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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

( १७ )
अंघ्रुल कोलिविकि भूतलंबुन निंडि पोलुपारे जूड हरिपाद मुन वृष्टि अय्यादि गंग
धरणि पै बरगुविधवच्चु पडग वरिकिप राम भूपालकुंड़पुडु हरुडुविष्णुवु, दानयनु
माड्रिकिनुंडे ।
(भरत ने निर्मलचेता एवं सदाचार-संपन्न वसिष्ठ, गौतम, जाबालि, कश्यप, गर्ग,
वामदेव आदि मुनीश्वरो को तथा चतुर्वेद-पारंगत विबुधो को बुलाकर विनय एव भक्ति
के साथ उनसे कहा--'आप कृपया विधिवत् श्रीराम का राजतिलक कीजिए ।' तब
मंगल-वाद्यो की ध्वनि के साथ वे जानकी तथा राम को बुला लाये और रमणीय रत्नपीठ
पर उन दोनो को आसीन कराया और वेदमंत्र-पूर्वक पुण्य सलिल से उनका अभिषेक
किया । राम के मस्तक पर से गिरनेवाली वह पुण्य जलधारा देखने में बहुत ही रमणीय
प्रतीत होती थी। देवताओ की स्तुतियो को प्राप्त करते हुए पार्वती के साथ विलसित
होनेवाले परमशिव की जटा से झरनेवाली गंगा नदी की भाँति वह जलधारा अत्यत
कमनीय दीख रही थी । वह (जलधारा) क्रमशः उनके चरणो से होकर पृथ्वी पर
ऐसे गिरने लगी, मानो विष्णु के चरणो में जन्म लेकर पवित्र गगा पृथ्वी पर उतर
रही हो। इस प्रकार, उस समय रामचन्द्र स्वयं विष्णु तथा शिव की भाँति
शोभायमान हुए ।)
मुहावरों का सम्यक् प्रयोग, भावो के अनुकूल भाषा, स्वाभाविक अनुप्रासो की
छटा, उक्ति-सौंदर्य तथा ओज, प्रसाद एवं माधुर्य गुणों से युक्त शैली, ये सभी कवि के
विलक्षण पांडित्य तथा कवित्व-शक्ति का परिचय देते हैं।
वैसे तो अनुवाद का कार्य ही कुछ कठिन है; क्योकि कितना भी प्रयत्न किया जाय,
मूल की सुन्दरता अनुवाद में नहीं आ सकती । एक भाषा की श्रेष्ठ कलाकृति का दूसरी
भाषा के गद्य में सरस अनुवाद प्रस्तुत करना स्वभावत. कठिन कार्य है । तेलुगु और
हिन्दी दो भिन्न भाषा-परिवार की भाषाएँ हैं और उनके अपने-अपने मुहावरे हैं। मुहावरो
का अनुवाद तो हो नहीं सकता। हाँ, यह प्रयत्न अवश्य हो सकता है कि तेलुगु मुहावरे
का मिलता-जुलता हिन्दी-मुहावरा का उपयोग किया जाय। फिर भी, अनुवाद अनुवाद ही है।
अनुप्रास, यमक आदि अलकारो का सौंदर्य एवं उक्ति-वैचित्र्य आदि अनुवाद में लाना
कठिन है । उदाहरण के लिए--
तोगलु वेट्टितुमु दुष्टारि सतुल, तोगलु जानकि इक तोल पग
तोगलार ! इकभीव तोग येष्ट्रि दनुचु, तोगतेल्ल चिदिभि वैतु रु पेच्चु पेरिगि।
'तोग' के कई अर्थ हैं--दुख, कष्ट, धक्ल। यहाँ कवि ने यमक अलकार के
द्वारा 'तोग' शब्द के प्रयोग से भिन्न-भिन्न अर्थो की अभिव्यञ्जना की हैं; किन्तु यह सुन्दरता
अनुवाद में लाना असभव है ।
फिर भी, अनुवादक ने मूल के प्रति निष्ठा बरतते हुए यथा.सभव मूल रचना की
सुंदरता को अनुवाद में लाने की भरपूर चेष्टा की है। उसे कहाँतक सफलता मिली है,
इसका मूल्याकन करना सहृदय पाठको का काम है ।

( १८ )
मैं अंत में दक्षिण-भारत-हिन्दी-प्रचार-सभा के भूतपूर्व संयुक्त मंत्री परम आदरणीय
पडित अवधनंदनजी के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करता हूँ, जो इस ग्रन्थ के
संपादन का कार्य बडी दक्षता के साथ संपन्न करते हुए लगातार मेरी सहायता करते रहे।
में विहार-राष्ट्रभाषा-परिषद् का भी आभार मानता हूँ, जिसने मुझे इस कार्य
के लिए योग्य समझकर मेरे द्वारा यह अनुवाद कराया । यदि यह ग्रन्थ हिन्दी-भाषा-
भाषियो को तेलुगु की विपुल साहित्य-संपत्ति का किंचित् भी आभास करा सकेगा, तो में
अपने परिश्रम को सफल मानूंगा ।
श्रीरामनावमी
ता० १६, शके १८८२ } ए० सी० कामाक्षि राव
५-४-१९६० ई०

विषयानुक्रमणी
परिचय १-३
प्रस्तावना ५-६५
बालकांड १-६९
१ देवस्तुति--३, २ ग्रन्थ-रचना का कारण--४, ३ कथा का प्रारम्भ--६,
४ कुश-लव का रामायण-गान--६, ५ पुत्रकामेष्टियज्ञ करने के लिए दशरथ का मन्त्रियो
से परामर्श--६, ६ ऋष्यशृंग का वृत्तान्त--१०, ७ वेश्याओ के साथ ऋष्यशृंग का
रोमपाद के घर आना--१२, ८ दशरथ का यज्ञदीक्षा लेना--१४, ९ रावण के अत्या-
चारो के बारे में ब्रह्मा से देवताओ की शिकायत--१४, १० देवताओ का विष्णु की
स्तुति करना--१५, ११ दशरथ को यज्ञपुरुष का पायस देना--१६, १२ देवताओ को
वानरो के रूप में जन्म लेने के लिए ब्रह्मा की सलाह--१६, १३ श्रीराम आदि का
जन्म--१७, १४ श्रीरामादि का बचपन--१८, १५ विश्वामित्र का आगमन--१८,
१६ यज्ञ की रक्षा के लिए श्रीराम को भेजने के लिए राजा से विश्वामित्र की प्रार्थना--१६,
१७ राम-लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेजने के लिए वसिष्ठ की सम्मति--२०,
१८ विश्वामित्र के साथ राम-लक्ष्मण को भेजना--२१, १६ अनगाश्रम का
वृत्तान्त--२१, २० विश्वामित्र का श्रीरामचन्द्र को ताडका का वृत्तान्त सुनाना--२२,
२१ ताडका का वध--२३, २२ विश्वामित्र का श्रीराम को भृशाश्व-सतान-रूपी शस्त्र
देना--२४, २३ कौशिक का श्रीराम को सिद्धाश्रम का वृत्तात सुनाना--२६, २४
विश्वामित्र का यज्ञ--२६, २५ कौशाबी का वृत्तात-२८, २६ गगा नदी का वृत्तात--३३,
२७ गगावतरण की कथा--३५, २८ अमृत-मथन की कथा--३६, २६ गौतम
के आश्रम का वृत्तात--४२, ३० मिथिला में आगमन--४३, ३१ विश्वामित्र की
शवित का परिचय--४४, ३२ शिव-धनुष का वृत्तात--५३, ३३ शिव-धनुर्भंग--५४,
३४ दशरथ का वशक्रम--५८, ३५ राजा जनक की वशावली--६०, ३६ सीता
और राम का विवाह--६३, ३७ परशुराम का गर्व-भग--६५, ३८ अयोध्या
में प्रवेश--६८ ।
अयोध्याकांड ७१-१२२
१ रामराज्याभिषेक का सकल्प--७३, २ मथरा की कुमत्रणा--७६, ३ कैकेयी
के महल में दशरथ का आगमन--७८, ४ दशरथ से कैकेयी का वर मांगना--८०,

