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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 508 में से

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पृष्ठ 21

( १७ )
अंघ्रुल कोलिविकि भूतलंबुन निंडि पोलुपारे जूड हरिपाद मुन वृष्टि अय्यादि गंग
धरणि पै बरगुविधवच्चु पडग वरिकिप राम भूपालकुंड़पुडु हरुडुविष्णुवु, दानयनु
माड्रिकिनुंडे ।
(भरत ने निर्मलचेता एवं सदाचार-संपन्न वसिष्ठ, गौतम, जाबालि, कश्यप, गर्ग,
वामदेव आदि मुनीश्वरो को तथा चतुर्वेद-पारंगत विबुधो को बुलाकर विनय एव भक्ति
के साथ उनसे कहा--'आप कृपया विधिवत् श्रीराम का राजतिलक कीजिए ।' तब
मंगल-वाद्यो की ध्वनि के साथ वे जानकी तथा राम को बुला लाये और रमणीय रत्नपीठ
पर उन दोनो को आसीन कराया और वेदमंत्र-पूर्वक पुण्य सलिल से उनका अभिषेक
किया । राम के मस्तक पर से गिरनेवाली वह पुण्य जलधारा देखने में बहुत ही रमणीय
प्रतीत होती थी। देवताओ की स्तुतियो को प्राप्त करते हुए पार्वती के साथ विलसित
होनेवाले परमशिव की जटा से झरनेवाली गंगा नदी की भाँति वह जलधारा अत्यत
कमनीय दीख रही थी । वह (जलधारा) क्रमशः उनके चरणो से होकर पृथ्वी पर
ऐसे गिरने लगी, मानो विष्णु के चरणो में जन्म लेकर पवित्र गगा पृथ्वी पर उतर
रही हो। इस प्रकार, उस समय रामचन्द्र स्वयं विष्णु तथा शिव की भाँति
शोभायमान हुए ।)
मुहावरों का सम्यक् प्रयोग, भावो के अनुकूल भाषा, स्वाभाविक अनुप्रासो की
छटा, उक्ति-सौंदर्य तथा ओज, प्रसाद एवं माधुर्य गुणों से युक्त शैली, ये सभी कवि के
विलक्षण पांडित्य तथा कवित्व-शक्ति का परिचय देते हैं।
वैसे तो अनुवाद का कार्य ही कुछ कठिन है; क्योकि कितना भी प्रयत्न किया जाय,
मूल की सुन्दरता अनुवाद में नहीं आ सकती । एक भाषा की श्रेष्ठ कलाकृति का दूसरी
भाषा के गद्य में सरस अनुवाद प्रस्तुत करना स्वभावत. कठिन कार्य है । तेलुगु और
हिन्दी दो भिन्न भाषा-परिवार की भाषाएँ हैं और उनके अपने-अपने मुहावरे हैं। मुहावरो
का अनुवाद तो हो नहीं सकता। हाँ, यह प्रयत्न अवश्य हो सकता है कि तेलुगु मुहावरे
का मिलता-जुलता हिन्दी-मुहावरा का उपयोग किया जाय। फिर भी, अनुवाद अनुवाद ही है।
अनुप्रास, यमक आदि अलकारो का सौंदर्य एवं उक्ति-वैचित्र्य आदि अनुवाद में लाना
कठिन है । उदाहरण के लिए--
तोगलु वेट्टितुमु दुष्टारि सतुल, तोगलु जानकि इक तोल पग
तोगलार ! इकभीव तोग येष्ट्रि दनुचु, तोगतेल्ल चिदिभि वैतु रु पेच्चु पेरिगि।
'तोग' के कई अर्थ हैं--दुख, कष्ट, धक्ल। यहाँ कवि ने यमक अलकार के
द्वारा 'तोग' शब्द के प्रयोग से भिन्न-भिन्न अर्थो की अभिव्यञ्जना की हैं; किन्तु यह सुन्दरता
अनुवाद में लाना असभव है ।
फिर भी, अनुवादक ने मूल के प्रति निष्ठा बरतते हुए यथा.सभव मूल रचना की
सुंदरता को अनुवाद में लाने की भरपूर चेष्टा की है। उसे कहाँतक सफलता मिली है,
इसका मूल्याकन करना सहृदय पाठको का काम है ।