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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

About this granth

The Shukraniti (शुक्रनीति), or Shukranitisara, is a Sanskrit treatise on kingship and government ascribed to Shukracharya, the preceptor of the asuras. It covers the duties of the king, the appointment of ministers and officials, the treasury and taxation, justice, forts, the army and the conduct of war, as well as social conduct, town planning and the making of images. Its date is disputed; because it describes firearms (nalika), many scholars regard its present form as relatively late.

This edition gives the Sanskrit verses with a Hindi commentary called Vidyotini. It was first published in Samvat 2025 (1968) by the Chowkhamba Sanskrit Series Office, Varanasi, as No. 185 of the Kashi Sanskrit Granthamala; the commentator is not named in the opening pages. The scan is of a copy from the Mumukshu Bhavan Veda-Vedanga library, Varanasi.

The text runs chapter by chapter; the second chapter, for example, lays down rules on the pay of royal servants, such as setting aside a sixth or a quarter of a servant's wage for him. The volume has 526 pages.

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४ शुक्रनीतिः

अप्रेरितहितकरं सर्व्वराष्ट्रं भवेद्यथा ।
तथा नीतिस्तु संधार्या नृपेणात्महिताय वै ॥ १८ ॥
जिस नीति से बिना राजा की प्रेरणा से ही स्वयं हितकरनेवाला संपूर्ण राष्ट्र (प्रजामण्डल) हो, उसी नीति को अपने हित के लिये राजा को अपनाना उचित है ॥

भिन्नं राष्ट्रं बलं भिन्नं भिन्नोऽमात्यादिको गणः ।
अकौशल्यं नृपस्यैतदनीतेर्यस्य सर्व्वदा ॥ १६ ॥
'जिस राजा की अनीति से सदा उसके राष्ट्र (देश), सेना और मन्त्री आदि गण में परस्पर भेद होता है', यह उसकी मूर्खता का द्योतक है ॥

तपसा तेज आदत्ते शास्ता पाता च रंजकः ।
नृपः स्वप्राक्तनाद्धत्ते तपसा च महीमिमाम् ॥ २० ॥
राजा तप से तेज धारण करता है और शास्त्र का जाननेवाला, प्रजा की रक्षा तथा मनोरञ्जन करनेवाला होता है। एवं अपने पूर्वजन्ममार्जित तप से ही वह इस पृथ्वी का पालन करता है ॥

वृष्टिशीतोष्णनक्षत्रगतिरूपस्वभावतः ।
इष्टानिष्टाधिकं न्यूनाचारैः कालस्तु भिद्यते ॥ २१ ॥
यद्यपि काल एक ही है तथापि वर्षा, शीत, उष्ण, नक्षत्रों की गति रूप स्वभाव से एवं इष्ट, अनिष्ट, अधिक, न्यून आचरण से उसके अनेक भेद होते हैं ॥

आचारप्रेरको राजा ह्येतत्कालस्य कारणम् ।
यदि कालः प्रमाणं हि कस्माद्धर्मोऽस्ति कर्तृषु ॥ २२ ॥
राजा की काल-कारणता का निर्देश—आचरण की प्रेरणा करनेवाला राजा होता है अतः वह काल का भी कारण होता है और यदि काल ही आचरण में प्रमाण माना जाय तो उसके करनेवालों में धर्म कहां से हो, अर्थात् धर्माचरण में राजा ही मुख्य कारण है न कि काल ॥

राजदंडभयाल्लोकः स्वस्वधर्मपरो भवेत् ।
यो हि स्वधर्मनिरतः स तेजस्वी भवेदिह ॥ २३ ॥
जगत् के लोग राजदण्ड के भय से अपने २ धर्म के पालन में तत्पर होते हैं। और जो अपने धर्म में निरत होता है वही इस संसार में तेजस्वी होता है ॥

विना स्वधर्मान्न सुखं स्वधर्मो हि परं तपः ।
तपः स्वधर्मरूपं यद्वर्द्धितं येन वै सदा ॥ २४ ॥
देवास्तु किंकरास्तस्य किं पुनर्मनुजा भुवि ।

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प्रथमोऽध्यायः

धर्म की प्रशंसा—स्वधर्म-पालन करने के बिना सुख नहीं होता है और अपने धर्म का पालन करना परम तप है। अतः जिसने स्वधर्म-पालन रूप तप को सदा बढ़ाया है, संसार में उसके देवता लोग भी किङ्कर हो जाते हैं फिर मनुष्यों के विषय में क्या कहना है ॥

सुदण्डैर्धर्मनिरताः प्रजाः कुर्यान्महाभयैः ॥ २५ ॥
नृपः स्वधर्मनिरतो भूत्वा तेजःक्षयोऽन्यथा ।

राजा अपने धर्म में रत होकर अत्यन्त भयदायक दण्डों के द्वारा प्रजाओं को अपने २ धर्म में रत रक्खे। यदि ऐसा नहीं करता है तो उसका तेज क्षीण हो जाता है ॥

अभिषिक्तोऽनभिषिक्तो नृपत्वं तु यदाप्नुयात् ॥ २६ ॥
बुद्ध्या बलेन शौर्येण ततो नीत्याऽनुपालयन् ।
प्रजाः सर्वाः प्रतिदिनमच्छिद्रे दंडधृक् सदा ॥ २७ ॥

जिसका अभिषेक हुआ है या नहीं हुआ है, ऐसा राजा जब राज-पदवी को धारण करे तब वह बुद्धि, बल, शूरता तथा नीति से प्रतिदिन सभी प्रजाओं का पालन करता हुआ स्वयं छिद्र (दोष) रहित होकर दण्ड को धारण करे ॥

नित्यं बुद्धिमतोऽप्यर्थः स्वल्पकोऽपि विवर्धते ।
तिर्यञ्चोऽपि वशं यांति शौर्यनौतिबलैर्धनैः ॥ २८ ॥

बुद्धिमान राजा का थोड़ा भी धन नित्य वृद्धि को प्राप्त होता है। और उसकी शूरता, नीति, बल तथा धन से तिर्यग्योनि के सर्पादि भी उसके वश में हो जाते हैं ॥

सात्त्विकं राजसं चैव तामसं त्रिविधं तपः ।
यादृक्तपति योऽत्यर्थं तादृग् भवति वै नृपः ॥ २९ ॥

सात्त्विकादि गुण भेद से राजा के तीन भेद—सात्त्विक, राजस तथा तामस भेद से तप तीन प्रकार का होता है। अतः जो राजा जिस प्रकार का तप करता है उसके अनुसार वह सात्त्विक, राजस अथवा तामस गुणवाला होता है ॥

यो हि स्वधर्मनिरतः प्रजानां परिपालकः ।
यष्टा च सर्वयज्ञानां नेता शत्रुगणस्य च ॥ ३० ॥
दानशौण्डः क्षमी शूरो निःस्पृहो विषयेष्वपि ।
विरक्तः सात्त्विकः स हि नृपोऽन्ते मोक्षमन्वियात् ॥ ३१ ॥

जो राजा अपने धर्म में निरत, प्रजाओं का पालक, सम्पूर्ण यज्ञों का करने वाला, शत्रुगणों को जीतनेवाला, दानवीर, क्षमावान, शूर, इन्द्रियों के

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६

शुक्रनीतिः

विषयों की तरफ मन नहीं लगानेवाला, वैराग्य-युक्त होता है वह 'सात्विक' कहलाता है। और ऐसा ही राजा अन्त में मोक्ष को प्राप्त करता है ॥

विपरीतस्तामसः स्यात् सोऽन्ते नरकभाजनः ।
निर्घृणश्च मदोन्मत्तो हिंसकः सत्यवर्जितः ॥ ३२ ॥

और उक्त इन गुणों से विपरीत गुणवाला जो राजा होता है वह 'तामस' कहलाता है और वह अन्त में नरक को प्राप्त करता है तथा दयारहित, मद से उन्मत्त, हिंसा करनेवाला, सत्य से रहित होता है ॥

राजसो दांभिको लोभी विषयी वंचकश्शठः ।
मनसाऽन्यश्च वचसा कर्मणा कलहप्रियः ॥ ३३ ॥
नीचप्रियः स्वतंत्रश्च नीतिहीनश्छलांतरः ।
स तिर्यक्त्वं स्थावरत्वं भविताऽन्ते नृपाधमः ॥ ३४ ॥

