सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 247, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 247

जिस इंद्र के विस्तार को आकाश और पृथ्वी नहीं पा सके हैं, आकाश के ऊपर होने
वाला जलप्रवाह जिस इंद्र के तेज का अंत नहीं जान सका, हे इंद्र! समस्त प्राणी समुदाय
उसी तरह तुम्हारे अपने वश में है. (१४)
आर्चन्नत्र मरुतः सस्मिन्नाजौ विश्वे देवासो अमदन्ननु त्वा.
वृत्रस्य यद्भृष्टिमता वधेन नि त्वमिन्द्र प्रत्यानं जघन्थ.. (१५)
हे इंद्र! इस युद्ध में मरुद्गणों ने तुम्हारी अर्चना की थी. जिस समय तुमने तेज धार वाले
वज्र से वृत्र के मुख पर चोट की, उस समय समस्त देव संग्राम में तुम्हें आनंद प्राप्त करता
हुआ देखकर प्रसन्न हो रहे थे. (१५)
सूक्त—५३ देवता—इंद्र
न्यू३ षु वाचं प्र महे भरामहे गिर इन्द्राय सदने विवस्वतः.
नू चिद्धि रत्नं ससतामिवाविदन्न दुष्टुतिर्द्रविणोदेषु शस्यते.. (१)
हम महान् इंद्र के लिए शोभन स्तुतियों का प्रयोग करते हैं, क्योंकि परिचर्या करने वाले
यजमान के घर में इंद्र की स्तुतियां की जाती हैं. जिस प्रकार चोर सोए हुए लोगों की संपत्ति
छीन लेते हैं, उसी प्रकार इंद्र असुरों के धन पर तुरंत अधिकार कर लेते हैं. धन देने वालों के
विषय में अनुचित स्तुति नहीं की जाती. (१)
दुरो अश्वस्य दुर इन्द्र गोरसि दुरो यवस्य वसुन इनस्पतिः.
शिक्षानरः प्रदिवो अकामकर्शनः सखा सखिभ्यस्तमिद्रं गृणीमसि.. (२)
हे इंद्र! तुम अश्व, गो एवं जौ आदि धान्य के देने वाले हो. तुम निवास हेतु धन के स्वामी
एवं सबके पालक हो. तुम दान के नेता एवं प्राचीन देव हो. तुम हवि देने वाले यजमानों की
इच्छाओं को अभिमत फल देकर पूरा करते हो तथा उनके लिए मित्र के समान अत्यंत प्रिय
हो. हम इस प्रकार के इंद्र के लिए स्तुति वचनों का प्रयोग करते हैं. (२)
शचीव इन्द्र पुरुकृद्द्युमत्तम तवेदिदमभितश्चेकिते वसु.
अतः संगृभ्याभिभूत आ भर मा त्वायतो जरितुः काममूनयीः.. (३)
हे इंद्र! तुम प्रज्ञावान् वृत्रवधादि अनेक कर्मों के कर्त्ता एवं अतिशय तेजस्वी हो. हम यह
जानते हैं कि सर्वत्र वर्तमान धन तुम्हारा है. हे शत्रुनाशक इंद्र! इसलिए हमें धन दो. जो स्तोता
तुम्हें चाहते हैं, उनकी अभिलाषा को अपूर्ण मत रहने दो. (३)
एभिर्द्युभिः सुमना एभिरिन्दुभिर्निरुन्धानो अमतिं गोभिरश्विना.
इन्द्रेण दस्युं दरयन्त इन्दुभिर्युतद्वेषसः समिषा रभेमहि.. (४)
ebook converter DEMO Watermarks*