शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
Page 109 of 526
Read in contextप्रथमोऽध्यायः २३
कामक्रोधस्तथा मोहो लोभो मानो मदस्तथा ।
षड्वर्गमुत्सृजेदेनमस्मिंस्त्यक्ते सुखी नृपः ॥ १४३ ॥
काम, क्रोध, मोह, लोभ, मान, मद, इनकी 'षड्वर्ग' संज्ञा है। इनका परित्याग करना चाहिये। क्योंकि इनके परित्याग से राजा सुखी होता है।
दण्डक्यो नृपतिः कामात्क्रोधाच्च जनमेजयः ।
लोभाद्वैलस्तु राजर्षिर्मोहाद्वातापिरासुरः ॥ १४४ ॥
पौलस्त्यो राक्षसो मानान्मदाद्दम्भोद्भवो नृपः ।
प्रयाता निधनं ह्येते शत्रुषद्वर्गमाश्रिताः ॥ १४५ ॥
काम से दण्डक्य राजा, क्रोध से जनमेजय, लोभ से राजर्षि ऐल ( इळा के पुत्र ), मोह से वातापि नामक असुर, मान से पुलस्त्यवंशी रावण, मद से दम्भोद्भव नामक राजा का विनाश हुआ, क्योंकि इन सबों ने शत्रु के समान षड्वर्ग का आश्रय लिया था।
शत्रुषड्वर्गमुत्सृज्य जामदग्न्यः प्रतापवान् ।
अंबरीषो महाभागो बुभुजाते चिरं महीम् ॥ १४६ ॥
शत्रुतुल्य इस षड्वर्ग को छोड़ देने से जमदग्नि के पुत्र प्रतापी परशुरामजी एवं महाराज अम्बरीष इन दोनों ने बहुत काल तक पृथ्वी का भोग किया ( राज्य किया )।
वर्धयंन्निह धर्मार्थौ सेवितौ सद्भिरादरात् ।
निगृहीतेंद्रियग्रामः कुर्वीत गुरुसेवनम् ॥ १४७ ॥
इस संसार में राजा सज्जनों के द्वारा सादर सेवित धर्म और अर्थ को बढ़ाता हुआ, अपने इन्द्रियों को वश में करता हुआ गुरु ( श्रेष्ठ, उपदेशक, माता-पिता आदि ) जनों का सेवन करै ।
शास्त्राय गुरुसंयोगः शास्त्रं विनयवृद्धये ।
विद्याविनीतो नृपतिः सतां भवति संमतः ॥ १४८ ॥
क्योंकि गुरुओं की सेवा से शास्त्र-ज्ञान होता है और शास्त्र-ज्ञान से विनय की वृद्धि होती है। अतः विद्या से उत्पन्न विनय से युक्त ही राजा सज्जनों द्वारा प्रशंसित होता है।
प्रेर्यमाणोप्यसद्वृत्तैर्नाकार्येषु प्रवर्तते ।
श्रुत्या स्मृत्या लोकतश्च मनसा साधु निश्चितम् ॥ १४९ ॥
यत्कर्मधर्मसंज्ञं तद्व्यवस्यति च पंडितः ।
आददानः प्रतिदिनं कलाः सम्यङ् महीपतिः ॥ १५० ॥
बुरे आचरण करनेवाले लोगों के प्रेरणा करने पर भी अच्छे-बुरे का विचार रखनेवाला समझदार राजा बुरे कार्य करने में प्रवृत्त नहीं होता है क्योंकि वह