जो दाम्भिक, लोभी, विषयी, ठग, शठ, मन से अन्य बाहर से अन्य व्यवहार करनेवाला, वाणी और कर्म से कलहप्रिय, नीचों से प्रेम रखने वाला, स्वतन्त्र, नीति से हीन, भीतर छल रखनेवाला होता है ऐसा राजा 'राजस' कहलाता है। और वह मरने पर तिर्यग्योनि ( सर्पादि योनि ) अथवा स्थावर-योनि ( वृक्षादि योनि ) को प्राप्त करता है ॥

देवांशान् सात्त्विको भुंक्ते राक्षसांशांस्तु तामसः ।
राजसो मानवांशांस्तु सत्त्वे धार्यं मनो यतः ॥ ३५ ॥

सात्त्विक राजा देवता के अंश को, तामस राक्षसों के अंश को तथा राजस मनुष्यों के अंश को भोगता है। अतः सत्त्व गुण में मन को लगाना चाहिये ॥

सत्त्वस्य तमः साम्यान्मानुषं जन्म जायते ।
यद्यदाश्रयते मर्त्यस्तत्तुल्यो दिष्टतो भवेत् ॥ ३६ ॥

सत्त्व गुण तथा तमो गुण की समता से मनुष्य का जन्म मिलता है। और भाग्यवश—जैसे गुणों का मनुष्य आश्रय लेता है उसी के अनुसार वह होता है ॥

कर्मैव कारणं चात्र सुगतिं दुर्गतिं प्रति ।
कर्मैव प्राक्तनमपि क्षणं कि कोऽस्ति चाक्रियः ॥ ३७ ॥

सुगति-दुर्गति भेद से प्राक्तन कर्म की कारणता—इस संसार में सुगति और दुर्गति के प्रति कर्म ही कारण होता है। वह भी प्राक्तन होता है। अर्थात् पूर्व कर्म ही प्रारब्ध कर्म कहलाता है। क्या कोई जीव बिना कर्म किये क्षण भर भी रह सकता है अर्थात् नहीं रह सकता है ॥

न जात्या ब्राह्मणश्चात्र क्षत्रियो वैश्य एव न ।
न शूद्रो न च वै म्लेच्छो भेदिता गुणकर्मभिः ॥ ३८ ॥

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प्रथमोऽध्यायः ७

इस संसार में जन्म से कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या म्लेच्छ नहीं होता है, वस्तुतः गुण तथा कर्म के भेद से ही होता है ॥

ब्रह्मणस्तु समुत्पन्नाः सर्वे ते किं नु ब्राह्मणाः ।
न वर्णतो न जनकाद् ब्रह्मतेजः प्रपद्यते ॥ ३६ ॥

संपूर्ण जीव ब्रह्मा से उत्पन्न हुये हैं अतः एव वे सभी क्या ब्राह्मण कहला सकते हैं ? नहीं, क्योंकि वर्ण (जाति) से और पिता से ब्रह्मतेज नहीं प्राप्त होता है ॥

ज्ञानकर्मोपासनाभिर्देवत्ताराधने रतः ।
शांतो दांतो दयालुश्च ब्राह्मणश्च गुणैः कृतः ॥ ४० ॥

'ज्ञानकाण्ड, कर्मकाण्ड और उपासना काण्ड का प्रकाण्ड विद्वान होता हुआ, देवता की आराधना में लीन, शान्तचित्त, इन्द्रियों का दमन करनेवाला, दयालु होना'—इन सब गुणों से ब्राह्मणों का निर्माण हुआ है ॥

लोकसंरक्षणे दक्षः शूरो दांतः पराक्रमी ।
दुष्टनिग्रहशीलो यः स वै क्षत्रिय उच्यते ॥ ४१ ॥

जनता की भली भांति रक्षा करने में चतुर, शूर, इन्द्रियों का दमन करने-वाला, पराक्रमयुक्त, स्वभावतः दुष्टों को दण्ड देनेवाला जो है वह इन गुणों से 'क्षत्रिय' कहलाता है ॥

क्रयविक्रयकुशला ये नित्यं पण्यजीविनः ।
पशुरक्षाकृषिकरास्ते वैश्याः कीर्तिता भुवि ॥ ४२ ॥

जो लोग क्रय (खरीदना)—विक्रय (बेचना) करने में कुशल, नित्य दूकानदारी से जीविका चलानेवाले, पशु-पालन तथा कृषि कर्म (खेती) करनेवाले होते हैं वे संसार में 'वैश्य' कहलाते हैं ॥

द्विजसेवाचनरताः शूराः शांता जितेन्द्रियाः ।
सीरकाष्ठतृणवहास्ते नीचाः शूद्रसंज्ञकाः ॥ ४३ ॥

जो लोग द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) जाति की सेवा में निरत, शूर, शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, हल, काष्ठ तथा तृण (घास आदि) का भार-वहन करनेवाले होते हैं वे नीच एवं 'शूद्र' कहलाते हैं ॥

त्यक्तस्वधर्माचरणा निर्घृणाः परपीडकाः ।
चंडाश्च हिंसका नित्यं म्लेच्छास्ते ह्यविवेकिनः ॥ ४४ ॥

जो लोग स्वधर्माचरण का परित्याग करनेवाले, दयाशून्य, दूसरे को पीड़ा पहुँचानेवाले, अत्यन्त क्रोधी तथा हिंसा करनेवाले होते हैं वे 'म्लेच्छ' कहलाते हैं । और उनमें विवेक का लेश भी नहीं होता है ॥

प्राक्कर्मफलभोगार्हा बुद्धिः संजायते नृणाम् ।

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८
: शुक्रनीतिः

पापकर्मणि पुण्ये वा कर्तुं शक्तो न चान्यथा ॥ ४५ ॥
मनुष्यों को पूर्वार्जित कर्मों के फल भोगने के योग्य जब जैसी बुद्धि उत्पन्न होती है तब उसके अनुसार पाप अथवा पुण्य कर्म करने में मनुष्य समर्थ होता है, अन्यथा असमर्थ रहता है ॥

बुद्धिरुत्पद्यते तादृग् यादृक्कर्मफलोदयः ।
सहायास्तादृशा एव यादृशी भवितव्यता ॥ ४६ ॥
जैसे कर्मों का फल उदय होता है उसी के अनुसार वैसी बुद्धि होती है तथा जैसी भवितव्यता (होनहार) होती है उसी के अनुसार वैसे सहाय (साथी) भी होते हैं ॥

प्राक्तनवशतः सर्वं भवत्येवेति निश्चितम् ।
तदोपदेशा व्यर्थाः स्युः कार्याकार्यप्रबोधकाः ॥ ४७ ॥
यदि यही निश्चित हो कि जो कुछ होता है वह सब प्राक्तन कर्म के अनुसार ही होता है तो 'यह कर्त्तव्य है और यह नहीं कर्त्तव्य है' इसके बोधक सभी उपदेश व्यर्थ हो जायेंगे ॥

धीमन्तो बन्द्यचरिता मन्यन्ते पौरुषं महत् ।
अशक्ताः पौरुषं कर्तुं क्लीबा दैवमुपासते ॥ ४८ ॥
जो बुद्धिमान एवं प्रशंसनीय चरितवाले हैं वे पुरुषार्थ को बड़ा मानते हैं अर्थात् उद्योग करते हैं। और जो पुरुषार्थ करने में असमर्थ कायर पुरुष हैं वे भाग्य की उपासना करते हैं अर्थात् भाग्य के भरोसे बैठे रहते हैं ॥

दैवे पुरुषकारे च खलु सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
पूर्वजन्मकृतं कर्मेहार्जितं तद् द्विधा कृतम् ॥ ४९ ॥
भाग्य और पुरुषार्थ इन दोनों के ऊपर ही सम्पूर्ण जगत् के कार्य स्थित हैं। इनमें पूर्वजन्म में किया हुआ कर्म 'भाग्य' और इस जन्म में किया हुआ कर्म 'पुरुषार्थ' कहलाता है, इस भांति से एक ही कर्म के दो भेद किये गये हैं ॥

