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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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८ : विज्ञानभैरव
ज्ञान, क्रिया आदि के प्राधान्य और अप्राधान्य का प्रतिपादन करने से अनेक भेदों में विभक्त
हो जाते हैं। उन सबके सारभूत त्रिक शास्त्र को भी मैंने पूरी सावधानी से सुन लिया है, किन्तु
मेरा संदेह अभी भी दूर नहीं हुआ है ।
'यामलादिषु भाषितम्' इस पाठान्तर का अर्थ यह होगा कि शिव और शक्ति के
सामरस्य से उत्पन्न हुए ब्रह्मयामल, विष्णुयामल, रुद्रयामल, भैरवयामल आदि में जो कुछ
आपने कहा है, आपके साथ अभिन्नरूप से रहने के कारण वह सब मैंने पहले सुना ही है ।
इस पूरे कथन का अभिप्राय यह है कि दर्पण में प्रतिबिम्बित वस्तु की जैसे अपने बिम्ब
से भिन्न और अभिन्न दोनों तरह की प्रतीति होती है, उसी तरह से आन्तर रूप से एकता
और बाह्य रूप से नर, शक्ति और शिव के रूप में भिन्नता का भी बोध होता है । इस
भेदावस्था में असाधारण और साधारण रूप से यद्यपि मैंने इस विषय को आप से सुन लिया
है, किन्तु अभी भी मेरा संदेह दूर नहीं हो रहा है, क्योंकि माया¹ प्रभृति के ढांचे में पड़-
कर मेरा स्वरूप और ज्ञान संकुचित हो गया है ।
²वेदादिभ्यः परं शैवं शैवाद् वामं तु दक्षिणम् ।
दक्षिणात् परतः कौलं कौलात् परतरं त्रिकम् ॥
इस वचन के अनुसार वेद से श्रेष्ठ शैव शास्त्र, शैव से श्रेष्ठ वाम, वाम से श्रेष्ठ दक्षिण,
दक्षिण से कौल और उससे भी श्रेष्ठतर त्रिक शास्त्र है । त्रिक शास्त्र में भी सिद्धा, मालिनी
और उत्तर³ शासन क्रमशः ज्ञान और उपदेश के प्रकर्ष के आधार पर उत्कृष्ट माने जाते हैं ।
'सारात्सारविभागशः' इस पद का अभिप्राय यही है कि इन सब शास्त्रों को, जो कि एक से
एक बढ़कर हैं, मैंने सुना है । त्रिक शास्त्र ही नहीं, उसमें भी उत्तरोत्तर उत्कृष्ट सिद्धा,
मालिनी और उत्तर शास्त्र को भी मैंने सुन लिया, किन्तु मेरा संशय अभी दूर नहीं
हुआ है ।।१।।

  1. “सर्वज्ञता तृप्तिरनादिबोधः स्वतन्त्रता नित्यमलुप्तशक्तिः । अनन्तशक्तिश्च विभो-
    र्विधिज्ञा : षडाहुरङ्गानि महेश्वरस्य ।।” (वा० पु० १२।३३) इस श्लोक में शिव के
    सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादिबेध, वतन्त्रता, अलुप्तशक्तित्ता और अनन्तशक्तित्ता—ये छः गुण
    गिनाये गये हैं । अद्वैत सिद्धान्त के अनुसार जीव शिव से अभिन्न है, किन्तु माया के
    कारण उसका स्वरूप संकुचित हो जाता है और इसके बाद कला, विद्या,
    राग, काल और नियति तत्त्वों के कारण क्रमशः उसकी सर्वकर्तृता, सर्वज्ञता,
    नित्यपरिपर्णतृप्तिता, नित्यता और स्वतन्त्रता—ये पाँच शक्तियाँ संकुचित हो जाती हैं
    (द्रष्टव्य—सौ० सू० १. ३२-३९), अतः इन पाँच तत्त्वों को पंचकंचुक कहा जाता है ।
    माया का भी इनमें समावेश कर कुछ आचार्य कंचुकों की संख्या छः मानते हैं ।
  2. परारित्रशिका की व्याख्या (पृ० ९२) में अभिनवगुप्त ने भी इसी आशय का श्लोक उद्धृत
    किया है, जिसमें कि त्रिकशास्त्र को सर्वोत्तम माना गया है ।
  3. उत्तर शब्द के स्पष्टीकरण के लिए पृ० १ की टिप्पणी द्रष्टव्य ।