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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३१

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३१

सवयःसारवेषोञ्चशस्त्रास्त्रं तु पृथक् शतम् ।
लघुनालिकयुक्तानां पदातीनां शतत्रयम् ॥ २४ ॥
अशीत्यश्वांन् रथं चैकं बृहन्नालद्वयं तथा ।
उष्ट्रान् दश गजौ द्वौ तु शकटौ षोडषर्षभान् ॥ २५ ॥
तथा लेखकषट्कं हि मन्त्रित्रितयमेव च ।
धारयेन्नृपतिः सम्यग् वत्सरे लक्षकर्षभाक् ॥ २६ ॥

एक वर्ष में एक लक्ष १०००००) मुद्रा की आयवाला राजा एक सी अवस्था के युवावस्थावाले दृढ तथा उत्तम वेष ( वर्दी-कवच ) वाले, ऊंचे कद के, अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित ऐसे १०० पैदल सिपाहियों की एक पृथक् टुकड़ी और बन्दूकों से युक्त ३०० पैदल सिपाहियों की एक पृथक् टुकड़ी तथा ८० घोड़े, १ रथ, २ तोपें, १० ऊंट, २ हाथी, २ बैलगाड़ी, १६ बैल, ६ लेखक, ३ मन्त्री, इन सबों को एक सेना के अन्दर अच्छी तरह से रक्खे ।

सम्भारदानभोगार्थं धनं सार्धसहस्रकम् ।
लेखकार्थे शतं मासि मन्त्र्यर्थे तु शतत्रयम् ॥ २७ ॥
त्रिशतं दारपुत्रार्थे विद्वदर्थे शतद्वयम् ।
साद्यश्वपदगार्थे हि राजा चतुःसहस्रकम् ॥ २८ ॥
गजोष्ट्रवृषनालार्थं व्ययीकुर्याच्चतुःशतम् ।
शेषं कोशे धनं स्थाप्यं राज्ञा सार्धसहस्रकम् ॥ २९ ॥
प्रतिवर्षं स्ववेशार्थं सैनिकेभ्यो धनं हरेत् ।

प्रतिमास में व्यय करने का प्रमाण—और १ लाख मुद्रा का सालभर में निम्न रीति से व्यय करे जैसे—सामग्री, दान तथा स्वयं भोग करने के लिये प्रति मास १५००) डेढ़ हजार, लेखकों के लिये १००) एक सौ, मन्त्रियों के लिये ३००) तीन सौ, स्त्री-पुत्र के लिये ३००) तीन सौ विद्वानों के समान के लिये २००) दो सौ घुड़सवार, तथा पैदल सिपाहियों के लिये ४०००) चार हजार, ऊंट, बैल तथा बन्दूक चलानेवाले सिपाही—इनके लिये ४००) चार सौ रुपये प्रतिमास व्यय करे । और १५००) प्रतिवर्ष अपनी २ वर्दी बनवाने के लिये सैनिकों को दे । शेष धन को कोश में राजा सुरक्षित रक्खे ।

लोहसारमयश्चक्रसुगमो मञ्चकासनः ॥ ३० ॥
स्वान्दोलायितरूढस्तु मध्यमासनसारथिः ।
शस्त्रास्त्रसन्धायुदर इष्टच्छायो मनोरमः ॥ ३१ ॥
एवंविधो रथो राज्ञा रच्यो नित्यं सदश्वकः ।

राजा के रथ का वर्णन—कान्तिसार उत्तम लौह का बना हुआ, अत्यन्त सुगमता से फिरने वाले चक्रों से युक्त, शय्या के समान सुखपूर्वक बैठने के लिये

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३३२ | शुक्रनीतिः

स्थान वाला, एवं जिसमें शरीर स्वयम् हिंडोले पर बैठने के समान आन्दोलित हो जाय (अर्थात् सुन्दर कमानीदार), और जिसके आगे की तरफ मध्य भाग में सारथी के बैठने का स्थान हो तथा जिसके अन्दर शस्त्र तथा अस्त्र भरे पड़े हों एवं मनोनुकूल छाया हुआ—इस प्रकार का बना हुआ मनोरम रथ सदा रक्खे, जिसमें अच्छे २ घोड़े जुते हों, राजा सदा सैन्य में रक्खे ।

नीलतालुर्नीलजिह्वो वक्रदन्तो ह्यदन्तकः ॥ ३२ ॥
दीर्घद्वेषी क्रूरमदस्तथा पृष्ठविधूनकः ।
दशाष्टोननखो मन्दो भुविशोधनपुच्छकः ॥ ३३ ॥
एवंविधोऽनिष्टगजो विपरीतः शुभावहः ।

