विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
img093_2R
विज्ञानभैरव : १२५
समाधि को मिला देने से समाधि के तीन भेद हो जाते हैं। ये तीनों भेद आन्तर समाधि के
हैं। सूर्य, चन्द्र, आकाश आदि बाह्य वस्तुओं को आलम्बन बनाने से भी समाधि के तीन भेद
होते हैं। जैसे कि—
हृदीव बाह्यदेशेऽपि यस्मिन् कस्मिंश्च वस्तुनि ।
समाधिराद्यः सन्मात्रे१ नामरूपपृथक्स्थितः ॥२७॥
अर्थात् हृदय की ही भांति जिस किसी बाह्य आलम्बन चन्द्र, सूर्य, आकाश प्रभृति सत्स्वभाव
दृश्यों के नाम और रूप की अलग-अलग हो रही प्रतीति में चित्त को स्थिर करना दृश्यानुविद्ध
सविकल्पक समाधि कही जाती है। शब्दानुविद्ध सविकल्पक समाधि का स्वरूप यह है—
अखण्डैकरसं वस्तु सच्चिदानन्दलक्षणम् ।
इत्यविच्छिन्नचिन्तेयं समाधिर्मध्यमो भवेत् ॥२८॥
अर्थात् सच्चिदानन्द स्वरूप वस्तु अखण्ड और एकरस है, इस तरह की निरन्तर प्रवहमान
चित्त की दशा को मध्यम समाधि, अर्थात् शब्दानुविद्ध सविकल्पक समाधि कहते हैं। बाह्य
आलम्बन में भी केवल ब्रह्माकार वृत्ति का उदय होने पर जब मन निश्चेष्ट हो जाता है, तो
यह निर्विकल्पक समाधि संपन्न होती है, जिसका कि लक्षण इस प्रकार बताया गया है—
स्तब्धीभावो रसास्वादात् तृतीयः पूर्ववन्मतः ।
एतैः समाधिभिः षड्भिर्नयेत् कालं निरन्तरम् ॥२९॥
अर्थात् ब्रह्म से भिन्न बाह्य वस्तु कुछ भी नहीं है, इस भावना के अभ्यास से मन को निश्चेष्ट
कर देने पर तीसरी निर्विकल्पक समाधि की उपलब्धि होती है। इस तरह से इन छः प्रकार
की समाधियों का अभ्यास करता हुआ साधक निरन्तर कालयापन करता रहे। इन समाधियों
के पुष्ट हो जाने पर स्पन्दकारिका में प्रदर्शित जीवन्मुक्त दशा की प्राप्ति हो जाती है, जो
कि विज्ञानभैरव की प्रस्तुत धारणा का भी लक्ष्य है। वाक्यसुधा में इस स्थिति का वर्णन
इस प्रकार किया गया है—
देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि ।
यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः ॥३०॥
अर्थात् देह में अहंभाव के नष्ट हो जाने पर और परमात्मा के स्वरूप का ज्ञान हो जाने पर
जहाँ जहाँ मन जाता है, वहीं वहीं समाधि लग जाती है। स्वच्छन्दतन्त्र में भी यही स्थिति
इस तरह से वर्णित है—
यत्र यत्र मनो याति ज्ञेयं तत्रैव चिन्तयेत् ।
चलित्वा यास्यते कुत्र सर्वं शिवमयं यतः ॥ (४।३१३)
अर्थात् जहाँ जहाँ मन जाता है, उसी विषय के साथ अपने ध्येय को एकाकार बना उसका
चिन्तन करने लगे। जब सब कुछ शिवमयं ही है, तब यह चित्त अन्ततः जायगा कहाँ ? इसका
अभिप्राय यह है कि जब सब कुछ शिव ही शिव है, तब जिस किसी भी विषय पर मन
आकृष्ट हो, उसको रोकने का प्रयास न करे, किन्तु सहज गति से उस विषय को भी शिव
१. °त्रान्नामरूपपृथक्कृतिः-वा० ।