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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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६० : विज्ञानभैरव
पाँच अध्वों को अपने भीतर समेटे किसी एक अध्व की शुद्धि का विधान मिलता है। जैसा
कि स्वच्छन्दतन्त्र के—
अध्वावलोकनं पश्चाद् व्याप्यव्यापकभेदतः ।
भुवनव्यापिता तत्त्वेष्वनन्तादिशिवान्तके ।।
व्यापकानि च षट्त्रिंशन्मन्त्रवर्णपदात्मकाः ।
तत्त्वान्तर्भाविनः सर्वे वाच्यवाचकयोगतः ।।
कलान्तर्भाविनस्ते वै निवृत्त्याद्याश्च ताः स्मृताः । (४।९५-९७)
इन श्लोकों में यह विषय प्रतिपादित है। यहाँ व्याप्यव्यापकभाव के आधार पर षडध्व की
भावना का प्रतिपादन किया गया है। अनन्त से शिव पर्यन्त भुवनों में सर्वत्र तत्त्व व्यापक रूप
से रहते हैं। ये व्यापक तत्त्व ३६ होते हैं। इनसे अतिरिक्त मन्त्र, वर्ण और पदात्मक अन्य
तीन अध्व हैं। इनमें से वर्ण ५० तथा नवात्मसंबन्धी पद ८१ प्रकार के हैं। क्रमशः इनमें
तत्त्व प्रभृति का अन्तर्भाव हो जाता है, क्योंकि तत्त्व प्रभृति वाच्य और मन्त्र प्रभृति वाचक
कहलाते हैं। कलाध्वा के शोधन की प्रधानता के आधार पर यह क्रम प्रतिपादित है। इस
प्रक्रिया से कलाध्वा में ही अन्य सभी अध्वों का अन्तर्भाव हो जाता है और यह कलाध्वा
निवृत्ति आदि के भेद से पांच प्रकारों में विभक्त है। इस विषय को हमने "वैष्णवेषु तदितरेषु
चागमेषु षडध्वविमर्शः"१ नामक निबन्ध में विस्तार से समझाया है।
इसको संक्षेप में इस तरह से समझा जा सकता है—चिदानन्दघन परम स्वतन्त्र
परमेश्वर अपनी उन्मना नाम की स्वातन्त्र्य शक्ति की सहायता से शून्य से लेकर पृथ्वी पर्यन्त
इस अनन्त जगत् को एक साथ प्रकाशित कर देता है। वाच्यवाचकरूप में विभक्त इस जगत्
को यद्यपि वह अपने स्वरूप (स्वात्मभित्ति) में ही प्रकाशित करता है, अतः वास्तव में इनमें
कोई भेद नहीं होता, किन्तु वह इसमें भेद-बुद्धि को भी पैदा कर देता है। यह वाचक अर्थात्
ग्राहक के रूप में विद्यमान जगत् पर, सूक्ष्म और स्थूल रूप में क्रमशः २वर्ण, मन्त्र और पद के
रूप में तीन तरह से विभक्त हो जाता है। इसी तरह से वाच्य भी ग्राह्य स्वरूप में प्रविष्ट
होकर पर, सूक्ष्म और स्थूल रूप में क्रमशः कला, तत्त्व और भुवन का रूप धारण कर लेता
है। पर-स्वभाव वर्ण अभेद विमर्श को पैदा करने वाले हैं। ये जब कुछ स्थूलता की ओर

  1. द्रष्टव्य—सारस्वती सुषमा, व० १७, अ० १-२, पृ० १७९-२००; तन्त्रयात्रा, पृ० १४-३४ ।
  2. तन्त्रालोक (६।३४-३५) में भी यही क्रम वर्णित है। शैवागमों में षडध्व का क्रम इस
    प्रकार दिया गया है—वर्ण, पद, मन्त्र और कला, तत्त्व, भुवन। वहाँ ५० वर्णों के बाद
    व्योमव्यापी प्रभृति ८१ पदों का विस्तार से वर्णन मिलता है और मुख्य मन्त्रों की संख्या
    ११ ही मानी गई है। षडध्व की शुद्धि में सर्वत्र प्रायः यही क्रम मान्य है। मन्त्रों का
    स्वरूप वाक्यों के सदृश है, अतः व्याकरण की दृष्टि से भी वर्ण और पद के बाद ही मन्त्र
    की स्थिति मानी जाय, यही उचित प्रतीत होता है। पूर्वोक्त क्रम को भी मन्त्र की
    नादात्मकता को स्वीकार कर मान्य किया जाता है।