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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

त्वमपामपिधानाऽवृणोरपाधारयः पर्वते दानुमद्वसु.

लिए शतद्वार नामक यंत्र का प्रयोग किया था, तब तुमने उन्हें मार्ग बताया था. तुमने विमद
ऋषि के लिए अन्नयुक्त धन प्रदान किया था, इसी प्रकार तुमने संग्राम में विजय प्राप्ति के लिए
स्तुति करने वाले अनेक स्तोताओं को वज्र चलाकर बचाया था. (३)
त्वमपामपिधानाऽवृणोरपाधारयः पर्वते दानुमद्वसु.
वृत्रं यदिन्द्र शवसावधीरहिमादित्सूर्य दिव्यारोहयो दृशे.. (४)
हे इंद्र! तुमने जल के अवरोधक मेघों को हटा दिया है एवं वृत्र आदि असुरों को पराजित
करके उनका धन पर्वत पर छिपा दिया है. तुमने तीनों लोकों की हिंसा करने वाले वृत्र का वध
किया एवं उसके तुरंत पश्चात् संसार को देखने के लिए सूर्य को आकाश में चढ़ा दिया था.
(४)
त्वं मायाभिरप मायिनोऽधमः स्वधाभिर्ये अधि शुप्तावजुह्वत.
त्वं पिप्रोनृमणः प्रारुजः पुरः प्र ऋजिश्वानं दस्युहत्येष्वाविथ.. (५)
हे इंद्र! जो असुर हविष्य अन्नों से सुशोभित अपने मुखों में ही यज्ञीय सामग्री डाल लेते
थे, तुमने उन मायावियों को माया द्वारा पराजित किया था. हे यजमानों पर अनुग्रहबुद्धि रखने
वाले इंद्र! तुमने पिप्रु असुर के निवासस्थान ध्वस्त कर दिए थे. तुमने हत्या करने के लिए
उद्यत दस्युओं के हाथों में पड़े ऋजिश्वान् की पूर्णतया रक्षा की थी. (५)
त्वं कुत्सं शुष्णहत्येष्वाविथारन्धयोऽतिथिग्वाय शम्बरम्.
महान्तं चिदर्बुदं नि क्रमीः पदा सनादेव दस्युहत्याय जज्ञिषे.. (६)
हे इंद्र! तुमने शुष्ण असुर के साथ भयानक संग्राम में कुत्स ऋषि की रक्षा की थी तथा
अतिथियों का स्वागत करने वाले दिवोदास को बचाने के लिए शंबर असुर का वध किया था.
तुमने अर्बुद नामक महान् असुर को पैरों से कुचल डाला था. इस प्रकार तुम्हारा जन्म
दस्युनाश के लिए हुआ जान पड़ता है. (६)
त्वे विश्वा ताविषी सध्म्यग्घिता तव राधः सोमपीथाय हर्षते.
तव वज्रश्चिकिते बाह्वोर्हितो वृश्चा शत्रोरव विश्वानि वृष्ण्या.. (७)
हे इंद्र! तुम में संपूर्ण बल निहित है एवं सोमरस पीने के बाद तुम्हारा मन अत्यंत प्रसन्न
हो जाता है. हम यह जानते हैं कि तुम्हारे दोनों हाथों में वज्र रहता है. इसलिए तुम शत्रुओं का
समस्त बल छिन्न करो. (७)
वि जानीह्यार्यान्ये च दस्यवो बर्हिष्मते रन्धया शासदव्रतान्.
शाकी भव यजमानस्य चोदिता विश्वेत्ता ते सधमादेषु चाकन.. (८)
हे इंद्र! पहले तुम यह बात जानो कि कौन आर्य है और कौन दस्यु? इसके पश्चात् तुम
कुशयुक्त यज्ञों का विरोध करने वालों को नष्ट करके उन्हें यजमानों के वश में लाओ. तुम
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शक्तिशाली हो, इसलिए यज्ञ करने वालों के सहायक बनो. मैं स्तोता भी तुम्हें प्रसन्नता देने
वाले यज्ञों के तुम्हारे उन समस्त कर्मों की प्रशंसा करना चाहता हूं. (८)
अनुव्रताय रन्धयन्नपव्रतानाभूरिन्द्रः श्रथयन्नाभुवः.