बलवत्प्रतिकारि स्याद् दुर्बलस्य सदैव हि ।
सबलाबलयोर्ज्ञानं फलप्राप्त्याऽन्यथा नहि ॥ ५० ॥
भाग्य और पुरुषार्थ इन दोनों में से जो दुर्बल होता है उसको हटाने-वाला सदा बलवान् होता है। सबल और दुर्बल का ज्ञान केवल फल-प्राप्ति से होता है। अन्य रीति से नहीं होता ॥

फलोपलब्धिः प्रत्यक्षहेतुना नैव दृश्यते ।
प्राक्कर्महैतुकी सा तु नान्यथैवेति निश्चयः ॥ ५१ ॥
'प्रत्यक्ष कारण (पुरुषार्थ) से फल की प्राप्ति नहीं दिखाई देती है, वह तो प्राक्तन कर्म के वश से ही होती है, अन्य से नहीं होती है' यह निश्चित है ॥

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प्रथमोऽध्यायः ९

यज्जायतेऽल्पक्रियया नृणां वापि महत्फलम् ।
तदपि प्राक्तनादेव केचित् प्रागिह कर्मजम् ॥ ५२ ॥
और कभी २ स्वल्प कर्म से ही मनुष्यों को जो अधिक फल की प्राप्ति दिखाई देती है वह प्राक्तन कर्म के वश से ही होती है, कोई २ आचार्य उसे पुरुषार्थ से हुआ ही मानते हैं ॥

वदन्तीहैव क्रियया जायते पौरुषं नृणाम् ।
सस्नेहवर्तिर्दीपस्य रक्षा वातात् प्रयत्नतः ॥ ५३ ॥
'मनुष्यों का जो पुरुषार्थ फलप्राप्ति के लिये होता है उसमें इसी जन्म के अर्थात् तात्कालिक कर्म ही कारण होता है। जैसे लोक में तैल तथा बत्ती से युक्त दीपक की हवा से रक्षा प्रयत्न करने से ही होती है' ऐसा कोई २ आचार्य कहते हैं ॥

अवश्यंभाविभावानां प्रतीकारो न चेद्यदि ।
दुष्टानां क्षपणं श्रेयो यावद्बुद्धिबलोदयैः ॥ ५४ ॥
यदि अवश्य होनेवाले कार्यों का प्रतीकार होना संभव न होता तो अपने बुद्धि तथा बल के अनुसार दुष्टों का नाश करना कल्याणकारक न होता अर्थात् पुरुषार्थ से दुर्बल भावी (होनहार) को मिटाया जा सकता है ॥

प्रतिकूलानुकूलाभ्यां फलाभ्यां च नृपोऽप्यतः ।
ईषन्मध्याधिकाभ्यां च त्रिधा दैवं विचिन्तयेत् ॥ ५५ ॥
इससे राजा प्रतिकूल तथा अनुकूल फल देनेवाले दैव (भाग्य) के थोड़ा, मध्यम तथा अधिक इन तीनों भेदों से तीन प्रकार का समझे ॥

रावणस्य च भीष्मादेर्वनभंगे च गोग्रहे ।
प्रातिकूल्यं तु विज्ञातमकस्माद्वानरान्नरात् ॥ ५६ ॥
रावण को अशोक-वाटिका का अकेले एक हनुमान् नामक वानर द्वारा ध्वंस होने से और अकेले एक नर (अर्जुन) द्वारा भीष्म आदि (दुर्योधन) को विराट नगर में गायों को पकड़ कर रख लेने से दैव की प्रतिकूलता ज्ञात हुई ॥

कालानुकूल्यं विस्पष्टं राघवस्यार्जुनस्य च ।
अनुकूले यदा दैवे क्रियाऽल्पा सुफला भवेत् ॥ ५७ ॥
और रामचन्द्र और अर्जुन के समय की अनुकूलता तो प्रगट ही है। अतः जब दैव अनुकूल रहता है तब थोड़ा भी पुरुषार्थ सफल हो जाता है ॥

महती सत्क्रियाऽनिष्फला स्यात् प्रतिकूलके ।
बलिर्दानेन संबद्धो हरिश्चन्द्रस्तथैव च ॥ ५८ ॥
और दैव प्रतिकूल रहने पर अत्यन्त अच्छी भी क्रिया (पुण्यकार्य) अनिष्ट

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१० | शुक्रनीतिः

फल देनेवाली हो जाती है। जैसे—दान से राजा बलि बाँधे गये और राजा हरिश्चन्द्र को भी डोम के यहां नौकरी करनी पड़ी ॥

भवतीष्टं सत्क्रिययाऽनिष्टं तद्विपरीतया ।
शास्त्रतः सदसज्ज्ञात्वा त्यक्त्वाऽसत्सत्समाचरेत् ॥ ५९ ॥

अच्छे कार्यों से अच्छा फल होता है, उससे विपरीत (बुरे) कार्यों से बुरा फल होता है अतः शास्त्र द्वारा अच्छे बुरे कार्यों का ज्ञान प्राप्त कर बुरे का त्याग तथा अच्छे का ग्रहण करना चाहिये ॥

कालस्य कारणं राजा सदसत्कर्मणस्त्वतः ।
स्वक्रौर्योद्यतदण्डाभ्यां स्वधर्मे स्थापयेत् प्रजाः ॥ ६० ॥

सत् (अच्छा) तथा असत् (बुरा) कर्म को करानेवाले काल का भी कारण (विधाता) राजा होता है। अतः राजा अपनी क्रूरता से तथा दण्ड देने के लिये उद्यत रह कर प्रजाओं को अपने २ धर्म पर स्थिर रक्खे ॥

स्वाम्यमात्यसुहृत्कोशराष्ट्रदुर्गबलानि च ।
सप्तांगमुच्यते राज्यं तत्र मूर्धा नृपः स्मृतः ॥ ६१ ॥

राजा के ७ अङ्गों का निर्देश—१ राजा, २ मन्त्री, ३ मित्र, ४ कोश (खजाना), ५ राष्ट्र (देश), ६ दुर्ग (किला), ७ सेना, ये राज्य के ७ अङ्ग कहलाते हैं। इनमें राजा को शिर माना गया है ॥

दृगमात्यः सुहृच्छ्रोत्रं मुखं कोशो बलं मनः ।
हस्तौ पादौ दुर्गराष्ट्रं राज्यांगानि स्मृतानि हि ॥ ६२ ॥

और मन्त्री नेत्र, मित्र-कर्ण, कोश-मुख, बल (सैन्य) मन, दुर्ग-दोनों हाथ, राष्ट्र दोनों पैर इस भाँति से राज्य के अङ्ग माने गये हैं ॥

अंगानां क्रमशो वक्ष्ये गुणान् भूतिप्रदान् सदा ।
यैर्गुणैस्तु सुसंयुक्ता वृद्धिमन्तो भवन्ति हि ॥ ६३ ॥

अब सदा ऐश्वर्य देनेवाले अङ्गों के उन गुणों का क्रमशः वर्णन करूँगा। जिनसे भली-भांति युक्त होने पर राजा लोग अभ्युदयशाली हो जाते हैं ॥

राजाऽस्य जगतो हेतुर्वृद्धयै वृद्धाभिसंमतः ।
नयनानन्दजनकः शशांक इव तोयधेः ॥ ६४ ॥

'इस जगत् के अभ्युदय (वृद्धि) का कारण राजा है, जो प्रजाओं के नेत्रों को आनन्द देनेवाला है। जैसे चन्द्रमा-समुद्र की वृद्धि में कारण है।' ऐसा वृद्धों का मत है ॥

यदि न स्यान्नरपतिः सम्यङ् नेता ततः प्रजाः ।
अकर्णधारा जलधौ विप्लवेतेह नौरिव ॥ ६५ ॥

यदि लोक में राजा उत्तम रीति से नेता (प्रजाओं को अपने २ धर्म

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प्रथमोऽध्यायः १९

पर ले चलनेवाला) न हो तो समुद्र में बिना कर्णधार (पतवार पकड़नेवाले मल्लाह) नौका की भाँति प्रजा नष्ट हो जाती है ॥

न तिष्ठन्ति·स्वस्वधर्मे विना पालेन वै प्रजाः ।
प्रजया तु विना स्वामी पृथिव्यां नैव शोभते ॥ ६६ ॥

बिना राजा के प्रजा अपने २ धर्म में स्थित नहीं रहती है। और पृथ्वी पर बिना प्रजा के राजा भी नहीं शोभित होता है ॥

