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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 96 of 526

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Page 96

१० | शुक्रनीतिः

फल देनेवाली हो जाती है। जैसे—दान से राजा बलि बाँधे गये और राजा हरिश्चन्द्र को भी डोम के यहां नौकरी करनी पड़ी ॥

भवतीष्टं सत्क्रिययाऽनिष्टं तद्विपरीतया ।
शास्त्रतः सदसज्ज्ञात्वा त्यक्त्वाऽसत्सत्समाचरेत् ॥ ५९ ॥

अच्छे कार्यों से अच्छा फल होता है, उससे विपरीत (बुरे) कार्यों से बुरा फल होता है अतः शास्त्र द्वारा अच्छे बुरे कार्यों का ज्ञान प्राप्त कर बुरे का त्याग तथा अच्छे का ग्रहण करना चाहिये ॥

कालस्य कारणं राजा सदसत्कर्मणस्त्वतः ।
स्वक्रौर्योद्यतदण्डाभ्यां स्वधर्मे स्थापयेत् प्रजाः ॥ ६० ॥

सत् (अच्छा) तथा असत् (बुरा) कर्म को करानेवाले काल का भी कारण (विधाता) राजा होता है। अतः राजा अपनी क्रूरता से तथा दण्ड देने के लिये उद्यत रह कर प्रजाओं को अपने २ धर्म पर स्थिर रक्खे ॥

स्वाम्यमात्यसुहृत्कोशराष्ट्रदुर्गबलानि च ।
सप्तांगमुच्यते राज्यं तत्र मूर्धा नृपः स्मृतः ॥ ६१ ॥

राजा के ७ अङ्गों का निर्देश—१ राजा, २ मन्त्री, ३ मित्र, ४ कोश (खजाना), ५ राष्ट्र (देश), ६ दुर्ग (किला), ७ सेना, ये राज्य के ७ अङ्ग कहलाते हैं। इनमें राजा को शिर माना गया है ॥

दृगमात्यः सुहृच्छ्रोत्रं मुखं कोशो बलं मनः ।
हस्तौ पादौ दुर्गराष्ट्रं राज्यांगानि स्मृतानि हि ॥ ६२ ॥

और मन्त्री नेत्र, मित्र-कर्ण, कोश-मुख, बल (सैन्य) मन, दुर्ग-दोनों हाथ, राष्ट्र दोनों पैर इस भाँति से राज्य के अङ्ग माने गये हैं ॥

अंगानां क्रमशो वक्ष्ये गुणान् भूतिप्रदान् सदा ।
यैर्गुणैस्तु सुसंयुक्ता वृद्धिमन्तो भवन्ति हि ॥ ६३ ॥

अब सदा ऐश्वर्य देनेवाले अङ्गों के उन गुणों का क्रमशः वर्णन करूँगा। जिनसे भली-भांति युक्त होने पर राजा लोग अभ्युदयशाली हो जाते हैं ॥

राजाऽस्य जगतो हेतुर्वृद्धयै वृद्धाभिसंमतः ।
नयनानन्दजनकः शशांक इव तोयधेः ॥ ६४ ॥

'इस जगत् के अभ्युदय (वृद्धि) का कारण राजा है, जो प्रजाओं के नेत्रों को आनन्द देनेवाला है। जैसे चन्द्रमा-समुद्र की वृद्धि में कारण है।' ऐसा वृद्धों का मत है ॥

यदि न स्यान्नरपतिः सम्यङ् नेता ततः प्रजाः ।
अकर्णधारा जलधौ विप्लवेतेह नौरिव ॥ ६५ ॥

यदि लोक में राजा उत्तम रीति से नेता (प्रजाओं को अपने २ धर्म