शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in contextप्रथमोऽध्यायः
धर्म की प्रशंसा—स्वधर्म-पालन करने के बिना सुख नहीं होता है और अपने धर्म का पालन करना परम तप है। अतः जिसने स्वधर्म-पालन रूप तप को सदा बढ़ाया है, संसार में उसके देवता लोग भी किङ्कर हो जाते हैं फिर मनुष्यों के विषय में क्या कहना है ॥
सुदण्डैर्धर्मनिरताः प्रजाः कुर्यान्महाभयैः ॥ २५ ॥
नृपः स्वधर्मनिरतो भूत्वा तेजःक्षयोऽन्यथा ।
राजा अपने धर्म में रत होकर अत्यन्त भयदायक दण्डों के द्वारा प्रजाओं को अपने २ धर्म में रत रक्खे। यदि ऐसा नहीं करता है तो उसका तेज क्षीण हो जाता है ॥
अभिषिक्तोऽनभिषिक्तो नृपत्वं तु यदाप्नुयात् ॥ २६ ॥
बुद्ध्या बलेन शौर्येण ततो नीत्याऽनुपालयन् ।
प्रजाः सर्वाः प्रतिदिनमच्छिद्रे दंडधृक् सदा ॥ २७ ॥
जिसका अभिषेक हुआ है या नहीं हुआ है, ऐसा राजा जब राज-पदवी को धारण करे तब वह बुद्धि, बल, शूरता तथा नीति से प्रतिदिन सभी प्रजाओं का पालन करता हुआ स्वयं छिद्र (दोष) रहित होकर दण्ड को धारण करे ॥
नित्यं बुद्धिमतोऽप्यर्थः स्वल्पकोऽपि विवर्धते ।
तिर्यञ्चोऽपि वशं यांति शौर्यनौतिबलैर्धनैः ॥ २८ ॥
बुद्धिमान राजा का थोड़ा भी धन नित्य वृद्धि को प्राप्त होता है। और उसकी शूरता, नीति, बल तथा धन से तिर्यग्योनि के सर्पादि भी उसके वश में हो जाते हैं ॥
सात्त्विकं राजसं चैव तामसं त्रिविधं तपः ।
यादृक्तपति योऽत्यर्थं तादृग् भवति वै नृपः ॥ २९ ॥
सात्त्विकादि गुण भेद से राजा के तीन भेद—सात्त्विक, राजस तथा तामस भेद से तप तीन प्रकार का होता है। अतः जो राजा जिस प्रकार का तप करता है उसके अनुसार वह सात्त्विक, राजस अथवा तामस गुणवाला होता है ॥
यो हि स्वधर्मनिरतः प्रजानां परिपालकः ।
यष्टा च सर्वयज्ञानां नेता शत्रुगणस्य च ॥ ३० ॥
दानशौण्डः क्षमी शूरो निःस्पृहो विषयेष्वपि ।
विरक्तः सात्त्विकः स हि नृपोऽन्ते मोक्षमन्वियात् ॥ ३१ ॥
जो राजा अपने धर्म में निरत, प्रजाओं का पालक, सम्पूर्ण यज्ञों का करने वाला, शत्रुगणों को जीतनेवाला, दानवीर, क्षमावान, शूर, इन्द्रियों के