न्यायप्रवृत्तो नृपतिरात्मानमथ च प्रजाः ।
त्रिवर्गेणोपसंघत्ते निहन्ति ध्रुवमन्यथा ॥ ६७ ॥

न्याय में प्रवृत्त रहनेवाला राजा अपने को तथा प्रजावर्ग को त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) से युक्त करता है। अन्यथा अर्थात् अन्याय में प्रवृत्त रहनेवाला राजा अपने को तथा प्रजावर्ग को त्रिवर्ग से रहित करने से निश्चय नष्ट करता है ॥

धर्माद्वै जवनो राजा विधाय बुभुजे भुवम् ।
अधर्माच्चैव नहुषः प्रतिपेदे रसातलम् ॥ ६८ ॥

धर्म से पवित्र हुआ राजा पृथ्वी का पालन कर उसका भोग करता है और अधर्म से नहुष राजा इन्द्रलोक को प्राप्त करके भी रसातल को पहुँच गया ॥

वेनो नष्टस्त्वधर्मेण पृथुर्वृद्धः स्वधर्मतः ।
तस्माद्धर्मं पुरस्कृत्य यतेतार्थाय पार्थिवः ॥ ६९ ॥

अधर्म से राजा वेन नष्ट हो गया और धर्म से राजा पृथु वृद्धि (अभ्युदय) को प्राप्त हुआ। इससे धर्म को प्रधान कर के ही राजा को अर्थ के लिये प्रयत्न करना चाहिये ॥

यो हि धर्मपरो राजा देवांशोऽन्यश्च रक्षसाम् ।
अंशभूतो धर्मलोपी प्रजापीडाकरो भवेत् ॥ ७० ॥

जो धर्म में तत्पर रहनेवाला राजा है वह देवांश (देवताओं के अंश से उत्पन्न हुआ) कहलाता है—इससे अन्य अर्थात् अधर्म में तत्पर राजा राक्षसों के अंश से उत्पन्न, धर्म का लोप करनेवाला एवं प्रजा को पीडा पहुँचाने वाला कहलाता है ॥

इन्द्रानिलयमार्काणामग्नेश्च वरुणस्य च ।
चन्द्रवित्तेशयोश्चापि मात्रा निर्हृत्य शाश्वतीः ॥ ७१ ॥
जंगमस्थावराणां च हीशः स्वतपसा भवेत् ।
भागभाग् रक्षणे दक्षो यथेन्द्रो नृपतिस्तथा ॥ ७२ ॥

राजा के देवांश होने का निर्देश—इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, चन्द्र, कुबेर इन लोकपालों के निरन्तर रहनेवाले अंशों को अपने में धारण

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१२ ॥ शुक्रनीतिः॥

कर अपनी तपस्या के प्रभाव से राजा स्थावर-जङ्गमात्मक जगत् का स्वामी होता है। और अपने भाग (कर) को ग्रहण करनेवाला तथा लोक की रक्षा करने में निपुण इन्द्र के समान ही होता है ॥

वायुर्गन्धस्य सदसत्कर्मणः प्रेरको नृपः ।
धर्मप्रवर्त्तकोऽधर्मनाशकस्तमसो रविः ॥ ७३ ॥

जिस प्रकार से वायु भले-बुरे गन्ध का प्रेरक होता है उसी प्रकार राजा भी भले-बुरे कर्म का प्रेरक होता है। एवं सूर्य जैसे अन्धकार का नाशक एवं धर्म का प्रवर्त्तक होता है वैसे राजा भी अधर्म का नाशक तथा धर्म का प्रवर्त्तक होता है ॥

दुष्कर्मदण्डको राजा यमः स्याद्दण्डकृद्यमः ।
अग्निशुचिस्तथा राजा रक्षार्थं सर्वभागभुक् ॥ ७४ ॥

दुष्कर्म का दण्ड देनेवाला होने से राजा यम के समान है। क्योंकि यम भी दुष्कर्म का दण्ड देते हैं। और अग्नि के समान राजा स्वयं शुद्ध तथा लोक-रक्षार्थ सब लोगों से भाग (कर या हवि) ग्रहण कर भोग करनेवाला होता है ॥

पुष्यत्यपां रसैः सर्वं वरुणः स्वधनैर्नृपः ।
करैश्चन्द्रो ह्लादयति राजा स्वगुणकर्मभिः ॥ ७५ ॥

वरुण जैसे जलसम्बन्धी रसों से सबको परिपुष्ट करता है वैसे राजा भी अपने धन से सब का पोषण करता है। चन्द्र जैसे अपनी किरणों से जगत् को आह्लादित करता है, वैसे ही राजा भी अपने गुण तथा कर्मों से जगत् को आह्लादित करता है ॥

कोशानां रक्षणे दक्षः स्यान्निधीनां धनाधिपः ।
चन्द्रांशेन बिना सर्वैरंशैर्नो भाति भूपतिः ॥ ७६ ॥

जैसे कुबेर अपनी निधियों की रक्षा करने में निपुण होता है वैसे राजा भी अपने कोशों की रक्षा करने में निपुण होता है। यदि चन्द्र का अंश न हो तो केवल अन्य लोकपालों के अंशों से राजा की शोभा नहीं हो सकती है अर्थात् चन्द्र के समान आह्लादकत्व गुण राजा में न हो तो अन्य सभी गुण व्यर्थ हैं अत एव राजा की सार्थकता प्रजा को आह्लाद पहुँचाने से ही होती है ॥

पिता माता गुरुर्भ्राता बन्धुर्वैश्रवणो यमः ।
नित्यं सप्तगुणैरेषां युक्तो राजा न चान्यथा ॥ ७७ ॥

  • गुणों से युक्त राजा की प्रजा रंजकता का निर्देश—१. पिता, २. माता, ३. गुरु, ४. भ्राता, ५. बन्धु, ६. कुबेर, ७. यम, इन सातों के वक्ष्यमाण
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प्रथमोऽध्यायः १३

गुणों से नित्य युक्त होने पर ही वस्तुतः राजा कहलाने योग्य होता है, अन्यथा यदि उक्त गुण न हों तो राजा नहीं कहला सकता है ॥

गुणसाधनसंदक्षः स्वप्रजायाः पिता यथा ।
क्षमयित्र्यपराधानां माता पुष्टिविधायिनी ॥ ७८ ॥

अपनी प्रजा (सन्तान) को गुणवान बनाने में पिता जैसे निपुण होता है, वैसे राजा को भी अपनी प्रजा (जनता) को गुणवान बनाने में निपुण होना चाहिये । और जिस प्रकार माता अपनी प्रजा के अपराधों को क्षमा करनेवाली, तथा उनको पुष्ट करनेवाली होती है उसी प्रकार राजा को भी होना चाहिये ॥

हितोपदेष्टा शिष्यस्य सुविद्याऽध्यापको गुरुः ।
स्वभागोद्धारकृद् भ्राता यथाशास्त्रं पितुर्धनात् ॥ ७९ ॥

जिस प्रकार गुरु अपने शिष्य के लिये हित का उपदेश करनेवाला एवं सुन्दर विद्या को पढ़ानेवाला होता है उसी प्रकार अपनी प्रजा के लिये राजा को भी होना चाहिये । जैसे भ्राता शास्त्रानुसार पिता के धन में से अपने भाग (अंश) को ग्रहण करनेवाला होता है वैसे राजा को भी प्रजा से भाग (कर) ग्रहण करना उचित है ॥

आत्मस्त्रीधनगुह्यानां गोप्ता बन्धुस्तु मित्रवत् ।
धनदस्तु कुबेरः स्याद्यमः स्याच्च सुदण्डकृत् ॥ ८० ॥

जिस प्रकार बन्धु अपने बन्धु के शरीर, स्त्री, धन तथा गुप्त रहस्य की रक्षा करनेवाला मित्र के समान होता है उसी प्रकार राजा को भी प्रजा के लिये होना चाहिये । और आवश्यकता पड़ने पर कुबेर के समान धन देनेवाला, एवं यम के समान अपराधी को यथार्थ दण्ड देनेवाला होना चाहिये ॥

प्रबुद्धिमति सम्राजि निवसन्ति गुणा अमी ।
एते सप्त गुणा राज्ञा न हातव्याः कदाचन ॥ ८१ ॥

