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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 104 of 526

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Page 104

३८ शुक्रनीतिः

द्यूत कर्म में अनभिज्ञ नल और युधिष्ठिर आदि राजाओं का द्यूत के द्वारा विशेष धन-नाश हुआ किन्तु द्यूत कर्म में निपुण लोगों को चालाकी से खेला हुआ द्यूत धन दिलाने में अत्यन्त समर्थ होता है।

स्त्रीणां नामापि संह्लादि विकरोत्येव मानसम् ।
किंपुनर्दर्शनं तासां विलासोल्लासितभ्रुवाम् ॥ ११० ॥

स्त्रियों का नाम लेना भी आह्लाद पैदा करके चित्त को काम-विकार से युक्त कर देता है। फिर विलासपूर्वक भौहों को नचाने वाली उन स्त्रियों का दर्शन करना क्यों नहीं मन को काम-विकार युक्त कर सकता है अर्थात् अवश्य कर सकता है।

रहःप्रचारकुशला मृदुगद्गदभाषिणी ।
कं न नारी वशीकुर्यान्नरं रक्तान्तलोचना ॥ १११ ॥

एकान्त में भेट करने में कुशल, कोमल तथा गद्गद वचन बोलने वाली एवं अनुराग युक्त कटाक्ष करने वाली स्त्री किस मनुष्य को वशीभूत नहीं कर सकती है अर्थात् सभी को वशीभूत कर सकती है।

मुनेरपि मनो वश्यं सरागं कुरुतेऽङ्गना ।
जितेंद्रियस्य का वार्ता किपुनश्चाजितात्मनाम् ॥ ११२ ॥

मन को सदा अपने अधीन रखने वाले मुनियों के भी मन को स्त्रियां काम-वासना से युक्त कर देती हैं, जब जितेन्द्रिय की यह दशा है तब इन्द्रियों को नहीं जीतने वाले कामियों के विषय में क्या बात की जाय। अर्थात् उनको तो अवश्य ही वशीभूत कर सकती हैं।

ध्यायच्छलन्तश्च बहवः स्त्रीषु नाशं गता अमी ।
इन्द्रदण्डक्यनहुषरावणाद्या नृपा अतः ॥ ११३ ॥

बहुत से लोग सदा परस्त्रियों में प्रेम करके नाश को प्राप्त हुये हैं जैसे—इन्द्र, दण्डक्य, नहुष और रावण आदि का उदाहरण प्रसिद्ध है।

अतत्परनरस्यैव स्त्री सुखाय भवेत्सदा ।
साहाय्यिनी गृह्यकृत्ये तां विनाऽन्या न विद्यते ॥ ११४ ॥

स्त्रियों में आसक्ति न रखने वालों के लिये ही स्त्री सदा सुख देने वाली होती है, क्योंकि गृह-कार्यों में उसके अलावा अन्य कोई दूसरी सहायता पहुँचाने वाली नहीं हो सकती है।

अतिमद्यं हि पिबतो बुद्धिलोपो भवेत्किल ।
प्रतिभां बुद्धिवैशद्यं धैर्य्यं चित्तविनिश्चयम् ॥ ११५ ॥
तनोति मात्रया पीतं मद्यमन्यद्विनाशकृत् ।
कामक्रोधौ मद्यतमौ नियोक्तव्यौ यथोचितम् ॥ ११६ ॥