शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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शुक्रनीतिः
किं पुनर्मनुजां नित्यं निंदाजः क्रोध इत्यतः ।
राजा सुभागदंडी स्यात्सुक्षमी रंजकः सदा ॥ १३७ ॥
ज्ञान-विज्ञान से संपन्न राजा के द्वारा अभय-दान पाने पर भी कोई भी व्यक्ति राजा के भय से उसके भारी दोष को उसके सामने नहीं कहता है। क्योंकि—ऐसा सुना जाता है कि विष्णु आदि देवताओं को भी स्तुति प्रिय लगती है तब फिर मनुष्यों की क्या बात है। और यह नित्य नियम है कि—क्रोध निन्दा से उत्पन्न होता है, इस कारण से राजा को उचित रीति से दण्ड देनेवाला, भली भांति सहन करनेवाला, सदा प्रजा का मनोरंजन करनेवाला होना चाहिये ।
यौवनं जीवितं वित्तं छाया लक्ष्मीश्च स्वामिता ।
चञ्चलानि षडेतानि ज्ञात्वा धर्मरतो भवेत् ॥ १३८ ॥
१. यौवन (जवानी), २. जीवन, ३. धन, ४. छाया, ५. लक्ष्मी, ६. प्रभुत्व, ये ६ चञ्चल होते हैं, अतः यह जानकर राजा को धर्म में रत होना चाहिये ।
अदानेनापमानेन छलाच्च कटुवाक्यतः ।
राज्ञः प्रबलदण्डेन नृपं मुंचति वै प्रजा ॥ १३६ ॥
राजा के दान न करने से, अपमान से, छल से, कटुवचन से, प्रबल दण्ड से प्रजा उसको छोड़ देती है ।
अतिभीरुमतिदीर्घसूत्रं चातिप्रमादिनम् ।
व्यसनाद्विषयाक्रान्तं न भजन्ति नृपं प्रजाः ॥ १४० ॥
अत्यन्त भीरु ( डरपोक ), अत्यन्त दीर्घसूत्र ( धीरे २ कार्य करनेवाले ), अत्यन्त प्रमादी ( असावधान ) और व्यसन होने से विषयों ( भोगों ) में आसक्त रहनेवाले राजा की प्रजा सेवा नहीं करती है । ( अर्थात् त्याग देती है ) ।
विपरीतगुणैरेभिः सान्वया रज्यते प्रजा ।
इनसे विपरीत गुणवाले राजा से अपने वंश के साथ २ सारी प्रजा प्रसन्न रहती है ।
एकस्तनोति दुष्कीर्त्तिं दुर्गुणः संघशो न किम् ॥ १४१ ॥
मृगयाऽक्षास्तथा पानं गर्हितानि महीभुजाम् ।
दृष्टास्तेभ्यस्तु विपदः पांडुनैषधवृष्णिषु ॥ १४२ ॥
एक भी दुर्गुण दुष्कीर्त्ति को फैला देती है तो क्या समूह रूप से होने पर न फैलावेंगी अर्थात् फैलावेंगी ही । मृगया ( शिकार खेलना ), अक्ष ( जुआ खेलना ) और मद्यपान करना ये तीनों राजाओं के लिये निन्दित हैं, क्योंकि मृगया से पाण्डु की, जूए से नल की और मद्यपान से वृष्णियों (यदुकुलवालों) की विपत्ति देखी गयी है ।