वृद्धस्य चिद्वर्धतो द्यामिनक्षतः स्तवानो वम्रो वि जघान संदिहः.. (९)
जो इंद्र यज्ञविरोधियों को यज्ञप्रिय यजमानों के वश में ला देते हैं तथा अपने अभिमुख
स्तोताओं द्वारा स्तुतिपरांगमुखों का नाश करा देते हैं, बभ्रु ऋषि ने ऐसे बुद्धिशील एवं
स्वर्गव्यापी इंद्र की स्तुति करते हुए यज्ञ में एकत्रित धन समूह ले लिया था. (९)
तक्षद्यत्त उशना सहसा सहो वि रोदसी मज्मना बाधते शवः.
आ त्वा वातस्य नृमणो मनोजुज आ पूर्यमाणमवहन्नभि श्रवः.. (१०)
हे इंद्र! जब शुक्र ने अपने बल के सहयोग से तुम्हारी शक्ति को तीक्ष्ण कर दिया था, तब
तुम्हारे उस विशुद्ध बल ने अपनी तीक्ष्णता द्वारा धरती और आकाश को भयभीत बना दिया
था. हे यजमानों के प्रति अनुग्रहबुद्धि रखने वाले इंद्र! बल से पूर्ण तुम्हारी इच्छा से रथ में
जोड़े गए एवं वायु के समान वेगशाली घोड़े तुम्हें यज्ञअन्न के सम्मुख ले आवें. (१०)
मन्दिष्ट यदुशने काव्ये सचाँ इन्द्रो वङ्कू वङ्कुतराधि तिष्ठति.
उग्रो ययिं निरपः स्रोतसासृजद्धि शुष्णस्य दृंहिता ऐरयत्पुरः.. (११)
हे इंद्र! जब सुंदर शुक्राचार्य ने तुम्हारी स्तुति की थी, तब तुम वक्रगति वाले दोनों घोड़ों
को रथ में जोड़कर उस पर सवार थे. उग्र इंद्र ने चलने वाले बादलों से धारारूप में जल
बरसाया था एवं सबको सताने वाले शुष्ण असुर के विस्तृत नगर को नष्ट कर दिया था. (११)
आ स्मा रथं वृषपाणेषु तिष्ठसि शार्यातस्य प्रभृता येषु मन्दसे.
इन्द्र यथा सुतसोमेषु चाकनोऽनर्वाणं श्लोकमा रोहसे दिवि.. (१२)
हे इंद्र! तुम सोमरस पीने के लिए रथ पर बैठकर गमन करते हो. जिस सोम से तुम
प्रसन्न होते हो, वही सोम शार्यात राजर्षि ने तैयार किया है. तुम जिस प्रकार अन्य यज्ञों में
निचोड़े हुए सोमरस को पीते हो, उसी प्रकार इस शार्यात के सोम की भी कामना करो. ऐसा
करने से तुम स्वर्ग में स्थिर यश प्राप्त करोगे. (१२)
अददा अर्भा महते वचस्यवे कक्षीवते वृचयामिन्द्र सुन्वते.
मेनाभवो वृषणश्वस्य सुक्रतो विश्वेत्ता ते सवनेषु प्रवाच्या.. (१३)
हे इंद्र! तुमने यज्ञों में सोम निचोड़ने वाले एवं तुम्हारी स्तुति करने के इच्छुक वृद्ध
कक्षीवान् ऋषि को वृचया नामक युवती प्रदान की थी. हे शोभन कर्म करने वाले इंद्र! तुम
वृषणाश्व राजा के घर मेना नामक कन्या के रूप में उत्पन्न हुए थे. सोमरस निचोड़ते समय
तुम्हारी इन सब कथाओं का वर्णन होना चाहिए. (१३)
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इन्द्रो अश्रायि सुध्यो निरेके पज्रेषु स्तोमो दुर्यो न यूपः.