( २० )
५ कैकेयी के भवन में राम का दशरथ से भेंट करना—८२, ६ कौसल्या का दुख—८४;
७ लक्ष्मण का क्रोध और राम का समझाना—८५, ८ राम का कौसल्या
को धैर्य देना—८७, ९ राम का अभिषेक-भंग का वृत्तांत सीता को सुनाना—८८;
१० राम का सीता तथा लक्ष्मण को भी साथ चलने की अनुमति देना—६०, ११ राम-
लक्ष्मण का सम्पत्ति-दान—६१, १२ त्रिजटाख्य को राम का गायो का दान देना—६१;
१३ सीता-लक्ष्मणसहित रामका दशरथ के दर्शनार्थ जाना—६२, १४ कैकेयी पर वसिष्ठ
का क्रोध—६५, १५ राम का दशरथ को सांत्वना देना—६६, १६ सीता को सीख
देना—६६, १७ राम का वन-गमन—६७, १८ गुह से राम की भेंट—१००, १९
राम का गगा पार करके वन में प्रवेश करना—१०२, २० काकासुर-वृत्तान्त—१०३,
२१ सुमंत्र का अयोध्या पहुँचना—१०३, २२ दशरथ का कौसल्या को अपने शाप का
वृत्तांत सुनाना—१०४, २३ दशरथ का स्वर्गवास—१०८, २४ भरत का अयोध्या में
प्रवेश—११०, २५ भरत का कौसल्या के घर जाना—१११, २६ भरत का राम के
पास जाना—११३, २७ भरत का भरद्वाज के आश्रम में पहुँचना—११४, २८ भरत
की राम से भेंट—११६, २९ भरत का राम को दशरथ की मृत्यु का समाचार देना—११७,
३० श्रीराम को जाबालि का उपदेश—१२०, ३१ पादुका-दान—१२० ।
अरण्यकांड १२३-१७०
१ चित्रकूट से प्रस्थान—१२५, २ राम का दण्डक वन की यात्रा करना—
१२६, ३ विराध का वध—१२६, ४ श्रीराम का शरभंग के आश्रम में पहुँचना—१२७,
५ श्रीराम का सुनीक्षण मुनि के आश्रम में पहुँचना—१२८, ६ मदकर्णी का वृत्तांत—
१३०, ७ अगस्त्य से भेंट—१३०, ८ जटायु से मित्रता—१३२, ९ हेमंत-वर्णन—
१३२, १० जवुमालि का वृत्तांत—१३३, ११ शूर्पणखा का वृत्तांत—१३६; १२ खर-
दूषण का वध—१३६, १३ लका में अकपन तथा रावण का वार्त्तालाप—१४५;
१४ शूर्पणखा का रावण से दीनालाप—१४६, १५ रावण का पुन मारीच के पास
जाना—१४७, १६ मारीच का पुन उद्बोधन—१४८, १७ मारीच का माया-मृग के
रूप में आना—१४६, १८ राम का माया-मृग का पीछा करना—१५१, १९ भिक्षुक
के वेश में रावण का सीता के पास आना—१५३, २० जानकी का शोक—१५५,
२१ जटायु और रावण का युद्ध—१५६, २२ जानकी को अशोकवन में रखना—१५६,
२३ श्रीराम का दुख—१५६, २४ लक्ष्मण का राम को सांत्वना देना—१६३, २५
जटायु का अग्नि-संस्कार करना—१६५, २६ कबध का वध—१६६, २७ राम-लक्ष्मण
की शबरी से भेंट—१६७, २८ श्रीराम का ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचना—१६८।
किष्किंधाकांड १७१-२१०
१ पंपासर-दर्शन—१७३, २ हनुमान की राम से भेंट—१७५, ३ हनुमान् का
अपने जन्म का वृत्तांत सुनाना—१७६; ४ सुग्रीव का सीताके आभूषणो को देना—१७८,

( २१ )
५ वालि-सुग्रीव का द्वंद्व-युद्ध--१८३ ; ६ तारा का वालि को रोकना--१८४ ;
७ वालि का सहार--१८७, ८ तारा का शोक--१८६; ९ वालिका सुग्रीव को उपदेश
देना--१६१, १० सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बनाना--१६२, ११ राम का माल्य-
वत पर पहुँचना--१६३, १२ लक्ष्मण का किष्किंधा में जाना--१६५; १३ सुग्रीव का
माल्यवत पर पहुँचना--१६७, १४ सीता के अन्वेषण के लिए सुग्रीव का वानरो को
भेजना--१६८, १५ हनुमान् को मुद्रिका देना--१६६, १६ महर्षि कडु के आश्रम
में--२०१, १७ स्वयंप्रभा का सत्कार--२०२, १८ वानरो की व्याकुलता--२०३,
१६ सपाति से भेंट--२०४, २० सीता का पता बताना--२०५, २१ वानरो का
अपनी शक्ति का परिचय देना--२०६, २२ समुद्र लाँघने के लिए हनुमान् को प्रेरित
करना--२०७, २३ समुद्र पार करना--मैनाक से भेंट--२०८ ।
सुन्दरकांड २१९-२४६
१ हनुमान् का लका में प्रवेश--२१३, २ लकिणी का हनुमान् को रोकना--
२१४, ३ हनुमान् का लका में सीता का अन्वेषण -- २१५, ४ हनुमान् का रावण
के अत पुर में प्रवेश करना--२१६, ५ हनुमान् का रावण के उद्यान में जाना--२१८,
६ हनुमान् की सीता से भेंट--२१६, ७ सीता से रावण का प्रलाप--२२०, ८ सीता
का रावण की निन्दा करना--२२२, ६ मन्दोदरी का रावण को उपदेश--२२३;
१० राक्षसियो का सीता को दुख देना--२२४, ११ त्रिजटा का स्वप्न--२२४,
१२ हनुमान् का सीता को राघवो का वृत्तात सुनाना--२२५, १३ हनुमान् का सीता
को राम की अँगूठी देना--२२६, १४ सीता का सदेह--२२६, १५ अशोकवन का
ध्वस--२३०, १६ हनुमान् का राक्षसो का वध करना--२३१, १७ अक्षयकुमार का
हनुमान् पर आक्रमण करना--२३५, १८ इन्द्रजीत का हनुमान् को वन्दी बनाना--
२३७, १६ हनुमान् का रावण को अपने आगमन का कारण बताना--२३८, २०
लका-दहन--२३६, २१ अगद आदि वानरो से हनुमान् की भेंट--२४२, २२ वानरो का
मधुवन में विचरण करना--२४३, २३ राम को सीता का कुशल-समाचार सुनाना-२४४।
युद्धकांड २४७-४७७
१ श्रीराम का हनुमान् की प्रशसा करना--२४६, २ लका के वैभव का वर्णन--
२५०, ३ कपि-सेनाओ की युद्ध-यात्रा--२५२, ४ महेन्द्र पर्वत से राम का समुद्र
को देखना--२५३, ५ सध्या-वर्णन--२५४, ६ मत्रियो के साथ रावण की मत्रणा--
२५५, ७ दानव-वीरो के दर्पपूर्ण वचन--२५६, ८ राक्षस-वीरो को विभीषण का
उपदेश--२५७, ६ रावण को विभीषण का हितोपदेश--२५८, १० कुभकर्ण को सीता-
पहरण का वृत्तात सुनाना--२६०, ११ इन्द्रजीत का विभीषण को अपने पराक्रम का
परिचय देना--२६२; १२ विभीषण द्वारा इन्द्रजीत के दभ की निंदा--२६२, १३
रावण का विभीषण को नगर से निर्वासित करना--२६३, १४ विभीषण का अपनी
माता के भवन में जाना--२६५, १५ विभीषण की शरणागति--२६६, १६ हनुमान