प्रकृष्ट बुद्धिवाले श्रेष्ठ राजाओं में ये सभी गुण रहते हैं । अतः राजाओं को उचित है कि इन ७ गुणों को वे कभी भी न छोड़ें ॥

क्षमते योऽपराधं स शक्तः स दमने क्षमी ।
क्षमया तु विना भूपो न भात्यखिलसद्गुणैः ॥ ८२ ॥

जो अपराधों को क्षमा करनेवाला होता है वह 'क्षमाशील' एवं जो दुष्टों का दमन करनेवाला होता है वह 'शक्तिमान्' कहलाता है । किन्तु संपूर्ण गुणों से युक्त होने पर भी राजा यदि क्षमा से रहित होता है तो उसकी शोभा नहीं होती है ॥

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१४ शुक्रनीतिः

स्वान् दुर्गुणान् परित्यज्य ह्यतिवादांस्तितिक्षते ।
दानैर्मानैश्च सत्कारैः स्वप्रजारंजकः सदा ॥ ८३ ॥
दान्तः शूरश्च शस्त्रास्त्रकुशलोऽरिनिषूदनः ।
अस्वतन्त्रश्च मेधावी ज्ञानविज्ञानसंयुतः ॥ ८४ ॥
नीचहीनो दीर्घदर्शी वृद्धसेवी सुनीतियुक् ।
गुणिजुष्टस्तु यो राजा स ज्ञेयो देवतांशकः ॥ ८५ ॥
जो राजा अपने दुर्गुणों का परित्याग कर निन्दा को सहन करनेवाला, दान, मान तथा सत्कार से अपनी प्रजा को सदा प्रसन्न रखनेवाला, इन्द्रियों को दमन करनेवाला, शूर, शस्त्रास्त्र चलाने में निपुण, शत्रुओं का नाशक, उच्छृङ्खलता से रहित धारणाशक्तिसंपन्न, ज्ञान तथा विज्ञान से युक्त, नीचगुणों से वा नीच संगति से रहित, दूरदर्शी, वृद्धों की उपासना करनेवाला, सुन्दर नीति से युक्त, गुणियों से सेवित होता है उसे 'देवांश' (देवताओं के अंश से उत्पन्न होनेवाला) समझना चाहिये ॥

विपरीतस्तु रक्षोऽशः स च नरकभाजनः ।
नृपांशसदृशो नित्यंः तत्सहायगणः किल ॥ ८६ ॥
इन गुणों से विपरीत गुणों वाला राजा 'रक्षोऽश' अर्थात् राक्षस के अंश से उत्पन्न हुआ कहलाता है और वह नरकगामी होता है । और राजा जैसे अंश का होता है निश्चय उसके सहायकगण (पार्श्ववर्त्ती मन्त्री इत्यादि) भी उसी अंश वाले होते हैं ॥

तत्कृतं मन्यते राजा संतुष्यति च मोदते ।
तेषामाचरणैर्नित्यं नान्यथा नियतेर्बलात् ॥ ८७ ॥
और दैव के वश से विवश होकर राजा उनके किये हुये कार्यों का अनुमोदन करता है एवं उनके आचरणों से नित्य सन्तुष्ट एवं हर्षित होता है । अन्यथा नहीं होता है अर्थात् भिन्न अंशवाले सहायकों से वैसा सन्तुष्ट नहीं रहता है ॥

अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतकर्मफलं नरैः ।
प्रतिकारैर्विना नैव प्रतिकारे कृते सति ॥ ८८ ॥
किये हुये कर्मों का फल मनुष्यों को अवश्य भोगना पड़ता है यदि उसकी निवृत्ति के लिये उपाय न किया जाय । और यदि निवृत्ति के लिये उपाय किया जाय तो नहीं भोगना पड़ता है ॥

तथा भोगाय भवति चिकित्सितगदो यथा ।
उपदिष्टेऽनिष्टहेतौ तत्तत्कर्तुं यतेत कः ॥ ८९ ॥
जैसे जिस रोग की चिकित्सा होती है, उसकी निवृत्ति का उपाय न करने पर वह भोग के लिये होता है और उपाय करने पर नहीं होता है । क्योंकि

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प्रथमोऽध्यायः १५

लोक में यह बात सिद्ध है कि अनिष्टकारक कारणों के उपदेशों को प्राप्त कर लेने पर भी कौन ऐसा व्यक्ति है जो उनको प्राप्त करने के लिये प्रयत्न करता है, अर्थात् कोई नहीं ॥

रज्यते सत्फले स्वान्तं दुष्फले नहि कस्यचित् ।
सदसद्बोधकान्येव दृष्ट्वा शास्त्राणि चाचरेत् ॥ ६० ॥

अच्छे फल देनेवाले कार्यों में मनुष्य का मन लगता है और बुरे फलवाले कार्यों में किसी का मन नहीं लगता है अतः सत् ( अच्छे ) तथा असत् (बुरे) कार्यों के बोधक शास्त्रों को देखकर तदनुसार आचरण करना चाहिये ॥

नयस्य विनयो मूलं विनयः शास्त्रनिश्चयात् ।
विनयस्येन्द्रियजयस्तद्युक्तः शास्त्रमृच्छति ॥ ६१ ॥

नीति का मूल विनय है, और शास्त्र में निश्चय होने से विनय होता है। विनय का मूल इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करना है अतः जो इन्द्रियजयी है वही शास्त्रज्ञान प्राप्त करता है ॥

आत्मानं प्रथमं राजा विनयेनोपपादयेत् ।
ततः पुत्रांस्ततोऽमात्यांस्ततो भृत्यांस्ततः प्रजाः ॥ ६२ ॥
परोपदेशकुशलः केवलो न भवेन्नृपः ।

अतः राजा सर्वप्रथम अपने को विनय से युक्त करे, तत्पश्चात् पुत्रों को, तदनन्तर मन्त्रियों को, उसके बाद भृत्यों को, अन्त में प्रजाओं को विनय से युक्त करे । राजा केवल दूसरों को उपदेश देने में कुशल न हो ॥

प्रजाधिकारहीनः स्यात् सगुणोपि नृपः कचित् ॥ ६३ ॥
न तु नृपविहीनाः स्युर्दुर्गुणा ह्यपि तु प्रजाः ।
यथा न विधवेन्द्राणी सधवा तु तथा प्रजाः ॥ ६४ ॥

कहीं-कहीं गुणवान राजा भी प्रजा के ऊपर अधिकार से हीन हो जाता है किन्तु दुर्गुणवाली भी प्रजा राजा से हीन नहीं होती है। जैसे कभी इन्द्राणी बिना इन्द्र के विधवारूप में नहीं रह सकती है वैसे ही बिना राजा के प्रजा भी नहीं रह सकती है ॥

भ्रष्टश्रीः स्वामिता राज्ये नृप एव न मन्त्रिणः ।
तथाऽविनीतदायादोऽदांताः पुत्रादयोपि च ॥ ६५ ॥

राजा ही भ्रष्टश्री होता है तथा स्वामित्व रखता है। मन्त्री में उक्त बातें नहीं होती हैं तथा अविनययुक्त दायाद ( भाई-पट्टीदार ) वर्ग एवं इन्द्रियों का दमन नहीं कर सकने वाले पुत्रादि के कारण से भी राजा राज्य भ्रष्ट एवं प्रभुत्व से हीन हो जाता है ॥

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१६
: शुक्रनीतिः

सदानुरक्तप्रकृतिः प्रजापालनतत्परः ।
विनीतात्मा हि नृपतिर्भूयसीं श्रियमश्नुते ॥ ६६ ॥

अतः जिस राजा की प्रजा सदा अनुरक्त रहनेवाली होती है। और जो स्वयं प्रजापालन में तत्पर रहता है एवं विनययुक्त होता है वह अत्यधिक श्रीको प्राप्त करता है ॥

प्रकीर्णविषयारण्ये धावन्तं विप्रमाथिनम् ।
ज्ञानांकुशेन कुर्वीत वशमिन्द्रियदंतिनम् ॥ ६७ ॥

**इन्द्रियजय की आवश्यकता का निर्देश—**राजा नाना विषयरूपी जंगलों में दौड़ते हुये मन को मथ डालनेवाले इन्द्रियरूपी हाथी को ज्ञानरूपी अङ्कुश से अपने वश में करे ॥