अश्वयुर्गव्यू रथयुर्वस्यूरिन्द्र इद्रायः क्षयति प्रयन्ता.. (१४)
शोभन कर्म वाले यजमान निर्धनता से सुरक्षित होने के लिए इंद्र की सेवा करते हैं.
अंगिरावंशी यज्ञों के स्तोत्र यज्ञद्वार पर गड़े लकड़ी के खंभों के समान निश्चल हैं. धन देने वाले
इंद्र यजमानों के लिए अश्व, रथ एवं विविध संपत्तियों को देने की इच्छा करते हैं तथा सब
प्रकार के धन देने के लिए स्थित हैं. (१४)
इदं नमो वृषभाय स्वराजे सत्यशुष्माय तवसेऽवाचि.
अस्मिन्निन्द्र वृजने सर्ववीराः स्मत्सूरिभिस्तव शर्मन्त्स्याम.. (१५)
हे इंद्र! तुम वर्णनशील, अपने तेज के द्वारा प्रकाशित, वास्तविक बलसंपन्न एवं अत्यंत
महान् हो. हमने यह स्तुति वचन तुम्हारे लिए ही प्रयोग किया है. हम इस युद्ध में समस्त वीरों
सहित विजय प्राप्त करके तुम्हारे द्वारा दिए हुए सुंदर घर में विद्वान् ऋत्विजों के साथ निवास
करें. (१५)
सूक्त—५२ देवता—इंद्र
त्यं सु मेषं महया स्वर्विदं शतं यस्य सुभ्वः साकमीरते.
अत्यं न वाजं हवनस्यदं रथेमेन्द्रं ववृत्यामवसे सुवृक्तिभिः.. (१)
हे अध्वर्युगणो! उन बली इंद्र की पूजा करो, जिनकी स्तुति सौ स्तोता एक साथ मिलकर
करते हैं और जो स्वर्ग प्राप्त करा देते हैं. इंद्र का रथ तेज दौड़ते हुए घोड़े के समान अत्यंत
वेगपूर्वक यज्ञ की ओर चलता है. मैं अपनी स्तुतियों के द्वारा इंद्र से अनुरोध करता हूं कि वे
उसी रथ पर चढ़कर मेरी रक्षा करें. (१)
स पर्वतो न धरुणेष्वच्युतः सहस्रमूतिस्तविषीषु वावृधे.
इन्द्रो यद्वृत्रमवधीन्नदीवृतमुब्जन्नर्णोसि जर्हृषाणो अन्धसा.. (२)
जिस समय यज्ञीय अन्न से प्रसन्न इंद्र ने जल की वर्षा करते हुए नदी के प्रवाह को रोकने
वाले वृत्र का वध किया, उस समय वह धारा रूप में बहने वाले जल के बीच पर्वत के समान
अचल रहा एवं उसने मनुष्यों की हजारों प्रकार से रक्षा करके पर्याप्त शक्ति प्राप्त की. (२)
स हि द्वरो द्वरिषु व्व्र ऊधनि चन्द्रबुध्नो मदवृद्धो मनीषिभिः.
इन्द्रं तमहे स्वपस्यया धिया मंहिष्ठरातिं स हि पप्रिरन्धसः.. (३)
मैं विद्वान् ऋत्विजों के साथ आक्रमणकारी शत्रुओं को जीतने वाले, जल के समान
आकाश में व्याप्त, सबकी प्रसन्नता के कारण, सोमपान से बुद्धिप्राप्त, महान् एवं धनसंपन्न
इंद्र को अपनी शोभन कार्य योग्य बुद्धि से बुलाता हूं, क्योंकि वे इंद्र अन्न को पूर्ण करने वाले
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हैं. (३)
आ यं पृणन्ति दिवि सद्मबर्हिषः समुद्रं न सुभव१ स्वा अभिष्टयः.