( २२ )
का विभीषण की योग्यता राम को समझाना—२६७, १७ विभीषण की स्तुति—२६८;
१८ त्रिकूट पर्वत की उत्पत्ति की कथा—२६६, १६ विभीषण का राम को रावण के
वैभव का परिचय देना—२६६, २० राम का विभीषण को लका का राजा बनाना—
२७१, २१ शुक का सन्देश—२७१, २२ गम का दर्भ-शयन—२७२, २३ राम का
समुद्र पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना—२७३, २४ समुद्र का राम से प्रार्थना करना—
२७५, २५ सेतु-बन्धन के लिए राम का सुग्रीव को आज्ञा देना—२७६, २६ सेतु-
बन्धन—२७७, २७ चन्द्रोदय का वर्णन—२७७, २८ गिलहरी की भक्ति—२७६,
२६ सेतु को देखकर राम का हर्षित होना—२८०, ३० राघवो का सुवेलाद्रि पर
पहुँचना—२८१, ३१ कैकसी का हितोपदेश—२८२, ३२ शुक तथा सारण का राम की
सैन्य-शक्ति का परिचय पाना—२८४, ३३ सारण का रावण को कपियों का परिचय
देना—२८५, ३४ शुक का रावण को राम का पराक्रम सुनाना—२८७, ३५ राम के
माया-धनुष तथा सिर दिखाकर सीता को भयभीत करना—२८८, ३६ माल्यवान् का
हितोपदेश—२६०, ३७ सुवेलाद्रि पर से राम-लक्ष्मण का लका को देखना—२६२,
३८ रावण तथा सुग्रीव का द्वंद्व-युद्ध—२६३, ३६ अंगद का दौत्य—२६५, ४० रावण
का अपना वैभव प्रदर्शित करना—२६७, ४१ रामका रावणके छत्र-चामरो पर अस्त्र
चलाना—२६८; ४२ रावण का राम की धनुर्विद्या का प्रशसा करना—२६६, ४३
वानरोका लका ध्वंस करना—२६६, ४४ राक्षसो तथा वानरो का भीषण संग्राम—
३००, ४५ युद्धभूमि का वर्णन—३०२, ४६ इन्द्रजीत का माया-युद्ध—३०४, ४७
नाग-पाशबद्ध दाशरथियो को देख सीता का दु खी होना—३०६, ४८ लक्ष्मण के लिए
राम का विलाप करना—३०८, ४६ विभीषण तथा अंगद का वानरो को धैर्य देना—
३०६, ५० नारद का आगमन—३१०, ५१ राघवो का नाग-पाश से मुक्त होना—
३१०, ५२ धूम्राक्ष का युद्ध—३१२, ५३ अकपन का युद्ध—३१३, ५४ महाकाय
का युद्ध—३१५, ५५ अंगद के द्वारा महाकाय का सहार—३१६, ५६ प्रहस्त का
युद्ध—३२०, ५७ नील के द्वारा प्रहस्त का वध—३२२, ५८ मदोदरी के हित-वचन—
३२३, ५६ मंदोदरी की मंत्रणा की उपेक्षा करना—३२४, ६० रावण का प्रथम
युद्ध—३२४, ६१ विभीषण का राम को राक्षस-वीरो का परिचय देना, ६२ हनुमान्
का रावण से युद्ध करके मूच्छित होना—३२७, ६३ नील का रावण से युद्ध करना—
३२८, ६४ रावण का ब्रह्मशक्ति से लक्ष्मण को गिराना—३२६, ६५ राम-रावण
का प्रथम युद्ध—३३०, ६६ रावण का खिन्न होकर लका लौट जाना—३३१;
६७ राक्षसो का कुंभकर्ण को जगाना—३३१, ६८ राघवो की युद्ध-यात्रा पर कुंभकर्ण का
क्रुद्ध होना—३३३, ६६ कुंभकर्ण का शाप-वृत्तान्त—३३५, ७० कुंभकर्ण का हितोपदेश—
३३६, ७१ रावण का कुंभकर्ण के उपदेश का तिरस्कार करना—३३८, ७२ कुंभ-
कर्ण की गर्वोक्तियाँ—३३६, ७३ कुंभकर्ण का युद्ध के लिए जाना—३४०, ७४ वानर-
कुंभकर्ण का युद्ध—३४१; ७५ कुंभकर्ण और हनुमान् का युद्ध—३४४, ७६ सुग्रीव
तथा कुंभकर्ण का युद्ध—३४५, ७७ कुंभकर्ण का मूर्च्छित सुग्रीव को लका ले जाना—३४५,
७८ कुंभकर्ण का वानर-सेना को तहस-नहस करना—३४६, ७६ विभीषण कुंभकर्ण और का