विषयामिषलोभेन मनः प्रेरयतीन्द्रियम् ।
तन्निरुन्ध्यात् प्रयत्नेन जिते तस्मिञ्जितेन्द्रियः ॥ ६८ ॥

विषयरूपी आमिष (मांस) के लोभ से मन इन्द्रिय को प्रेरित करता है। अतः उसे (मन) प्रयत्नपूर्वक रोके। उसके जीतने पर मनुष्य 'जितेन्द्रिय' कहलाता है ॥

एकस्यैव हि योऽशक्तो मनसः सन्निबर्हणे ।
महीं सागरपर्यन्तां स कथं ह्यवजेष्यति ॥ ६६ ॥

जो राजा केवल एक मन को भलीभांति जीतने में असमर्थ रहता है तो भला वह समुद्रपर्यन्त पृथ्वी को जीतने में कैसे समर्थ हो सकता है।

क्रियावसानविरसैर्विषयैरपहारिभिः ।
गच्छत्याक्षिप्तहृदयः करीव नृपतिर्ग्रहम् ॥ १०० ॥

क्रिया (भोग) के अन्त में प्रीति का विषय न रह जानेवाले, मन को आकृष्ट करनेवाले विषयों से आकृष्ट चित्त होकर हस्ती की भांति राजा बन्धन में पड़ जाता है ॥

शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः ।
एकैकन्त्वलमेतेषां विनाशप्रतिपत्तये ॥ १०१ ॥

शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध इनमें से प्रत्येक पृथक् पृथक् विषय लोगों के विनाश करने में समर्थ होते हैं ॥

शुचिदर्भाङ्कुराहारो विदूरभ्रमणे क्षमः ।
लुब्धकोद्गीतमोहेन मृगो मृगयते वधम् ॥ १०२ ॥

**जैसे शब्द विषय के द्वारा—**पवित्र, कुशके अङ्कुरों का आहार करनेवाला, अत्यन्त दूर तक भ्रमण करने में समर्थ भी मृग बहेलिया के गीत से मोहित होकर मृत्यु को प्राप्त होता है ॥

प्रथमोऽध्यायः १७.

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प्रथमोऽध्यायः १७.

गिरीन्द्रशिखराकारो लीलयोन्मूलितद्रुमः ।
करिणीस्पर्शसम्मोहाद्बन्धनं याति वारणः ॥ १०३ ॥
**स्पर्श विषय के द्वारा—**पर्वत के शिखर की भांति ऊंचे आकार वाला, खेलवाड़ से पेड़ों को उखाड़ देने वाला हाथी भी हथिनी के स्पर्श से मोहित होकर बन्धन को प्राप्त होता है ।

स्निग्धदीपशिखालोकविलोलितविलोचनः ।
मृत्युमृच्छति सम्मोहात् पतंगः सहसा पतन् ॥ १०४ ॥
**रूप विषय द्वारा—**स्निग्ध (स्नेह = तैलयुक्त) दीप की शिखा के प्रकाश से चञ्चल नेत्र वाला पतङ्ग (फततिङ्गा) मोहित होकर सहसा दीपशिखा पर गिरता हुआ मृत्यु को प्राप्त करता है ।

अगाधसलिले मग्नो दूरेऽपि बसतौ बसन् ।
मीनस्तु सामिषं लोहमास्वादयति मृत्यवे ॥ १०५ ॥
**रस विषय द्वारा—**अगाध जल में डूबा हुआ, दूर से दूर रहता हुआ भी मीन (मछली) मोह से मांसयुक्त लौहकण्टक का आस्वाद लेता हुआ मृत्यु को प्राप्त करता है ।

उत्कर्तितुं समर्थोपि गंतुं चैव सपक्षकः ।
द्विरेफो गन्धलोभेन कमले याति बन्धनम् ॥ १०६ ॥
**गन्ध विषय द्वारा—**कमल को काट डालने में एवं पङ्ख होने से उड़ने में भी समर्थ भौंरा गन्ध के लोभ से कमल के अन्दर संकुचित होने पर बँध जाता है अर्थात् उसी में बँधकर मर जाता है ।

एकैकशो विनिघ्नन्ति विषया विषसन्निभाः ।
किंपुनः पंच मिलिता न कथं नाशयंति हि ॥ १०७ ॥
विष के तुल्य उक्त शब्दादि विषय पृथक् २ रहकर भी प्राणनाशक होते हैं यदि वे पांचों मिलित हों तो क्यों नहीं नाश कर सकते हैं अर्थात् निःसन्देह प्राण ले सकते हैं ।

द्यूतं स्त्री मद्यमेवैतत्त्रितयं बहनर्थकृत् ।
अयुक्तं युक्तियुक्तं हि धनपुत्रमतिप्रदम् ॥ १०८ ॥
**द्यूतादिव्यसन के दोषों का निर्देश—**द्यूत (जूआ) खेलना, स्त्री-सेवन, मद्यपान ये तीनों अधिक मात्रा में होने से बहुत अनर्थ करने वाले होते हैं किन्तु यदि इनका उचित उपयोग किया जाय तो द्यूत से धन, स्त्री से पुत्र और मद्य से बुद्धि की प्राप्ति होती है ।

नलधर्मप्रभृतयः सुद्यूतेन विनाशिताः ।
सकापट्यं धनायालं द्यूतं भवति तद्विदाम् ॥ १०९ ॥

२ शु०

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३८ शुक्रनीतिः

द्यूत कर्म में अनभिज्ञ नल और युधिष्ठिर आदि राजाओं का द्यूत के द्वारा विशेष धन-नाश हुआ किन्तु द्यूत कर्म में निपुण लोगों को चालाकी से खेला हुआ द्यूत धन दिलाने में अत्यन्त समर्थ होता है।

स्त्रीणां नामापि संह्लादि विकरोत्येव मानसम् ।
किंपुनर्दर्शनं तासां विलासोल्लासितभ्रुवाम् ॥ ११० ॥

स्त्रियों का नाम लेना भी आह्लाद पैदा करके चित्त को काम-विकार से युक्त कर देता है। फिर विलासपूर्वक भौहों को नचाने वाली उन स्त्रियों का दर्शन करना क्यों नहीं मन को काम-विकार युक्त कर सकता है अर्थात् अवश्य कर सकता है।

रहःप्रचारकुशला मृदुगद्गदभाषिणी ।
कं न नारी वशीकुर्यान्नरं रक्तान्तलोचना ॥ १११ ॥

एकान्त में भेट करने में कुशल, कोमल तथा गद्गद वचन बोलने वाली एवं अनुराग युक्त कटाक्ष करने वाली स्त्री किस मनुष्य को वशीभूत नहीं कर सकती है अर्थात् सभी को वशीभूत कर सकती है।

मुनेरपि मनो वश्यं सरागं कुरुतेऽङ्गना ।
जितेंद्रियस्य का वार्ता किपुनश्चाजितात्मनाम् ॥ ११२ ॥

मन को सदा अपने अधीन रखने वाले मुनियों के भी मन को स्त्रियां काम-वासना से युक्त कर देती हैं, जब जितेन्द्रिय की यह दशा है तब इन्द्रियों को नहीं जीतने वाले कामियों के विषय में क्या बात की जाय। अर्थात् उनको तो अवश्य ही वशीभूत कर सकती हैं।

ध्यायच्छलन्तश्च बहवः स्त्रीषु नाशं गता अमी ।
इन्द्रदण्डक्यनहुषरावणाद्या नृपा अतः ॥ ११३ ॥

बहुत से लोग सदा परस्त्रियों में प्रेम करके नाश को प्राप्त हुये हैं जैसे—इन्द्र, दण्डक्य, नहुष और रावण आदि का उदाहरण प्रसिद्ध है।

अतत्परनरस्यैव स्त्री सुखाय भवेत्सदा ।
साहाय्यिनी गृह्यकृत्ये तां विनाऽन्या न विद्यते ॥ ११४ ॥

स्त्रियों में आसक्ति न रखने वालों के लिये ही स्त्री सदा सुख देने वाली होती है, क्योंकि गृह-कार्यों में उसके अलावा अन्य कोई दूसरी सहायता पहुँचाने वाली नहीं हो सकती है।

