द प्राप्ति सम्भव नहीं है, उसके लिए
समग्र व्यक्तित्व ही श्रेष्ठ होना चाहिए। अगले मंत्रों में श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर आनन्द का उल्लेख है। ऋषि बार-बार कहते हैं
कि वह आनन्द "श्रोत्रियस्य च अकाम हतस्य" है, अर्थात् जो ज्ञान सम्पन्न है तथा कामनाओं से आहत नहीं है, उसी
के लिए यह आनन्द है। अज्ञानी हीनसुखों में ही भटक जाता है, श्रेष्ठ आनन्द तक पहुँचना ही नहीं चाहता। छाले
जैसे रोगों से आहत जीभ जिस प्रकार स्वादिष्ट व्यंजनों का रस नहीं ले सकती, उसी प्रकार कामनाओं से आहत
मन-अन्तःकरण श्रेष्ठ आनन्द की अनुभूति नहीं कर पाता।]