( २३ )
वार्त्तालाप—३४८, ८० श्रीराम के द्वारा कुभकर्ण का सहार—३५०; ८१ कुभकण की
मृत्यु पर रावण का शोक—३५१, ८२ अतिकाय तथा महोदर आदि राक्षसो की युद्ध-
यात्रा--३५२, ८३ अगद तथा नरातक का द्वद्व-युद्ध--३५५, ८४ देवांतक तथा त्रिशिर
का अंगद पर आक्रमण करना--३५६, ८५ हनुमान् आदि वीरो के द्वारा त्रिशिर आदि
राक्षसो का वध--३५६, ८६ अतिकाय का युद्ध--३५७, ८७ लक्ष्मण तथा अतिकाय
का द्वन्द्व-युद्ध—३६०, ८८ अतिकाय का वध—३६१, ८६ इद्रजीत का द्वितीय युद्ध—
३६२, ६० ब्रह्मास्त्र से इन्द्रजीत का राम-लक्ष्मण आदि को मूर्च्छित करना—३६४;
६१ हनमान् का ओषधी-शैल लाकर वानरो की मूर्च्छा दूर करना—३६६, ६२ वानरो
का लका जलाना--३६८, ६३ कुभ-निकुभ का युद्ध के लिए प्रस्थान--३६६, ६४
सुग्रीव के द्वारा कुभ का वध--३७२, ६५ मकराक्ष का युद्ध--३७३, ६६ इन्द्रजीत
का तृतीय युद्ध--३७४, ६७ इन्द्रजीत का होम करना तथा कृति नामक शक्ति प्राप्त
करना—३७५, ६८ रामका आग्नेय अस्त्र से इन्द्रजीत की मायाको दूर करना—
३७६, ६६ इन्द्रजीत का यज्ञ करके रथ प्राप्त करना—३७८, १०० इन्द्रजीत का
माया-सीता का सिर काटना—३८१, १०१ इन्द्रजीत का निकुभिल-यज्ञ करना—३८२,
१०२ लक्ष्मण का शोक—३८३, १०३ इन्द्रजीत की माया को विभीषण का राघवो
को समझाना—३८४, १०४ लक्ष्मण का युद्ध के लिए प्रस्थान--३८५, १०५ निकुभिल-
होम में विघ्न--३८५, १०६ लक्ष्मण तथा इन्द्रजीत का परस्पर तिरस्कार के
वचन कहना—३८६, १०७ इन्द्रजीत तथा लक्ष्मण का युद्ध—३८७, १०८ इन्द्रजीत
का वध—३६०, १०६ इन्द्रजीत की मृत्यु पर रावण का शोक—३६३, ११० रावण
का सीता का वध करने के लिए जाना--३६४, १११ इन्द्रजीत की स्त्री सुलोचना
का शोक—३६५, ११२ सुलोचना का राम की स्तुति करना--३६७, ११३ सुलोचना
का सहगमन--३६६, ११४ रावण का अपनी प्रधान सेना को युद्ध के लिए भेजना--
४००, ११५ वानर-सेना को हनुमान् आदि का प्रोत्साहन देना--४०२, ११६ राक्षस-
स्त्रियो का रावण की निन्दा करना—४०३, ११७ रावण का द्वितीय युद्ध—४०५,
११८ सुग्रीव के द्वारा विरूपाक्ष आदि राक्षसो का वध--४०७, ११९ रावण का राघवौं
पर आक्रमण करना--४०६, १२० रावण की शक्ति से लक्ष्मण का मूर्च्छित होना—
४११, १२१ रावण का चितित होना—४१२, १२२ लक्ष्मण की मूर्च्छा पर राम का
शोक—४१४, १२३ सजीवनी लाने के लिए हनुमान् का द्रोणाद्रि को जाना—४१५,
१२४ कालनेमि का वृत्तात—४१६, १२५ मकरी का हनुमान् को निगल जाना--४१८,
१२६ धान्यमालिनी का वृत्तात—४१६, १२७ कालनेमि का वध—४२१, १२८ भरत
का स्वप्न--४२२, १२६ हनुमान् का माल्यवान् से युद्ध करना—४२३, १३० लक्ष्मण
के लिए राघव का शोक—४२४, १३१ हनुमान् का द्रोण-पर्वत ले आना—४२६,
१३२ सजीवकरणी से लक्ष्मण की मूर्च्छा दूर होना—४२७, १३३ रावण का शुक्राचार्य
से परामर्श करना—४२६, १३४ पाताल-होम--४२६, १३५ अगद का मदोदरी को
रावण के पास घसीटकर लाना—४३१, १३६ रावण को मन्दोदरी का राघव की

( २४ )

महिमा बताना-४३३; १३७ रावण का तृतीय युद्ध के लिए प्रस्थान-४३५; १३८
वानरो के द्वारा खडगरोम आदि राक्षसो का वध-४३७, १३६ इन्द्र का मातलि के
द्वारा राम को रथ भेजना-४३८, १४० राम का रावण के बाणो का प्रतिवाण चलाना-
४४०, १४१ रावण का राम पर शूल चलाना-४४०, १४२ अगस्त्य के द्वारा
राम को आदित्यहृदय का उपदेश-४४१, १४३ राम-रावण का परस्पर दोषारोपण-
४४२; १४४ रावण की मूर्च्छा-४४३, १४५ रामका रावण के कर चरणो को खडित
करना-४४५, १४६ आग्नेय अस्त्र के प्रयोग से रामका रावण को शक्तिहीन कर
देना-४४७, १४७ ब्रह्मास्त्र से रावण का वध-४४८, १४८ विभीषण का शोक-
४४६, १४६ मृत रावण के निकट मदोदरी का आना-४४६, १५० मदोदरी का
विलाप-४५१; १५१ राम का विभीषण के द्वारा रावण की अंत्येष्टि कराना-४५३;
१५२ विभीषण का राजतिलक-४५४, १५३ हनुमान् का सीता को राम की विजय
का समाचार देना-४५४; १५४ राम के आदेश से विभीषण का सीता को लिवा
लाना-४५५; १५६ सीता का अग्नि-प्रवेश-४५७, १५७ सीता-परिग्रहण — ४५८;
१५८ दशरथ के दर्शन-४५६, १५६ देवताओ का अभिनन्दन-४६०, १६० पुष्पक-
आरोहण-४६१; १६१ श्रीराम का सीता को विभिन्न दृश्यो को दिखाकर समझाना-
४६२; १६२ राम के द्वारा शिवलिंग का प्रतिष्ठापन-४६३, १६३ श्रीराम का
सेतु की महिमा बताना-४६५; १६४ भरद्वाज मुनिका आतिथ्य-४६७, १६५ हनुमान्
का भरत को राघवो का कुशल-समाचार सुनाना-४६६, १६६ भरत-मिलाप-४७१,
१६७ अयोध्या में प्रवेश-४७३; १६८ राजतिलक-४७४; १६६ मित्रो को प्रीतिभोज
देना-४७५ ।

रंगनाथ रामायण

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बालकाण्ड एवं अयोध्याकाण्ड (दक्षिण भारतीय प्रसंग सहित)

श्रीरंगनाथ रामायण
(बालकांड)

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१. देव-स्तुति
चरित रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तर ।
एकैकमक्षर प्रोक्त महापातकनाशनम् ॥
रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे,
रघुनाथाय नाथाय सीताया पतये नम ॥
श्रीलक्ष्मीनाथ, दैत्य-विजयी, लोक-रक्षक, नित्य, सदानंद, मोक्षदायक, कर्म-रहित, सृष्टि
के स्वयंभूत आधार, हृदय-कमल में स्थित भक्ति-रूपी आनन्द को व्यक्त करने के साधन-क्रम में
तत्पर भूमर-रूपी भगवान्, गजराज को मोक्ष प्रदान करनेवाले, अपने आश्रित-लोक के वंधु,
मसार के बंधनो से मुक्ति देनेवाले, वलि को बाँधने का दृढ़ सकल्प करनेवाले, प्रणव-रूप,
गोपिकाओ के हृदय में विहार करनेवाले, अबोध-गम्य आकारवाले, निराकार, योगियो के
हृदय में ओंकार-रूप में वर्त्तमान, योगिसदर्शित, मोक्ष-प्रचारक, श्रुतियो के शिरोमणि, विशुद्ध-चैतन्य
स्वरूप, अतिलोकवासी, समस्त लोको का आश्रय, ब्रह्माण्डरूपी मुक्ता का आयतन, नित्याधार,
अखिल तत्त्वातीत, आदि-अन्त-रहित, पवित्रात्मा, अविनाशी, वेद-रूपी कमल के लिए सूर्य,
अक्षीण कल्याणो का आधार, निश्शंक मन से सद्भक्ति तथा सेवा करनेवाले भक्तो के लिए
दया-सिंधु, करुणा-सिंधु, बोधक, बोध्य तथा बोध—इन तीनो में व्यक्त होनेवाले पूर्ण-रूप,

