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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 95 of 526

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Page 95

प्रथमोऽध्यायः ९

यज्जायतेऽल्पक्रियया नृणां वापि महत्फलम् ।
तदपि प्राक्तनादेव केचित् प्रागिह कर्मजम् ॥ ५२ ॥
और कभी २ स्वल्प कर्म से ही मनुष्यों को जो अधिक फल की प्राप्ति दिखाई देती है वह प्राक्तन कर्म के वश से ही होती है, कोई २ आचार्य उसे पुरुषार्थ से हुआ ही मानते हैं ॥

वदन्तीहैव क्रियया जायते पौरुषं नृणाम् ।
सस्नेहवर्तिर्दीपस्य रक्षा वातात् प्रयत्नतः ॥ ५३ ॥
'मनुष्यों का जो पुरुषार्थ फलप्राप्ति के लिये होता है उसमें इसी जन्म के अर्थात् तात्कालिक कर्म ही कारण होता है। जैसे लोक में तैल तथा बत्ती से युक्त दीपक की हवा से रक्षा प्रयत्न करने से ही होती है' ऐसा कोई २ आचार्य कहते हैं ॥

अवश्यंभाविभावानां प्रतीकारो न चेद्यदि ।
दुष्टानां क्षपणं श्रेयो यावद्बुद्धिबलोदयैः ॥ ५४ ॥
यदि अवश्य होनेवाले कार्यों का प्रतीकार होना संभव न होता तो अपने बुद्धि तथा बल के अनुसार दुष्टों का नाश करना कल्याणकारक न होता अर्थात् पुरुषार्थ से दुर्बल भावी (होनहार) को मिटाया जा सकता है ॥

प्रतिकूलानुकूलाभ्यां फलाभ्यां च नृपोऽप्यतः ।
ईषन्मध्याधिकाभ्यां च त्रिधा दैवं विचिन्तयेत् ॥ ५५ ॥
इससे राजा प्रतिकूल तथा अनुकूल फल देनेवाले दैव (भाग्य) के थोड़ा, मध्यम तथा अधिक इन तीनों भेदों से तीन प्रकार का समझे ॥

रावणस्य च भीष्मादेर्वनभंगे च गोग्रहे ।
प्रातिकूल्यं तु विज्ञातमकस्माद्वानरान्नरात् ॥ ५६ ॥
रावण को अशोक-वाटिका का अकेले एक हनुमान् नामक वानर द्वारा ध्वंस होने से और अकेले एक नर (अर्जुन) द्वारा भीष्म आदि (दुर्योधन) को विराट नगर में गायों को पकड़ कर रख लेने से दैव की प्रतिकूलता ज्ञात हुई ॥

कालानुकूल्यं विस्पष्टं राघवस्यार्जुनस्य च ।
अनुकूले यदा दैवे क्रियाऽल्पा सुफला भवेत् ॥ ५७ ॥
और रामचन्द्र और अर्जुन के समय की अनुकूलता तो प्रगट ही है। अतः जब दैव अनुकूल रहता है तब थोड़ा भी पुरुषार्थ सफल हो जाता है ॥

महती सत्क्रियाऽनिष्फला स्यात् प्रतिकूलके ।
बलिर्दानेन संबद्धो हरिश्चन्द्रस्तथैव च ॥ ५८ ॥
और दैव प्रतिकूल रहने पर अत्यन्त अच्छी भी क्रिया (पुण्यकार्य) अनिष्ट