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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 369, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 369

हे धन सहित रथ! मेरा वंश विस्तार करो. अश्विनीकुमार उस सुखकारी रथ को
स्तोताओं के सोमपान वाले स्थान पर ले जाते हैं. (११)
अध स्वप्रस्य निर्विदेऽभुञ्जतश्च रेवतः. उभा ता बस्नि नश्यतः.. (१२)
मैं प्रातःकाल के स्वप्न एवं दूसरों को रक्षा न करने वाले धनी से घृणा करता हूं. ये दोनों
शीघ्र नष्ट हो जाते हैं. (१२)
सूक्त—१२१ देवता—इंद्र
कदित्था नूँः पात्रं देवयतां श्रवद्गिरो अङ्गिरसां तुरण्यन्.
प्र यदानड्दिश आ हर्म्यस्योरु क्रंसते अध्वरे यजत्रः.. (१)
स्तोताओं के पालक एवं गोरूप धन के देने वाले इंद्र अपने भक्त अंगिरा की स्तुति कब
सुनेंगे? वे जब गृहस्वामी यजमान के ऋत्विजों को सामने देखते हैं, तभी यज्ञपात्र बनकर यज्ञ
में स्वयं आ जाते हैं. (१)
स्तम्भीद्ध द्यां स धरुणं पुषायद्भुर्वजाय द्रविणं नरो गोः.
अनु स्वजां महिषश्चक्षत व्रां मेनामश्वस्य परि मातरं गोः.. (२)
उसने आकाश को धारण किया, असुरों द्वारा चुराई गई गायों को निकाला एवं परम
भासमान होकर प्राणियों द्वारा सेवित एवं अन्न का कारण वर्षाजल बिखेरा. वह महान् अपनी
पुत्री उषा के पश्चात् उदय होता है. उसने घोड़ी को गाय की माता बनाया. (२)
नक्षद्धवमरुणीः पूर्व्यं राट् तुरो विशामङ्गिरसामनु द्यून्.
तक्षद्वज्रं नियुतं तस्तम्भद् द्यां चतुष्पदे नर्य्याय द्विपादे.. (३)
अरुण वर्ण की उषा को रंजित करने वाले वे पूर्ववर्ती ऋषियों द्वारा निर्मित स्तोत्र सुनें. वे
अंगिरागोत्रीय ऋषियों को प्रतिदिन धनदाता, वज्र को तीखा करने वाले एवं मानवों के हितार्थ
द्विपाद एवं चतुष्पाद की रक्षा करते तथा आकाश को धारण करते हैं. (३)
अस्य मदे स्वर्यं दा ऋतायापीवृतमुस्रियाणामनीकम्.
यद्ध प्रसर्गे त्रिककुम्निवर्तदप दृहो मानुषस्य दुरो वः.. (४)
तुमने सोमपान से प्रसन्न होकर पणियों द्वारा चुराई हुई गायों का यज्ञ के लिए प्रशंसनीय
दान दिया था. तीनों लोकों में उत्तम इंद्र जब युद्ध में संलग्न थे, तब वे मानवद्रोही असुरों का
द्वार गायों के निकलने के लिए खोल देते थे. (४)
तुभ्यं पयो यत्पितरावनीतां राधः सुरेतस्तुरणे भुरण्यू.
शुचि यत्ते रेक्ण आयजन्त सबर्दुघायाः पय उस्रियायाः.. (५)
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