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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 94 of 526

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Page 94

८
: शुक्रनीतिः

पापकर्मणि पुण्ये वा कर्तुं शक्तो न चान्यथा ॥ ४५ ॥
मनुष्यों को पूर्वार्जित कर्मों के फल भोगने के योग्य जब जैसी बुद्धि उत्पन्न होती है तब उसके अनुसार पाप अथवा पुण्य कर्म करने में मनुष्य समर्थ होता है, अन्यथा असमर्थ रहता है ॥

बुद्धिरुत्पद्यते तादृग् यादृक्कर्मफलोदयः ।
सहायास्तादृशा एव यादृशी भवितव्यता ॥ ४६ ॥
जैसे कर्मों का फल उदय होता है उसी के अनुसार वैसी बुद्धि होती है तथा जैसी भवितव्यता (होनहार) होती है उसी के अनुसार वैसे सहाय (साथी) भी होते हैं ॥

प्राक्तनवशतः सर्वं भवत्येवेति निश्चितम् ।
तदोपदेशा व्यर्थाः स्युः कार्याकार्यप्रबोधकाः ॥ ४७ ॥
यदि यही निश्चित हो कि जो कुछ होता है वह सब प्राक्तन कर्म के अनुसार ही होता है तो 'यह कर्त्तव्य है और यह नहीं कर्त्तव्य है' इसके बोधक सभी उपदेश व्यर्थ हो जायेंगे ॥

धीमन्तो बन्द्यचरिता मन्यन्ते पौरुषं महत् ।
अशक्ताः पौरुषं कर्तुं क्लीबा दैवमुपासते ॥ ४८ ॥
जो बुद्धिमान एवं प्रशंसनीय चरितवाले हैं वे पुरुषार्थ को बड़ा मानते हैं अर्थात् उद्योग करते हैं। और जो पुरुषार्थ करने में असमर्थ कायर पुरुष हैं वे भाग्य की उपासना करते हैं अर्थात् भाग्य के भरोसे बैठे रहते हैं ॥

दैवे पुरुषकारे च खलु सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
पूर्वजन्मकृतं कर्मेहार्जितं तद् द्विधा कृतम् ॥ ४९ ॥
भाग्य और पुरुषार्थ इन दोनों के ऊपर ही सम्पूर्ण जगत् के कार्य स्थित हैं। इनमें पूर्वजन्म में किया हुआ कर्म 'भाग्य' और इस जन्म में किया हुआ कर्म 'पुरुषार्थ' कहलाता है, इस भांति से एक ही कर्म के दो भेद किये गये हैं ॥

बलवत्प्रतिकारि स्याद् दुर्बलस्य सदैव हि ।
सबलाबलयोर्ज्ञानं फलप्राप्त्याऽन्यथा नहि ॥ ५० ॥
भाग्य और पुरुषार्थ इन दोनों में से जो दुर्बल होता है उसको हटाने-वाला सदा बलवान् होता है। सबल और दुर्बल का ज्ञान केवल फल-प्राप्ति से होता है। अन्य रीति से नहीं होता ॥

फलोपलब्धिः प्रत्यक्षहेतुना नैव दृश्यते ।
प्राक्कर्महैतुकी सा तु नान्यथैवेति निश्चयः ॥ ५१ ॥
'प्रत्यक्ष कारण (पुरुषार्थ) से फल की प्राप्ति नहीं दिखाई देती है, वह तो प्राक्तन कर्म के वश से ही होती है, अन्य से नहीं होती है' यह निश्चित है ॥