४ रंगनाथ रामायण
आदितत्त्व, 'तत्त्वमसि' आदि कथनानुसार भेदातीत, अभेद, प्रतापी परमेश्वर का (भक्ति-युक्त
ध्यान करने के निमित्त) मैने अत्यंत धैर्य के साथ नियमो का पालन किया, कर्म के बंधनो
को ठुकराया, एकांत में रहते हुए इन्द्रिय-व्यापारो को भुला दिया, सुस्थिर होकर सुलभ-
साध्य तथा परिचित आसन (सुखासन) पर उपविष्ट हुआ, मन को भक्ति-रस-परिपूर्ण
बनाया, (शरीर के भीतर रहनेवाली) बहत्तर नाडियो का विचार करके उनका परिमार्जन किया,
एकचित्त तथा निर्मल मन से नाडियो में अत्यंत सूक्ष्म रूप से व्याप्त पवन को रोका,
मन को निश्चल बनाकर निरुद्ध प्राण-वायु को मूलाधार-चक्र में प्रविष्ट कराया और उसे
क्रमशः छह कमलो को पार कराते हुए चंद्रमंडल में पहुँचाया । वहाँ योगीन्द्रो के हृदय का
भेद परखने के लिए परम-व्योम के रूप में स्थित अनादि ब्रह्म-स्वरूपा, अत्यंत सूक्ष्म तथा
निर्मल नाडी को यूप, अविचल मन को यज्ञ-पशु, निष्ठानुरक्ति को वेदी, समस्त इन्द्रियो को
काष्ठ, ज्ञान को अखंड अग्नि तथा आनंद-योग को यज्ञ-फल के रूप में मानते हुए इच्छित-
आनंद-प्राप्ति के हेतु, कर्म के द्वारा प्राप्त होनेवाले मोक्ष रूपी परमेश्वर, अगोचर, कर्म-रहित,
हमारे देव, कमलनेत्रवाले, हमारे पालनहार, आदि नारायण तथा अखिल लोकार्थेश की
भक्ति, स्तुति, प्रार्थना एवं वंदना की । अपने मन की इच्छा पूर्ण करने के निमित्त हार,
कर्पूर, नीहार, गोक्षीर तथा तारको के सदृश उज्ज्वल शारदा देवी की उपासना की; चारु
रामायण-रूपी चंद्र के जन्म-स्थान के रूप में विलसित होनेवाले वाल्मीकि का स्मरण किया,
भारत-रूपी मंजरी के पारिजात, तत्त्ववेत्ता पराशर-पुत्र का स्मरण किया और उनके पुत्र
शुकदेव की बडी भक्ति से स्तुति करने के पश्चात् मैं अपने मन में एक ऐसे ग्रन्थ की रचना
करने का विचार करने लगा, जिसकी कथा के कथन से सभी सज्जन मेरा कीर्त्ति-गान करेंगे,
जिसकी कथा का वर्णन करने से मेरे इह-लोक और पर-लोक दोनो सफल होगे और जिस
कथा के कथन से ईप्सितार्थ सिद्ध होगे और साथ-ही-साथ पुण्य की प्राप्ति होगी ।
२. ग्रन्थ-रचना का कारण
सृष्टि के समस्त प्राणी, जिस पुण्यात्मा की प्रशंसा बडे आदर से करते हैं, जो सदा-
चार के पुण्य-फलस्वरूप सूर्य के समान उदित होकर कलिकाल का अंधकार दूर करते थे,
जो श्रेष्ठ धर्म-पथ का महत्त्व जानते थे, जिनके पवित्र तेज के समान शत्रु-रूपी नक्षत्रों के
प्रकाश मंद पड जाते थे, जिन्होंने अपने खड्ग की दीप्ति-रूपी गंगा-प्रवाह में अन्य राजाओ
के ललाट में लगे गर्व-पंक को धो दिया था, असमान बलशाली, सत्यनिष्ठ, शरणार्थी
राजा-रूपी भ्रमरो के लिए (जिनका कर-कमल) आधार था, ऐसे कोनकाट भूपति के वंश
की कीर्त्ति बढाने हुए नय, विनय, दया के आगार महाराजा के पुत्र गोनरुद्र नरेन्द्र महान
प्रतापी तथा पवित्रात्मा थे । उनके पौत्र बुद्ध भूपाल अभंग, अप्रतिम विक्रमी, कुल-गोत्र के
संवर्द्धक, देवेन्द्र के समान वैभवशाली, वीर और विख्यात थे । उनके पुत्र अक्षीण दाक्षिण्य-
वनी (अर्थात् अक्षीण कृपावाले), धन-धान्य में कुवेर, मर्म में धर्मराज (युधिष्ठिर) के समान
अति-पुण्य सौजन्य-शील, शत्रुओ के लिए अति शौर्यवान् वामदेव कार्त्तिकेय, शुभजन्मा,
कामिनियों के लिए कामदेव, अखंड विक्रमी और रण-विशारद थे । वे चंदन, मदार-चंद्रिका-
हार, कदली, कुंद, इंदु सम उज्ज्वल कीर्तिमान्, गोनवंश-रूपी पारिजात के फल-स्वरूप

[बालकांड] [५]

दीखनेवाले, गोनवंश-रूपी उदयाद्रि पर भानु-सम दीप्त होनेवाले, गोनवंश-रूपी क्षीरसागर
के (उत्पन्न) चंद्र सम सुशोभित, अपनी कीर्त्ति को दिग्-दिगंतों में व्याप्त करनेवाले, अपने
दान-धर्म के द्वारा सबकी प्रशंसा प्राप्त करनेवाले, अपने असमान पौरुष से बड़ी आसानी से
शत्रुओं का नाश करनेवाले, महा बलशाली एवं प्रतापी राजाओं के लिए वज्रपाणि सम
दीखनेवाले, (शत्रु) नृप-वन के लिए साक्षात् अग्निदेव, सत्यनिष्ठ, महाबलशाली शत्रु-सेनाओं
को मथने में मयर पर्वत की भाँति प्रचंड रूप धारण करनेवाले, अपने खड्ग-रूपी सूर्य-बिम्ब
की प्रभा से प्रतापी राजा-रूपी अंधकार का नाश करके अमर-वधुओं के मुख-कमलों को
वीर-भ्रमरों से अलंकृत करनेवाले, शत्रुओं के प्राण-रूपी अनिल का सेवन करनेवाले श्रेष्ठ
भुज-भुजंगों (सर्प-रूपी भुजाओं) पर राज्य-भार वहन करनेवाले थे, वे कुरु, केरल, अवंती,
कुंतल, द्रविड़, मरु, मत्स्य, करुष, मगध, पुलिंद, सरस, पाण्ड्य, कोसल और बर्बर की राज-
सभाओं में प्रशंसा प्राप्त करनेवाले, साम-दाम-भेद आदि नीतियों में निपुण, प्राचीन राजाओं
के समान समस्त वैभवों से युक्त तथा नय, विनय आदि उपायों से सुस्थिर विजय
प्राप्त किये हुए, यशस्वी विट्ठलनरेश, राजाओं में सर्वज्ञ, नरेशों से पूजित, सफल जगद्धित-
चातुर्य-धुरी, एक दिन अपनी राज-सभा में बैठे हुए थे। उस समय पुराणवेत्ता, शास्त्रज्ञ,
काव्य-नाटक-शिरोमणि, मित्र, मंत्री, पुरोहित, आश्रित, पुत्र, सामंत राजा और बहुश्रुत उनकी
सेवा में उपस्थित थे। राजा भूलोक के देवेन्द्र के समान बड़े उत्साह से रसिकजनों द्वारा
भारत, रामायण आदि का पाठ सुनकर बहुत प्रसन्न हुए।
तत्पश्चात् वे रसिक-शेखर (राजा) राम-कथा-सुधा से अनुरक्त हो, सभा में यों बोले—
'तेलुगु में रामायण को सुंदर ढंग से कहने की कविता-शक्ति रखनेवाले कवि इस संसार
में कौन हैं?' तब पंडितों ने उस उदात्त, यशस्वी विट्ठलनरेश से कहा--
(महाराज) आपके सुपुत्र, निपुण, पापरहित, नीति-निष्ठ, सर्वज्ञ, अनघ, शिष्ट-संपन्न,
सर्वपुराणवेत्ता, सुंदर कलाओं के मर्मज्ञ, सज्जनों को आश्रय देने में ही सुख का अनुभव
करनेवाले, कविसार्वभौम, कवि-कल्पतरु, कवि-कुल-भोज, कवीन्द्र, शत्रु-राजाओं के लिए वज्र-
पाणि, शत्रु राजा-रूपी वन के लिए प्रचण्ड पावक के समान दीखनेवाले, जिनके भयंकर
खड्ग में स्वर्गलोक तक प्रतिबिंबित है, त्रिलोक-दुर्दम, श्रेष्ठ-साधु-जन-रूपी कमलों के लिए
सूर्य, पुरुषश्रेष्ठ, आपके परम भक्त, निखिल शब्द, अर्थ, गुण आदि के ज्ञाता, महापंडित,
रामायण के मर्मज्ञ बुद्ध-नरेश (रामायण की कथा तेलुगु में कहने की) कविता-शक्ति
रखते हैं। (काव्य रचने के लिए) आप उन्हें आदेश दें।"
यह सुनकर उदात्त चरित्रवाले मेरे जनक ने मुझे बड़े स्नेह से बुलाकर यह आदेश
दिया—'रामायण की कथा पुराणों के ढंग पर तेलुगु भाषा में मेरे नाम पर लिखो कि
संसार के कवि और पंडित उसकी प्रशंसा करें।' उनके मृदु वचनों से अत्यंत हर्षित होकर
उनकी आज्ञा का पालन करने के हेतु शत्रुओं के लिए भयंकर मूर्ति, महान्, ललितसद्गुणा-
लंकारवाले, निश्चल दयालु, धन्यात्मा तथा पुण्यात्मा मेरे पिता विट्ठलनरेश के नाम पर
श्रीरामचन्द्र का चरित्र, इस ढंग से लिखूँगा कि राजा, पंडित, रसिक, सुकवि श्रेष्ठ,
गोष्ठियों में (उसे सुनकर) हर्षित होकर उसकी प्रशंसा करेंगे और जिसमें, शब्द, अर्थ, भाव,

