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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 90 of 526

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Page 90

४ शुक्रनीतिः

अप्रेरितहितकरं सर्व्वराष्ट्रं भवेद्यथा ।
तथा नीतिस्तु संधार्या नृपेणात्महिताय वै ॥ १८ ॥
जिस नीति से बिना राजा की प्रेरणा से ही स्वयं हितकरनेवाला संपूर्ण राष्ट्र (प्रजामण्डल) हो, उसी नीति को अपने हित के लिये राजा को अपनाना उचित है ॥

भिन्नं राष्ट्रं बलं भिन्नं भिन्नोऽमात्यादिको गणः ।
अकौशल्यं नृपस्यैतदनीतेर्यस्य सर्व्वदा ॥ १६ ॥
'जिस राजा की अनीति से सदा उसके राष्ट्र (देश), सेना और मन्त्री आदि गण में परस्पर भेद होता है', यह उसकी मूर्खता का द्योतक है ॥

तपसा तेज आदत्ते शास्ता पाता च रंजकः ।
नृपः स्वप्राक्तनाद्धत्ते तपसा च महीमिमाम् ॥ २० ॥
राजा तप से तेज धारण करता है और शास्त्र का जाननेवाला, प्रजा की रक्षा तथा मनोरञ्जन करनेवाला होता है। एवं अपने पूर्वजन्ममार्जित तप से ही वह इस पृथ्वी का पालन करता है ॥

वृष्टिशीतोष्णनक्षत्रगतिरूपस्वभावतः ।
इष्टानिष्टाधिकं न्यूनाचारैः कालस्तु भिद्यते ॥ २१ ॥
यद्यपि काल एक ही है तथापि वर्षा, शीत, उष्ण, नक्षत्रों की गति रूप स्वभाव से एवं इष्ट, अनिष्ट, अधिक, न्यून आचरण से उसके अनेक भेद होते हैं ॥

आचारप्रेरको राजा ह्येतत्कालस्य कारणम् ।
यदि कालः प्रमाणं हि कस्माद्धर्मोऽस्ति कर्तृषु ॥ २२ ॥
राजा की काल-कारणता का निर्देश—आचरण की प्रेरणा करनेवाला राजा होता है अतः वह काल का भी कारण होता है और यदि काल ही आचरण में प्रमाण माना जाय तो उसके करनेवालों में धर्म कहां से हो, अर्थात् धर्माचरण में राजा ही मुख्य कारण है न कि काल ॥

राजदंडभयाल्लोकः स्वस्वधर्मपरो भवेत् ।
यो हि स्वधर्मनिरतः स तेजस्वी भवेदिह ॥ २३ ॥
जगत् के लोग राजदण्ड के भय से अपने २ धर्म के पालन में तत्पर होते हैं। और जो अपने धर्म में निरत होता है वही इस संसार में तेजस्वी होता है ॥

विना स्वधर्मान्न सुखं स्वधर्मो हि परं तपः ।
तपः स्वधर्मरूपं यद्वर्द्धितं येन वै सदा ॥ २४ ॥
देवास्तु किंकरास्तस्य किं पुनर्मनुजा भुवि ।