अतिमद्यं हि पिबतो बुद्धिलोपो भवेत्किल ।
प्रतिभां बुद्धिवैशद्यं धैर्य्यं चित्तविनिश्चयम् ॥ ११५ ॥
तनोति मात्रया पीतं मद्यमन्यद्विनाशकृत् ।
कामक्रोधौ मद्यतमौ नियोक्तव्यौ यथोचितम् ॥ ११६ ॥

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प्रथमोऽध्यायः १९

अत्यन्त मद्य पीने वाले की बुद्धि का निश्चय लोप हो जाता है। और मात्रा के साथ थोड़ा मद्य पीने वाले की प्रतिभा, बुद्धि में उज्ज्वलता, धीरता, चित्त की स्थिरता बढ़ती है। और इससे भिन्न मात्रा से अधिक पीने से मद्य शरीर को नष्ट कर देता है। और मद्य के समान काम तथा क्रोध भी चित्त को अत्यन्त मतवाला बना देने वाला होता है अतः इन दोनों को भी यथोचित रीति से प्रयोग करना उचित होता है।

कामः प्रजापालने च क्रोधः शत्रुनिबर्हणे।
सेनासंधारणे लोभो योज्यो राज्ञा जयार्थिना ॥ ११७ ॥

कामादि पर जय-प्राप्ति की इच्छा रखने वाले राजा के लिये उचित है कि वह—प्रजा-पालन के लिये काम (कामना) का, शत्रु-नाश के लिये क्रोध का, सैन्य रखने में लोभ का प्रयोग करे।

परस्त्री-संगमे कामो लोभो नान्यधनेषु च ।
स्वप्रजादण्डने क्रोधो नैव धार्यो नृपैः कदा ॥ ११८ ॥

राजा कभी भी पर-स्त्री के साथ सङ्ग करने के लिये काम को, अन्य के धन की प्राप्ति में लोभ को, अपनी प्रजा को दण्ड देने में क्रोध को न करे।

किमुच्येत कुटुम्बीति परस्त्रीसंगमान्नरः ।
स्वप्रजादण्डनाच्छूरो धनिकोऽन्यधनैश्च किम् ॥ ११९ ॥

पर-स्त्री के साथ संग करने वाला मनुष्य क्या कुटुम्बी ? अपनी प्रजा को दण्ड देने से क्या शूर-वीर और दूसरे के धन को लेने से मनुष्य क्या धनी कहला सकता है ? अर्थात् कभी नहीं कहला सकता है।

अरक्षितारं नृपतिं ब्राह्मणं चातपस्विनम् ।
धनिकं चाप्रदातारं देवा घ्नन्ति त्यजन्त्यधः ॥ १२० ॥

प्रजा की रक्षा नहीं करने वाले राजा को, तपस्या नहीं करने वाले ब्राह्मण को और दान नहीं देने वाले धनी को देवता लोग नष्ट कर देते हैं और अन्त में उन्हें नरक में गिरा देते हैं।

स्वामित्वं चैव दातृत्वं धनिकत्वं तपः-फलम् ।
एनसः फलमर्थित्वं दास्यत्वं च दरिद्रता ॥ १२१ ॥

राजा होना, दानी होना एवं धनी होना ये सब तप के फल हैं। और याचक होना, दास होना एवं दरिद्र होना ये सब पाप के फल हैं।

दृष्ट्वा शास्त्राण्यथात्मानं सन्नियम्य यथोचितम् ।
कुर्यान्नृपः स्ववृत्तं तु परत्रेह सुखाय च ॥ १२२ ॥

इससे राजा शास्त्रों को देखकर तदनुसार अपने मन को विषयों से यथो-

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२० | शुक्रनीतिः

चित रोककर पर-लोक और इस लोक में सुख पाने के लिये अपने आचरण को उचित रीति से करे।

दुष्टनिग्रहणं दानं प्रजायाः परिपालनम् ।
यजनं राजसूयादेः कोशानां न्यायतोऽर्जनम् ॥ १२३ ॥
करदीकरणं राज्ञां रिपूणां परिमर्द्दनम् ।
भूमेरुपार्जनं भूयो राजवृत्तं तु चाष्टधा ॥ १२४ ॥

आठ प्रकार के राजा के व्यवहार का निर्देश— १ दुष्टों का निग्रह करना, २ दान देना, ३ प्रजा का परिपालन, ४ राजसूयादि यज्ञ करना, ५ न्यायपूर्वक कोश ( खजाना ) बढ़ाना, ६ राजाओं से कर वसूल करना, ७ शत्रुओं का मान मर्द्दन करना, ८ बार बार राज्य को बढ़ाना, ये ८ प्रकार के राजाओं के वृत्त ( आचरण ) हैं।

न वर्धितं बलं यैस्तु न भूपाः करदीकृताः ।
न प्रजाः पालिताः सम्यक्ते वै षण्ढतिला नृपाः ॥ १२५ ॥

राजा के दोष-गुण का निर्देश— जिन राजाओं ने सेना नहीं बढ़ाई, राजाओं को कर देने वाला ( अधीन ) नहीं बनाया, प्रजाओं का भली भांति पालन नहीं किया, वे बांझतिल ( तेल-रहित तिल ) के समान तुच्छ कहलाते हैं।

प्रजा सूद्विजते यस्माद्यत्कर्म परिनिंदति ।
त्यज्यते धनिकैर्यस्तु गुणिभिस्तु नृपाधमः ॥ १२६ ॥

प्रजा जिससे उद्विग्न हो उठती है और जिसके कर्मों की निन्दा करती है और जिसे धनिक तथा गुणी लोग त्याग देते हैं वह राजा नृपाधम कहलाता है।

नटगायकगणिकामल्लषण्ढालपजातिषु ।
योऽतिसक्तो नृपो निन्द्यः स हि शत्रुमुखे स्थितः ॥ १२७ ॥

नट, गवैया, वेश्या, पहलवान, जनखा तथा नीच जाति वालों में अत्यन्त आसक्ति रखने वाला राजा निन्द्य कहलाता है। और वह शत्रु के मुख में पड़ जाता है।

बुद्धिमंतं सदा द्वेष्टि मोदते वंचकैः सह ।
स्वदुर्गुणं न वै वेत्ति स्वात्मनाशाय सो नृपः ॥ १२८ ॥

जो राजा सदा बुद्धिमानों से द्वेष रखता है और वंचकों से खुश रहता है एवं अपने दुर्गुणों को नहीं समझता है वह अपना नाश करने के लिये कारण बन जाता है।

नापराधं हि क्षमते प्रदंडो धनहारकः ।

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प्रथमोऽध्यायः
२१

स्वदुर्गुणश्रवणतो लोकानां परिपीडकः ॥ १२९ ॥
नृपो यदा तदा लोकः क्षुभ्यते भिद्यते यतः ।
गूढचारैः श्रावयित्वा स्ववृत्तं दूषयंति के ॥ १३० ॥
भूषयंति च कैर्भावैरमात्याद्याश्च तद्विदः ।

जब जो राजा अपराध को नहीं सहन करता है तथा उग्र दण्ड देता है। धन को हरण कर लेता है, अपने दुर्गुणों के सुनने पर कहनेवाले को पीड़ा पहुँचाने लगता है तब उससे प्रजा क्षुभित हो उठती है और भेदभाव रखने लगती है अर्थात् राजा से प्रेम हटा लेती है। अतः इनसे बचने के लिये राजा को उचित है कि वह अपने गुप्तचरों (खुफिया पुलिस) को भेजकर उनसे अपने आचरणों को प्रजा पर प्रकट करावे और यह जाने कि—कौन व्यक्ति मेरे आचरण को दोषयुक्त बताते हैं। और उस वृत्त के जानकार मन्त्री आदि किन आचरणों से मेरी प्रशंसा करते हैं।

मयि कीदृक् च संप्रोतिः केषामप्रीतिरेव वा ॥ १३१ ॥
ममागुणैर्गुणैर्वापि गूढं संश्रुत्य चाखिलम् ।
चारैः स्वदुर्गुणं ज्ञात्वा लोकतः सर्वदा नृपः ॥ १३२ ॥
सुकीर्त्यै संत्यजेन्नित्यं नावमन्येत वै प्रजाः ।