तं वृत्रहत्ये अनु तस्थुरूूतयः शुष्मा इन्द्रमवाता अहुतप्सवः.. (४)
जिस प्रकार समुद्र की ओर दौड़ती हुई इसकी आत्मीय सरिताएं उसे पूर्ण करती हैं,
उसी प्रकार कुशों पर रखा हुआ सोमरस स्वर्गलोक में अवस्थित इंद्र को पूर्णता प्रदान करता
है. शत्रुओं का शोषण करने वाले, शत्रुरहित एवं शोभन शरीर मरुद्गण वृत्रवध के समय उन्हीं
के सहायक के रूप में उनके पास खड़े थे. (४)
अभि स्ववृष्टिं मदे अस्य युध्यतो रघ्वीरिव प्रवणे सस्रूरतयः.
इन्द्रो यद्वज्री धृषमाणो अन्धसा भिनद्वलस्य परिधींरिव त्रितः.. (५)
जिस प्रकार स्वभाव के अनुसार जल नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार इंद्र के
सहायक मरुद्गण सोमपान द्वारा प्रसन्न होकर इंद्र के साथ युद्ध करते हुए वृष्टि के स्वामी वृत्र
के सामने गए. जिस प्रकार त्रित नामक पुरुष ने परिधियों का भेदन किया था, उसी प्रकार इंद्र
ने सोमरस से शक्तिशाली बनकर बल नामक असुर को विदीर्ण कर दिया था. (५)
परीं घृणा चरति तित्विषे शवोऽपो वृत्वी रजसो बुध्नमाशयत्.
वृत्रस्य यत्प्रवणे दुर्गुभिष्वनो निजघन्थ हन्वोरिन्द्र तन्यतुम्.. (६)
हे इंद्र! वृत्र नामक असुर जल को रोककर आकाश में सोया था. आकाश में वृत्र के
विस्तार की कोई सीमा नहीं थी. तुमने अपने शब्द करते हुए वज्र के द्वारा उसी वृत्र की ठोड़ी
को जिस समय घायल किया था, उसी समय तुम्हारा शत्रुविजयी तेज विस्तृत हो गया एवं
तुम्हारा बल सर्वत्र प्रकाशित हो गया. (६)
हृदं न हि त्वा न्यृषन्त्युर्मयो ब्रह्माणीन्द्र तव यानि वर्धना.
त्वष्टा चित्ते युज्यं वावृधे शवस्ततक्ष वज्रमभिभूत्योजसम्.. (७)
हे इंद्र! जिस प्रकार जल के प्रवाह जलाशय में पहुंच जाते हैं, उसी प्रकार तुम्हारी वृद्धि
करने वाले स्तोत्र तुम्हें प्राप्त हो जाते हैं. त्वष्टा देव ने ही तुम्हारे योग्य तुम्हारा बल बढ़ाया है.
उसी ने शत्रुओं को अभिभूत करने वाले तेज से संपन्न तुम्हारे वज्र को तीक्ष्ण बनाया है. (७)
जघन्वां उ हरिभिः संभृतक्रतविन्द्र वृत्रं मनुषे गातुयन्नपः.
अयच्छथा बाह्वोर्वज्रमायसमधारयो दिव्या सूर्यं दृशे.. (८)
हे यज्ञकर्म संपादक इंद्र! तुमने अपने भक्तजनों के समीप आने के लिए रथ में अश्व
जोड़कर वृत्र असुर का नाश किया, रुके हुए जल की वर्षा की, अपने दोनों बाहुओं में वज्र
धारण किया एवं हम सबके दर्शन के निमित्त सूर्य को आकाश में स्थापित किया. (८)
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बृहत्स्वश्चन्द्रमवद्यदुक्थ्य१मकृण्वत भियसा रोहणं दिवः.
