Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४७

Page 433Permalink

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४७

उत्तमं वाजिनो मध्यं नीचमर्धं तदर्धकम् ॥ १३१ ॥
**उत्तमादि मण्डलों के प्रमाणों का निर्देश—**गतिकी शिक्षा देने में घोड़े के लिये १ मण्डल का प्रमाण १००० धनुषों का होता है जो उत्तम होता है उसका आधा (५०० धनुषों का) मण्डल मध्यम और उसका भी आधा (२५० धनुषों का) मण्डल नीच होता है।

अल्पं शतधनुः प्रोक्तमत्यल्पं च तदर्धकम् ।
और १०० धनुषों का मण्डल अल्प और उसका आधा (५० धनुषों का) मण्डल अत्यल्प होता है।

शतयोजनगन्ता स्याद्दिनेकेन यथा हयः ॥ १३२ ॥
गतिं संवर्धयेन्नित्यं तथा मण्डलविक्रमैः ।
मण्डल के द्वारा गति बढ़ाने की शिक्षा से तब तक घोड़े की गति नित्य बढ़ाता रहे कि जब तक वह एक दिन में १०० योजन (४००) तक न दौड़ लगाने लगे।

सायं प्रातश्च हेमन्ते शिशिरे कुसुमागमे ॥ १३३ ॥
सायं ग्रीष्मे तु शरदि प्रातरश्वं वहेत् सदा ।
**ऋतु के भेद से अश्वशिक्षा के समय में भेद का निर्देश—**हेमन्त, शिशिर तथा वसन्तऋतु में सायंकाल तथा प्रातःकाल एवं ग्रीष्म में सायंकाल और शरदऋतु में प्रातःकाल घोड़े को शिक्षा देवे।

वर्षासु न वहेद्दीषत्तथा विषमभूमिषु ॥ १३४ ॥
**वर्षाऋतु में और विषम भूमि में घोड़े को चलाने का निषेध—**और वर्षा ऋतु तथा विषम भूमि में घोड़े को थोड़ी भी दौड़ाने की शिक्षा न देवे।

सुगत्याऽग्निर्बलं दार्ढ्यमारोग्यं वर्धते हरेः ।
**उत्तमगति से अश्व के फल का निर्देश—**उत्तम चाल से घोड़ों की जठराग्नि, बल, शरीर की दृढ़ता तथा आरोग्य की वृद्धि होती है। अतः चाल की शिक्षा देना आवश्यक है।

भारमार्गपरिश्रान्तं शनैश्चङ्क्रमयेद्धयम् ॥ १३५ ॥
स्नेहं सम्पाथयेत् पश्चाच्छर्करासक्तुमिश्रितम् ।
हरिमन्थांश्च माषांश्च भक्षणार्थे मकुष्ठकान् ॥ १३६ ॥
शुष्कानाद्रांश्च मांसानि सुस्विन्नानि प्रदापयेत् ।
**थके हुये अश्व को धीरे २ चलाने का एवं उनके भक्षणार्थ हितकारक पदार्थ देने का निर्देश—**भारवहन तथा मार्ग चलने से थके हुये घोड़े को धीरे २ टहलावे उसके बाद शक्कर तथा सत्तू मिले हुये स्नेह (घृत) को पिलावे। और खाने के

Page 434Permalink

३४८ | शुक्रनीतिः

लिये चने, उड़द तथा मोठ को दे चाहे वे सूखे हों या हरे (भिगोये हुये) एवं अच्छी तरह पकाये हुये मांस भी दे।

यद्यत्र स्खलितं गात्रं तत्र दण्डं न पातयेत् ॥ १३७ ॥
मोच आये अंग पर घोड़े को चाबुक न मारने का निर्देश— यदि कभी घोड़े के किसी अंग में मोच हो जाय तो वहां पर चाबुक नहीं मारना चाहिये।

नावतारितपल्याणं हयं मार्गसमागतम्।
दत्त्वा गुडं सलवणं बलसंरक्षणाय च ॥ १३८ ॥
मार्ग से चलकर आये हुये घोड़े को गुड़ तथा लवण देने का निर्देश— मार्ग चलकर आये हुये घोड़ों को बिना जीन उतारे हुये ही बल का संरक्षण करने के लिये लवण (निमक) के साथ गुड़ देना चाहिये।