मेरे गुणों से किन लोगों की मेरे में कैसी प्रीति है ? और मेरे अवगुणों से किन लोगों की कैसी अप्रीति है ? इसे गूढ पुरुषों ( खुफिया पुलिस ) द्वारा लोगों से कहे हुये अपने दुर्गुणों को सर्वदा जानकर राजा अपनी कीर्ति के लिये उन दुर्गुणों को भली भांति छोड़ देवे और निन्दा करनेवाली प्रजा का कभी तिरस्कार न करै ।

लोको निंदति राजंस्त्वां चारैः संभावितो यदि ॥ १३३ ॥
कोपं करोति दौरात्म्यादात्मदुर्गुणलोपकः ।
सीता साध्व्यपि रामेण त्यक्ता लोकापवादतः ॥ १३४ ॥

यदि जासूस आकर यह सुनावें कि—'हे महाराज ! प्रजा आप की निन्दा करती है' इस पर जो अपने दुर्गुण को छिपानेवाला होता है वही राजा दुष्ट स्वभाववश कोप करता है—अन्य नहीं करता है । जैसे कि समर्थ होते हुये भी रामचन्द्र ने लोकापवाद के भय से पतिव्रता सीता का भी परित्याग किया, और अपवाद लगाने वाले धोबी के लिये कभी थोड़ा भी दण्ड नहीं दिया ।

शक्तेनापि हि न धृतो दण्डोऽल्पो रजके क्वचित् ।
ज्ञानविज्ञानसंपन्न-राजदत्ताभयोऽपि च ॥ १३५ ॥
समक्षं वक्ति न भयाद्राज्ञो गुर्वपि दूषणम् ।
स्तुतिप्रिया हि वै देवा विष्णुमुख्या इति श्रुतिः ॥ १३६ ॥

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२२

शुक्रनीतिः

किं पुनर्मनुजां नित्यं निंदाजः क्रोध इत्यतः ।
राजा सुभागदंडी स्यात्सुक्षमी रंजकः सदा ॥ १३७ ॥

ज्ञान-विज्ञान से संपन्न राजा के द्वारा अभय-दान पाने पर भी कोई भी व्यक्ति राजा के भय से उसके भारी दोष को उसके सामने नहीं कहता है। क्योंकि—ऐसा सुना जाता है कि विष्णु आदि देवताओं को भी स्तुति प्रिय लगती है तब फिर मनुष्यों की क्या बात है। और यह नित्य नियम है कि—क्रोध निन्दा से उत्पन्न होता है, इस कारण से राजा को उचित रीति से दण्ड देनेवाला, भली भांति सहन करनेवाला, सदा प्रजा का मनोरंजन करनेवाला होना चाहिये ।

यौवनं जीवितं वित्तं छाया लक्ष्मीश्च स्वामिता ।
चञ्चलानि षडेतानि ज्ञात्वा धर्मरतो भवेत् ॥ १३८ ॥

१. यौवन (जवानी), २. जीवन, ३. धन, ४. छाया, ५. लक्ष्मी, ६. प्रभुत्व, ये ६ चञ्चल होते हैं, अतः यह जानकर राजा को धर्म में रत होना चाहिये ।

अदानेनापमानेन छलाच्च कटुवाक्यतः ।
राज्ञः प्रबलदण्डेन नृपं मुंचति वै प्रजा ॥ १३६ ॥

राजा के दान न करने से, अपमान से, छल से, कटुवचन से, प्रबल दण्ड से प्रजा उसको छोड़ देती है ।

अतिभीरुमतिदीर्घसूत्रं चातिप्रमादिनम् ।
व्यसनाद्विषयाक्रान्तं न भजन्ति नृपं प्रजाः ॥ १४० ॥

अत्यन्त भीरु ( डरपोक ), अत्यन्त दीर्घसूत्र ( धीरे २ कार्य करनेवाले ), अत्यन्त प्रमादी ( असावधान ) और व्यसन होने से विषयों ( भोगों ) में आसक्त रहनेवाले राजा की प्रजा सेवा नहीं करती है । ( अर्थात् त्याग देती है ) ।

विपरीतगुणैरेभिः सान्वया रज्यते प्रजा ।

इनसे विपरीत गुणवाले राजा से अपने वंश के साथ २ सारी प्रजा प्रसन्न रहती है ।

एकस्तनोति दुष्कीर्त्तिं दुर्गुणः संघशो न किम् ॥ १४१ ॥
मृगयाऽक्षास्तथा पानं गर्हितानि महीभुजाम् ।
दृष्टास्तेभ्यस्तु विपदः पांडुनैषधवृष्णिषु ॥ १४२ ॥

एक भी दुर्गुण दुष्कीर्त्ति को फैला देती है तो क्या समूह रूप से होने पर न फैलावेंगी अर्थात् फैलावेंगी ही । मृगया ( शिकार खेलना ), अक्ष ( जुआ खेलना ) और मद्यपान करना ये तीनों राजाओं के लिये निन्दित हैं, क्योंकि मृगया से पाण्डु की, जूए से नल की और मद्यपान से वृष्णियों (यदुकुलवालों) की विपत्ति देखी गयी है ।

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प्रथमोऽध्यायः २३

कामक्रोधस्तथा मोहो लोभो मानो मदस्तथा ।
षड्वर्गमुत्सृजेदेनमस्मिंस्त्यक्ते सुखी नृपः ॥ १४३ ॥
काम, क्रोध, मोह, लोभ, मान, मद, इनकी 'षड्वर्ग' संज्ञा है। इनका परित्याग करना चाहिये। क्योंकि इनके परित्याग से राजा सुखी होता है।

दण्डक्यो नृपतिः कामात्क्रोधाच्च जनमेजयः ।
लोभाद्वैलस्तु राजर्षिर्मोहाद्वातापिरासुरः ॥ १४४ ॥
पौलस्त्यो राक्षसो मानान्मदाद्दम्भोद्भवो नृपः ।
प्रयाता निधनं ह्येते शत्रुषद्वर्गमाश्रिताः ॥ १४५ ॥
काम से दण्डक्य राजा, क्रोध से जनमेजय, लोभ से राजर्षि ऐल ( इळा के पुत्र ), मोह से वातापि नामक असुर, मान से पुलस्त्यवंशी रावण, मद से दम्भोद्भव नामक राजा का विनाश हुआ, क्योंकि इन सबों ने शत्रु के समान षड्वर्ग का आश्रय लिया था।

शत्रुषड्वर्गमुत्सृज्य जामदग्न्यः प्रतापवान् ।
अंबरीषो महाभागो बुभुजाते चिरं महीम् ॥ १४६ ॥
शत्रुतुल्य इस षड्वर्ग को छोड़ देने से जमदग्नि के पुत्र प्रतापी परशुरामजी एवं महाराज अम्बरीष इन दोनों ने बहुत काल तक पृथ्वी का भोग किया ( राज्य किया )।

वर्धयंन्निह धर्मार्थौ सेवितौ सद्भिरादरात् ।
निगृहीतेंद्रियग्रामः कुर्वीत गुरुसेवनम् ॥ १४७ ॥
इस संसार में राजा सज्जनों के द्वारा सादर सेवित धर्म और अर्थ को बढ़ाता हुआ, अपने इन्द्रियों को वश में करता हुआ गुरु ( श्रेष्ठ, उपदेशक, माता-पिता आदि ) जनों का सेवन करै ।

शास्त्राय गुरुसंयोगः शास्त्रं विनयवृद्धये ।
विद्याविनीतो नृपतिः सतां भवति संमतः ॥ १४८ ॥
क्योंकि गुरुओं की सेवा से शास्त्र-ज्ञान होता है और शास्त्र-ज्ञान से विनय की वृद्धि होती है। अतः विद्या से उत्पन्न विनय से युक्त ही राजा सज्जनों द्वारा प्रशंसित होता है।

प्रेर्यमाणोप्यसद्वृत्तैर्नाकार्येषु प्रवर्तते ।
श्रुत्या स्मृत्या लोकतश्च मनसा साधु निश्चितम् ॥ १४९ ॥
यत्कर्मधर्मसंज्ञं तद्व्यवस्यति च पंडितः ।
आददानः प्रतिदिनं कलाः सम्यङ् महीपतिः ॥ १५० ॥
बुरे आचरण करनेवाले लोगों के प्रेरणा करने पर भी अच्छे-बुरे का विचार रखनेवाला समझदार राजा बुरे कार्य करने में प्रवृत्त नहीं होता है क्योंकि वह