विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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विज्ञानभैरव : ३३
आमूलात् आहृदयाद् जन्माधाराद्वा द्वादशान्तं यावत् किरणाभासां मरीचिरूपां
क्रमात्क्रमं सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरात्मिकां तनिमानमाश्रयन्तीं तां मरुच्छक्तिं चिन्तयेत् ध्यायेत् ।
कीदृशीम् ? द्विषट्कान्ते द्वादशान्ते शाम्यन्तीम् । एवं सुसूक्ष्मतमस्यापि ध्येयाकारस्य
गलनाद् भैरवोदयो भैरवस्वरूपाविर्भावः, भवेदिति शेषः ॥२८॥
हृदय से अथवा मूलाधार से लेकर द्वादशान्त तक चन्द्र और सूर्य के समान अपनी
किरणों से भासित हो रही तथा क्रमशः सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अवस्था की ओर अग्रसर हो रही
उस पवन की शक्ति का चिन्तन करे, जो कि द्वादशान्त में जाकर शान्त हो जाती है, नाम
और रूप से अतीत अवस्था को प्राप्त कर लेती है । इस प्रकार के अभ्यास से अत्यन्त सूक्ष्म
ध्येय के आकार के भी विगलित हो जाने पर योगी भैरव स्वरूप हो जाता है, अर्थात् उसकी
स्वाभाविक भैरव दशा का आविर्भाव हो जाता है ।
नेत्रतन्त्र (८।४१) की टीका में क्षेमराज ने तथा तन्त्रालोक (५।८९-९१) की
टीका में जयरथ ने इस श्लोक को उद्धृत कर जो विवरण प्रस्तुत किया है, तदनुसार यहाँ
द्वादशान्त पद से ब्रह्मरन्ध्र का ग्रहण किया जाना चाहिये । मूलाधार में अथवा हृदय में
विद्यमान प्राण शक्ति यौगिक पद्धति के अनुसार सुषुम्णा मार्ग से अथवा मध्यदशा के विकास
के कारण ब्रह्मरन्ध्र तक जाते जाते अत्यन्त सूक्ष्म होकर अन्त मे प्रकाश में विलीन हो
जाती है ॥२८॥
[ धारणा-६ ]
¹उद्गच्छन्तीं तडिद्रूपां प्रतिचक्रं क्रमात्क्रमम् ।
ऊर्ध्वं मुष्टित्रयं यावत् तावदन्ते महोदयः ॥२९॥
तामेत शक्तिं तडिद्रूपां विद्युद्वत् चलद्दीप्त्योज्ज्वलां प्रतिचक्रं कन्दादिब्रह्मरन्धा-
न्तचक्रेभ्यः क्रमात्क्रमम् उद्गच्छन्तीमुल्लसन्तीं चिन्तयेत्, यावत् परं विश्वपूरकमूर्ध्वं
मुष्टित्रयं द्वादशान्तधाम तावत् । अन्ते महोदयः महाभैरवैकात्मतोदयः, अहमेव महाभैरव
इत्यवमर्शः स्यादेव ॥२९॥
इसी विद्युतस्वरूप, बिजली के समान एकाएक चमकने वाली शक्ति का प्रत्येक चक्र
में, कन्द से लेकर ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त क्रमशः ऊपर उठती हुई अवस्था में चिन्तन करे । इससे
²मुष्टित्रय परिमित द्वादशान्त धाम में परम उत्कृष्ट विश्वपूरक, सारे विश्व को अपने प्रकाश
से भर देने वाला, महाभैरव का स्वरूप प्रकाशित हो उठता है । इसी बात को तन्त्रालोक में
इस प्रकार से कहा गया है—
अधःप्रवाहसंरोधादूर्ध्वक्षेपविवर्जनात् ।
महाप्रकाशमुदयज्ञानव्यक्तिप्रदायकम् ॥
अनुभूय परे धाम्नि मात्रावृत्त्या पुरं विशेत् । (५।८८-८९)
१. यह श्लोक तन्त्रालोकविवेक (भा० ३, आ० ५, पृ० ३९७) में उद्धृत है ।
२. एक मुट्ठी का परिमाण चार अंगुल माना गया है । तीन मुट्ठी, अर्थात् बाहर अंगुल ।
इस तरह से मुष्टित्रय शब्द यहाँ द्वादशान्त के अर्थ में प्रयुक्त है ।