गतस्वेदस्य शान्तस्य सुरूपमुपतिष्ठतः।
मुक्तपृष्ठादिबन्धस्य खलीनमवतारयेत् ॥ १३९ ॥
पसीना शान्त होने पर लगाम उतारने का निर्देश— पसीना सूख जाय एवं घोड़ा शान्त होकर अपनी स्वाभाविक अवस्था में स्थित हो जाय तब उसके पीठ के बन्धन (कसे हुये चारजामे) को खोल कर लगाम निकाल लेवे।

मर्दयित्वा तु गात्राणि पांसुमध्ये विवर्त्तयेत्।
स्नानपानावगाहैश्च ततः सम्यक् प्रपोषयेत् ॥ १४० ॥
घोड़ों के अङ्गों को मलकर फेरने का निर्देश— और घोड़े के सारे शरीर का मर्दन (खरहरा) करके धूलि में लोटने की व्यवस्था कर दे। इसके बाद स्नान कराना, पानी पिलाना, नदी आदि में अवगाहन (स्नान) कराना आदि से उसे भलीभांति पुनः परिपुष्ट (ताजा) कर लेवे।

सर्वदोषहरोऽश्वानां मद्यजाङ्गल्यो रसः।
शक्त्या सम्पापयेत् क्षीरं घृतं वा वारिसक्तुकम् ॥ १४१ ॥
घोड़ों को मद्य व मांसरस देने का फल— घोड़ों के लिये मद्य तथा जंगली जीवों का मांसरस सर्वदोषनाशक (लाभप्रद) होता है। शक्ति के अनुसार दूध, घी या जल में घुला हुआ सत्तू पिलावे।

अन्नं भुक्त्वा जलं पीत्वा तत्क्षणाद्वाहितो हयः।
उत्पद्यन्ते तदाश्वानां कासश्वासादिका गदाः ॥ १४२ ॥
चारा आदि खिलाने के बाद तत्काल घोड़े की सवारी के दोष— यदि चारा खिलाने के बाद पानी पिलाकर फौरन घोड़े पर सवारी की जाय तो उससे घोड़े को खांसी तथा दमे की बीमारी हो जाती है।

यवाश्च चणकाः श्रेष्ठा मध्या माषा मकुष्ठकाः।
नीचा मसूरा मुद्गाश्च भोजनार्थं तु वाजिनः ॥ १४३ ॥

Page 435Permalink

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४६

**घोड़ों के लिये उत्तम, मध्यम तथा नीच भोजनों का निर्देश—**घोड़ों को भोजन के लिये जौ तथा चना देना उत्तम, उर्द तथा मोठ मध्यम और मसूर तथा मूंग का देना नीच माना जाता है।

गतयः षड्विधा धाराऽऽस्कन्दितं रेचितं प्लुतम् ।
धौरीतकं वल्गितं च तासां लक्ष्म पृथक् पृथक् ॥ १४४ ॥

**घोड़ों की ६ प्रकार की गति का नाम-निर्देश—**१. धारा, २. आस्कन्दित, ३. रेचित, ४. प्लुत, ५. धौरीतक, ६. वल्गित इन भेदों से गति ६ प्रकार की होती है। अब उनके लक्षण पृथक् २ कहते हैं।

धारागतिः सा विज्ञेया यातिवेगतरा मता ।
पार्ष्णिस्तोदाविनुदितो यस्यां भ्रान्तो भवेद्धयः ॥ १४५ ॥

**धारा गति के लक्षण—**जो अत्यन्त वेग से युक्त गति हो उसे 'धारा' गति समझनी चाहिये। इसमें सवार की एड़ी या चाबुक की मार से अत्यन्त प्रेरित होकर घोड़ा वेग से चक्कर या दौड़ लगाने लगता है।

आकुञ्चिताग्रपादाभ्यामुत्प्लुत्योत्प्लुत्य या गतिः ।
आस्कन्दिता च सा ज्ञेया गतिविद्भिस्तु वाजिनाम् ॥ १४६ ॥

