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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 505 में से

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पृष्ठ 198

१९८ तैत्तिरीयोपनिषद्
[ इस मन्त्र में वायु को प्रत्यक्ष ब्रह्म कहा है, क्योंकि प्राण प्रवाह वायु के साथ संचरित होता है। ब्रह्म में सभी
समाये हुए हैं और ब्रह्म सभी प्राणियों के जीवन रूप में संचरित है। इस सत्य के अनुरूप यह प्राणरूप-वायुमय
परमात्म तत्त्व प्रत्यक्ष रूप में अनुभव गम्य है। सम्भवतः इसीलिए ऋषि ने वायु को प्रत्यक्ष ब्रह्म कहा है। ]
॥ द्वितीयोऽनुवाकः ॥
ॐ शीक्षां व्याख्यास्यामः। वर्णः स्वरः। मात्रा बलम्। साम संतानः। इत्युक्तः
शीक्षाध्यायः ॥ १ ॥
हम शिक्षा = (शीक्षा) की व्याख्या करते हैं। वर्ण, स्वर, मात्रा, बल, साम तथा सन्धि - ये सब शिक्षा
की सार वस्तुएँ हैं। इस प्रकार इसे शिक्षा अध्याय कहा गया है ॥ १ ॥
[ वर्ण = अ, आ, आदि, स्वर = उदात्त, अनुदात्त, स्वरित आदि वैदिक स्वर, मात्रा= ह्रस्व, दीर्घ आदि मात्रा,
बल = वर्णोच्चारण में लगने वाली प्राणशक्ति, साम=मध्यम वृत्ति से उच्चारण करने की विधि तथा सन्तान=शब्दों
की मिलन प्रक्रिया ( सन्धि ) है। शिक्षा का शीक्षा रूप वैदिक प्रयोग है। ]
॥ तृतीयोऽनुवाकः ॥
सह नौ यशः। सह नौ ब्रह्मवर्चसम्। अथातः सꣳहिताया उपनिषदं व्याख्यास्यामः ॥
पञ्चस्वधिकरणेषु। अधिलोकमधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रजमध्यात्मम्। ता महासꣳहिता
इत्याचक्षते। अथाधिलोकम्। पृथिवी पूर्वरूपम्। द्यौरुत्तररूपम्। आकाशः संधिः ॥ १ ॥
वायुःसंधानम्। इत्यधिलोकम्। अथाधिज्यौतिषम्। अग्निः पूर्वरूपम्। आदित्य उत्तररूपम्।
आपः संधिः। वैद्युतः संधानम्। इत्यधिज्यौतिषम्। अथाधिविद्यम्। आचार्यः पूर्वरूपम् ॥२ ॥
अन्तेवास्युत्तररूपम्। विद्या संधिः। प्रवचनꣳ संधानम्। इत्यधिविद्यम्। अथाधिप्रजम्।
माता पूर्वरूपम्। पितोत्तररूपम्। प्रजा संधिः। प्रजननꣳ संधानम्। इत्यधिप्रजम्॥ ३ ॥
हम दोनों (शिष्य और आचार्य) का यश साथ-साथ बढ़े, हम दोनों का ब्रह्मतेज भी साथ-साथ बढ़े।
अब हम पाँच अधिकरणों में संहिता की-उपनिषद् की व्याख्या करते हैं। ये पाँच अधिकरण - अधिलोक,
अधिज्योतिष, अधिविद्य, अधिप्रज और अध्यात्म हैं। विद्वज्जन उन्हें महासंहिता कहते हैं। अब लोक
सम्बन्धी संहिता का वर्णन करते हैं। इसका पूर्वरूप पृथ्वि है। उत्तररूप द्युलोक है। पृथिवी और द्यु के बीच
का अन्तरिक्ष इसका संधि रूप है। वायु संधान (संयोजक) रूप है। यह लोक संबन्धी संहिता है। अब
ज्योति सम्बन्धी संहिता का वर्णन करते हैं। (पृथ्वी स्थित) अग्नि पूर्व रूप है। (द्युलोक स्थित) आदित्य

  • सूर्य उत्तर रूप है, जल इन दोनों का संधि रूप है। (अन्तरिक्ष स्थित) विद्युत् इस संधि स्थान में
    संयोजक है। यह ज्योति सम्बन्धी संहिता है। अब विद्या सम्बन्धी संहिता का वर्णन करते हैं। गुरु इसका पूर्व
    रूप है। शिष्य उत्तररूप है और विद्या संधि रूप है। प्रवचन संधि में संयोजक है। यह विद्या सम्बन्धी संहिता
    है। अब संतति (प्रजा) सम्बन्धी संहिता का वर्णन करते हैं। माता पूर्व रूप है। पिता उत्तर रूप है। सन्तान
    संधि रूप है। प्रजनन कर्म संयोजक है। यह संतति सम्बन्धी संहिता है ॥ १-३ ॥
    अथाध्यात्मम्। अधरा हनुः पूर्वरूपम्। उत्तरा हनुरुत्तररूपम्। वाक् संधिः। जिह्वा
    संधानम्। इत्यध्यात्मम्। इतीमा महासꣳहिताः। य एवमेता महासꣳहिता व्याख्याता वेद।
    संधीयते प्रजया पशुभिः। ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन सुवर्गेण लोकेन ॥ ४॥