**अनिष्ट तथा शुभप्रद गज का लक्षण—**नील तालु और जीभवाला, टेढ़े दाँतोंवाला या बिना दाँत का, दीर्घ काल तक द्वेष रखनेवाला, विश्रृङ्खल भाव से मद बहानेवाला, पीठ हिलानेवाला, १८ से कम नखवाला, मन्दगामी और पृथ्वी तक लटकनेवाली पूंछ से युक्त ऐसा हाथी अनिष्ट फल देनेवाला होता है एवं इससे विपरीत लक्षणों से युक्त शुभ फल देनेवाला होता है ।

भद्रो मन्द्रो मृगो मिश्रो गजो जात्या चतुर्विधः ॥ ३४ ॥

**हाथी के ४ प्रकार—**१. भद्र, २. मन्द्र, ३. मृग और ४. मिश्र भेद से गज की ४ जातियां होती हैं ।

मध्वाभदन्तः सबलः समाङ्गो वर्तुलाकृतिः ।
सुमुखोऽवयवश्रेष्ठो ज्ञेयो भद्रगजः सदा ॥ ३५ ॥

**भद्रगज के लक्षण—**मधु (शहद) के समान आभा से युक्त दाँतोंवाला, बलवान, अनुरूप अङ्गोंवाला, गोल आकारवाला, सुन्दर मुख एवं श्रेष्ठ अङ्गों-पाङ्गोंवाला गज 'भद्र' संज्ञक सदा जानना चाहिये ।

स्थूलकुक्षिः सिंहदृक् च बृहत्त्वग्गलशुण्डकः ।
मध्यमावयवो दीर्घकायो मन्द्रगजः स्मृतः ॥ ३६ ॥

**मन्द्रगज के लक्षण—**जिसके पेट स्थूल, आँखें सिंह के समान, चमड़ा मोटा एवं गला और शूंढ लम्बी, अवयव मध्यम आकार का एवं शरीर दीर्घ हो उसे 'मन्द्र' संज्ञक गज समझना चाहिये ।

तनुकण्ठदन्तकर्णशुण्डः स्थूलाक्ष एव हि ।
सुह्रस्वाधरमेढ्रस्तु वामनो मृगसंज्ञकः ॥ ३७ ॥

**मृगगज के लक्षण—**जिसके कण्ठ, दांत, कान एवं शूंढ पतले हों और आँखें स्थूल, ओष्ठ और लिङ्ग अत्यन्त छोटे तथा शरीर का आकार छोटा हो, उसे 'मृग' संज्ञक गज जानना चाहिये ।

एषां लक्षणैर्विमिश्रितो गजो मिश्र इति स्मृतः ।

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् १३३

भिन्नं भिन्नं प्रमाणं तु त्रयाणामपि कीर्तितम् ॥ ३८ ॥
मिश्रगज के लक्षण— इन सबों के कुछ २ लक्षण जिसमें मिलते हों उसे 'मिश्र' संज्ञक गज समझना चाहिये । उक्त तीनों गजों के प्रमाण भी भिन्न २ कहे हुये हैं ।

गजमाने ह्यङ्गुलं स्यादाष्टभिस्तु यवोदरैः ।
चतुर्विंशत्यङ्गुलैस्तैः करः प्रोक्तो मनीषिभिः ॥ ३९ ॥
गजमान में अंगुलादिकों का प्रमाण— गजों को नापने के लिये जौ के उदर भाग की चौड़ाई के समान चौड़ाई १ अंगुल की होती है । ऐसे २४ अंगुलों का १ हाथ विद्वान लोग कहते हैं ।

सप्तहस्तोन्नतिर्भद्रे ह्यष्टहस्तप्रदीर्घता ।
परिणाहो दशकर उदरस्य भवेत् सदा ॥ ४० ॥
भद्रगज के शरीर का मान— 'भद्रगज' की ऊंचाई ७ हाथ की, लम्बाई ८ हाथ की तथा पेट का विस्तार १० हाथ का सदा होता है ।

प्रमाणं मन्दमृगयोर्हस्तहीनं क्रमाद्गतः ।
कथितं दैर्घ्यसाम्यं तु मुनिभिर्भद्रमन्द्रयोः ॥ ४१ ॥
मन्द्र तथा मृग गज का मान— मन्द्र और मृग की ऊंचाई का प्रमाण भद्रगज से क्रम से १-१ हाथ छोटा होता है अर्थात् मन्द्र की ऊंचाई ६ हाथ की एवं मृग की ५ हाथ की होती है किन्तु मुनियों ने भद्र और मन्द्र की लम्बाई समान ही बताई है ।

