शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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शुक्रनीतिः
विषयों की तरफ मन नहीं लगानेवाला, वैराग्य-युक्त होता है वह 'सात्विक' कहलाता है। और ऐसा ही राजा अन्त में मोक्ष को प्राप्त करता है ॥
विपरीतस्तामसः स्यात् सोऽन्ते नरकभाजनः ।
निर्घृणश्च मदोन्मत्तो हिंसकः सत्यवर्जितः ॥ ३२ ॥
और उक्त इन गुणों से विपरीत गुणवाला जो राजा होता है वह 'तामस' कहलाता है और वह अन्त में नरक को प्राप्त करता है तथा दयारहित, मद से उन्मत्त, हिंसा करनेवाला, सत्य से रहित होता है ॥
राजसो दांभिको लोभी विषयी वंचकश्शठः ।
मनसाऽन्यश्च वचसा कर्मणा कलहप्रियः ॥ ३३ ॥
नीचप्रियः स्वतंत्रश्च नीतिहीनश्छलांतरः ।
स तिर्यक्त्वं स्थावरत्वं भविताऽन्ते नृपाधमः ॥ ३४ ॥
जो दाम्भिक, लोभी, विषयी, ठग, शठ, मन से अन्य बाहर से अन्य व्यवहार करनेवाला, वाणी और कर्म से कलहप्रिय, नीचों से प्रेम रखने वाला, स्वतन्त्र, नीति से हीन, भीतर छल रखनेवाला होता है ऐसा राजा 'राजस' कहलाता है। और वह मरने पर तिर्यग्योनि ( सर्पादि योनि ) अथवा स्थावर-योनि ( वृक्षादि योनि ) को प्राप्त करता है ॥
देवांशान् सात्त्विको भुंक्ते राक्षसांशांस्तु तामसः ।
राजसो मानवांशांस्तु सत्त्वे धार्यं मनो यतः ॥ ३५ ॥
सात्त्विक राजा देवता के अंश को, तामस राक्षसों के अंश को तथा राजस मनुष्यों के अंश को भोगता है। अतः सत्त्व गुण में मन को लगाना चाहिये ॥
सत्त्वस्य तमः साम्यान्मानुषं जन्म जायते ।
यद्यदाश्रयते मर्त्यस्तत्तुल्यो दिष्टतो भवेत् ॥ ३६ ॥
सत्त्व गुण तथा तमो गुण की समता से मनुष्य का जन्म मिलता है। और भाग्यवश—जैसे गुणों का मनुष्य आश्रय लेता है उसी के अनुसार वह होता है ॥
कर्मैव कारणं चात्र सुगतिं दुर्गतिं प्रति ।
कर्मैव प्राक्तनमपि क्षणं कि कोऽस्ति चाक्रियः ॥ ३७ ॥
सुगति-दुर्गति भेद से प्राक्तन कर्म की कारणता—इस संसार में सुगति और दुर्गति के प्रति कर्म ही कारण होता है। वह भी प्राक्तन होता है। अर्थात् पूर्व कर्म ही प्रारब्ध कर्म कहलाता है। क्या कोई जीव बिना कर्म किये क्षण भर भी रह सकता है अर्थात् नहीं रह सकता है ॥
न जात्या ब्राह्मणश्चात्र क्षत्रियो वैश्य एव न ।
न शूद्रो न च वै म्लेच्छो भेदिता गुणकर्मभिः ॥ ३८ ॥