६ रंगनाथ रामायण
गति, पद, शय्या, अर्थ-गौरव, यति, रस, कल्पना, प्रास, असमान रीतियाँ आदि होंगे और
आदि कवि वाल्मीकि की कृपा से सभी सज्जन मेरी प्रशंसा करेंगे । कथा का प्रारंभ यो है—
३. कथा का प्रारंभ
एक दिन श्रेष्ठ तपस्स्वाध्याय-निरत, महान् शीलवान् मुनिश्रेष्ठ नारद से अनघ,
तपोनिधि वाल्मीकि ने हाथ जोड़कर प्रश्न किया—“हे मुने, आप कृपया बतलाइए कि इस
संसार में, श्रीमान्, क्षमाशील, पुण्यात्मा, उन्नत, नीतिज्ञ, प्राज्ञ, दुर्दम, उत्तम, जितकाय, अजेय,
ईर्ष्याहीन, संपन्न, सुव्रती, उदार और चरित्रवान् कौन है ? जिनके क्रोध से इंद्रादि देवता
डरते रहते हैं ? ऐसा व्यक्ति क्या, कभी हुआ है या आगे चलकर इस पृथ्वी पर जन्म
लेनेवाला है ?”
यह सुनकर लोकज्ञाता नारद मुनि ने अपने मन में बहुत देर तक सोच-विचार कर
कहा—“इस पृथ्वी पर श्रीविष्णु, महाराज दशरथ के यहाँ जन्मे हैं । वे नियतात्मा, अति-
शौर्यनिधि, कृपानिधि, जयी और स्वजनों की रक्षा में विचक्षण हैं । वे कम्बु-कंधर, सुदराकार,
बिम्बारुण ओष्ठ, पीन वक्ष, विशाल-नेत्र, विशाल अवतंस और आजानुबाहु हैं । वे नियतात्मा,
वेदवेदांग-कोविद वेदविद्, विवेकभूषण, सूर्य के समान तेजस्वी, समुद्र के समान गंभीर,
अमराद्रि के समान धीर और पृथ्वी के समान क्षमाशील हैं । उनकी मूर्त्ति (लोगों को)
अपनी ओर आकृष्ट करती है । वे कौसल्या के आनंद-दाता, श्रीकर, दीप्तिमान्, त्रिलोक-
पावन मूर्त्ति, राम के नाम से अवतरित हुए हैं ।
राजर्षि (विश्वामित्र) के (रामचन्द्र को) माँगने तथा राजा के भेजने पर वे मुनि
के साथ गये । (उन्होंने) यज्ञ की रक्षा की, दानवी का नाश किया, राक्षसों का संहार
किया, शिला को स्त्री बनाया, शिव-धनुष को तोड़ा और सीताजी से विवाह करके बड़ी
ख्याति पाई । सीताजी के साथ अयोध्या जाते समय बड़े क्रोध से विप्र (परशुराम) ने
आकर उन्हें रोका, तो वे उनसे जूझ पड़े और उनका धनुष छीनकर उसे तोड़ डाला ।
उनके बाद सब लोगों के हृदयों को आनंद से भरते हुए वे अयोध्या पहुँचे ।
जब पिता '(राम को) युवराज बनाऊँगा'—ऐसा कहकर अयोध्या का राज देने को
उद्यत हुए, तब ढीठ मंथरा ने कैकेयी के कान भरे । कैकेयी पहले ही युद्ध में दो वर प्राप्त
कर चुकी थी । (राजा ने) राघव को कानन में भेज दिया । पिता के वचन से बँधकर,
वे सीता और लक्ष्मण के साथ वन में गये, जहाँ उन्होंने बड़े उत्साह से वनों में तपस्या
करनेवाले संयमी मुनियों की रक्षा की, खर-दूषणादि राक्षसों के सर धरों से काट डाले,
ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव से मित्रता की, एक ही बाण से वालि का संहार किया, (सीता
को पुन प्राप्त करने का) दृढ़ निश्चय करके सेतु को बाँधा तथा पापी दशकंठ के दसों
सिर काट डाले ।
उसके पश्चात् आश्रितों के कल्पवृक्ष रामचंद्र, सीता के साथ, वनचर-समूह तथा
इंद्रादि देवताओं द्वारा स्तुति किये जाते हुए और सेवा प्राप्त करते हुए, (अयोध्या) आये
और अपनी पूज्य साम्राज्य-लक्ष्मी का पालन करते हुए तथा प्रजा को सुख पहुँचाते हुए कृत-
कृत्य हुए हैं ।”

