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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : ७३
शिवोपाध्याय ने यहां अपनी व्याख्या में बताया है कि प्राण की बाह्य गति का निरोधक
होने से बाह्य वृत्ति वाला प्राणायाम पूरक, प्राण की अन्दर की गति का निरोधक होने से
आन्तर वृत्ति वाला प्राणायाम रेचक कहलाता है। आगे वे लिखते हैं कि कुछ लोग 1बाह्य
शब्द से रेचक और आन्तर शब्द से पूरक प्राणायाम का ग्रहण करते हैं। ऐसा लिखते हुए वे
इस द्वितीय मत के प्रति अपनी अरुचि प्रकट करते हैं। किन्तु भाष्यकार व्यास, वाचस्पति मिश्र,
भोजदेव प्रभृति व्याख्याकारों ने द्वितीय मत को ही स्वीकार किया है। प्राण और अपान की
बाह्य और आन्तर गति का एक साथ निरोध कर देने पर स्तम्भ वृत्ति वाला कुम्भक प्राणायाम
संपन्न होता है। जैसा कि वाचस्पति मिश्र ने प्रस्तुत सूत्र के व्यासभाष्य की टीका करते हुए
लिखा है— जहां श्वास और प्रश्वास दोनों का, एक साथ ही रोक देने के कारण, अभाव हो
जाता है, अर्थात् इस अवरोधक प्रयत्न के कारण फिर वह न तो सांस भरने में ही समर्थ होता
है और न सांस छोड़ने में ही, किन्तु जैसे तपे हुए पत्थर पर पानी पड़ने से वह वहीं सूख जाता
है, उसी तरह से श्वास-प्रश्वास के रूप में पवन का प्रवहमान यह प्रवाह भी बलवान् अवरोधक
प्रयत्न से अवरुद्ध होकर शरीर में ही सूक्ष्म रूप से विलीन हो जाता है। उस समय पूरकता के
अभाव में यह पूरक और रेचकता के अभाव में रेचक भी नहीं कहला सकता।
यह तीनों प्रकार का प्राणायाम देश, काल और संख्या से परीक्षित होकर 'दीर्घसूक्ष्म'
नाम से अभिहित होता है। अर्थात् जैसे भली भांति दबाई गई रुई की गांठ छोटी सी दिखाई
पड़ती है, किन्तु उसमें से निकाल कर रुई को फैला देने पर वह बहुत जगह घेरती है, उसी
तरह से प्राण भी दुर्लक्ष्य होने से यद्यपि अत्यन्त सूक्ष्म रहता है, किन्तु देश, काल और संख्या
के अनुसार क्रमशः प्राणायाम का अभ्यास बढ़ाने से वह अत्यन्त विस्तृत हो जाता है। फैलाई
हुई रुई को जैसे फिर गांठ में बांध देने पर वह थोड़ा ही स्थान घेरती है, उसी तरह से
प्राणायाम के अभ्यास से उस प्राण को पुनः सूक्ष्म किया जा सकता है। उक्त तीनों प्रकार के
प्राणायामों में देश, काल और संख्या की अधिकता और अल्पता के आधार पर प्राण दीर्घ और
सूक्ष्म रूप में परिणत होता रहता है। अतः प्राणायाम की यह विधि 'दीर्घ-सूक्ष्म' कही
जाती है।
देश-परीक्षा की विधि यह है—हृदय से निकल कर श्वास नाक के सामने बारह
अंगुल तक जाकर समाप्त हो जाता है। वहीं से लौट कर यह पुनः हृदय में प्रवेश करता है।
यह प्राण और अपान की स्वाभाविक गति है। प्राणायाम का विधिपूर्वक अभ्यास करने से
प्राण की यह गति क्रमशः नाभि अथवा मूलाधार से निकलने लगती है और नाक से बाहर
२४ अंगुल तक अथवा ३६ अंगुल तक पहुँच जाती है। इसी तरह से वहाँ से पुनः लौटकर
वह नाभि अथवा मूलाधार तक पहुँचती है। इनमें से नासिका के बाहर प्राण की गति कहाँ
तक पहुँची, इसकी परीक्षा किसी निवात (पवन रहित) स्थान में तिनके में रुई लपेट कर की

  1. जैसा कि पृ० २९-३० की टिप्पणी में लिखा गया है, इस विषय पर उपोद्घात में विचार
    किया जायगा। पृ० २९-३० की टिप्पणी में पालि-साहित्य में उपलब्ध इस तरह के
    परस्पर विरोधी विचारों का उल्लेख किया गया है।