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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 105 of 526

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Page 105

प्रथमोऽध्यायः १९

अत्यन्त मद्य पीने वाले की बुद्धि का निश्चय लोप हो जाता है। और मात्रा के साथ थोड़ा मद्य पीने वाले की प्रतिभा, बुद्धि में उज्ज्वलता, धीरता, चित्त की स्थिरता बढ़ती है। और इससे भिन्न मात्रा से अधिक पीने से मद्य शरीर को नष्ट कर देता है। और मद्य के समान काम तथा क्रोध भी चित्त को अत्यन्त मतवाला बना देने वाला होता है अतः इन दोनों को भी यथोचित रीति से प्रयोग करना उचित होता है।

कामः प्रजापालने च क्रोधः शत्रुनिबर्हणे।
सेनासंधारणे लोभो योज्यो राज्ञा जयार्थिना ॥ ११७ ॥

कामादि पर जय-प्राप्ति की इच्छा रखने वाले राजा के लिये उचित है कि वह—प्रजा-पालन के लिये काम (कामना) का, शत्रु-नाश के लिये क्रोध का, सैन्य रखने में लोभ का प्रयोग करे।

परस्त्री-संगमे कामो लोभो नान्यधनेषु च ।
स्वप्रजादण्डने क्रोधो नैव धार्यो नृपैः कदा ॥ ११८ ॥

राजा कभी भी पर-स्त्री के साथ सङ्ग करने के लिये काम को, अन्य के धन की प्राप्ति में लोभ को, अपनी प्रजा को दण्ड देने में क्रोध को न करे।

किमुच्येत कुटुम्बीति परस्त्रीसंगमान्नरः ।
स्वप्रजादण्डनाच्छूरो धनिकोऽन्यधनैश्च किम् ॥ ११९ ॥

पर-स्त्री के साथ संग करने वाला मनुष्य क्या कुटुम्बी ? अपनी प्रजा को दण्ड देने से क्या शूर-वीर और दूसरे के धन को लेने से मनुष्य क्या धनी कहला सकता है ? अर्थात् कभी नहीं कहला सकता है।

अरक्षितारं नृपतिं ब्राह्मणं चातपस्विनम् ।
धनिकं चाप्रदातारं देवा घ्नन्ति त्यजन्त्यधः ॥ १२० ॥

प्रजा की रक्षा नहीं करने वाले राजा को, तपस्या नहीं करने वाले ब्राह्मण को और दान नहीं देने वाले धनी को देवता लोग नष्ट कर देते हैं और अन्त में उन्हें नरक में गिरा देते हैं।

स्वामित्वं चैव दातृत्वं धनिकत्वं तपः-फलम् ।
एनसः फलमर्थित्वं दास्यत्वं च दरिद्रता ॥ १२१ ॥

राजा होना, दानी होना एवं धनी होना ये सब तप के फल हैं। और याचक होना, दास होना एवं दरिद्र होना ये सब पाप के फल हैं।

दृष्ट्वा शास्त्राण्यथात्मानं सन्नियम्य यथोचितम् ।
कुर्यान्नृपः स्ववृत्तं तु परत्रेह सुखाय च ॥ १२२ ॥

इससे राजा शास्त्रों को देखकर तदनुसार अपने मन को विषयों से यथो-