शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context२० | शुक्रनीतिः
चित रोककर पर-लोक और इस लोक में सुख पाने के लिये अपने आचरण को उचित रीति से करे।
दुष्टनिग्रहणं दानं प्रजायाः परिपालनम् ।
यजनं राजसूयादेः कोशानां न्यायतोऽर्जनम् ॥ १२३ ॥
करदीकरणं राज्ञां रिपूणां परिमर्द्दनम् ।
भूमेरुपार्जनं भूयो राजवृत्तं तु चाष्टधा ॥ १२४ ॥
आठ प्रकार के राजा के व्यवहार का निर्देश— १ दुष्टों का निग्रह करना, २ दान देना, ३ प्रजा का परिपालन, ४ राजसूयादि यज्ञ करना, ५ न्यायपूर्वक कोश ( खजाना ) बढ़ाना, ६ राजाओं से कर वसूल करना, ७ शत्रुओं का मान मर्द्दन करना, ८ बार बार राज्य को बढ़ाना, ये ८ प्रकार के राजाओं के वृत्त ( आचरण ) हैं।
न वर्धितं बलं यैस्तु न भूपाः करदीकृताः ।
न प्रजाः पालिताः सम्यक्ते वै षण्ढतिला नृपाः ॥ १२५ ॥
राजा के दोष-गुण का निर्देश— जिन राजाओं ने सेना नहीं बढ़ाई, राजाओं को कर देने वाला ( अधीन ) नहीं बनाया, प्रजाओं का भली भांति पालन नहीं किया, वे बांझतिल ( तेल-रहित तिल ) के समान तुच्छ कहलाते हैं।
प्रजा सूद्विजते यस्माद्यत्कर्म परिनिंदति ।
त्यज्यते धनिकैर्यस्तु गुणिभिस्तु नृपाधमः ॥ १२६ ॥
प्रजा जिससे उद्विग्न हो उठती है और जिसके कर्मों की निन्दा करती है और जिसे धनिक तथा गुणी लोग त्याग देते हैं वह राजा नृपाधम कहलाता है।
नटगायकगणिकामल्लषण्ढालपजातिषु ।
योऽतिसक्तो नृपो निन्द्यः स हि शत्रुमुखे स्थितः ॥ १२७ ॥
नट, गवैया, वेश्या, पहलवान, जनखा तथा नीच जाति वालों में अत्यन्त आसक्ति रखने वाला राजा निन्द्य कहलाता है। और वह शत्रु के मुख में पड़ जाता है।
बुद्धिमंतं सदा द्वेष्टि मोदते वंचकैः सह ।
स्वदुर्गुणं न वै वेत्ति स्वात्मनाशाय सो नृपः ॥ १२८ ॥
जो राजा सदा बुद्धिमानों से द्वेष रखता है और वंचकों से खुश रहता है एवं अपने दुर्गुणों को नहीं समझता है वह अपना नाश करने के लिये कारण बन जाता है।
नापराधं हि क्षमते प्रदंडो धनहारकः ।