यन्मानुषप्रधना इन्द्रमूतयः स्वर्णृषाचो मरुतोऽमदन्ननु.. (९)
वृत्र असुर के भय से स्तोताओं ने बृहत्, प्रसन्नताकारक तेज से युक्त, बलसंपन्न एवं स्वर्ग
के सोपानभूत स्तोत्रों का गान किया था. उस समय स्वर्गलोक की रक्षा करने वाले मरुद्गणों
ने मनुष्यों की रक्षा के लिए वृत्र से युद्ध करके एवं स्तोताओं का पालन करके इंद्र को वृत्र वध
के लिए उत्साहित किया. (९)
द्यौश्चिदस्यामवाँ अहेः स्वनादयोयवीद्भियसा वज्र इन्द्र ते.
वृत्रस्य यद्बद्धधानस्य रोदसी मदे सुतस्य शवसाभिनच्छिरः.. (१०)
हे इंद्र! जब निचोड़े हुए सोमरस को पीकर तुम अत्यंत हर्षित हो रहे थे, तब तुम्हारे वज्र
ने धरती और आकाश में बाधक बनने वाले वृत्र का सिर वेग से काट दिया था. उस समय
बलवान् आकाश भी वृत्र के शब्द भय से कांपने लगा था. (१०)
यदिन्न्विन्द्र पृथिवी दशभुजिरहानि विश्वा ततनन्त कृष्टयः.
अत्राह ते मघवन्विश्रुतं सहो द्यामनु शवसा बर्हणा भुवत्.. (११)
हे इंद्र! यदि पृथ्‍वी अपने वर्तमान आकार से दस गुनी बड़ी होती और उस पर रहने वाले
मनुष्य सदा जीवित रहते, तब भी तुम्हारी वृत्रवधकारिणी शक्ति सर्वत्र प्रसिद्ध होती. तुम्हारे
द्वारा वृत्र का वध आकाश के समान विशाल कार्य है. (११)
त्वमस्य पारे रजसो व्योमनः स्वभूत्योजा अवसे धृषन्मनः.
चकृषे भूमिं प्रतिमानमोजसोऽपः स्वः परिभूरेष्या दिवम्.. (१२)
हे शत्रुनाशक इंद्र! तुमने इस व्यापक आकाश के ऊपर रहते हुए अपनी शक्ति से हमारी
रक्षा करने के निमित्त भूलोक का निर्माण किया है. तुम बल की अंतिम सीमा हो. तुमने
सुखपूर्वक गमन करने योग्य आकाश एवं स्वर्ग को व्याप्त कर लिया है. (१२)
त्वं भुवः प्रतिमानं पृथिव्या ऋष्ववीरस्य बृहतः पतिर्भूः.
विश्वमाप्रा अन्तरिक्षं महित्वा सत्यमद्धा नकिरन्यस्त्वावान्.. (१३)
हे इंद्र! जिस प्रकार भूलोक का विस्तार अचिंत्य है, उसी प्रकार तुम्हारी भी महत्ता जानी
नहीं जा सकती. तुम दर्शनीय देवों वाले स्वर्ग के पालनकर्ता हो. यह सत्य है कि तुमने अपनी
महत्ता से धरती और आकाश के मध्यभाग को पूरित कर दिया है, इसलिए तुम्हारे समान
दूसरा कोई नहीं है. (१३)
न यस्य द्यावापृथिवी अनु व्यचो न सिन्धवो रजसो अन्तमानशुः.
नोत स्ववृष्टिं मदे अस्य युध्यत एको अन्यच्चकृषे विश्वमानुषक्.. (१४)
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जिस इंद्र के विस्तार को आकाश और पृथ्वी नहीं पा सके हैं, आकाश के ऊपर होने
वाला जलप्रवाह जिस इंद्र के तेज का अंत नहीं जान सका, हे इंद्र! समस्त प्राणी समुदाय
उसी तरह तुम्हारे अपने वश में है. (१४)
आर्चन्नत्र मरुतः सस्मिन्नाजौ विश्वे देवासो अमदन्ननु त्वा.
