शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context१४ शुक्रनीतिः
स्वान् दुर्गुणान् परित्यज्य ह्यतिवादांस्तितिक्षते ।
दानैर्मानैश्च सत्कारैः स्वप्रजारंजकः सदा ॥ ८३ ॥
दान्तः शूरश्च शस्त्रास्त्रकुशलोऽरिनिषूदनः ।
अस्वतन्त्रश्च मेधावी ज्ञानविज्ञानसंयुतः ॥ ८४ ॥
नीचहीनो दीर्घदर्शी वृद्धसेवी सुनीतियुक् ।
गुणिजुष्टस्तु यो राजा स ज्ञेयो देवतांशकः ॥ ८५ ॥
जो राजा अपने दुर्गुणों का परित्याग कर निन्दा को सहन करनेवाला, दान, मान तथा सत्कार से अपनी प्रजा को सदा प्रसन्न रखनेवाला, इन्द्रियों को दमन करनेवाला, शूर, शस्त्रास्त्र चलाने में निपुण, शत्रुओं का नाशक, उच्छृङ्खलता से रहित धारणाशक्तिसंपन्न, ज्ञान तथा विज्ञान से युक्त, नीचगुणों से वा नीच संगति से रहित, दूरदर्शी, वृद्धों की उपासना करनेवाला, सुन्दर नीति से युक्त, गुणियों से सेवित होता है उसे 'देवांश' (देवताओं के अंश से उत्पन्न होनेवाला) समझना चाहिये ॥
विपरीतस्तु रक्षोऽशः स च नरकभाजनः ।
नृपांशसदृशो नित्यंः तत्सहायगणः किल ॥ ८६ ॥
इन गुणों से विपरीत गुणों वाला राजा 'रक्षोऽश' अर्थात् राक्षस के अंश से उत्पन्न हुआ कहलाता है और वह नरकगामी होता है । और राजा जैसे अंश का होता है निश्चय उसके सहायकगण (पार्श्ववर्त्ती मन्त्री इत्यादि) भी उसी अंश वाले होते हैं ॥
तत्कृतं मन्यते राजा संतुष्यति च मोदते ।
तेषामाचरणैर्नित्यं नान्यथा नियतेर्बलात् ॥ ८७ ॥
और दैव के वश से विवश होकर राजा उनके किये हुये कार्यों का अनुमोदन करता है एवं उनके आचरणों से नित्य सन्तुष्ट एवं हर्षित होता है । अन्यथा नहीं होता है अर्थात् भिन्न अंशवाले सहायकों से वैसा सन्तुष्ट नहीं रहता है ॥
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतकर्मफलं नरैः ।
प्रतिकारैर्विना नैव प्रतिकारे कृते सति ॥ ८८ ॥
किये हुये कर्मों का फल मनुष्यों को अवश्य भोगना पड़ता है यदि उसकी निवृत्ति के लिये उपाय न किया जाय । और यदि निवृत्ति के लिये उपाय किया जाय तो नहीं भोगना पड़ता है ॥
तथा भोगाय भवति चिकित्सितगदो यथा ।
उपदिष्टेऽनिष्टहेतौ तत्तत्कर्तुं यतेत कः ॥ ८९ ॥
जैसे जिस रोग की चिकित्सा होती है, उसकी निवृत्ति का उपाय न करने पर वह भोग के लिये होता है और उपाय करने पर नहीं होता है । क्योंकि