**आस्कन्दित गति के लक्षण—**जिसमें अगले पैरों को सिकोड़े हुये उछल २ कर घोड़े की गति होती है उसे 'आस्कन्दित' गति घोड़ों की गति जाननेवाले विद्वान् मानते हैं ।

ईषदूत्प्लुत्य गमनमखण्डं रेचितं हि तत् ।

**रेचित गति के लक्षण—**और घोड़ा जिसमें थोड़ा उछल २ कर अखण्ड गमन करता है उसे 'रेचित' कहते हैं ।

पादैश्चतुर्भिरुत्प्लुत्य मृगवत् सा प्लुता गतिः ॥ १४७ ॥
असंवलितपद्भ्यां तु सुव्यक्तं गमनं तुरम् ।
धौरीतकं च तज्ज्ञेयं रथसंवाहने वरम् ॥ १४८ ॥

**प्लुत तथा धौरीतक गति के लक्षण—**घोड़ा चारो पैरों से मृग के समान चौकड़ी भरकर जिसमें दौड़ता है उसको 'प्लुत' गति कहते हैं। जिसमें दोनों पैर बिना सिकोड़े हुये उठाकर चलाये जांय, और शीघ्र सुन्दर गति हो, जिससे रथ ( गाड़ी ) खींचने में अच्छाई हो, उसे 'धौरीतक' गति कहते हैं।

प्रसंवलितपद्भ्यां यो मयूरोद्धृतकन्धरः ।
दोलायितशरीरार्धकायो गच्छति वल्गितम् ॥ १४९ ॥

**वल्गित गति के लक्षण—**जिसमें घोड़ा सिकोड़े हुये दोनों पैरों से मयूर के समान गर्दन उठाये हुये और आधे शरीर को हिंडोले के समान हिलाता हुआ दौड़ता है उसको 'वल्गित' गति कहते हैं

Page 436Permalink

३५० | शुक्रनीतिः

परिणाहो वृषमुखादुदरे तु चतुर्गुणः।
सककुत् त्रिगुणोच्छ्रन्तु सार्धत्रिगुणदीर्घता ॥ १५० ॥
**बैल के मुखादि का प्रमाण—**वृष के मुख के प्रमाण से चौगुना उदर का विस्तार और ककुद् (बैल के पीठ पर का टिल्ला)-के सहित उदर मुख से तिगुना ऊंचा एवं मुख से उदर की लम्बान साढ़े तीन गुना होना चाहिये।

सप्ततालो वृषः पूज्यो गुणैरेभियुतो यदि।
**पूज्य सप्तताल बैल के लक्षण—**जो सात ताल प्रमाण ऊंचा होते हुये यदि इन निम्न लिखित गुणों से युक्त हो तो वह बैल पूजनीय (श्रेष्ठ) माना जाता है।

न स्थायी न च वै मन्दः सुवोढा स्वङ्गसुन्दरः ॥ १५१ ॥
नातिक्रूरः सुपृष्ठश्च वृषभः श्रेष्ठ उच्यते।
**श्रेष्ठ बैल के लक्षण—**जो चलते १ रुकनेवाला (अड़ियल) न हो और धीरे २ चलनेवाला भी न हो एवं सुन्दर वहन करनेवाला, सभी अङ्गों से सुन्दर, अत्यन्त क्रूर (बदमाश) न हो और जिसकी पीठ सुन्दर हो, ऐसा बैल श्रेष्ठ कहा जाता है।

त्रिंशद्योजनगन्ता वा प्रत्यहं भारवाहकः ॥ १५२ ॥
नवतालश्च सुदृढः सुमुखोष्ट्रः प्रशस्यते।
**श्रेष्ठ ऊंट के लक्षण—**जो प्रतिदिन ३० योजन (१२० कोश) तक चल सकनेवाला या भारवहन करनेवाला, नवताल-प्रमाण ऊंचा हो, एवं अत्यन्त मजबूत शरीरवाला तथा सुन्दर मुखवाला हो, ऐसा ऊंट प्रशस्त माना जाता है।