वृत्रस्य यद्भृष्टिमता वधेन नि त्वमिन्द्र प्रत्यानं जघन्थ.. (१५)
हे इंद्र! इस युद्ध में मरुद्गणों ने तुम्हारी अर्चना की थी. जिस समय तुमने तेज धार वाले
वज्र से वृत्र के मुख पर चोट की, उस समय समस्त देव संग्राम में तुम्हें आनंद प्राप्त करता
हुआ देखकर प्रसन्न हो रहे थे. (१५)
सूक्त—५३ देवता—इंद्र
न्यू३ षु वाचं प्र महे भरामहे गिर इन्द्राय सदने विवस्वतः.
नू चिद्धि रत्नं ससतामिवाविदन्न दुष्टुतिर्द्रविणोदेषु शस्यते.. (१)
हम महान् इंद्र के लिए शोभन स्तुतियों का प्रयोग करते हैं, क्योंकि परिचर्या करने वाले
यजमान के घर में इंद्र की स्तुतियां की जाती हैं. जिस प्रकार चोर सोए हुए लोगों की संपत्ति
छीन लेते हैं, उसी प्रकार इंद्र असुरों के धन पर तुरंत अधिकार कर लेते हैं. धन देने वालों के
विषय में अनुचित स्तुति नहीं की जाती. (१)
दुरो अश्वस्य दुर इन्द्र गोरसि दुरो यवस्य वसुन इनस्पतिः.
शिक्षानरः प्रदिवो अकामकर्शनः सखा सखिभ्यस्तमिद्रं गृणीमसि.. (२)
हे इंद्र! तुम अश्व, गो एवं जौ आदि धान्य के देने वाले हो. तुम निवास हेतु धन के स्वामी
एवं सबके पालक हो. तुम दान के नेता एवं प्राचीन देव हो. तुम हवि देने वाले यजमानों की
इच्छाओं को अभिमत फल देकर पूरा करते हो तथा उनके लिए मित्र के समान अत्यंत प्रिय
हो. हम इस प्रकार के इंद्र के लिए स्तुति वचनों का प्रयोग करते हैं. (२)
शचीव इन्द्र पुरुकृद्द्युमत्तम तवेदिदमभितश्चेकिते वसु.
अतः संगृभ्याभिभूत आ भर मा त्वायतो जरितुः काममूनयीः.. (३)
हे इंद्र! तुम प्रज्ञावान् वृत्रवधादि अनेक कर्मों के कर्त्ता एवं अतिशय तेजस्वी हो. हम यह
जानते हैं कि सर्वत्र वर्तमान धन तुम्हारा है. हे शत्रुनाशक इंद्र! इसलिए हमें धन दो. जो स्तोता
तुम्हें चाहते हैं, उनकी अभिलाषा को अपूर्ण मत रहने दो. (३)
एभिर्द्युभिः सुमना एभिरिन्दुभिर्निरुन्धानो अमतिं गोभिरश्विना.
इन्द्रेण दस्युं दरयन्त इन्दुभिर्युतद्वेषसः समिषा रभेमहि.. (४)
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हे इंद्र! हमारे द्वारा दिए हुए पुरोडाशादि हव्य एवं सोमरस से प्रसन्न होकर हमें गायों
और घोड़ों के साथ-साथ धन भी दो. इस प्रकार हमारी दरिद्रता मिटाकर तुम शोभन मन बन
जाओ. इंद्र इस सोमरस के कारण संतुष्ट होकर हमारी सहायता करेंगे तो हम दस्युओं का
नाश करके एवं शत्रुओं से छुटकारा पाकर इंद्र के द्वारा दिए हुए अन्न का उपभोग करेंगे. (४)
समिन्द्र राया समिषा रभेमहि सं वाजेभिः पुरुश्चन्द्रैरभिद्युभिः.
सं देव्या प्रमत्या वीरशुष्मया गोअग्रयाश्वावत्या रभेमहि.. (५)
हे इंद्र! हम धन और अन्न के साथ-साथ ऐसा बल भी प्राप्त करें, जो बहुतों का
आह्लादक एवं दीप्तिमान् हो. शत्रुविनाश में समर्थ तुम्हारी उत्तम बुद्धि हमारी सहायता करे.