बालकांड ७
ईस प्रकार श्रीराम का चरित्र अथ से इति तक कहकर नारद मुनि ब्रह्मलोक को
चले गये । मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकि अत्यत हर्ष से अपने शिष्य भरद्वाज के साथ सज्जनता की
मूर्त्ति, अकलुष जीवन-युक्त, तमसा नदी के तट पर गये और उस नदी के जल से अपने
अनुष्ठान का पालन करते रहे । उस नदी के किनारे (पेड पर) क्रौंच पक्षियो का एक
जोडा बडे प्रेम से मिलकर बैठा था । एक व्याध ने जब उनमें से एक को मार गिराया,
तब क्रौंची शोक से विलाप करने लगी । यह देखकर न्याय और धर्म का विचार करके
मुनि उस व्याध पर क्रोध करते हुए बोले-“हे निषाद, हे पापी, इन्होने तुम्हारा क्या
बिगाडा था ? जब ये क्रौंच बडे प्रेम से मिले, तब तुमने इस प्रकार एक को क्यो मार
गिराया ? इस पाप के कारण तुम बहुत दुख प्राप्त करते हुए अनेक वर्षों तक भटकते
रहोगे ।”
इस प्रकार व्याध को शाप देकर वाल्मीकि ने अपने शिष्य भरद्वाज से छन्दोबद्ध शब्दो
में कहा-“मेरे द्वारा कहे हुए वचनो पर बार-बार विचार करने पर मालूम होता है कि
इन चार समवर्ण पक्तियो में छन्दोबद्धता है । यह बडे आश्चर्य की बात है कि ये शाप के
वाक्य अपने आप एक पद्य के रूप में प्रकट हुए है ।” तब भरद्वाज आदि शिष्य बडी भक्ति
से उस पद्य को (दुहराने) पढने लगे । अनघ वाल्मीकि अपने आश्रम को लौट आये ।
एक दिन ब्रह्मा उनके आश्रम में आये । वाल्मीकि ने उनकी अगवानी की, चरणो
पर झुककर नमस्कार किया, कुशासन पर बिठाकर उनकी पूजा की और हाथ जोडकर अपने
मुँह से निकले छन्दोबद्ध शाप-वचन उन्हें सुनाया । तब ब्रह्मा ने मुस्कुराकर कहा--“हे अनघ,
यह वाणी पद्य के रूप में आपके मुख से व्यक्त हुई है । नारद ने सारा राम-चरित मुझे
सक्षेप में कह सुनाया है । आप उसको विस्तार के साथ सुनाइए । अपने आप वह चरित्र
आपको सूझ जायेगा ।” यो कहकर ब्रह्मा चले गये ।
इस प्रकार बडी कृपापूर्वक कमलासन के वर देकर चले जाने के पश्चात् मुनि ने
निर्मल मति से ध्यान लगाकर सोचा और रघुचरित, दशरथ की कथा, रघुराम का जन्म,
राम का आचरण, ताडका-वध, उद्दण्ड राक्षसो का गर्व-भग, यज्ञ-रक्षा, गगा का महत्त्व,
गौतम की स्त्री का शाप-मोचन, धनुर्भंग, सीता-विवाह, अयोध्या जाते समय परशुराम का
क्रोध, राम के युवराज्याभिषेक की तैयारी, दुष्ट स्त्री कैकेयी के कटुवचन, अभिषेक में विघ्न,
राम-वन-गमन, राजा का शोक, दशरथ की मृत्यु, दाशरथि से गुह की भेंट, गगा पार
करना, तपोनिधि भरद्वाज से (राम की) भेंट, चित्रकूट पर्वत पर पहुँचना, भरत और राम
की भेंट और उनका पादुका प्राप्त करके लौट जाना, दण्डकवन-गमन, प्रचड विराध का वध,
पुण्यात्मा शरभग के दर्शन, मुनियो को वचन देना, अगस्त्याश्रम में पहुँचना दिव्य अस्त्रो की
प्राप्ति, मुनि के आदेशानुसार पर्ण-कुटी बनाकर निवास करना, (राम पर) मुग्ध होकर
राक्षसी (शूर्पणखा) का आना, उसके साथ वार्त्तालाप, रामानुज के द्वारा उसका नाश, उधर
रावण का बुद्धि-भ्रष्ट होना, कुटिल मारीच की मृत्यु, राक्षसराज (रावण) के द्वारा सीता-
पहरण, राम का विलाप, जटायु की मृत्यु, कबंध से भेंट, पपासरोवर को गमन, ऋष्यमूक पर्वत पर
सुग्रीव से भेंट, उससे मित्रता, वालि-सुग्रीव के वैर का कारण जानना, श्रीराम का एक साथ

८ रंगनाथ रामायण
सातो ताड़ के पेड़ो को काट देना, वालि का वध, दारा का विलाप, रविपुत्र (अंगद) का
राज्याभिषेक, माल्यवत में उस पुरुषोत्तम का वर्षा-काल बिताना, काकुत्स्थ (राम) का कोप,
कपियो का आना, अगूठी देकर (उन्हें) भेजना, वानरो के द्वारा सीता का अथक अन्वेषण,
विल का दर्शन, महेन्द्रगिरि का आरोहण, सपाती से भेंट, समुद्र को लाँघते समय बीच में
मैनाक के दर्शन, सिंहिका की वायुपुत्र से मुठभेड़ और उसकी मृत्यु, लका राक्षसी को तग
करना, उस स्त्री से लका का मार्ग जानकर लका में प्रवेश करना, अत पुर में सीता की
खोज, अशोकवन का अवलोकन, वहाँ सीताजी का संदर्शन, विश्वास दिलाने के लिए अगूठी
देकर उन्हें सान्त्वना देना, अशोकवन को उजाडना, उस समय हनुमान् का अक्षयकुमार को
मार डालना, पवनसुत का वधन में पडना, लका नगर को जलाना, मानिनी सीता का चूडा-
मणि देकर श्रीराम तथा हनुमान को उत्साहित करना, सूर्यकुलाधिप (श्रीराम) का लका
पर