शतमायुर्मनुष्याणां गजानां परमं स्मृतम् ॥ १५३ ॥
मनुष्यगजयोर्बाल्यं यावद्विंशतिवत्सरम् ।
नृणां हि मध्यमं यावत् षष्टिवर्षे वयः स्मृतम् ॥ १५४ ॥
अशीतिवत्सरं यावद् गजस्य मध्यमं वयः।
**मनुष्य और हाथियों की आयु तथा बाल्यादि अवस्था का प्रमाण—**मनुष्यों और हाथियों की परम आयु १०० वर्ष तक की और बाल्यावस्था २० वर्ष तक की मानी गई है। और मनुष्यों की मध्यम (जवानी से प्रौढ़ावस्था तक) अवस्था ६० वर्ष तक की मानी जाती है किन्तु हाथियों की मध्यम अवस्था ८० वर्ष तक की मानी गई है।

चतुस्त्रिंशत्तु वर्षाणामश्वस्यायुः परं स्मृतम् ॥ १५५ ॥
पञ्चविंशतिवर्षं हि परमायुर्वृषोष्ट्रयोः ।
बाल्यमश्ववृषोष्ट्राणां पञ्चमं वत्सरं मतम् ॥ १५६ ॥
मध्यं यावत् षोडशाब्दं वार्धक्यं तु ततः परम्।

Page 437Permalink

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३५१

**घोड़ा, बैल तथा ऊँट की आयु तथा अवस्थाओं का प्रमाण—**घोड़े की परमायु ३४ वर्ष तक की मानी गई है। और बैल तथा ऊंटों की परमायु २५ वर्ष तक की ही मानी जाती है। घोड़ा, बैल तथा ऊंट की बाल्यावस्था ५ वर्ष तक की और मध्यावस्था १६ वर्ष तक की होती है उसके बाद वृद्धावस्था मानी गई है।

दन्तानामुद्गमैर्वर्णैरायुर्ज्ञेयं वृषाश्वयोः ॥ १५७ ॥
**दांतों के द्वारा बैल व घोड़ों की अवस्था-ज्ञान का निर्देश—**बैल तथा घोड़े की अवस्था का ज्ञान उनके दांत निकलने तथा दांतों के वर्ण के द्वारा किया जाता है।

अश्वस्य षट् सिता दन्ताः प्रथमाब्दे भवन्ति हि ।
कृष्णलोहितवर्णास्तु द्वितीयेऽब्दे ह्यधोगताः ॥ १५८ ॥
**दांतों द्वारा घोड़ों के प्रथम वर्ष का ज्ञान—**घोड़ों के प्रथम वर्ष में उपरी भाग में सफेद ६ दांत होते हैं। और दूसरे वर्ष में काले तथा लाल मिश्रित वर्ण के ६ दांत नीचे भाग में निकलते हैं।

तृतीयेऽब्दे तु सन्दंशौ क्रमात् कृष्णौ षडब्दतः ।
तत्पार्श्ववर्त्तिनौ तौ तु चतुर्थे पुनरुद्गतौ ॥ १५९ ॥
तीसरे वर्ष में दो २ दांत ६ वर्ष तक क्रम से कृष्ण वर्ण के हो जाते हैं और चौथे वर्ष में पुनः उक्त दाँतों के पार्श्व में दो दांत निकल आते हैं।

अन्त्यौ द्वौ पञ्चमाब्दे तु संदंशौ पुनरुद्गतौ ।
मध्यपार्श्वान्तगौ द्वौ द्वौ क्रमात् कृष्णौ षडब्दतः ॥ १६० ॥
पांचवें वर्ष में अन्त में दो दांत फिर निकल आते हैं। मध्य तथा पार्श्व के अन्त भाग में दो २ दांत ६ वर्ष में क्रम से कृष्ण वर्ण के हो जाते हैं।

नवमाब्दात् क्रमात् पीतौ तौ सितौ द्वादशाब्दतः ।
दशपञ्चाब्दतस्तौ तु काचाभौ क्रमशः स्मृतौ ॥ १६१ ॥
नवें वर्ष से वे दोनों दांत क्रम से पीत वर्ण के तदनन्तर फिर १२ वें वर्ष तक में सफेद हो जाते हैं। फिर १५ वें वर्ष तक वे दोनों कांच की भांति क्रमशः उज्ज्वल हो जाते हैं।