तुम्हारी बुद्धि स्तोताओं को गाय आदि प्रमुख पशु एवं अश्व प्रदान करे. (५)
ते त्वा मदा अमदन्तानि वृष्ण्या ते सोमासो वृत्रहत्येषु सत्पते.
यत्कारवे दश वृत्राण्यप्रति बर्हिष्मते नि सहस्राणि बर्हयः.. (६)
हे सज्जनों के पालक इंद्र! जिस समय तुमने वृत्र असुर का वध किया, उस समय
तुम्हारे मादक मरुद्गण ने तुम्हें प्रमुदित किया था. तुम वर्षा करने में समर्थ हो. जब तुमने
शत्रुओं की बाधा को पार करके स्तुतिकर्त्ता एवं हव्यदाता यजमान के दस हजार उपद्रवों को
समाप्त किया था, उस समय चरुपुरोडाशादि हव्य एवं प्रसिद्ध सोमरस ने तुम्हें प्रसन्न किया
था. (६)
युधा युधमुप घेदेषि धृष्णुया पुरा पुरं समिदं हंस्योजसा.
नम्या यदिन्द्र सख्या परावति निबर्हयो नमुचिं नाम मायिनम्.. (७)
हे शत्रुध्वंसक इंद्र! तुम सदा युद्धशील रहते हो एवं अपने बल से शत्रुओं के एक नगर के
बाद दूसरे का विनाश करते हो. हे इंद्र! तुमने वज्र की सहायता से दूर देश में वर्तमान, प्रसिद्ध,
मायावी नमुचि नामक असुर का वध किया था. (७)
त्वं करञ्जमुत पर्णयं वधीस्तेजिष्ठ यातिथिग्वस्य वर्तनी.
त्वं शता वङ्गदस्याभिनत्पुरोऽनानुदः परिषूता ऋजिश्वना.. (८)
हे इंद्र! तुमने अतिथिग्व नामक राजा की सहायता करने के लिए तेज एवं शत्रुनाशक
आयुध से करंज एवं पर्णय नामक असुरों का वध किया था. ऋजिश्वान् नामक राजा ने वंगृद
असुर के सौ नगरों को चारों ओर से घेर लिया था. तुमने अकेले ही उन नगरों का विनाश कर
दिया था. (८)
त्वमेताञ्जनराज्ञो द्विर्दशाबन्धुना सुश्रवसोपजग्मुषः.
षष्टिं सहस्रा नवतिं नव श्रुतो नि चक्रेण रथ्या दुष्पदावृणक्.. (९)
असहाय सुश्रवा नामक राजा के साथ युद्ध करने के लिए साठ हजार निन्यानवे
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सहायकों के सहित बीस जनपद शासक आए थे. हे प्रसिद्ध इंद्र! तुमने शत्रुओं द्वारा अलंघ्य
चक्र से उन अनेक को पराजित किया था. (९)
त्वमाविथ सुश्रवसं तवोतिभिस्तव त्रामभिरिन्द्र तूर्वयाणम्.
त्वमस्मै कुत्समतिथिग्वमायुं महे राज्ञे यूने अरन्धनायः.. (१०)
हे इंद्र! तुमने पालकशक्ति द्वारा सुश्रवा एवं सूर्यवान् नामक राजाओं की रक्षा की थी.
तुमने कुत्स, अतिथिग्व एवं आयु नामक राजाओं को महान् एवं तरुण राजा सुश्रवा के अधीन
किया था. (१०)
य उद्दीचन्द्र देवगोपाः सखायस्ते शिवतमा असाम.
