विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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विज्ञानभैरव : २७
मन्त्र का उच्चारण, जो कि 'अजपा जप'1 के नाम से प्रसिद्ध है, परा शक्ति स्वयं ही करती
है। इसीलिये 'मैं वह शिव हूँ' इस तरह के अपने स्वरूप का परिचय यहाँ प्राप्त होता है। इस
स्थिति में हकार और सकार इन दोनों की उत्पत्ति के स्थल में, अर्थात् हकार की उत्पत्ति के
स्थान हृदय और सकार की उत्पत्ति के स्थान द्वादशान्त में भरण से, अर्थात् उन वर्णों के
स्वरूप का चिन्तन करने से, शाक्त बल की प्राप्ति होती है और अन्त में साधक भैरव-स्वरूप
हो जाता है।
ऊपर बताई गई छः व्याख्याओं में से पहली और दूसरी व्याख्या के अनुसार अविकल्प
स्वरूप के चिन्तन से साधक शाम्भव समावेश में, चौथी और पांचवीं व्याख्या के अनुसार सब
कुछ अपना ही स्वरूप है, इस तरह की भावना के आधार पर शुद्ध विकल्प का चिन्तन करने
से शाक्त समावेश में एवं तीसरी और छठी व्याख्या के अनुसार धारणा में वर्णविशेष के
परामर्श की प्रधानता के आधार पर आणव समावेश में समाहित होता है। इन त्रिविध
समावेशों का वर्णन मालिनीविजयोत्तर तन्त्र में 'उच्चारकरण' (२।२१-२३) इत्यादि तीन
श्लोकों में किया गया है। उपोद्घात में इस विषय पर विशेष प्रकाश डाला जायगा। इस प्रथम
धारणा में और आगे दी जा रही सभी धारणाओं में शाम्भव, शाक्त और आणव उपायों में
से किसी एक का सहारा लेकर ही योगी अनुपाय प्रक्रिया में प्रविष्ट होता है या कभी-कभी
बिना इनका सहारा लिये भी अपने स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है, इस बात का विशेष
विवेचन भी हम वहीं करेंगे। आवश्यकता के अनुसार श्लोकों की व्याख्या के प्रसंग में भी
इनका संक्षिप्त उल्लेख हो सकता है ॥२४॥
[ धारणा-२ ]
मरुतोऽन्तर्बहिर्वाऽपि वियद्युग्मानि१वर्तनात् ।
भैरव्या२ भैरवस्येत्थं भैरवि व्यज्यते वपुः ॥२५॥
भैरवि, मरुतः प्राणस्यापानस्य च, अन्तर्बहिश्च यद् वियद्युग्मं हृदाकाशो
द्वादशान्तश्च यद् वियद्द्वयम्, ततोऽनिवर्तनात् प्रत्यावर्तनाभावेन क्षणमात्रमन्तर्मुखत्वेना-
वस्थानात् प्राणापानयोर्द्वयोरस्तंगतत्वात्, भैरवीस्वरूपस्य भैरवस्य परमात्मनः, वपुः
शरीरं स्वरूपमिति यावत्। धर्मिधर्मात्मकत्वेन शिवशक्तिद्वैधं प्रकाशविमर्शस्वरूपं
परमार्थत एकमेव तत्त्वं व्यज्यते प्रकाशते, प्रकटीभवति। 'अनुवर्तनात्' इति पाठे
अनुन्मेषनिमेषणादित्यर्थः ॥२५॥
हे भैरवि, प्राण और अपान नामक पवन के आधारभूत स्थान आन्तर आकाश हृदय
और बाह्य आकाश द्वादशान्त से प्रत्यावृत्ति के अभाव में एक क्षण के लिये उसकी वृत्ति
१. ॰नु॰-ख० । २. ॰वं-ख० ।
- आगे १५१ संख्या के श्लोक की व्याख्या में इस विषय पर विस्तार से विचार
किया जायगा।