अष्टादशाब्दतस्तौ हि मध्वाभौ भवतः क्रमात् ।
शङ्खाभौ चैकविंशाब्दाच्चतुर्विंशाब्दतः सदा ॥ १६२ ॥
छिद्रं सञ्चलनं पातो दन्तानां च त्रिके त्रिके ।
फिर १८ वें वर्ष तक वे दोनों मधु के समान वर्ण के क्रम से हो जाते हैं। फिर २१ वें वर्ष तक शङ्ख के समान वर्ण के हो जाते हैं पुनः २४ वें वर्ष तक तीन ३ दांतों में छिद्र, संचलन (हिलना) तथा गिरना जारी हो जाता है।

Page 438Permalink

३५२ | शुक्रनीतिः

प्रोथे सुवलयस्तिस्रः पूर्णायुर्यस्य वाजिनः ॥ १६३ ॥
यथा यथा तु हीनास्ता हीनमायुस्तथा तथा ।

निन्दित घोड़ों के लक्षण—जिस घोड़े के प्रोथ (मुखाग्र) में स्पष्ट ३ बली पड़ी हुई हों उसकी आयु पूर्ण (वृद्धि पूर्ण) हुई समझनी चाहिये। और जैसे २ उक्त बलियों में कमी होती जाती है वैसे २ उसकी आयु क्षीण हुई समझनी चाहिये।

जानूत्पाता त्वोष्ठवायो धूतपृष्ठो जलासनः ॥ १६४ ॥
गतिमध्यासनः पृष्ठपाती पश्चाद्गमोर्ध्वपात् ।
सर्पजिह्वश्शङ्खकान्ति-भीरुरश्वोऽतिनिन्दितः ॥ १६५ ॥
सच्छिद्रभालतिलकी निन्य आश्रयकृत्तथा ।

जो घोड़ा जानुओं को उछालता हो, ओठों को बजाता हो, पीठ हिलाता हो, जल में या चलते २ बैठ जाता हो, पीठ पर से सवार को गिरा देता हो, पीछे की ओर घसकता हो, पैर ऊपर उठाता हो, सांप की तरह जीभ लपलपानेवाला, शंख की भांति कान्तिवाला, और भड़कनेवाला हो वह अत्यन्त निन्द्य होता है। और जिस घोड़े के भाल में छिद्रयुक्त तिलक हो वह निन्दनीय तथा आश्रयदाता स्वामी को नष्ट करनेवाला होता है।

वृषस्याष्टौ सिता दन्ताश्चतुर्थेऽब्देऽखिलाः स्मृताः ॥ १६६ ॥
द्वावन्त्यौ पतितोत्पन्नौ पञ्चमेऽब्दे हि तस्य व ।

दाँतों द्वारा बैल व ऊंट के आयु की परीक्षा—बैल के चौथे वर्ष तक में सम्पूर्ण सफेद ८ दांत निकल आते हैं, और ५ वें वर्ष में अन्त के दो दांत गिर कर पुनः उत्पन्न जाते हैं।

षष्ठे तूपान्त्यौ भवतः सप्तमे तत्समीपगौ ॥ १६७ ॥
अष्टमे पतितोत्पन्नौ मध्यमौ दशनौ खलु ।

६ ठें वर्ष में अन्त के समीप में स्थित दो दांत, ७ वें वर्ष में उसके समीप के दो दांत, और ८ वें वर्ष में मध्य के दो दांत क्रमसे गिरकर पुनः उत्पन्न हो जाते हैं।

कृष्णपीतसितारक्तशङ्खच्छायौ द्विके द्विके ॥ १६८ ॥
क्रमादब्दे च भवतश्चलनं पतनं ततः ।
उष्ट्रस्योक्तप्रकारेण वयोग्ज्ञानं तु वा भवेत् ॥ १६९ ॥

उसके बाद ८ वें वर्ष से दो-दो वर्ष के पश्चात् क्रम से दो-दो दांत काले पीले, श्वेत, रक्त तथा शंख वर्ण के हो जाते हैं। उसके बाद वे हिलने लगते हैं और अन्त में गिर जाते हैं। और इसी प्रकार से ऊंटकी अवस्था का भी ज्ञान किया जाता है।