त्वां स्तोषाम त्वया सुवीरा द्राघीय आयुः प्रतरं दधानाः.. (११)
हे इंद्र! यज्ञ की समाप्ति पर उपस्थित देवों द्वारा पालित तुम्हारे मित्र तुल्य प्रिय एवं
अतिशय कल्याणपात्र हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. हम तुम्हारी दया से शोभन पुत्रों एवं उत्तम
दीर्घ जीवन को प्राप्त करें. (११)
सूक्त—५४ देवता—इंद्र

प्रभूत यशस्वी एवं शक्तिसंपन्न इंद्र के प्रति स्तुतिवचनों का उच्चारण करो. वे इंद्र शत्रुनाशक,
अश्वों द्वारा सेवित, कामनाएं पूर्ण करने वाले एवं वेगवान् हैं. (३)
त्वं दिवो बृहतः सानु कोपयोऽव त्मना धृषता शम्बरं भिनत्.
यन्मायिनो वन्दिनो मन्दिना धृषच्छितां गभस्तिमशनिं पृतन्यसि.. (४)
हे इंद्र! तुमने विशाल आकाश के ऊपर उठा हुआ प्रदेश कंपित कर दिया था एवं
शत्रुनाशक शक्ति द्वारा शंबर असुर का वध किया था. तुमने हर्षित एवं प्रगल्भ मन से तेज
धार वाले तथा चमकीले वज्र को मायावी असुर समूह की ओर चलाया था. (४)
नि यद्वृणक्षि श्वसनस्य मूर्धनि शुष्णस्य चिद्व्रन्दिनो रोरुवद्वना.
प्राचीनेन मनसा बर्हणावता यदद्या चित्कृणवः कस्त्वो परि.. (५)
हे इंद्र! तुम वायु के तथा जल सोखने वाले एवं फलों को पकाने वाले सूर्य के ऊपर वाले
प्रदेश में जल बरसाते हो. हे दृढ़ निश्चय एवं शत्रुविनाशक हृदय वाले इंद्र! आज आपने
पराक्रम दिखाया है, उससे स्पष्ट है कि आपसे बढ़कर कोई नहीं है. (५)
त्वमाविथ नर्यं तुर्वशं यदुं त्वं तुर्वीतिं वय्यं शतक्रतो.
त्वं रथेमेतशं कृत्व्ये धने त्वं पुरो नवतिं दम्भयो नव.. (६)
हे शतक्रतु! तुमने नर्य, तुर्वश, यदु एवं वय्य कुल में उत्पन्न तुर्वीति नामक राजाओं की
रक्षा की है. तुमने धन प्राप्ति के उद्देश्य से प्रारंभ संग्राम में रथ एवं एतश ऋषियों की रक्षा की
तथा शंबर असुर के निन्यानवे नगरों का ध्वंस किया है. (६)
स घा राजा सत्पतिः शूशुवज्जनो रातहव्यः प्रति यः शासमिन्वति.
उक्था वा यो अभिगृणाति राधसा दानुरस्मा उपरा पिन्वते दिवः.. (७)
वे ही यजमान सुशोभित होकर सज्जनों के पालन के साथ-साथ अपनी भी वृद्धि करते
हैं, जो इंद्र को हव्य प्रदान करके उनकी स्तुति करते हैं. अभिमत फलदाता इंद्र ऐसे ही लोगों
के लिए आकाश से मेघों द्वारा वर्षा करते हैं. (७)
असमं क्षत्रमसमा मनीषा प्र सोमपा अपसा सन्तु नेमे.
ये त इन्द्र ददृषो वर्धयन्ति महि क्षत्रं स्थविरं वृष्ण्यं च.. (८)
इंद्र का बल एवं बुद्धि अतुलनीय है. हे इंद्र! जो सोमपायी यजमान अपने यज्ञकर्म द्वारा
तुम्हारा महान् बल एवं स्थूल पौरुष बढ़ाते हैं, उनकी उन्नति हो. (८)
तुभ्येदेते बहुला अद्रिदुग्धाश्चमूसदश्चमसा इन्द्रपानाः.
व्यश्नुहि तर्पया काममेषामथा मनो वसुदेयाय कृष्व.. (९)
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