१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 199, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ेंशीक्षावल्ली अनुवाक ४ मन्त्र ३ १९९
अब आत्मा (शरीर) सम्बन्धी संहिता का वर्णन करते हैं। नीचे का जबड़ा पूर्व रूप है। ऊपर का
जबड़ा उत्तर रूप है। वाणी सन्धि रूप है। जिह्वा इसमें संयोजक है। यह आत्मा सम्बन्धी संहिता है। इस
प्रकार ये पाँच संहिताएँ कही गयी हैं। जो पुरुष इन महासंहिताओं के सार तत्त्व को जान लेता है, वह प्रजा,
पशु, ब्रह्मवर्चस, अन्नादि भोग्य पदार्थ और स्वर्ग लोक आदि से सम्पन्न हो जाता है॥४॥
[ सामान्य रूप से संहिता, वर्णों के संयोजित समूह को कहते हैं। आचरण सूत्रों के संयोजित समूह को
आचरण संहिता कहते हैं। इसी प्रकार जब विराट् इकाइयों लोक, ज्योति आदि के संयोजित समूहों का उल्लेख
होता है, तो उन्हें 'महासंहिता' कहते हैं। वर्णों की संधि के चार भाग होते हैं :- पूर्व (पहले वाला), पर या उत्तर
(बाद वाला), संधि (दोनों का संयुक्त रूप) तथा संधान (संयोजक नियम)। महासंधियों के वर्णन में भी ऋषि
ने इन चारों भागों का उल्लेख किया है।]
॥ चतुर्थोऽनुवाकः॥
यश्छन्दसामृषभो विश्वरूपः। छन्दोभ्योऽध्यमृतात्संबभूव। स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु।
अमृतस्य देव धारणो भूयासम्। शरीरं मे विचर्षणम्। जिह्वा मे मधुमत्तमा। कर्णाभ्यां
भूरि विश्रुवम्। ब्रह्मणः कोशोऽसि मेधया पिहितः। श्रुतं मे गोपाय ॥ १ ॥
जो वेदों में सर्वश्रेष्ठ हैं, सर्वरूप हैं। जिनका वेदों से विशेष रूप से प्राकट्य हुआ है, वे इन्द्रदेव
(परमेश्वर) मुझे मेधा सम्पन्न बनाएँ। हे देव! मैं अमृत स्वरूप परमात्मा को धारण करने वाला बनूँ। मेरा
शरीर स्फूर्तियुक्त हो। मेरी जिह्वा मधुर-भाषिणी हो। मेरे कान शुभ श्रवण करने वाले हों। आप मेधा से युक्त
ब्रह्म की निधि के समान हैं। मेरे द्वारा सुनी गयी वाणियाँ विस्मृत न हों (रक्षित हों) ॥ १ ॥
आवहन्ती वितन्वाना। कुर्वाणाचीरमात्मनः। वासांसि मम गावश्च। अन्नपाने च
सर्वदा। ततो मे श्रियमावह। लोमशां पशुभिः सह स्वाहा। आमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा।
विमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। प्रमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। दमायन्तु ब्रह्मचारिणः
स्वाहा। शमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा ॥ २ ॥
हे देव! हमारे निमित्त उस श्री-सम्पदा को ले आएँ, जो तत्काल ही विविध वस्त्र, गौएँ, अन्नादि पदार्थ प्रदान
करने वाली हो तथा रोमयुक्त पशुओं के साथ वैभव की वृद्धि करती हो। यह आहुति इसी निमित्त समर्पित है।
ब्रह्मचारीगण हमारे पास आएँ। वे कपट रहित हों, वे प्रामाणिक ज्ञान को धारण करने वाले हों। वे इन्द्रियों का दमन
करने वाले हों। वे मन का निग्रह करने वाले हों, इन सबके निमित्त आहुतियाँ समर्पित की जाती हैं॥ २ ॥
यशो जनेऽ सानि स्वाहा। श्रेयान् वस्यसोऽसानि स्वाहा। तं त्वा भग प्रविशानि
स्वाहा। स मा भग प्रविश स्वाहा। तस्मिन् सहस्रशाखे। निभगाहं त्वयि मृजे स्वाहा।
यथापः प्रवता यन्ति। यथा मासा अहर्जरम्। एवं मां ब्रह्मचारिणः। धातरायन्तु सर्वतः
स्वाहा। प्रतिवेशोऽसि प्र मा भाहि प्र मा पद्यस्व ॥ ३॥
हम सब लोगों में यशस्वी हों। धनवानों में अधिक धनसम्पन्न हों। हे भगवन्! हम आपमें प्रविष्ट हों,
आप हममें प्रविष्ट हों, हे सहस्र रूप वाले भगवन्! आपकी उपासना से हम पवित्र हों। इन सबके निमित्त
आहुतियाँ समर्पित की जाती हैं। जैसे जल निम्न स्थानों की ओर प्रवाहित होते हुए समुद्र में पहुँच जाता है
और माह, दिनों का क्षय करते हुए संवत्सर में विलीन हो जाते हैं। हे विधातः! उसी प्रकार ब्रह्मचारीगण
सब ओर से हमारे पास आएँ, आप हमारे आश्रयस्थल हैं। आप हमें प्रकाशित करें। आप हमें प्राप्त हों ॥ ३ ॥