बालकाण्ड ६
४. कुश-लव का रामायण-गान
कोसल-देश में सरयू नदी के किनारे, पृथिवी के ऊरु-भाग के समान अयोध्या नगर
सुशोभित था। वह बारह योजन लंबा, पाँच योजन चौड़ा था और शिल्प-निपुण मय द्वारा
निर्मित था। वह शत्रु-राजाओ की आँखो में खटकनेवाला नगर सूर्यवंशी राजाओ की राज-
धानी था। वह रत्नमय गोपुर, मणिमय तोरण, मणिमय कुट्टिम (फर्श), गवाक्ष, क्रीडा-
गृह, कृत्रक शैल (बनावटी पर्वत), पटह-नाद (नगाडे की आवाज), विशालकाय हाथी,
उत्तम घोडे, नाना प्रकार के रथ-समूह, सेना, स्वच्छ सौध, बाजार, कमनीय उपवन, सरोवर,
तालाब, बावडी ऊख के खेत, धान के खेत, गहरी खाई तथा महलों से भरा हुआ संसार-
भर में विख्यात था। उस नगर में दशरथ नामक राजा राज्य करते थे, जो धनुर्विद्या में
निपुण, साम, दाम, भेद आदि चार उपायो के ज्ञाता, (भगवान् के ऐश्वर्य आदि) षड्गुणों के
आगार, (इच्छा, ज्ञान एव क्रिया) शक्तित्रय-संधानकर्त्ता, धर्मनिरत, कृताध्वर (जिसने
यज्ञ किया है), श्रीसपन्न, धर्मशास्त्र, पुराणादि के ज्ञाता, अजनंदन, बाल्यावस्था से, नियमानुकूल
प्रजा का पालन करते रहनेवाले परमपवित्र व्यक्ति, इन्द्र के निमित्त शंबरासुर का गर्व भंग
कर इंद्र से मंदार-पुष्पों को प्राप्त करनेवाले, इन्दुमती के पुत्र और सूर्यवंश में श्रेष्ठ राजा थे ।
वे तेज, कांति, त्याग, चातुर्य, उदारता, साहस, आदि सद्‌गुणो के भाडार थे ।
वे उदित होते हुए सूर्य की भाँति अपने उग्र तेज से सप्त द्वीपो को दीप्त करते हुए शासन
करते थे। उस नरनाथ के तीन सौ पचास रानियाँ थीं, जिनमें विशेष कर अचल शील-
वाली कौसल्या, कुचकुभ-निर्जित परिधानवाली कैकेयी, पुण्यशीला सुमित्रा त्रयी विद्याओ
के समान थीं। इस पृथिवी पर उनके हितैषी पुरोहित वसिष्ठ आदि पुण्य संयमी थे। पुण्यात्मा
धृष्टि, विजय, सिद्धार्थ, अर्थसाधक, जयंत, नीतिवेत्ता अशोक, धीमान् मंत्री सुमंत्र आदि
उनके आठ सचिव थे। सभी सचिव परस्पर मित्र और स्वामिकार्य में विचक्षण और चतुर थे।
वे परम मर्मों के उद्घाटन में निपुण थे और विचार-पूर्वक प्रजा की रक्षा करते थे।
समस्त कार्यों को सँभालनेवाले ऐसे आठ मंत्रियो से युक्त राजा दशरथ अष्टाक्षर और अष्ट-
भुजाओ से समन्वित नारायण की तरह सुशोभित थे। उनके राज्य में निर्बल, चुगलखोर,
रोगी, दरिद्र, व्यभिचारी, अनाचारी, पापी, क्रूर, नीच, जड, मूर्ख, मद, एक भी व्यक्ति नहीं था।
सारी प्रजा मणि-कुडल आदि से अलकृत, धर्मपरायण, कुलाचार-निरत, सकलशास्त्र-
पारंगत तथा विष्णु-भक्त थीं। इस प्रकार बडी कुशलता से राज्य का पालन करते और
राज्य-सुख भोगते हुए राजा दशरथ एक दिन अपने मन-ही-मन इस प्रकार सोचने लगे।
५. पुत्रकामेष्टि यज्ञ करने के लिए दशरथ का मंत्रियों से परामर्श
राजा दशरथ अपनी निस्संतान अवस्था का तथा अपनी ढलती आयु का विचार
करते हुए बहुत दुःखी हुए। उन्होंने अपने सभी श्रेष्ठ मंत्रियो को बुला भेजा और उन्हें
उचित आसन पर बैठने का आदेश देकर स्वयं भी आसन पर बैठ गये। और, उनसे इस
प्रकार कहने लगे- "मैंने बहुत दान दिये, अनेक धर्म-कार्य किये, कई यज्ञ किये और बहुत

१० रंगनाथ रामायण
सालों से जीवन व्यतीत कर रहा हूँ। मैंने बड़ी कीर्त्ति पाई है। तुम्हारे जैसे स्नेही मंत्रियों
के रहते हुए मुझे किसी बात का अभाव नहीं है। पुत्र-हीन होने का एकमात्र दुःख ही
मुझे है। कुल का उद्धार करनेवाले पुत्रों के बिना कोई भी व्यक्ति पुण्य और स्वर्गलोक
की प्राप्ति नहीं कर सकता। इसलिए मेरे भी पुत्र उत्पन्न होने चाहिए। समस्त संसार
मेरी प्रशंसा करे, एतदर्थ मैं अश्वमेध यज्ञ करूँगा और उसके बाद पुत्र-कामेष्टि यज्ञ करूँगा।
इन यज्ञों के कारण मेरा हित होगा और मैं जरूर पुत्र प्राप्त करूँगा। राजा के यों कहने
पर वे सब बड़े संभ्रमचित्त होकर मन में हर्षित हुए। उन्हें प्रसन्न देखकर राजा मन में
विचारकर बोले—
मैं अनुपम रीति से, बड़े विनय के साथ अश्वमेध यज्ञ करूँगा, जिसकी प्रशंसा देवता
भी करेंगे और पुत्रों के लिए पुत्रकामेष्टि-यज्ञ नेत्र-पर्व रीति (दर्शकों की आँखों को तृप्ति
देनेवाली रीति) से करूँगा। ऐसा कहकर उन्होंने आवश्यक प्रबन्ध करने के लिए सब लोगों
को भेजा। उसी समय अनघ वसिष्ठ आदि मुनि वहाँ आये। (राजा ने) दण्डवत की और
बड़ी श्रद्धा से उन्हें लिवा लाये और उनसे बोले—हे महान् संयमी तथा पुण्यवान् वसिष्ठ !
यथाशीघ्र आप मुझसे श्रेष्ठ अश्वमेध यज्ञ करवाइए, जिससे मुझे एक पुत्र की प्राप्ति हो।'
इस पर (मुनि बोले)—'तुम्हारे द्वारा संपन्न होनेवाले अश्वमेध यज्ञ का निर्वाह हम करेंगे।
उस श्रेष्ठ यज्ञ की महिमा का वर्णन करना क्या सहज है ? इसके अतिरिक्त पुत्र-कामेष्टि
करने से तुम धन्यात्मा पुत्रों को प्राप्त करोगे।' यह सुनकर राजा को बड़ा हर्ष हुआ।
उन्होंने सबको विदा किया और रनवास में पहुँचकर सभी रानियों को यह शुभ संवाद
सुनाया। तब से वे प्रसन्नचित्त रहने लगे। एक दिन अनघ सूत (सुमंत्र) राजा के पास
आकर एकान्त में यों कहने लगे—
६. ऋष्यशृंग का वृत्तांत
सुमंत्र ने कहा—“हे महाराज, इसके पहले आपको संतान-प्राप्ति कैसे होगी, इस
सम्बन्ध में मैंने एक कथा सुनी थी। आप उसे सुनें। अंगराज के पुत्र गुणवान् रोमपाद के
राज्य में न जाने उनके किस अपराध से वर्षा नहीं हुई। अपने राज्य में कहीं भी वर्षा
न होते देख राजा बहुत दुःखी हुए। उन्होंने श्रेष्ठ मुनियों से वर्षा के निमित्त बहुत हवन
करवाये, फिर भी वर्षा नहीं हुई। तब राजा को अत्यंत दुःख से पीड़ित देखकर मुनियों ने
कहा—“हे महीपाल ! हे राजचन्द्र ! इस पृथ्वी पर वर्षा होने के लिए हम शुद्ध मन से आपको
एक उपाय बतायेंगे। हे पर्वत के समान वीर ! परहितनिरत विभांडक के पुत्र पुण्यनिधि
ऋष्यशृंग जन्म से नगर-ग्राम के सम्बन्ध में कोई ज्ञान न रखने के कारण स्त्रियों के नाम
तक से अनभिज्ञ हैं। वे तपस्वी की वृत्ति में जंगलों में रहते हैं। हे वसुधेश ! उनके यहाँ
आते ही अनावृष्टि-दोष तुरन्त दूर हो जायगा। इसपर राजा अपन मन में सोचने लगे कि
उन मुनिश्रेष्ठ को नगर में कैसे ले आ सकूँगा। उन्होंने बुद्धिमान् मंत्रियों तथा मुनियों को
बुलाकर बड़े प्रसन्न चित्त से पूछा। मुनियों तथा मंत्रियों ने भी बड़ी प्रसन्नता से उपाय
बताये, तो राजा मन ही मन बहुत हर्षित हुए। मुनियों ने कहा—“महाराज, अभी
आप कई (प्रकार के) मिष्टान्न तथा सुन्दर वस्तुएँ देकर वेश्याओं को वन में भेजिए।