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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 101 of 526

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Page 101

प्रथमोऽध्यायः १५

लोक में यह बात सिद्ध है कि अनिष्टकारक कारणों के उपदेशों को प्राप्त कर लेने पर भी कौन ऐसा व्यक्ति है जो उनको प्राप्त करने के लिये प्रयत्न करता है, अर्थात् कोई नहीं ॥

रज्यते सत्फले स्वान्तं दुष्फले नहि कस्यचित् ।
सदसद्बोधकान्येव दृष्ट्वा शास्त्राणि चाचरेत् ॥ ६० ॥

अच्छे फल देनेवाले कार्यों में मनुष्य का मन लगता है और बुरे फलवाले कार्यों में किसी का मन नहीं लगता है अतः सत् ( अच्छे ) तथा असत् (बुरे) कार्यों के बोधक शास्त्रों को देखकर तदनुसार आचरण करना चाहिये ॥

नयस्य विनयो मूलं विनयः शास्त्रनिश्चयात् ।
विनयस्येन्द्रियजयस्तद्युक्तः शास्त्रमृच्छति ॥ ६१ ॥

नीति का मूल विनय है, और शास्त्र में निश्चय होने से विनय होता है। विनय का मूल इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करना है अतः जो इन्द्रियजयी है वही शास्त्रज्ञान प्राप्त करता है ॥

आत्मानं प्रथमं राजा विनयेनोपपादयेत् ।
ततः पुत्रांस्ततोऽमात्यांस्ततो भृत्यांस्ततः प्रजाः ॥ ६२ ॥
परोपदेशकुशलः केवलो न भवेन्नृपः ।

अतः राजा सर्वप्रथम अपने को विनय से युक्त करे, तत्पश्चात् पुत्रों को, तदनन्तर मन्त्रियों को, उसके बाद भृत्यों को, अन्त में प्रजाओं को विनय से युक्त करे । राजा केवल दूसरों को उपदेश देने में कुशल न हो ॥

प्रजाधिकारहीनः स्यात् सगुणोपि नृपः कचित् ॥ ६३ ॥
न तु नृपविहीनाः स्युर्दुर्गुणा ह्यपि तु प्रजाः ।
यथा न विधवेन्द्राणी सधवा तु तथा प्रजाः ॥ ६४ ॥

कहीं-कहीं गुणवान राजा भी प्रजा के ऊपर अधिकार से हीन हो जाता है किन्तु दुर्गुणवाली भी प्रजा राजा से हीन नहीं होती है। जैसे कभी इन्द्राणी बिना इन्द्र के विधवारूप में नहीं रह सकती है वैसे ही बिना राजा के प्रजा भी नहीं रह सकती है ॥

भ्रष्टश्रीः स्वामिता राज्ये नृप एव न मन्त्रिणः ।
तथाऽविनीतदायादोऽदांताः पुत्रादयोपि च ॥ ६५ ॥

राजा ही भ्रष्टश्री होता है तथा स्वामित्व रखता है। मन्त्री में उक्त बातें नहीं होती हैं तथा अविनययुक्त दायाद ( भाई-पट्टीदार ) वर्ग एवं इन्द्रियों का दमन नहीं कर सकने वाले पुत्रादि के कारण से भी राजा राज्य भ्रष्ट एवं प्रभुत्व से हीन हो जाता है ॥