बृहद्भ्रूगण्डफालस्तु धृतशीर्षगतिः सदा ।
गजः श्रेष्ठस्तु सर्वेषां शुभलक्षणसंयुतः ॥ ४२ ॥
सर्वश्रेष्ठ जिसके भौंह, गण्डस्थल तथा मस्तक बृहदाकार के हों एवं चाल सदा शीघ्रता से युक्त हो, ऐसा शुभ लक्षणों से युक्त हाथी सर्वश्रेष्ठ समझा जाता है ।

पञ्चयवाङ्गुलेनैव वाजिमानं पृथक् स्मृतम् ।
चत्वारिंशाङ्गुलमुखो वाजी यश्चोत्तमोत्तमः ॥ ४३ ॥
उत्तमोत्तम अश्व के लक्षण— घोडों का मान हाथियों के मान से भिन्न होता है । इसमें ५ जौ का १ अंगुल माना जाता है । जिसका मुख ४० अंगुल का होता है, वह घोड़ा 'उत्तमोत्तम' माना जाता है ।

षट्त्रिंशदङ्गुलमुखो ह्युत्तमः परिकीर्तितः ।
द्वात्रिंशदङ्गुलमुखो मध्यमः स उदाहृतः ॥ ४४ ॥
उत्तम तथा मध्यम अश्व के लक्षण— ३६ अंगुल का मुख जिसका होता है वह 'उत्तम' तथा ३२ अंगुल का मुख हो तो 'मध्यम' समझा जाता है ।

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३३४शुक्रनीतिः

अष्टाविंशत्यङ्गुलो यो मुखे नीचः प्रकीर्तितः।
वाजिनां मुखमानेन सर्वावयवकल्पना ॥ ४५ ॥

**नीच अश्व के लक्षण तथा अश्व के अवयवों की मान-कल्पना—**और जिसका मुख २८ अंगुल का होता है वह 'नीच' घोड़ा समझा जाता है। और घोड़ों के मुख के मान के द्वारा सम्पूर्ण अवयवों के मान की भी कल्पना की जाती है।

औच्चं तु मुखमानेन त्रिगुणं परिकीर्तितम् ।
शिरोमणि समारभ्य पुच्छमूलान्तमेव हि ॥ ४६ ॥
तृतीयांशाधिकं दैर्घ्यं मुखमानाच्चतुर्गुणम् ।
परिणाहस्तूदरस्य त्रिगुणस्त्र्यङ्गुलाधिकः ॥ ४७ ॥

**अश्व की ऊंचाई और लम्बाई का प्रमाण—**उक्त मुखमान से तिगुनी ऊंचाई कही हुई है। घोड़े की शिरोमणि भाग से लेकर पूंछ के मूल भाग तक की लम्बाई मुखमान से तृतीयांश अधिक चौगुनी होती है। और उदर का विस्तार ३ अंगुल अधिक तिगुना होता है।

साधारणमिदं मानमुच्यते विस्तरादथ ।
अष्टाविंशाङ्गुलमुखं पुरस्कृत्य यथा तथा ॥ ४८ ॥
शफोच्चं त्र्यङ्गुलं ज्ञेयं मणिबन्धोऽङ्गुलाधिकः ।

यह साधारण रूप से मान कहा गया, अब विस्तारपूर्वक कहा जा रहा है। यदि २८ अंगुल प्रमाण मुखवाला नीच संज्ञक अश्व हो तो उसके खुर की ऊंचाई तीन ३ अंगुल प्रमाण की होती है और मणिबन्ध अर्थात् खुर का ऊपरी भाग १ अंगुल अधिक अर्थात् ४ अंगुल प्रमाण का होता है।

चतुर्हस्ताङ्गुला जङ्घा त्र्यङ्गुलं जानु कीर्तितम् ॥ ४९ ॥
चतुर्दशाङ्गुलावूरू कूर्परान्तं स्मृतो बुधैः ।
अष्टत्रिंशाङ्गुलं ज्ञेयं स्कन्धान्तं कूर्परादितः ॥ ५० ॥

और जंघा ४ हस्त के अंगुल प्रमाण की, जानु ३ अंगुल प्रमाण का कहा कहा हुआ है। और कूर्पर के दूनी पर्यन्त दोनों ऊरु १४ अंगुल प्रमाण का पण्डितों ने कहा है। कूर्पर से लेकर स्कन्ध पर्यन्त ऊंचाई ३८ अंगुल की होती है।

प्रत्यगूरू मुखसमौ जङ्घोना पादमानतः ।
प्रोक्तोच्चता चाथ दैर्घ्यमुच्यते शास्त्रसङ्गतम् ॥ ५१ ॥

और पीछे के दोनों ऊरु मुख के समान अर्थात् २८ अंगुल प्रमाण के होते हैं। और पीछे की जंघा चौथाई मान से कम होती है। इस प्रकार से घोड़ों की ऊंचाई का वर्णन किया गया अब शास्त्र-संगत लम्बाई का वर्णन किया जा रहा है।